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  • अजमेर का इतिहास - 75

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 75

    बीसवीं सदी में अजमेर (1)


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    ई.1901 में जनता के चंदे से भारतीय क्लब के रूप में ट्रेवर हॉल का निर्माण किया गया। बाद में ट्रेवर के अनुरोध पर इसे टाउन हॉल बना दिया गया तथा म्युन्सिपल कमेटी को सौंप दिया गया। 1 मार्च 1901 को अजमेर में जनगणना करवाई गयी। इस जनगणना में अजमेर नगर में 73,839 मनुष्यों का निवास करना पाया गया। इनमें से 46,298 हिन्दू, 25,569 मुसलमान, 1,871 ईसाई तथा 101 अन्य धर्मावलम्बी थे।

    ई.1902 में जनरल मैनेजर के अधीन कोर्ट ऑफ वार्ड्स की स्थापना की गयी। 18 नवम्बर 1902 को वायसराय एवं गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्जन अजमेर आया। उसने मेयो कॉलेज में एक भाषण दिया जिसमें उसने कुलीन वर्गों के भारतीय जनता पर वास्तविक प्रभाव की चर्चा की। उस वर्ग के विद्यार्थियों को कॉलेज में बुलाकर उन चीजों की शिक्षा देना जो उनके काम नहीं आयेंगी, व्यर्थ था। पोलो खेलने की उसने फिर से निंदा की। वर्ष 1902-03 में अजमेर म्युनिसपलिटी की आय 1,83,000 रुपये थी। अजमेर की उस समय की जनसंख्या के आधार पर म्युनिसपलिटी की प्रति व्यक्ति से आय 2 रुपये आठ आने थी। ई.1904 में अजमेर में को-ऑपरेटिव क्रेडिट मूवमेंट आरंभ हुआ।

    ई.1904 में आनासागर के किनारे की बारादरी, नया बाजार की बादशाही बिल्डिंग, अढाई दिन का झौंपड़ा, ब्यावर रोड पर रेलवे गुड्स शेड के निकट अब्दुल्लाह खां का मकबरा, दरगाह ख्वाजा में सोला खुम्भा तथा कोस मीनार को मोन्यूमेंट प्रिजर्वेशन एक्ट 1904 के अंतर्गत संरक्षित भवन घोषित किया गया। किशनगढ़ से अजमेर के बीच में आज भी आठ कोसमीनारें स्थित हैं। इनका निर्माण अकबर ने करवाया था। ये कोस मीनारें यात्रियों के लिये मील के पत्थर के रूप में कार्य करती थीं।

    ई.1905 में अजमेर में जल आपूर्ति के प्रशन को हल करने के लिए भारत का सेनेटरी कमिश्नर मि.लेस्ली अजमेर आया। 4 अप्रेल 1906 को भारत का वायसराय एवं गवर्नर जनरल लॉर्ड मिण्टो अजमेर आया।

    ई.1907 में आनासागर के तट पर स्थित बारादरियों का पुनर्निर्माण करवाया गया। अजमेर में स्वच्छ जल की आपूर्ति की व्यवस्था करने के लिए मि.सिल्फ को अजमेर भेजा गया।

    3 जनवरी 1907 को अफगानिस्तान का अमीर हबीबुल्लाहखां अजमेर आया। वह प्रातः 10 बजे विशेष ट्रेन से अजमेर पहुँचा तथा ट्रेन से उतरकर सीधा ख्वाजा की दरगाह के लिये रवाना हो गया। वह ख्वाजा की दरगाह तक जूते पहनकर गया। ऐसा करने वाला वह पहला व्यक्ति था। वह तथा उसके 44 सरदार आनासागर के किनारे बनी बारादरियों में ठहरे। वह दस घण्टे अजमेर में ठहरा। उसने दोपहर का भोजन अजमेर में खाया तथा रात्रि का भोजन ट्रेन में खाया।

    ई.1908 में अजमेर-मेरवाड़ा में आबकारी विभाग की स्थापना की गयी तथा शराब बनाने की मद्रास पद्धति अपनायी गयी। 19 अक्टूबर 1908 को अजमेर में राजपूताना म्यूजियम की स्थापना की गयी। ई.1909 में अजमेर में भयंकर फ्लेग फैला। इसी वर्ष अजमेर में रेलवे बिसेट इंस्टीट्यूट की स्थापना की गयी। ई.1910 में मि. लुप्टन ने तीस वर्षीय सैटलमेंट बनाया।

    1870 से ब्रिटिश सरकार भारतीय राजाओं एवं राजकुमारों को सभ्य बनाने के मिशन पर कार्य कर रही थी किंतु इसका परिणाम यह रहा था कि अंग्रेजीयत में रचे-बसे राजा और राजकुमार अपने ही राज्यों में अलोकप्रिय होते जा रहे थे। ई. 1910 तक आते-आते यह मिशन असफल मान लिया गया तथा इस मिशन की असफलता का उत्तरदायित्व स्थानीय पोलिटिकल अधिकारियों पर डाल दिया गया। उनके अभिमानी तथा प्रभुतासम्पन्न व्यवहार को बलि का बकरा बना दिया गया।

    अब संचार के नये साधन विकसित हो चुके थे जिससे एजीजी का सीधा सम्पर्क वायसराय से निरंतर बना रहने लगा। इसलिये अब स्थानीय पोलिटिकल अधिकारियों को डाकघर के समान बना दिया गया जिसमें उनके लिये स्वविवेक तथा निर्णय लेने का अधिकार जैसी बातों की संभावना नहीं रह गई। अब तक विभिन्न रियासतों में पोलिटिकल अधिकारी 10 से 13 साल तक कार्यरत रहते थे किंतु अब उनका कार्यकाल छोटा कर दिया गया। साथ ही राजाओं को विदेश जाने की अनुमति देने पर रोक लगा दी ताकि उन पर अंग्रेजियत का रंग और न चढ़े।

    वस्तुतः भारतीय नरेश अंग्रेजों के लिये सुरक्षा कवच की तरह थे। राजाओं तथा उनकी पुरानी परम्पराओं को भारतीय जनता पसंद करती थी इसलिये राजाओं के बने रहने पर अंग्रेजों के राज्य को कोई खतरा नहीं था।

    मार्ले-मिण्टो सुधार

    ई.1911 में देश में मार्ले मिण्टो सुधार लागू किये गये जिनके कारण ब्रिटिश भारत के प्रांतों के प्रशासन में बड़ा परिवर्तन आया किंतु अजमेर-मेरवाड़ा के प्रशासन में कोई परिवर्तन नहीं किया गया।

    ब्रिटिश महारानी अजमेर में

    21 दिसम्बर 1911 को ब्रिटेन की महारानी मैरी अजमेर आई। उसके साथ डचेज ऑफ डेवोनशायर, दी अर्ल एण्ड काउण्टेस ऑफ शाफ्ट्सबरी तथा सम्मानित वेनेटिया बेरिंग भी अजमेर आये। वह सायं साढ़े तीन बजे अजमेर पहुँची तथा रेजीडेंसी में ठहरी। वह उसी सायं मेयो कॉलेज तथा आनासागर झील देखने गई। 22 दिसम्बर को प्रातः 10 बजे वह तीर्थराज पुष्कर के दर्शन करने गई। वहाँ से लौटने के बाद सायं 4 बजे वह ख्वाजा की दरगाह तथा उसके बाद ढाई दिन का झौंपड़ा देखने गई। 23 दिसम्बर को प्रातः 10 बजे वह देवली के लिये रवाना हो गई।

    एडवर्ड मेमोरियल हॉल

    6 मई 1911 को इंगलैण्ड के राजा एडवर्ड सप्तम का निधन हो गया। उसकी स्मृति में ई.1912 में अजमेर में किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉल बनाया गया। इसके लिये जोधपुर दरबार सरदारसिंह की तरफ से 10,000 रुपया दिया गया और समग्र भारतीय यादगार के लिये एक अच्छी रकम दी गई। जोधपुर नरेश सरदारसिंह की तरफ से मेयो कॉलेज के चारों ओर के स्थानों को सुधारने के लिये एक लाख रुपया दिया गया।

    लॉर्ड हाडिंग अजमेर में

    16 नवम्बर 1912 को भारत वायसराय लॉर्ड हार्डिंग अजमेर आया।

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