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  • अजमेर का इतिहास - 74

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 74

    आर्यसमाज द्वारा अजमेर में नवीन शिक्षण पद्धति की स्थापना


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    आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म ई.1824 में गुजरात में हुआ। राजस्थान में उनका प्रवेश आर्यसमाज की स्थापना से 10 वर्ष पूर्व अर्थात् ई.1865 में हुआ। ई.1865-66 में उन्होंने धौलपुर, करौली, जयपुर, अजमेर तथा पुष्कर आदि स्थानों का दौरा किया। मुंशी अमीनचंद जज ने उनका पहला प्रवचन गजमल लूनियां की हवेली में करवाया। ई.1875 में दयानंद सरस्वती ने मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की तथा 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया। ई.1878 में वे एक बार पुनः राजस्थान आये।

    इस बार भी उन्होंने जयपुर, अजमेर तथा पुष्कर आदि स्थलों का भ्रमण किया। नौकरियों राजस्थान में अजमेर को आर्यसमाज की गतिविधियों का मुख्य केन्द्र बनाया। ई.1883 में तीसरे राजस्थान दौरे के अंत में वे जोधपुर गये जहाँ जसवंतसिंह की वेश्या नन्ही बाई ने स्वामीजी को विष दे दिया। स्वामीजी को जोधपुर से अजमेर लाया गया। उनके उपचार के प्रयत्न किये गये किंतु उन्हें बचाया नहीं जा सका।

    मुराद अली ने चालाकी से काम लेते हुए, दयांनद सरस्वती की मृत्यु के बारे में लिखा है कि हिन्दू लोग उनसे सख्त नाराज थे। यहाँ तक कि जब अजमेर में उनका निधन हुआ तो उनकी शवयात्रा में तीन चार आदमियों के अतिरिक्त किसी ने हाथ नहीं लगाया। यद्यपि उदयपुर के महाराणा सज्जनसिंह, जोधपुर के प्रधानमंत्री प्रतापसिंह शाहपुरा के राजाधिराज नाहरसिंह उनके शिष्य थे, तथा लोगों के हृदय में उनकी शिक्षाओं का बीज बोया जा चुका था इसलिये उनके मरते ही अजमेर में आर्यसमाज के सैंकड़ों आदमी प्रकट हो गये।

    कैसरगंज में आर्यसमाज का भवन बनाया गया तथा उस पर दयानंदी झण्डा फहराने लगा। मुरादअली की बातों में स्वयं ही विरोधाभास है। जब लोग दयानंद सरस्वती से इतने नाराज थे कि उनकी शव यात्रा में तीन-चार आदमियों ने ही भाग लिया तब यह कैसे संभव हुआ कि उनकी मृत्यु के बाद अजमेर में उनके सैंकड़ों अनुयायी प्रकट हो गये। वस्तुतः स्वामी दयानंद सरस्वती के सिद्धांतों को उनके जीवन काल में ही पर्याप्त प्रसिद्धि मिल चुकी थी तथा अजमेर में उनके सैंकड़ों अनुयायी बन चुके थे।

    आर्यसमाज अजमेर

    ई.1882 में मुंशी मुन्नालाल ने आर्यसमाज अजमेर के तत्वावधान में अजमेर से देश हितैषी का प्रकाशन प्रारंभ किया। इस समाचार पत्र में बाल विवाह तथा विधवा विवाह की समस्याओं पर सामग्री प्रकाशित की गई। साथ ही प्रतापनारायण मिश्रा द्वारा देशदशा नामक आलेख प्रकाशित हुआ। ई.1888 में आर्य प्रतिनिधि सभा राजस्थान की स्थापना हुई। 13 फरवरी 1923 से इसने अपनी पत्रिका आर्य मार्तण्ड का प्रकाशन आरंभ किया। यह पत्रिका आर्यसमाज की धार्मिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक गतिविधियों की मुख्य ध्वजवाहक बन गई।

    ई.1895 में आर्यसमाज अजमेर द्वारा अजमेर में श्री मध्यानंद अनाथालय की स्थापना की गई। ई.1903 से इस अनाथालाय द्वारा अनाथ रक्षक नामक मासिक पत्रिका आरम्भ की गई। इसका उद्देश्य स्त्रियों की दशा में सुधार लाना था। इसका उद्घोष इस प्रकार से था-


    लाखों तुम्हारे लाल जाति के लूटे अभी जा रहे।

    पर तुम नहीं कुछ सोचते गाढ़ निद्रा ले रहे।

    द्रव्यवनो द्रव्य का उपयोग करना छोड़ दो

    दीन अबला और अनाथों का हृदय से साथ दो।

    ई.1904 में ईसाई पादरी डॉ. समरवैली ने आर्यसमाज की शिक्षाओं एवं उसके प्रभाव का प्रतिकार करने के लिये अपने चिकित्सालय में शाम के समय न्यू टेस्टामेंट क्लास आरंभ की। इसके विरोध में आर्यसमाज द्वारा अपनी संस्थाओं में भी सांध्यकालीन सत्र आरंभ किये गये जिनमें सांध्य कालीन हवन, मंत्रों का गायन एवं वैदिक ज्ञान की शिक्षा दी जाती थी। इन कक्षाओं में लड़कियों को भी प्रवेश दिया जाता था। ई.1929-30 में आर्यसमाज अजमेर ने बड़ी संख्या में विधवा विवाह करवाये। आर्य मार्तण्ड में प्रकाशित लेख अजमेर में विधवा विवाह की धूम में कहा गया कि अजमेर में इस वर्ष 41 विधवा विवाह करवाये गये।

    आर्य स्त्री समाज, अजमेर

    26 दिसम्बर 1904 को गुलाब देवी महेश्वरी तथा सिद्धा कंवर ने अजमेर में आर्य स्त्री समाज की स्थापना की। राजस्थान में आर्य स्त्री समाज की पहले पहल स्थापना अजमेर में ही हुई थी। आर्य स्त्री समाज द्वारा महिलाओं में धार्मिक जागृति लाने, नामकरण तथा जनेऊ संस्कार करने जैसी गतिविधियां चलाईं। इससे स्त्री समाज में सामाजिक बुराईयों के प्रति चेतना आई।

    आर्यसमाज अजमेर ने विधवा एवं असहाय स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाने के लिये 8 विधवा स्त्रियों के साथ दयानंद आश्रम के भीतर विधवा आश्रम की स्थापना की। इस विधवाश्रम में मुस्लिम विधवाओं को भी स्थान दिया गया। ई.1937 में विधवा आश्रम अजमेर द्वारा एक अंतर्जातीय विधवा विवाह आयोजित किया गया। इसमें वर ब्राह्मण जाति से था जबकि दुल्हन बलाई जाति से थी।

    गुलाब देवी ने अपनी सहकर्मियों भंवरीदेवी, सिद्धा कंवर बाई, सुखदा देवी, पम्मी बारी आदि के साथ मिलकर अजमेर के आस पास के गांवों में शिविर लगाकर स्त्रियों को अक्षर ज्ञान करवाना आरंभ किया। जुलाई 1928 में कौशल्या देवी, सुभद्रा देवी एवं मनोरमा देवी ने अजमेर में पर्दा निवारक मण्डल की स्थापना की। मूल चंद अग्रवाल ने आर्य मार्तण्ड में 'पर्दा प्रथा अवैदिक है', शीर्षक से लेख लिखा जिसमें नौकरियों वैदिक श्लोकों का उदाहरण देते हुए कहा कि इनका अर्थ मुँह ढकना नहीं है।

    बाल विवाह का विरोध

    हर बिलास शारदा के नेतृत्व में आर्यसमाज अजमेर ने बाल विवाह का प्रबल विरोध किया। ई.1929 में उनकी प्रार्थना पर बाल विवाह निषेध एक्ट बना जिसे शारदा एक्ट भी कहा जाता है। इस एक्ट के अनुसार विवाह के समय लड़के की आयु कम से कम 18 साल तथा लड़की की आयु कम से कम 14 साल होनी अनिवार्य की गई।

    आर्यसमाज द्वारा नवीन शिक्षण पद्धति की स्थापना

    स्वामी दयानंद सरस्वती आधुनिक भारत के प्रथम देशी शिक्षाविद् थे। उनकी शिक्षा पद्धति ने मनोवैज्ञानिक स्तर पर गहरी सफलता अर्जित की क्योंकि भारतीय शिक्षाविद एक आदर्श शिक्षा पद्धति को तलाश रहे थे। अंग्रेजी शिक्षा पद्धति में भारतीय संस्कृति को पूरी तरह नकार दिया गया था, उसके स्थान पर दयानंद सरस्वती ने पूरी तरह भारतीय संस्कृति पर आधारित शिक्षा पद्धति का विकास किया। आर्य समाजी शिक्षा पद्धति में जाति और नस्ल का कोई भेदभाव नहीं था। सबके लिये फीस भी समान थी।

    इस शिक्षा पद्धति में मानव मन एवं मस्तिष्क को दक्ष, सुंदर एवं क्षमतावान बनाने का लक्ष्य रखा गया था। इस पद्धति में अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी को स्वैच्छिक माध्यम के रूप में पढ़ने का अवसर दिया गया था। उनके द्वारा खोले गये स्कूलों ने इतनी अधिक लोकप्रियता अर्जित की कि मार्टिण्डल को यह टिप्पणी करनी पड़ी कि आर्यसमाजी स्कूल ईसाई मिशनरी स्कलों के समानांतर हैं। इनमें क्रिश्चियन मिशनरी स्कूलों के बराबर ही, अध्ययन के विषय, अनुशासन के नियम तथा विद्यार्थियों में शिक्षा के प्रति रुचि उत्पन्न की गई है।

    आर्यसमाज ने इस क्षेत्र में गुणवत्ता और संख्या की दृष्टि से अच्छी स्कूलें स्थापित की जिनके माध्यम से समाज में समानता का प्रसार करने तथा अंधविश्वासों को दूर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया गया। इन स्कूलों के माध्यम से बच्चों में राष्ट्रीय चेतना का भी विकास हुआ तथा छुआछूत जैसी बुराईयों को भी कम करने में सहायता मिली।

    दयानंद आश्रम एंग्लो-वैदिक पाठशाला

    ई.1888 में अजमेर के आर्य समाजी कार्यकर्ताओं ने दयानन्द आश्रम पाठशाला की स्थापना की जिसका नाम बाद में बदलकर दयानन्द आश्रम ऐंग्लो वैदिक पाठशाला रखा गया। सर्वप्रथम 1 अध्यापक एवं 11 विद्यार्थियों से यह विद्यालय खोला गया। विद्यालय का प्रबंध आर्यसमाज अजमेर की एक उपशाखा के अधीन था, जिसके प्रधान हर बिलास शारदा एवं मंत्री हीरालाल थे। ई.1888 के अंत तक इस विद्यालय में छात्रों की संख्या 111 हो गई। ई.1897 में यह विद्यालय हाई स्कूल में क्रमोन्नत हुआ।

    इस विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती गई। ई.1888 में 111, ई.1899 में 445, ई.1909 में 480, ई.1919 में 590, ई.1929 में 702, ई.1939 में 839, ई.1941 में 957 छात्र इस विद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। विद्यार्थियों की बढ़ती हुई संख्या के कारण ई.1927 में दो विभाग और ई.1931 में तीन विभाग उच्च कक्षाओं के खोले गये। ई.1927 में अध्यापकों की संख्या 40 के लगभग थी। अगस्त 1941 में इस विद्यालय की स्वर्ण जयंती उदयपुर के तत्कालीन दीवान सर टी विजय राघवाचार्य की अध्यक्षता में मनाई गई। इसमें आर्यसमाज के शिक्षा कार्य एवं डी ए वी स्कूल की प्रशंसा की गई कि इस संस्था ने विद्या प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

    दयानन्द विद्यालय

    निर्धन एवं उपेक्षित बालकों की शिक्षा के लिये जुलाई 1943 में महात्मा कन्हैयालाल द्वारा अजमेर में दयानन्द विद्यालय की स्थापना की गई। ई.1944 में शिक्षा विभाग द्वारा इस विद्यालय को मिडिल स्कूल की मान्यता प्रदान की गई। ई.1946 में यह विद्यालय हाईस्कूल में क्रमोन्नत हो गया। विद्यालय का संचालन एक कार्यकारिणी सभा द्वारा होता था। विद्यालय में प्रत्येक शनिवार को हवन एवं धार्मिक प्रवृत्तियों का आयोजन होता था।

    दयानन्द मिडिल स्कूल

    ई.1939 में जियालाल की प्रेरणा से अजमेर में दयानन्द मिडिल स्कूल की स्थापना की गई जिसका संचालन आर्यसमाज शिक्षा सभा, अजमेर द्वारा होता था। इसका अपना भवन नहीं होने से स्कूल अनाथालय में लगता था।

    दयानंद महाविद्यालय अजमेर

    इस महाविद्यालय की स्थापना गैर सरकारी सोसाइटी 'आर्यसमाज शिक्षा सभा' द्वारा ई.1888 में हुई। तब यह एक छोटी पाठशाला के रूप में था। ई.1895 में यह हाई स्कूल बना। ई.1942 में इण्टर कॉलेज ई.1951 में ग्रेजुएशन कॉलेज तथा ई.1958 में पोस्ट ग्रेजुएशन कॉलेज बना। 20वीं शताब्दी के चतुर्थ दशक में अजमेर आर्यसमाज के उत्साही कार्यकर्ता पंडित जियालाल ने अजमेर में कॉलेज भवन बनवाने का निश्चय किया। 28 जुलाई 1940 को महाविद्यालय भवन की नींव खुदाई का कार्य आर्यसमाज के स्वामी सतग्दानन्द के हाथों सम्पन्न हुआ।

    5 अप्रेल 1941 को डी ए वी हाई स्कूल की स्वर्ण जयंती के अवसर पर डूंगरपुर के महारावल लक्ष्मणसिंह ने कृषि और औद्योगिक कॉलेज भवन की नींव रखी। ई.1942-43 में कॉलेज का निचला हिस्सा बन जाने के पश्चात् धनाभाव के कारण कार्य कुछ समय के लिये बंद रहा। ई.1942 में कॉलेज भवन के निचले हिस्से में इन्टरमीडियेट की कक्षायें लगने लगीं। ई.1942 से 1945 तक कॉलेज में कई प्राचार्य नियुक्त हुए किंतु कॉलेज की प्रारम्भिक कठिनाइयों के कारण वे असफल सिद्ध हुए।

    इसके पश्चात् ई.1945 में जियालाल के अधिक आग्रह के कारण दत्तात्रेय वाबले अपनी वकालात छोड़कर महाविद्यालय के प्राचार्य बने। इस कॉलेज में ई.1942 में कला, ई.1943 में वाणिज्य, ई.1948 में विज्ञान की 11वीं तथा 12वीं कक्षायें प्रारंभ की गईं। कॉलेज में विद्यार्थियों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती गई। ई.1945 में इण्टरमीडियेट कॉमर्स में बोर्ड की परीक्षा में जगदीश चन्द्र कोरिया ने प्रथम स्थान प्राप्त किया।

    ई.1947 में चार छात्रों ने इण्टरमीडियेट परीक्षा में दूसरा, तीसरा, छठा, सातवां स्थान प्राप्त किया। ई.1947 तक डी ए वी कॉलेज ने अत्यधिक उन्नति की और परीक्षा फल भी ठीक रहा। ई.1945 से ई.1972 तक वाबले दयानन्द कॉलेज के प्राचार्य पद पर रहे और इस अवधि में उन्होंने इसे स्नातकोत्तर कॉलेज के स्तर तक पहुँचा दिया। इस कॉलेज का पुस्तकालय अत्यंत विशाल है जिसमें एक लाख से भी अधिक पुस्तकें हैं। ई.1980 से ई.1984 तक इस पुस्तक के लेखक ने इसी महाविद्यालय से प्रथम श्रेणी में कृषि स्नातक की उपाधि ग्रहण की।

    आर्य पुत्री पाठशाला

    आर्यसमाज अजमेर द्वारा 27 फरवरी 1898 को पुरानी मण्डी अजमेर में आर्य पुत्री पाठशाला की स्थापना की गई। यह राजस्थान में अपने प्रकार की पहली पाठशाला थी। इसका उद्देश्य लड़कियों को मानसिक, शारीरिक एवं बौद्धिक रूप से मजबूत बनाना, उन्हें धार्मिक शिक्षा देना, उन्हें आधुनिक शिक्षा उपलब्ध करवाना तथा प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से हिन्दू संस्कृति में विश्वास एवं आदर उत्पनन करना था।

    मथुराप्रसाद गुलाबदेवी आर्य कन्या पाठशाला

    मथुराप्रसाद गुलाबदेवी आर्य कन्या पाठशाला की स्थापना ई.1898 में अजमेर में मथुरा प्रसाद ने की। कन्या पाठशाला का प्रबंध सर्वप्रथम गुलाब देवी के हाथों में रहा। इसक पश्चात् ई.1921 में आर्य प्रतिनिधि सभा राजस्थान ने इस पाठशाला का प्रबंधन आर्यसमाज अजमेर को सौंप दिया। पाठशाला का कार्य सुचारू रूप से चलाने के लिये 12 सदस्यों का ट्रस्ट बनाया गया। 26 जनवरी 1940 को इस ट्रस्ट को पंजीकृत करवाया गया। पाठशाला की स्थापना के पश्चात् इसके विद्यार्थियों की संख्या लगातार बढ़ने लगी।

    ई.1926 में 127 छात्राएं, ई.1937 में 275 छात्राएं, ई.1941 में 300 से अधिक छात्राएं तथा ई.1947 में इस पाठशाला में 325 छात्राएं विद्याध्ययन करती थीं। इस पाठशाला में पाठ्य पुस्तकों के साथ-साथ धार्मिक पुस्तकों का भी अध्ययन करवाया जाता था। कक्षाएं एक से आठ तक चलती थीं। छात्राएं प्रयाग महिला विद्यापीठ तथा वैदिक धर्म विशारद की परीक्षायें भी समय-समय पर देती थीं।

    इस विद्यालय की प्रधानाध्यापकिाओं में गुलाब देवी, जवाहर देवी तथा विद्यादेवी शास्त्री के नाम उल्लेखनीय हैं। ई.1926 में 127 छात्राओं में से 94, ई.1936 में कक्षा अष्टम में 13 छात्राओं में से 13, ई.1941 में 298 छात्राओं में से 248 छात्रायें उत्तीर्ण हुईं किंतु विद्यालय में स्थानाभाव बना रहा।

    अछूत पाठशाला

    आर्यसमाज अजमेर द्वारा ऊसरी दरवाजा के पास अछूत पाठशाला स्थापित की गई।

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