Blogs Home / Blogs / अजमेर नगर का इतिहास - पुस्तक / अजमेर का इतिहास - 73
  • अजमेर का इतिहास - 73

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 73

    उन्नीसवीं सदी में अजमेर में शैक्षणिक विकास


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    मिशनरी स्कूल


    नया बाजार (ब्यावर) में दी यूनाइटेड प्रेस्बाईटेरियन मिशन की ओर से डॉ. शूलब्रेड द्वारा ई.1860 में, एक धर्मान्तरित ईसाई (बाबू चिंताराम राजाराम ब्राह्मण) की सहायता से अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र का पहला मिशनरी स्कूल खोला गया जो थोड़े दिनों में ही प्रसिद्ध हो गया। इसमें हिन्दी तथा उर्दू के साथ अंग्रेजी की भी शिक्षा दी जाती थी। शीघ्र ही इस स्कूल में छात्रों की संख्या 100 हो गई।

    मिशनरी स्कूल को सफल बनाने के लिये ब्यावर में पहले से ही चल रहे सरकारी स्कूल को बंद कर दिया गया तथा यह सोच कर कि इस क्षेत्र में लोग बहुत ही पिछड़े हुए हैं इसलिये इस स्कूल में बाइबिल की शिक्षा देनी आरंभ की गई। इससे ब्यावर के व्यापारी वर्ग में असंतोष उठ खड़ा हुआ तथा उन्होंने ब्राह्मणों एवं गुसाईंयों की सहायता से अपने बच्चों के लिये एक नया स्कूल खोल लिया।

    इस स्कूल में कुछ मेहतर बच्चों ने प्रवेश ले लिया जिससे नाराज होकर दो तिहाई छात्रों ने मिशनरी स्कूल में जाना बंद कर दिया। इस पर रेवर्ड (सम्मानित) मकालिस्टर ने रात्रि कालीन स्कूल खोलकर मिशनरी स्कूल को जीवित रखने का प्रयास किया। ई.1876 में एक ब्राह्मण ने अपना स्कूल मिशनरी स्कूल के साथ मिला दिया। इससे मिशनरी स्कूल को जीवन दान मिल गया।

    मार्च 1862 में इस स्कूल की एक शाखा अजमेर में खोली गई। तब अजमेर के पण्डितों ने अंग्रेज मिशनरियों के समक्ष एक शर्त रखी कि अजमेर की समस्त स्कूलों में से मेहतरों के बालकों को बाहर निकाला जाये। ग्लार्डन को यह शर्त स्वीकृत नहीं थी। इसलिये अंग्रेजी स्कूलों में से 103 लड़कों में से 92 बच्चों ने अपने नाम कटवा लिये। केवल चार हिन्दू तथा सात मुस्लिम लड़के ही अंग्रेजी स्कूलों में बचे।

    इस स्कूल की विशेषता यह थी कि यह अपनी कक्षायें सवेरे जल्दी लगाता था ताकि कार्यालयों एवं संस्थाओं में काम करने वाले क्लर्क एवं अन्य कर्मचारी भी इनमें आकर पढ़ सकें। इन सारे विरोधों के बावजूद अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र में अंग्रेजी स्कूलों की संख्या बढ़ने लगी। समर्पित ईसाई पादरियों- डब्ल्यू शूलब्रेड, विलियम मार्टिन, जॉन रॉबसन, विलियम रॉब तथा डॉ. सी. एस. वेलेण्टाइन के लगातार प्रयासों से ई.1862 में नसीराबाद में, ई.1864 में टॉडगढ़ में, ई.1871 में देवली में, ई.1872 में जयपुर में अंग्रेजी स्कूल खुले।

    लड़कियों के लिये शिक्षण संस्थायें

    प्रथम मिशन गर्ल्स स्कूल ई.1862 में नसीराबाद में स्थानीय ईसाई महिला एमिला के प्रयासों से खुला। उसने एक घर में तीन बहिनों के सहयोग से यह स्कूल खोला। प्रेसबाइटेरियन मिशन की रिपोर्ट में इस स्कूल की सफलता की सराहना की गई। इस स्कूल में लिखना, पढ़ना, कसीदा करना, कपड़े सीना तथा क्रोशिया कार्य सिखाया जाता था। 1863 ई. में अजमेर में मिसेज लूसी फिलिप एवं एक ब्राह्मण स्त्री सरदारी द्वारा वर्नाक्यूलर गर्ल्स स्कूल खोला गया। इस स्कूल पर भी यह संदेह किया गया कि यह बच्चों को ईसाई बनाने के उद्देश्य से खोला गया था। इस स्कूल में लड़कियों की संख्या शीघ्र ही 25 हो गई। ईसाई मिशनरी द्वारा ओसवाल जाति की स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार करने के लिये जनाना विजिटेशन नामक कार्यक्रम चलाया गया।

    लिथोग्राफिक मुद्रणालय

    मिशन द्वारा ई.1864 में पाठ्य पुस्तकें मुद्रित करने के लिये लिथोग्राफिक मुद्रणालय स्थापित किया गया। इसमें मिशन से सम्बन्धित अन्य पुस्तकें भी मुद्रित की जाती थीं। इस प्रेस में हजारों की संख्या में मारवाड़ी भाषा की मुक्ति रो मार्ग, समजोतरी माला, उकेश माला आदि पुस्तकें छापीं और निःशुल्क वितरित की गईं। हिन्दी और उर्दू में प्राथमिक अध्यायों की पट्टियां, पहाड़ों की सारणियां, जिन्हें पट्टी पहाड़ी कहा जाता था, छापी गईं। सोलोमन की कहावतों के हिन्दी दोहों में अनुवाद विशेष रूप से छापकर बेचे गये। मि. रॉबसन ने हिन्दी पंचांग तैयार किया जो कि बहुत प्रसिद्ध हुआ। ई.1871 में एक पंजाबी व्यक्ति ने अजमेर में मॉडर्न प्रेस लगाई। इस प्रेस में हिन्दी अंग्रेजी तथा उर्दू में राजस्थान ऑफीशियल गजट भी प्रकाशित किया जाता था। इस प्रेस को नौ साल बाद जब्त कर लिया गया।

    प्रेसबाईटेरियन मिशन की स्कूलें

    प्रेसबाईटेरियन मिशन द्वारा ई.1872 में अजमेर नगर में कुल 11 स्कूलें चल रही थीं। जिनमें से 1 एंग्लो वर्नाकुलर, 7 वर्नाकुलर बॉयज तथा 3 वर्नाकुलर गर्ल्स स्कलें चल रही थीं। इन स्कूलों में विद्यार्थियों की कुल संख्या 389 थी जिनमें से लड़कियों की संख्या 82 थी। जबकि इस वर्ष ब्यावर में मिशन की 18 स्कूलों में 873 विद्यार्थी, नसीराबाद में 13 स्कूलों में 558, टॉडगढ़ में 11 स्कूलों में 331 तथा देवली में 9 स्कूलों में 281 विद्यार्थी पढ़ रहे थे। ई.1863 में अजमेर में राज्य की ओर से लड़कों के लिये अंग्रेजी माध्यम की 1 स्कूल चलती थी जिसमें 340 बच्चे पढ़ते थे जबकि निजी क्षेत्र में 113 स्कूलें चलती थीं जिनमें 1,706 बच्चे पढ़ते थे।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×