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  • अजमेर का इतिहास - 71

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 71

    अजमेर में संवैधानिक विकास



    नॉर्थ-वेस्ट प्रोविंस के हिस्से के रूप में अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में विभिन्न राजनैतिक एवं प्रशासकीय कठिनाइयों को अनुभव किया गया। इसलिये ई.1871 में अजमेर-मेरवाड़ा को नया एवं नॉन रेग्यूलेशन प्रोविंस घोषित किया गया। अंग्रेज अधिकारियों द्वारा कहा गया कि अजमेर प्रांत को प्रशासनिक दक्षता के मॉडल के रूप में विकसित किया जायेगा। साथ ही यह भी विचार किया गया कि इस प्रांत का प्रशासनिक व्यय, प्रांत से ही प्राप्त राजस्व में से किया जायेगा। यद्यपि अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत की स्थापना के समय ब्रिटिश सरकार द्वारा कहा गया कि नया प्रोविंस प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाने के लिये बनाया जा रहा है तथापि वास्तविकता यह थी कि ब्रिटिश सरकार एजीजी की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करना चाहती थी।

    मार्ले मिण्टो सुधार

    ई.1911 में देश में मार्ले मिण्टो सुधार लागू किये गये जिनके कारण ब्रिटिश भारत के प्रांतों के प्रशासन में बड़ा परिवर्तन आया किंतु अजमेर-मेरवाड़ा के प्रशासन में कोई परिवर्तन नहीं किया गया।

    मॉण्टेग्यू चैम्सफोर्ड सुधार योजना

    ई.1924 में मॉण्टेग्यू चैम्सफोर्ड सुधार योजना के अंतर्गत भी अजमेर-मेरवाड़ा के प्रशासनिक ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। एक मात्र सुधार यह हुआ कि अजमेर-मेरवाड़ा का एक प्रतिनिधि केन्द्रीय विधान सभा (सेन्ट्रल-लेजिस्लेटिव एसेम्बली) में भेजे जाने की स्वीकृति दी गई।

    अजमेर में ज्युडीशियल मेम्बर नियुक्त

    ई.1925 में अजमेर-मेरवाड़ा के लिये नवीन म्युन्सिपेलिटीज रेग्यूलेशन लागू किया गया। ई.1925 में हरिभाऊ उपाध्याय ने अजमेर में सस्ता साहित्य मण्डल की स्थापना की। ई.1926 में उपाध्याय ने अजमेर की राजनीति में प्रवेश किया। ई.1926 में अजमेर-मेरवाड़ा के लिये एक ज्युडीशियल मेम्बर की नियुक्ति की गई तथा मुख्य आयुक्त की न्यायिक शक्तियां समाप्त कर दी गयीं।

    साइमन कमीशन

    ई.1927 में भारत में साइमन कमीशन आया। इस कमीशन द्वारा दी गई रिपोर्ट में कहा गया कि अजमेर-मेरवाड़ा में किसी प्रकार के संवैधानिक परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही आयोग ने भारत सरकार को सिफारिश की कि अजमेर-मेरवाड़ा से जो पहले निर्वाचित प्रतिनिधि केन्द्रीय विधानसभा में भेजा जाता था, अब वह चीफ कमिश्नर द्वारा मनोनीत किया जाये। इस रिपोर्ट की अजमेर में तीव्र प्रतिक्रिया हुई।

    भारत सरकार अधिनियम 1935

    ई.1935 में नया भारत सरकार अधिनियम पारित हुआ। इसका तृतीय भाग 1 अप्रेल 1937 से लागू किया गया। इसके बाद अजमेर के प्रशासनिक ढांचे में एक बार फिर परिवर्तन आया। अजमेर-मेरवाड़ा को भारत सरकार के पोलिटिकल विभाग से हटाकर, गृह विभाग के अधीन कर दिया गया क्योंकि नये संविधान के अनुसार भारत सरकार के पोलिटिकल विभाग का प्रशासनिक नियंत्रण क्राउन प्रतिनिधि वायसराय के अधीन दे दिया गया था।

    नये अधिनियम के अनुसार क्राउन प्रतिनिधि (वायसरॉय) को ब्रिटिश भारत के मामलों में बोलने का अधिकार नहीं रह गया था। यह व्यवस्था भी की गई कि भविष्य में अजमेर के कमिश्नर एवं असिस्टेण्ट कमिश्नर यूनाइटेड प्रोविंस सिविल सेवा के अधिकारी होंगे। इनकी नियुक्ति तीन साल के लिये होगी तथा ये एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना के नीचे काम करेंगे। एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल का पदनाम बदलकर रेजीडेण्ट इन राजपूताना तथा चीफ कमिश्नर अजमेर मेरवाड़ा कर दिया गया।

    भारत सरकार अधिनियम 1935 में यह प्रावधान किया गया था कि जब संघीय संविधान का निर्माण होगा, तब अजमेर-मेरवाड़ा तथा पांठ-पीपलोदा के लिये संयुक्त रूप से, संघीय विधान सभा में एक सदस्य तथा संघीय विधान परिषद में एक सदस्य का प्रतिनिधित्व होगा। यह भी प्रावधान किया गया कि भविष्य में अजमेर प्रांत के लिये कानून का निर्माण गवर्नर जनरल की परिषद के स्थान पर संघीय विधान द्वारा किया जायेगा। इस समय अजमेर-मेरवाड़ा में जो भी कानून चल रहे थे उन्हें किसी संवैधानिक संस्था द्वारा लागू नहीं किया गया था।

    1 अप्रेल 1937 से अनुसूचित जिला अधिनियम (शिड्यूल्ड डिस्ट्रिक्ट्स एक्ट) अप्रभावी बना दिया गया। 1 अप्रेल 1937 से पहले अजमेर मेरवाड़ा क्षेत्र का पुलिस बल, राजपूताना की रेलवे भूमि तथा आबू में पट्टे की जमीनें एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल ऑफ राजपूताना के अधीन हुआ करती थीं। 1 अप्रेल 1937 से ये सारे विषय चीफ कमिश्नर ऑफ अजमेर-मेरवाड़ा के प्रशासनिक नियंत्रण में दे दिये गये। ई.1947 तक अजमेर में लगभग यही संवैधानिक व्यवस्था चलती रही।

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