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  • अजमेर का इतिहास - 70

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 70

    ब्रिटिश काल में अजमेर का प्रशासन (1)



    सामान्य प्रशासन के लिये समय नहीं

    ब्रिटिश दस्तावेज इन तथ्यों से भरे पड़े हैं कि ब्रिटिश अधिकारी अजमेर को प्रशासनिक दक्षता का आदर्श घोषित करना चाहते थे जबकि अजमेर में वे सामान्य सुविधायें भी उपलब्ध नहीं करवाई जा सकी थीं जिनका लाभ दूसरे प्रांतों की जनता लम्बे समय से उठा रही थी। इसका मुख्य कारण यह था कि प्रांत के उच्चस्थ पॉलिटिकल अधिकारी हर समय देशी राज्यों की समस्याओं को सुलझाने में व्यस्त रहते थे इस कारण उनके पास अजमेर के सामान्य प्रशासन के लिये पर्याप्त समय नहीं था। यहां तक कि अजमेर की नगर पालिका भी ढंग से कार्य नहीं कर पा रही थी।

    प्रशासन में भ्रष्टाचार

    उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में अजमेर का प्रशासन भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबा हुआ था। शहर में व्यभिचार का बोलबाला था। अजमेर के चारों तरफ स्थित देशी रियासतों की आवारा औरतों को अजमेर में शांति मिलती थी। इस कारण उस समय अजमेर में वेश्याओं के चार बड़े अड्डे विकसित हो गये थे। हर अड्डे में रात को तीस चालीस बदमाश और आवारा औरतें जमा रहते थे। कुटनियों की पांचों अंगुलियां घी में थीं और सिर कढ़ाई में। उस पर उच्च श्रेणी के नये आने वाले अधिकारियों के लिये नई और ताजा औरतें प्रस्तुत की जाती थीं। शहर के हर गली कूंचे में बंदोबस्त के पंजाबी कर्मचारी ही दिखाई देते थे। शहर के चारों ओर के रास्तों तथा पुष्करजी, किशनगढ़ एवं ब्यावर जाने वाली सड़कों पर जुआरियों के झुण्ड फिरा करते थे।

    चण्डू और नशीले पदार्थ को कोई जानता तक न था। किसी बंगले पर कोई साहब का खानसामा या बावरची चोरी छिपे मदक के छर्रे पीता था। अफीम का भी ठेका न था। हर बनिये की दुकान पर रुपये की पंद्रह, बीस तोला अफीम मिलती थी। अजमेर में प्रतिदिन हजारों रुपये की अफीम का सौदा होता था। अजमेर में केवल एक पारसी था। गुजराती, मराठी और मद्रासी नहीं थे। केवल दो बंगाली थे जो डिप्टी कमिश्नर की अदालत में कर्मचारी थे। शहर के सारे रास्ते खतरों से भरे हुए थे। अक्सर सरकारी डाक लुट जाया करती थी। मुंशी अब्दुल्लाह खां सब इंसपेक्टर और मुंशी रामतीर्थ आदि अधिकारी डाकुओं के पीछे दौड़ते-फिरते थे।

    अधिकारियों की नीतियाँ भ्रष्टाचार के लिये जिम्मेदार

    अजमेर की बुरी प्रशासनिक दशा के पीछे एक कारण यह भी था कि इस जिले में कोई भी हाकिम जम कर दो-चार वर्ष नहीं रह पाता था। यूरोपियन अधिकारी और मिलिट्री ऑफिसर विदेश कार्यालय के अधीन होने से जल्दी-जल्दी स्थानांतरित होते थे। अजमेर के निवासियों की ओर से यह मांग उठने लगी थी कि इस जिले को किसी हाईकोर्ट के अधीन कर दिया जाये ताकि यहाँ सिविलियन हाकिम लग सकें किंतु राजपूताना के तत्कालीन एजीजी वॉल्टेयर का यह मानना था कि यदि यह जिला अजमेर हाईकोर्ट के अधीन हो गया तो राजपूताना की समस्त देशी रियासतों पर भी ब्रिटिश सरकार के प्रशासनिक एवं राजनैतिक नियंत्रण की हैसियत कुछ भी नहीं रह जायेगी।

    आदर्श प्रशासनिक प्रतिरूप बनाने का काम छोड़ा

    अजमेर प्रांत में भी वे सब विभाग स्थापित किये गये जो एक नियमित प्रांत में होते थे किंतु 1877 ई. में लॉर्ड लिटन ने अनुभव कर लिया कि यदि अजमेर को आदर्श प्रशासनिक प्रांत के रूप में विकसित किया जायेगा तो यह एक ऐसा प्रदर्शनीय खेत बन जायेगा जिसमें सारी चीजें बहुत खर्चा करके जुटाई गई हों। प्रांत की आय इतनी न थी कि उससे प्रशासनिक व्यय को चलाया जा सके। यही कारण है कि अजमेर में अधिकांश विभागों को एक ही व्यक्ति के अधीन कर दिया तथा बहुत से विभागों में लम्बे समय तक पद रिक्त रखे गये। इस कारण इन विभागों का काम गति नहीं पकड़ सका।

    पोलिटिकल अधिकारियों को नागरिक प्रशासकों के रूप में काफी शक्तियां दी गई थीं किंतु उन्हें काम का अनुभव न होने तथा प्रशिक्षण का अभाव होने के कारण उनके कार्य में दक्षता का अभाव था। नया प्रांत बन जाने एवं नई व्यवस्थायें आरंभ हो जाने पर भी पॉलिटिकल अधिकारियों का मुख्य उद्देश्य राजपूताना की देशी रियासतों पर अपना प्रभावी नियंत्रण बनाये रखना ही रहा।

    ब्रिटिश क्षेत्रों से अलग होने, राजपूताना रियासतों के मध्य स्थित होने तथा कार्य की प्रकृति भिन्न होने से अजमेर-मेरवाड़ा का नागरिक प्रशासन काफी जटिल हो गया। एक तरफ ब्रिटिश सरकार अपने उस वचन से अलग नहीं होना चाहती थी जिसमें कहा गया था कि भारत के नागरिकों को उन्नत नागरिक प्रशासन दिया जायेगा तथा दूसरी तरफ ब्रिटिश सरकार, अजमेर-मेरवाड़ा को अपने पॉलिटिकल अधिकारियों एवं प्रशासकों को प्रशिक्षण स्थल के रूप में विकसित करना चाहती थी। इन दोनों उद्देश्यों ने अजमेर-मेरवाड़ा के प्रशासन को आत्म निर्भर बनाने के लिये विवश किया। शीघ्र ही यह अनुभव कर लिया गया कि प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने में काफी रुपया खर्च करना होगा जिसके बदले में कोई अर्थलाभ नहीं होगा।

    शैक्षिक प्रशासन

    शैक्षिक क्षेत्र में अजमेर प्रशासन ने कई प्रयोग किये ताकि शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर किया जा सके। 1872 ई. तक नॉर्थ-वेस्ट प्रोविंसेज के डायरेक्टर पब्लिक इन्सट्रक्शन्स ही नियंत्रक अधिकारी थे। इसके बाद अजमेर-मेरवाड़ा कमिश्नर पब्लिक इंस्ट्रक्शन्स के पदेन डायरेक्टर बन गये। उनके साथ ऐसा कोई अधिकारी नहीं था जो अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में शिक्षा के लिये पूरा समय और ध्यान दे सके। गवर्नमेंट कॉलेज अजमेर, पदेन इंसपेक्टर ऑफ स्कूल्स हुआ करते थे। उनके जिम्मे ही पूरे जिले का काम देखने का भार था। चालीस वर्ष तक यही व्यवस्था चलती रही। इसके बाद ई.1912 में सुपरिण्टेंडेंट ऑफ एज्यूकेशन फॉर अजमेर एण्ड देहली का पद सृजित किया गया किंतु ई.1922 तक इस पद पर किसी की नियुक्ति नहीं की गई।

    ई.1923 में भारत सरकार के एज्यूकेशनल कमिश्नर को अजमेर मेरवाड़ा में शिक्षा के कार्य को देखने का दायित्व दिया गया। ई.1930 में सुपरिण्टेंडेंट ऑफ एज्यूकेशन फॉर अजमेर-मेरवाड़ा, देहली एण्ड सेण्ट्रल इण्डिया की नियुक्ति की गई। इस पर जितने भी अधिकारियों की नियुक्ति की गई उन सबका मुख्यालय अजमेर से बाहर रहा। इसलिये वे अजमेर में शिक्षा के कार्य पर अधिक ध्यान नहीं दे सके। इस कारण अजमेर की जनता शिक्षा के क्षेत्र में अन्य प्रांतों की तुलना में काफी पिछड़ी हुई थी किंतु आर्यसमाज की स्कूलों तथा मेयो कॉलेज की उपस्थिति के कारण अजमेर का शैक्षिक दृश्य देशी रियासतों की तुलना में काफी समृद्ध दिखाई पड़ता था।

    भू-राजस्व प्रशासन

    अजमेर मेरवाड़ा में ब्रिटिश भू-राजस्व प्रशासन के दो पक्ष थे- पहला, भूस्वामियों (इस्तिमरदारों) के प्रति ब्रिटिश अधिकारियों की प्रवृत्ति तथा दूसरा, प्रत्यक्ष ब्रिटिश नियंत्रण वाले क्षेत्रों में भू बंदोबस्त की नीति। ब्रिटिश अधिकारियों ने पहले पहल इस्तिमरारी जागीरों में काश्तकारों के अधिकारों की रक्षा के दायित्व को पूरा करने का काम किया किंतु बाद में इस्तिमरदारों का विश्वास जीतने के दृष्टिकोण से उन्होंने प्रत्यक्षतः इस्तिमरदारों का पक्ष लेने की नीति अपना ली किंतु इस नीति के कारण इस्तिमरारी जागीरों के किसानों में असंतोष पनप गया।

    जब काश्तकारों ने भूस्वामियों के विरुद्ध शिकायतें कीं तो ब्रिटिश अधिकारियों ने उन शिकायतों को सुनने से मना कर दिया। इससे भूस्वामियों ने यह मान लिया कि काश्तकार अब भूस्वामियों की मर्जी पर छोड़ दिये गये हैं। इससे इस्तिमरदार जागीरों में काश्तकारों पर अत्याचार बढ़ गये और उनकी दुर्दशा होने लगी। अंग्रेज सरकार को काश्तकारों की इस दुर्दशा का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि अब किसान मानने लगे कि इस्तिमरदार जागीरों की बजाय अंग्रेजी नियंत्रण वाली जागीरों में प्रशासन अधिक अच्छा है। आम जनता में भूस्वामियों की प्रतिष्ठा गिर गई। इससे ब्र्रिटिश अधिकारियों को भूस्वामियों के आंतरिक मामलों में प्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप करने का अवसर मिल गया।

    इस्तिमरदार जागीरों में काश्तकारों की दुर्दशा का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में इस्तिमरदार जागीरों के अधीन 61 प्रतिशत कृषि भूमि थी तथा ब्रिटिश अधिकारियों के प्रत्यक्ष नियंत्रण में 39 प्रतिशत कृषि भूमि ही थी फिर भी इस्तिमरदारी काश्तकारों की अपेक्षा ब्रिटिश नियंत्रण वाले काश्तकारों से 28 हजार रुपये का वार्षिक राजस्व अधिक प्राप्त होता था। अजमेर प्रांत में 1874, 1887 एवं 1910 में तीन भू बंदोबस्त हुए। तीनों ही बार राजस्व करों में वृद्धि की गई किंतु काश्तकारों के लिये सिंचाई आदि की सुविधाओं का विकास नहीं किया गया।

    पुलिस प्रशासन

    अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में पुलिस प्रशासन की भी हालत खराब थी। पुलिस कर्मियों के वेतन, भत्ते एवं सुविधायें बहुत कम थे जबकि काम की परिस्थितियां अत्यंत खराब थीं। 1871 ई. के बाद से अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में पुलिस विभाग में स्वीकृत पदों में से केवल 15 प्रतिशत पदों पर ही पुलिस कर्मियों की भर्ती की जाती थी। पुलिस में भर्ती के लिये योग्य युवक नहीं मिलते थे। लोगों की निर्धनता एवं रहन-सहन के निम्न स्तर के कारण अच्छे युवक उपलब्ध नहीं हो पाते थे।

    इसके साथ ही पुलिस सेवा की परिस्थितियां अच्छी नहीं थीं तथा पुलिस में काम करने की बजाय अन्य जगह पर काम करने से अच्छा वेतन मिलता था। निम्न वेतन के चलते पुलिस कार्मिकों में भ्रष्टाचरण बढ़ गया था। कई बार जांच में यह भी पाया गया कि अजमेर शहर में हुई चोरी की वारदातों में स्वयं पुलिस भी शामिल थी। पुलिस कर्मियों द्वारा नौकरी छोड़ देना अथवा उनकी मौत हो जाना आम बात थी। अजमेर पुलिस अपने दक्ष कर्मियों को नौकरी के प्रति आकर्षित करने में पूरी तरह विफल थी।

    पुलिस सुपरिंटेण्डेंट पर काम का अत्यधिक दबाव था। उसे निश्चित समयावधि में पुलिस थानों का निरीक्षण करना होता था तथा साथ ही अजमेर प्रांत के विशाल एवं असुरक्षित बॉर्डर की भी सुरक्षा करनी पड़ती थी। इस कारण वह सदैव व्यस्त रहत था जिससे उसके काम की गुणवत्ता काफी नीची थी और पुलिस कर्मियों को भ्रष्टाचार करने का पूरा अवसर प्राप्त हो जाता था। अजमेर में पुलिस कर्मियों की स्वीकृत संख्या से सदैव आधी संख्या ही उपलब्ध रहती थी।

    लगभग 36 प्रतिशत अपराधों की जांच ही नहीं हो पाती थी। जांच विभाग में स्टाफ की कमी थी इसकारण बड़ी संख्या में अपराध, चोरी एवं सेंधमारी के प्रकरणों की जांच करने से मना कर दिया जाता था। जहाँ ब्रिटिश सरकार एक ओर अजमेर प्रांत को एक सभ्य और प्रगतिशील जिला कहने के लिये उत्सुक थी वहीं दूसरी ओर वास्तविकता यह थी कि बहुत से अंग्रेज अधिकारी अजमेर को अनुसूचित जिला अधिनियम (शिड्यूल्ड डिस्ट्रिक्ट एक्ट) के अंतर्गत शासित करने की बात करते थे।

    यही कारण था कि ब्रिटिश सरकार ने अजमेर प्रांत में किसी तरह की लोकतांत्रिक संस्था की स्थापना नहीं की। बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में जब अजमेर में विधान सभा की स्थापना करने की मांग उठी तो सरकार ने यह कहकर इस मांग को अस्वीकार कर दिया कि अजमेर प्रांत में पर्याप्त संख्या में पढ़े-लिखे लोग नहीं हैं जो विधानसभा को चला सकें। जबकि कुर्ग जैसे छोटे प्रांत में भी तब विधान सभा का गठन हो चुका था।

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