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  • अजमेर का इतिहास - 7

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 7

    अजमेर के चौहान शासक (4)


    दसवीं शताब्दी में अजमेर

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    राजा तंत्रपाल ने वाक्पतिराज पर आक्रमण किया किंतु बुरी तरह परास्त हुआ। वाक्पतिराज के तीन पुत्र थे। सिंहराज, लक्ष्मणराज तथा वत्सराज। वाक्पतिराज की मृत्यु के बाद ई.950 में सिंहराज उसका उत्तराधिकारी हुआ। लक्ष्मणराज नाडौल के पृथक राज्य का स्वामी हुआ। इसे लखनसी भी कहते हैं।

    सिंहराज

    सिंहराज महान राजा हुआ। तोमरों ने राजा लवण की सहायता से सिंहराज के राज्य पर आक्रमण किया किंतु तोमर पराजित हो गये। सिंहराज ने लवण को बंदी बना लिया। इस पर प्रतिहार शासक स्वयं चलकर सिंहराज के पास आया और उसने सिंहराज से प्रार्थना करके लवण को मुक्त करवाया। सिंहराज के बारे में कहा जाता है कि उसकी कैद में उतनी ही रानियां थीं जितनी उसके महल में थीं। वह अपनी उदारता के लिये भी उतना ही प्रसिद्ध था जितना कि सैन्य अभियानों के लिये। हम्मीर महाकाव्य कहता है कि जब उसके अभियान का डंका बजता तो कर्नाटक का राजा उसकी चापलूसी करने लगता।

    लाट (माही एवं नर्बदा के बीच का दोआब) का राजा अपने दरवाजे उसके लिये खोल देता। चोल नरेश (मद्रास नरेश) कांपने लगता, गुजरात का राजा अपना सिर खो देता तथा अंग (पश्चिमी बंगाल) के राजा का हृदय डूब जाता। वह लगातार मुसलमानों से लड़ता रहा। एक युद्ध में उसने मुसलमानों के सेनापति हातिम का वध किया तथा उसके हाथियों को पकड़ लिया। एक अन्य अवसर पर उसने, सुल्तान हाजीउद्दीन के नेतृत्व में अजमेर से 25 किलोमीटर दूर जेठाना तक आ पहुँची मुस्लिम सेना को खदेड़ दिया। सिंहराज ई.956 तक जीवित रहा। हर्ष अभिलेख के अनुसार हर्ष मंदिर का निर्माण उसके काल में ही पूरा हुआ। इस अभिलेख में चौहानों की तब तक की वंशावली दी गई है।

    विग्रहराज (द्वितीय)

    सिंहराज का पुत्र विग्रहराज (द्वितीय) ई.973 में उसका उत्तराधिकारी हुआ। उसने अपने राज्य का बड़ा विस्तार किया। अजमेर का राज्य प्राचीन काल से सपादलक्ष (अर्थात् एक लाख तथा चौथाई लाख) कहलाता था। इससे अर्थ यह लिया जाता है कि अजमेर राज्य में सवा लाख नगर एवं गांव थे। सम्पूर्ण पूर्व एवं दक्षिणी राजपूताना, मारवाड़ का काफी बड़ा हिस्सा तथा उत्तर में भटनेर तक का क्षेत्र इस राज्य में सम्मिलित था। संस्कृत का सपादलक्ष ही हिन्दी भाषा में श्वाळक (सवा लाख) बन गया जिसमें नागौर, अजमेर तथा सांभर आते थे।

    विग्रहराज (द्वितीय) ने प्रतिहारों की अधीनता त्याग दी और पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो गया। विग्रहराज (द्वितीय) ने ई.973 से ई.996 के बीच में गुजरात पर आक्रमण किया। गुजरात का शासक मूलराज अपनी राजधानी खाली करके कच्छ में भाग गया। इस पर विग्रहराज अपनी राजधानी अजमेर लौट आया। उसने दक्षिण में अपना राज्य नर्बदा तक बढ़ा लिया। उसने भरूच में आशापूर्णा देवी का मंदिर बनवाया। प्रबंध चिंतामणि के लेखक मेरुतुंग ने भी इस विजय का उल्लेख किया है। चौदहवीं शताब्दी में लिखे गये हम्मीर महाकाव्य के अनुसार विग्रहराज (द्वितीय) ने गुजरात के राजा मूलराज का वध किया। यहाँ से चौहानों तथा चौलुक्यों का संघर्ष आरंभ हुआ जिसका लाभ अफगानियों ने उठाया।

    दुर्लभराज (द्वितीय) तथा गोविंदराज (द्वितीय)

    विग्रहराज (द्वितीय) के बाद दुर्लभराज (द्वितीय) तथा उसके बाद गोविंदराज (द्वितीय) अजमेर के शासक हुए।


    ग्यारहवीं शताब्दी में अजमेर

    ई.1008 में जब महमूद गजनवी ने अनंगपाल पर आक्रमण किया तब उज्जैन, कलिंजर, ग्वालियर, कन्नौज, दिल्ली तथा अजमेर के राजाओं ने एक संधि की तथा मुस्लिम आक्रमणों के विरुद्ध एक संघ बनाया। राजा अनंगपाल की सहायता के लिये हिन्दू औरतों ने अपने आभूषण गलाकर बेच दिये तथा उससे प्राप्त धन इस संघ की सहायता के लिये भेजा। (निःसंदेह इस कार्य में अजमेर की औरतें भी सम्मिलित थीं।) अजमेर के शासक गोविंदराज (द्वितीय) ने महमूद गजनवी को परास्त किया।

    वाक्पतिराज (द्वितीय)

    गोविंदराज (द्वितीय) का उत्तराधिकारी उसका पुत्र वाक्पतिराज (द्वितीय) हुआ। उसने मेवाड़ के शासक अम्बाप्रसाद का वध किया।

    वीर्यराम

    वाक्पतिराज (द्वितीय) के बाद वीर्यराम अजमेर का राजा हुआ। वह मालवा के राजा भोज का समकालीन था। वीर्यराम के शासन काल में ई.1024 में महमूद गजनवी ने अजमेर पर आक्रमण किया तथा गढ़ बीठली को घेर लिया किंतु घायल होकर अन्हिलवाड़ा को भाग गया। वीर्यराम ने मालवा पर आक्रमण किया किंतु भोज के हाथों परास्त होकर मारा गया।

    चामुण्डराज

    वीर्यराम का उत्तराधिकारी चामुण्डराज हुआ। उसने शक मुसलमानों के स्वामी हेजामुद्दीन को पकड़ लिया। दुर्लभराज (तृतीय) चामुण्डराज के बाद ई.1075 में दुर्लभराज (तृतीय) उत्तराधिकारी हुआ जिसे दूसल भी कहते हैं। उसने मुसलमान सेनापति शहाबुद्दीन को परास्त किया। ई.1080 में मेवात के शासक महेश ने अजमेर के शासक दुर्लभराज (तृतीय) की अधीनता स्वीकार की। ई.1091 से 1093 के मध्य उसने गुजरात पर आक्रमण किया तथा वहाँ के राजा कर्ण को मार डाला ताकि मालवा का शासक उदयादित्य, गुजरात पर अधिकार कर सके। मेवाड़ के शासक वैरिसिंह ने दुर्लभराज को कुंवारिया में हुए युद्ध में मार डाला।

    विग्रहराज (तृतीय)

    दुर्लभराज के बाद विग्रहराज (तृतीय) अजमेर का शासक हुआ। इसे बीसल अथवा वीसल भी कहा जाता था। उसने भी मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध एक संघ बनाया तथा हांसी, थाणेश्वर और नगरकोट से मुस्लिम गवर्नरों को मार भगाया। इस विजय के बाद दिल्ली के स्तम्भ लेख लगावाया गया। इस स्तम्भ लेख में लिखा गया है कि विन्ध्य से हिमालय तक म्लेच्छों को निकाल बाहर किया गया जिससे आयावर्त एक बार फिर पुण्यभूमि बन गया।

    पृथ्वीराज रासो के अनुसार अन्हिलवाड़ा पाटन के चौलुक्य राजा ने, विग्रहराज द्वारा निर्मित राजाओं के संघ में सम्मिलित होने से मना कर दिया। जब गजनी (के शासक की तरफ) से (अजमेर के शासक से) कर के साथ-साथ वफादारी की शपथ मांगी गई तो शाकम्भरी के स्वामी ने अपने सामन्तों के नाम फरनाम जारी किया। इस पर ठट्ठ और मुलतान के सरदारों के साथ मण्डोर और भटनेर के सैन्य समूह भी आये। गंगा और यमुना के बीच अंतर प्रदेश के सैनिक, समस्त राजपूत शाखाएं उसके झण्डे के नीचे एकत्रित हुईं किंतु चौलुक्य नहीं आये। इसलिये विग्रहराज (तृतीय) ने अन्हिलवाड़ा पाटन पर आक्रमण की तैयारी की। इस पर अन्हिलवाड़ा पाटन का चौलुक्य राजा कर्ण भी अजमेर पर आक्रमण करने के लिये चल पड़ा। मारवाड़ में सोजत के निकट दोनों राजाओं में युद्ध हुआ। चौलुक्य राजा परास्त होकर जालोर भाग गया।

    इस पर भी विग्रहराज ने उसका पीछा नहीं छोड़ा तो चौलुक्य राजा कर्ण गिरनार भाग गया। जब विग्रहराज को लगा कि कर्ण उसे मुंह नहीं दिखाना चाहता तो विग्रहराज उसका पीछा छोड़कर अजमेर लौट आया। कुछ दिन बाद कर्ण ने अपनी सेना दुबारा से खड़ी कर ली और विग्रहराज को संदेश भेजा कि वह विग्रहराज के बराबर है तथा 'कर' के रूप में विग्रहराज को तलवार के टुकड़े देने को तैयार है यदि विग्रहराज ले सके तो ले ले। इस पर विग्रहराज ने गुजरात से लाये गये बंदियों को मुक्त कर दिया तथा स्वयं फिर से सेना सजा कर गुजरात पर चढ़ बैठा। उसने अपनी सेना को एक वृत्ताकार क्रम में जमाया तथा पहले ही धावे में 2000 चौलुक्यों को मार डाला। उसके अगले दिन दोनों पक्षों में संधि हुई। कर्ण ने अपनी पुत्री का विवाह विग्रहराज के साथ कर दिया। विग्रहराज ने विजय स्थल पर अपने नाम से वीसलनगर नामक नगर की स्थापना की। यह नगर आज भी विद्यमान है।

    प्रबंधकोष के अनुसार विग्रहराज (तृतीय) ने एक ब्राह्मण स्त्री का सतीत्व भंग किया। उस ब्राह्मणी ने विग्रहराज को श्राप दिया। इस श्राप के कारण विग्रहराज तृतीय की मृत्यु हुई। पृथ्वीराज रासो में भी इसी प्रकार की एक कथा दी गई है जिसके अनुसार बीसलदेव ने एक सुंदर परमार रानी का सतीत्व भंग किया। उसके पति के श्राप देने से बीसलदेव की मृत्यु हुई। ये दोनों कथायें बीसलदेव की मृत्यु के बहुत बाद में जोड़ी गई हैं। इसलिये इनकी सत्यता का परीक्षण होना संभव नहीं है।

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