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  • अजमेर का इतिहास - 69

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 69

    ब्रिटिश काल में अजमेर का प्रशासन (1)



    अजमेर नगर का स्थानीय प्रशासन

    अजमेर का स्थानीय प्रशासन ई.1818 से ई.1853 तक सुपरिण्टेण्डेण्ट ऑफ अजमेर के अधीन, ई.1853 से 1857 तक कमिश्नर ऑफ अजमेर-मेरवाड़ा के अधीन, ई.1857 से ई.1870 तक डिप्टी कमिश्नर ऑफ अजमेर के अधीन तथा ई.1871 से 1943 तक कमिश्नर ऑफ अजमेर-मेरवाड़ा के अधीन रहा। ई.1943 से 1947 तक अजमेर का स्थानीय प्रशासन फिर से डिप्टी कमिश्नर ऑफ अजमेर के अधीन रहा।

    अजमेर का प्रांतीय स्तर पर नियंत्रण

    ई.1818 से ई.1832 तक अजमेर नगर का प्रांतीय स्तर पर नियंत्रण कुछ समय के लिये दिल्ली स्थित रेजीडेण्ट के अधीन रहा। उसके बाद कुछ समय के लिये एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल फॉर मालवा के अधीन रहा। ई.1832 में एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना का पद सृजित किया गया। ई.1832 से ई.1853 तक एजीजी को ही कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) भी बनाया जाता रहा। ई.1853 में कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) का पद अलग अधिकारी को दे दिया गया। ई.1857 से पुनः पुरानी व्यवस्था आरंभ कर दी गई। इस कारण ई.1857 से ई.1871 तक अजमेर का प्रांतीय शासन एजीजी एवं कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) के अधीन रहा। ई.1871 से ई.1947 तक अजमेर का प्रांतीय नियंत्रण एजीजी के अधीन ही रहा किंतु इस अवधि में उसे चीफ कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) कहा जाता था।

    अजमेर का राष्ट्रीय स्तर पर नियंत्रण

    अजमेर का राष्ट्रीय स्तर पर नियंत्रण ई.1818 से ई.1871 तक भारत सरकार के नॉर्थ वेस्ट प्रोविंस के अधिकार में रहा। ई.1871 से 1937 तक अजमेर का राष्ट्रीय स्तर पर नियंत्रण भारत सरकार के विदेश एवं राजनीतिक विभाग के अधीन रहा। इसी अवधि में कुछ समय के लिये यह भारत सरकार के राजनीतिक विभाग के अधीन चला गया। ई.1937 में यह नियंत्रण भारत सरकार के गृह विभाग के अधीन चला गया। ई.1947 तक यही स्थिति रही।

    एजेण्ट टू दी गर्वनर जनरल फॉर राजपूताना (एजीजी)

    ई.1832 से एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना का पद सृजित किया गया। तब से वही अजमेर-मेरवाड़ा का पदेन कमिश्नर होता था। प्रांत का नागरिक प्रशासन चलाने के लिये पर्याप्त समय एवं ध्यान देने की आवश्यकता थी जो कि एजीजी द्वारा नहीं दिया जा सकता था। उसे राजपूत रियासतों के साथ सम्बन्धों के निर्वहन में राजनैतिक एवं कूटनीतिक दायित्वों को प्राथमिकता देनी पड़ती थी। इन दो अलग-अलग तरह के दायित्वों ने कम्पनी को बीमार बना दिया। राजनैतिक एवं कूटनैतिक दायित्वों को निभाने के लिये नियमित रूप से यात्रायें करनी पड़ती थीं तथा शासकों से व्यक्तिशः सम्पर्क रखना पड़ता था जबकि दक्षता पूर्ण नागरिक शासन के लिये लम्बे टेबल वर्क तथा मौके पर पहुँचने एवं मौजूद रहने की आवश्यकता थी।

    अजमेर में न्यायिक प्रशासन

    अजमेर में सबसे अधिक खराब दशा न्यायिक प्रशासन की थी जिसके लिये राजस्थान के राज्यों पर दबाव डाला जाता था। ई.1832 से ई.1853 तक पोलिटिकल विभाग का अधिकारी होते हुए भी अजमेर के कमिश्नर और एजीजी को अंतिम न्यायिक अधिकारी भी बनाया हुआ था किंतु ई.1853 में कमिश्नर और एजीजी के पद अलग-अलग व्यक्तियों को दिये गये। फलस्वरूप अजमेर के कमिश्नर के न्यायिक निर्णयों की अपीलें पहले नॉर्थ वेस्ट प्रोविंस के न्यायिक कमिश्नर और बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष जाती थीं। ई.1858 में पुनः ये दोनों पद एक ही व्यक्ति को दे दिये किंतु न्यायिक अपीलों की व्यवस्था यथावत् रही।

    एजीजी की प्रतिष्ठा को धक्का

    एजीजी को सेशन जज के भी अधिकार प्राप्त थे। उसके निर्णयों को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा उलट दिये जाने के कारण एजीजी की प्रतिष्ठा एवं महत्व को काफी धक्का लगा था। इससे राजपूताना की रियासतों के साथ सम्बन्धों में भी कठिनाइयां उत्पन्न होने लगी थीं। उसकी प्रतिष्ठा इतनी घट गई थी कि जब उसे राजपूताना की रियासतों में दौरा करना होता था तो उसे वे सब प्रबंध करने होते थे जो शत्रु के क्षेत्र में जाने पर करने आवश्यक होते हैं। एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल को छः माह तक अपनी राजधानी माउण्ट आबू में रखनी होती थी। उसे प्रशासनिक आवश्यकताओं के कारण मेज-कुर्सी पर बैठकर भी काफी काम करना होता था। इस कारण वह रियासतों का दौरा नहीं कर पाता था।

    एजीजी को हाईकोर्ट के अधिकार

    ई.1861 के पश्चात् अधिकांश मामलों में एजीजी के निर्णयों को बदल दिया गया क्योंकि एजीजी का विधि ज्ञान सदा ही न्यूनतम होता था। कुछ मुकदमों में एजीजी के विरुद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने टिप्पणियां भी कर दीं। इसलिये एजीजी की राजनीतिक छवि बचाने के लिये अजमेर को पिछड़ा हुआ प्रांत कहकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के क्षेत्र से बाहर निकाला गया ओर एजीजी को अजमेर का उच्च न्यायालय भी बना दिया गया। इस प्रकार एजीजी की राजनीतिक और प्रशासनिक सत्ता को बचाये रखने के लिये लोगों को न्यायिक सुविधा से वंचित कर दिया गया।

    नई व्यवस्था में, प्रांत का न्यायिक प्रशासन प्रथम महत्वपूर्ण आकस्मिकता थी। एजीजी को अजमेर-मेरवाड़ा का न्यायिक आयुक्त घोषित किया गया तथा प्रांत में अपील की सर्वोच्च कोर्ट घोषित किया गया। इसके पीछे औचित्य यह बताया गया कि उच्चतम न्यायिक प्राधिकार केवल मुख्य आयुक्त (चीफ कमिश्नर) में ही निहित हो सकते थे जो कि नॉन रेग्यूलेशन प्रोविंस का मुखिया होता है। यह शक्ति उसके बराबर अथवा उससे उच्च स्तर के अधिकारी को नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे एजीजी की प्रतिष्ठा एवं उच्चता को राजपूताना रियासतों में कम करके आंका जाता जबकि उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वे एजीजी को पूरा सम्मान दें।

    इस व्यवस्था ने न्यायिक शक्तियां कार्यकारी अधिकारियों में निहित कर दीं। इस प्रकार प्रांत में न्याय का काम उन ब्रिटिश पॉलिटिकल अफसरों को दे दिया गया जिन्हें न तो न्यायिक प्रशिक्षण था और न कानूनों की जानकारी थी। इस प्रकार प्रांत के नागरिकों को दक्ष न्यायिक सलाह एवं अनुभवी न्यायिक अधिकारी उपलब्ध नहीं करवाये गये। ब्रिटिश सरकार ने इसका औचित्य यह बताया कि वे प्रांत के नागरिकों को सस्ती एवं सुलभ न्यायिक प्रशासन उपलब्ध करवाना चाहते हैं जो कि न्यायिक तकनीकों से मुक्त हो एवं देशी राज्यों को भी वे सब न्यायिक तकनीकियों सम्बन्धी परेशानियां नहीं हों जो नियमित न्यायिक प्रशासन के भीतर व्यवहार करते समय होती हैं।

    न्याय व्यवस्था चरमराई

    जब अजमेर के चीफ कमिश्नर को हाईकोर्ट के अधिकार दिये गये तो अजमेर के कमिश्नर को सेशन्स न्यायालय के अधिकार दे दिये गये। ये दोनों अधिकारी चीफ कमिश्नर और कमिश्नर, पोलिटिकल विभाग से आते थे जो न्यायिक कार्य करने से बचते थे। इस कारण न्याय पिछड़ता चला गया मुकदमे वर्षों तक अनिर्णीत पड़े रहे। ब्रिटिश सरकार ने न्यायिक प्रशासन को पोलिटिकल प्रशासन के अधीन देकर एक अस्वस्थ परम्परा विकसित की। पोलिटिकल अफसरों ने न्यायिक कार्य को अपने ऊपर भार समझा और उन्होंने प्रकरणों में निर्णय देने को टालने की कोशिश की।

    अदालतों में भ्रष्टाचार

    ई.1896 में अजमेर का विवरण लिखते समय मुराद अली ने लिखा है- अदालतों में रिश्वतबाजी, दगाबाजी, झूठे मुकदमे, झूठे गवाहों की भरमार हो गई। चंडू, मदक और अफीम के ठेके हो गये। हजारों आदमी इन चीजों को पीकर तबाह हो गये। व्यभिचार का बाजार पहले से ही गर्म था, अब भी गर्म है।

    पृथक न्यायिक कमिश्नर

    ई.1907 में अजमेर में एक पृथक न्यायिक कमिश्नर नियुक्त किया गया। ई.1920 में राष्ट्रीय आंदोलन तेजी से बढ़ने के कारण एजीजी एवं चीफ कमिश्नर को भी न्यायिक उत्तरदायित्व से मुक्त कर दिया गया। ई.1921 में अजमेर के लिये एक पृथक् ज्युडीशियल कमिश्नर नियुक्त किया गया ताकि लम्बे समय से अनिर्णित पड़े मुकदमे हल किये जा सकें किंतु ई.1924 में फिर से काठियावाड़ के ज्युडीशियल आयुक्त को अजमेर का काम सौंप दिया गया। वह भी पोलिटिकल विभाग का अधिकारी था। इसका परिणाम यह हुआ कि 1880-81 में जो नागरिक प्रकरण औसतन 19 दिनों में निर्णित होते थे, वे ई.1935-36 में 490 दिनों में निर्णित होने लगे। फौजदारी प्रकरणों के निर्णयों में ई.1880-81 में औसतन 6.4 दिनों का समय लगता था, वे ई.1929-30 में 94 दिनों में निर्णित होने लगे।

    अजमेर के शासन को राजपूताने के लिये प्रतिमान बनाने के प्रयास

    ई.1870 में लार्ड मेयो की अजमेर यात्रा के पश्चात् अजमेर के प्रशासन को राजस्थान के राज्यों के लिये एक प्रतिमान के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया गया। इसलिये ब्रिटिश शासन का पुनर्गठन किया गया किंतु अजमेर को नॉन रेग्यूलेशन प्रान्त के रूप में ही रखा गया। यह श्रेणी पिछड़े हुए क्षेत्रों के लिये थी। ई.1870 के बाद एजीजी न केवल अजमेर प्रांत का मुख्य प्रशासनिक अधिकारी था, अपितु समस्त प्रांत का मुख्य न्यायिक अधिकारी तथा अंतिम अपील कोर्ट भी बन गया।

    वर्ष भर में पांच माह- नवम्बर से मार्च तक वह निरंतर दौरे पर रहता था। 18 राज्यों के साथ राजनीतिक सम्बन्धों का संचालन करता था और माउण्ट आबू में रहता था। ई.1870 के पश्चात् अजमेर प्रशासन का प्रयोग राज्यों पर राजनीतिक एवं कूटनीतिक नियंत्रण स्थापित करने के लिये किया गया। विभिन्न नए विभागों के गठन के लिये राज्यों को अजमेर से अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर भेजे जाने लगे। इन अंग्रेज अधिकारियों को उन विभागों के संचालन के लिये अति उत्तम और योग्य बताया जाता।

    कुछ क्षेत्रों में यदि कोई पृथक विभाग प्रत्येक राज्य में न खोला जा सकता तो अजमेर के अधिकारी को समस्त राजस्थान के लिये उस विभाग का अध्यक्ष बना दिया जाता, जैसे मुख्य चिकित्सा अधिकारी, शिक्षा अधिकारी, पशु चिकित्सा अधिकारी, जेल तथा पुलिस अधिकारी आदि। जहाँ तक संभव हो सका, अजमेर प्रशासन में वे समस्त विभाग खोले गये जो एक सामान्य प्रांत में होते थे किंतु उनके पृथक्-पृथक् अध्यक्ष नहीं रख गये। प्रतिमान प्रशासन का अभिप्राय कुशल प्रशासन नहीं था।

    अधिकांश प्रशासनिक अधिकारी, पोलिटिकल विभाग के होते थे जो कार्यालय के काम से बचते थे। अजमेर प्रांत के नागरिकों के सामान्य जीवन से सम्बन्धित चार विभाग खोले गये- न्याय, शांति व्यवस्था, जन स्वास्थ्य और चिकित्सा तथा शिक्षा, इनमें से प्रत्येक में बहुत कमियां थीं। शांति व्यवस्था के लिये आय स्रोतों के अनुसार पुलिस चार भागों में विभक्त थी- कण्टोनमेंट, इम्पीरियल, लोकल और रूरल। पुलिस दल में सेवा की शर्तें अत्यधिक खराब थीं और रिक्त स्थान अधिक रहते थे जिसके कारण वार्षिक भर्ती होने वालों की संख्या अधिक रहती थी।

    बीसवीं सदी के प्रारंभ में लगभग 30-40 प्रतिशत पुलिस कर्मचारी बीमार रहते थे। घोर अपराधों की संख्या बढ़ती रहती थी। अजमेर में 1895 तक सरकारी अस्पताल नहीं था और जब खोला भी गया तो उस पर अधिक खर्च के कारण ध्यान कम दिया गया। मृत्यु दर अजमेर प्रांत में बहुत अधिक थी।

    विदेश एवं राजनीतिक विभाग के अधीन

    ई.1871 में अजमेर मेरवाड़ा क्षेत्र से एन. डब्लू. पी. सरकार का नियन्त्रण हटा लिया गया तथा उसे भारत सरकार के विदेश एवं राजनीतिक विभाग के अधीन कर दिया गया। इस कारण एजीजी राजपूताना को चीफ कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़) बनाया गया। एजीजी के अधीन कमिश्नर अजमेर, असिस्टेण्ट कमिश्नर अजमेर तथा असिस्टेण्ट कमिश्नर मेरवाड़ा की नियुक्ति की गई। ये तीनों अधिकारी राजनीतिक विभाग से आते थे। इसी वर्ष मेरवाड़ा बटालियन को ब्यावर से अजमेर स्थानांतरित कर दिया गया तथा रामसर तहसील समाप्त कर दी गयी।

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