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  • अजमेर का इतिहास - 68

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 68

    अजमेर का गौरव मेयो कॉलेज (2)



    ई.1871 में मेयो कॉलेज के सार्वजनिक निर्माण खण्ड की स्थापना की गई। मि.गोर्डन को इसका प्रथम एक्जीक्यूटिव इंजीनियर बनाया गया। उसने डीग के महलों का भ्रमण किया तथा शिमला में बैठकर दो नक्शे तैयार किये। इनमें से पहला नक्शा ग्रेशियन ढंग का था तथा दूसरा नक्शा इण्डो-सारसेनिक ढंग का था। लॉर्ड मेयो को ग्रेशियन ढंग वाला नक्शा पसंद आया किंतु इस नक्शे को अनुमोदित नहीं किया गया। मि. जोसेलाइन ने मेयो कॉलेज के लिये कोल्हापुर स्कूल का डिजाइन प्रस्तुत किया किंतु यह भी स्वीकृत नहीं हुआ।

    इसके बाद चार साल तक कॉलेज के मानचित्र के निर्माण पर विभिन्न अधिकारियों एवं अभियंताओं में लम्बा पत्र व्यवहार हुआ। लम्बे विचार विमर्श हुए और अंत में रॉयल इंजीनियर्स सेवा के मेजर जनरल कनिंघम एवं मेजर जनरल मॉण्ट द्वारा प्रस्तुत नक्शा स्वीकार कर लिया गया। राजपूताना के एजीजी मि.अल्फ्रेड सी. ल्याल ने 19 अक्टूबर 1875 को भवन की नींव रखी। इसके बनने में 7 साल और 8 माह लगे। इसके भवन निर्माण पर 3,81,696 रुपये की लागत आई।

    इसके निर्माण का आरंभिक कार्य एक्जीक्यूटिव इंजीनियर ब्रासिंगटन की देखरेख में आरंभ हुआ। उसके बाद एक्जीक्यूटिव इंजीनियर भगारसिंह की सेवायें ली गईं जो 30 जून 1885 तक अजमेर में रहा। इसी के साथ मेयो कॉलेज का पीडब्लूडी खण्ड भंग कर दिया गया तथा कॉलेज के पर्यवेक्षण का काम कॉलेज के प्रिंसीपल को दे दिया गया। इसका उद्घाटन 7 नवम्बर 1885 को वायसरॉय लॉर्ड डफरिन द्वारा हुआ। ई.1903-04 में इसमें विस्तार कार्य किया गया।

    ई.1909 में इस कॉलेज के लिये चार भूखण्ड खरीदे गये। ये भूखण्ड, कॉलेज के विद्यार्थियों के स्वास्थ्य की रक्षा के उद्देश्य से खरीदे गये। ई.1908-09 में नवीन पूर्वी खण्ड जोड़ा गया ताकि कक्षाओं की संख्या पूरी की जा सके। राजाओं, राजकुमारों तथा सामंत पुत्रों के लिये स्थापित किये गये इस कॉलेज की स्थापना का उद्देश्य शैक्षिक कम और राजनैतिक अधिक था। साम्राज्यिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये अंग्रेज अधिकारियों को एक ऐसे अंग्रेजी पसंद वर्ग की आवश्यकता थी जिन्हें शासन में उच्च पदों पर महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जा सकें।

    अक्टूबर 1875 में अंग्रेज अधिकारियों ने कॉलेज तो आरंभ कर दिया किंतु उन्हें चिंता थी कि इसमें पढ़ने के लिये राजा एवं राजकुमार आयेंगे अथवा नहीं। उनकी चिंता को दूर करने के लिये अलवर नेरश मंगलसिंह इसके आरंभ होने से पहले ही अजमेर पहुँच गये। वे इसमें प्रवेश लेने वाले प्रथम विद्यार्थी थे। इस सत्र में जयपुर रियासत के जोबनेर ठिकाणे के करणसिंह, बगरू से पृथ्वीसिंह, दूदू के शिवनाथसिंह भरती हुए।

    इस सत्र में अलवर से पांच, मारवाड़ से 8, मेवाड़ से 4, जयपुर से 6, झालावाड़ से 1, अजमेर से 9 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। इन 33 विद्यार्थियों में से एक अलवर रियासत का राजा था। एक को शीघ्र ही झालावाड़ की राजगद्दी पर बैठाया जाने वाला था तथा एक विद्यार्थी महाराजा जोधपुर का भाई था। ये समस्त विद्यार्थी 7 से 17 साल की आयु के थे। ये अपनी मातृभाषा में भी लिखना और पढ़ना नहीं जानते थे। इनमें से केवल अजमेर के तीन विद्यार्थी ही ऐसे थे जिन्हें अंग्रेजी का पूर्व ज्ञान था।

    मेयो कॉलेज में जयपुर के विद्यार्थियों के आवास के लिये जयपुर हाउस का मानचित्र अंग्रेज इंजीनियर डी. के. फैब ने बनाया। इसके निर्माण पर 66 हजार रुपये खर्च आया। ई.1875 में जोधपुर नरेश महाराजा जसवंतसिंह (द्वितीय) ने मारवाड़ के सरदारों और राजवंश के बालकों के रहने के लिये 36 हजार रुपये व्यय कर मेयो कालेज में एक बोर्डिंग (छात्रावास) बनवाया और मेयो कॉलेज के लिये मकराना (संगमरमर) का पत्थर मुफ्त दिया। जब तक अलवर रेजीडेंस तैयार नहीं हुआ, महाराजा अलवर ब्रिटिश रेजीडेंसी के एक बंगले में रहे। मेजर सेंट जॉन को मेयो कॉलेज का प्रथम प्रिंसीपल बनाया गया।

    यहाँ से वह कर्नल के पद पर पदोन्नत होकर कश्मीर व बलूचिस्तान का रेजीडेंट बना। कॉलेज के खुलने के समय मि. केटर को ऑफीशियेटिंग हैड मास्टर, मि. कीने को राइटिंग मास्टर, मौलवी हबीबुर्रहमान को उर्दू एण्ड पर्शियन टीचर, पण्डित जानकी नाथ को जूनियर इंगलिश एण्ड वर्नाक्यूलर मास्टर तथा पण्डित शिवनारायण को हिन्दी एण्ड संस्कृत ट्यूटर रखा गया।

    5 दिसम्बर 1879 को लॉर्ड लिटन मेयो कॉलेज के पुरस्कार वितरण समारोह में भाग लेने अजमेर आये। इस दौरान उन्होंने कहा कि इस कॉलेज का प्रथम उद्देश्य देश को प्रथम श्रेणी के बुद्धिमान युवक उपलब्ध करवाना तथा राजपूताना के उच्च वर्ग के युवकों को शारीरिक प्रशिक्षण उपलब्ध करवाना है। लॉर्ड रिपन ने इस संस्था के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा था कि हमारा उद्देश्य आपको वह समस्त ज्ञान उपलब्ध करवाना है जो पश्चिमी सभ्यता ने आज तक अर्जित किया है। साथ ही वह श्रेष्ठ ज्ञान जो परम्परागत रूप से आपमें निहित है, उसे भी बनाये रखना है।

    कर्नल लॉक ने इस संस्था के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए कहा कि इस कॉलेज का उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान उपलब्ध करवाना नहीं है अपितु मस्तिष्क एवं शरीर को ऊर्जा एवं बढ़ावा देना है। लॉक ने कहा कि यह कॉलेज विभिन्न रियासतों के राजकुमारों को निकट लाकर उनमें परस्पर मित्रता स्थापित करने का भी अवसर प्रदान करता है जिससे कि वे इतने परिपक्व हो जायें कि उनके अपने और उनकी प्रजा के उच्चतम लाभ निष्फल न हो सकें। इस संस्था में केवल राजा एवं राजकुमार ही पढ़ते थे।

    संस्था के प्रथम प्राचार्य ऑलिवर सेंट जॉन के समय से ही संस्था को अच्छे शिक्षाविदों की सेवाएं प्राप्त होती रहीं। विद्यालय प्रारंभ से ही 20 खेल मैदानों एवं सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त रहा। बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध संस्था के इतिहास में गौरवशाली परंपराओं का पर्याय रहा और संस्था में विलियम लॉक, स्टो, लेस्ली जॉन, पं.चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी', कानमल माथुर एवं गफ्फार हुसैन जैसे प्रख्यात शिक्षाविदों ने पढ़ाया।

    लॉर्ड मेयो की प्रतिमा

    आरम्भ में लॉर्ड मेयो की प्रतिमा कॉलेज के केन्द्रीय कक्ष में लगाई गई थी। ई.1885 में मेयो कॉलेज भवन बनकर पूरा हुआ। 5 नवम्बर 1885 को वायसराय मारकीस ऑफ डफरिन अजमेर आया। इसी वर्ष लॉर्ड मेयो की प्रतिमा कॉलेज के केन्द्रीय कक्ष से हटाकर पश्चिम में बाहर लॉन में स्थानान्तरित की गयी।

    मेयो हॉस्टल में शराब और औरतों का बोलबाला

    अंग्रेजों ने भारतीय राजाओं तथा सामंतों को सभ्य बनाने के लिये मेयो कॉलेज खोला था किंतु इस कॉलेज में पढ़ने के प्रति राजपूताना के राजाओं में विशेष उत्साह नहीं था। 1970 से 1990 तक इस कॉलेज में जयपुर, जोधपुर, उदयपुर से कोई शासक अथवा राजकुमार पढ़ने के लिये नहीं आया। कोटा नरेश उम्मेदसिंह को बलपूर्वक लाया गया। बीकानेर नरेश बालक होने के कारण सरलता से अजमेर लाया जा सका। कॉलेज में वातावरण बहुत उत्साह जनक नहीं था। शराब पीना और स्त्रियों का रात्रि में हॉस्टलों में आना सामान्य घटनाएं थीं। कॉलेज के मंच से घोषणा की गई कि अब कॉलेज के द्वारा राजाओं, राजकुमारों तथा सामंतों को सभ्य नहीं बनाया जायेगा। ई.1890 में लेंसडाउन ने कॉलेज की असफलता को स्वीकार किया। मेयो कॉलेज को असफल होने से बचाने के लिये लेन्स डाउन तथा कर्जन ने इसके प्रशासन में फेर बदल किया।

    मेयो कॉलेज की दुर्दशा

    1891 के पश्चात् इस कॉलेज में विद्यार्थियों की संख्या में निरंतर गिरावट आने लगी। शेरिंग ने ई.1896 में हिस्ट्री ऑफ मेयो कॉलेज लिखकर कॉलेज के पुराने छात्रों से अपील की कि वे अपनी मातृ संस्था को सफल बनायें। शासकों से अनुरोध किया गया कि वे अपने यहाँ ऐसी संस्थायें खोलें जिनसे छात्रों को, बड़ा होने पर अजमेर के मेयो कॉलेज में भरती किया जा सके। ई.1902 में लॉर्ड कर्जन ने इस समस्या को व्यापक रूप देकर समस्त कुलीन वर्गीय कॉलेजों के प्रबंध से सम्बन्धित भारतीय नरेशों की एक सभा बुलाई। इसके बाद यह सम्मेलन हर साल बुलाया जाने लगा जिसका निमंत्रण वायसरॉय की ओर से दिया जाता था।

    कर्जन ने कॉलेजों के प्रशासन में आवश्यक परिवर्तन किये जिससे नरेशों का विश्वास प्राप्त किया जा सके। मेयो कॉलेज की प्रबंध समिति में 16 में से 13 सदस्य राज्यों के नरेश अथवा प्रमुख सामंतों को बना दिया गया। कॉलेज में खेले जाने वाले पोलो के खेल की आलोचना हुई। प्राचार्य को पढ़ाने का दायित्व सौंपा गया। भारतीय अध्यापकों की नियुक्ति आरंभ हुई तथा इम्पीरियल कैडेट कोर की योजना बनी। वास्तव में यह एक राजनीतिक योजना थी।

    जोधपुर के राजा और राजकुमार मेयो कॉलेज में

    फरवरी 1907 में जोधपुर नरेश सरदारसिंह अजमेर में मेयो कॉलेज की 'कॉन्फ्रेंस' में सम्मिलित हुआ। नवम्बर 1907 में वह पुनः अजमेर आया तथा मेयो कॉलेज के उत्सव में सम्मिलित हुआ। ई.1910 में जोधपुर नरेश उम्मेदसिंह शिक्षा प्राप्त करने के लिये अपने बड़े भ्राता महाराजकुमार सुमेरसिंह के साथ ही अजमेर के मेयो कॉलेज में प्रविष्ट हुए। उन्होंने कर्नल वाडिंग्टन् की निगरानी में रहकर, शिक्षा प्राप्त की। उम्मेदसिंह का छोटा भ्राता महाराज अजीतसिंह भी मेयो कॉलेज में शिक्षा प्राप्त करने लगा।

    भारत के वायसरॉय मेयो कॉलेज में

    भारत की स्वतन्त्रता से पूर्व, भारत के समस्त वायसरायों ने, मेयो कॉलेज का अवलोकन किया। इनमें लॉर्ड लिटन (ई.1879), लॉर्ड रिपन (ई.1881), लॉर्ड डफरिन (ई.1885), लॉर्ड लेन्सडाऊन (ई.1891), लॉर्ड कर्जन (ई.1899 तथा ई.1902), लॉर्ड मिन्टो (ई.1906), लॉर्ड इर्विन (ई.1930), लॉर्ड वेलिंग्टन (ई.1932), आदि प्रमुख थे। इनके अतिरिक्त प्रिस ऑफ वेल्स (बाद में किंग एडवर्ड सप्तम्) भी संस्था में आए। उन्होनें इस संस्था को 'पूर्व का ईटन' की संज्ञा दी। ई.1911 में महारानी मैरी ने भी इस संस्था को देखा।

    मेयो कॉलेज का संग्रहालय

    मेयो कॉलेज का संग्रहालय विश्व भर की शिक्षण संस्थाओं में अद्भुत है। इसमें प्राचीन काल के अस्त्र-शस्त्र, भाले, तलवारें, बन्दूकें, पिस्तोलें तथा आधुनिक युग के हथियार-बम आदि रखे गये हैं। भारतीय और मिश्र सभ्यता के प्राचीन अवशेषों की प्लास्टर ऑफ पेरिस की अनुकृतियां तथा छठी शताब्दी ईस्वी से बारहवीं शताब्दी ईस्वी के बीच के पुरातात्विक अवशेष, पहली-दूसरी शताब्दियों की पत्थर की कलाकृतियों की अनुकृतियां, 17वीं से 19वीं शताब्दी ईस्वी की पुरानी पेंटिंग्स, पोट्रेट्स, ऑइल पेंटिंग्स, तथा फोटोग्राफ, भारत में विभिन्न काल खण्डों में प्रचलित रहे सिक्के, विश्व के प्रमुख देशों में प्रचलित सिक्के तथा मुद्रायें, विभिन्न पशुओं के अण्डे, घोंसले, मधु मक्खियों के छत्ते, विभिन्न पशुओं की खालें, विभिन्न प्रकार के पशु, पक्षी, सरीसृप एवम् मछलियों के नमूने उनके सींग तथा दांत, तितलियां, कीट-पतंगे, सीपियां, घोंघे, कौड़ियां, वनस्पति एवं जन्तुओं के काष्ठ जीवाश्म, चट्टानों के नमूने, खनिज पदार्थ, विभिन्न प्रकार की पोषाकें, टोपियाँ, बुनाई के नमूने तथा विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों के नमूने संग्रहीत हैं।

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