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  • अजमेर का इतिहास - 67

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 67

    अजमेर का गौरव मेयो कॉलेज (1)



    ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के दौरान यह माना जाता था कि भारतीय नरेशों के अशिक्षित होने के कारण उन्हें नियंत्रण में रखना सरल है। इसलिये उनकी शिक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया गया तथा इसे राजाओं का आंतरिक मामला कहकर उपेक्षित किया गया। ई.1830 से इस नीति में बदलाव आना आरंभ हुआ तथा नरेशों एवं राजकुमारों के शिक्षण के लिये निजी शिक्षक नियुक्त किये जाने लगे।

    ई.1858 में महारानी विक्टोरिया की घोषणा के बाद राज्यों को ब्रिटिश साम्राज्य का सहयोगी घोषित किया गया। ब्रिटिश साम्राज्य के काम में भारतीय नरेशों का सहयोग लेने के उद्देश्य से नरेशों एवं राजकुमारों की अंग्रेजी शिक्षा की आवश्यकता अनुभव की गई। महलों एवं रजवाड़ों में इनकी शिक्षा के लिये समुचित वातावरण उपलब्ध नहीं था। उन्हें साधारण स्कूलों में भी पढ़ने के लिये नहीं भेजा जा सकता था क्योंकि उन स्कूलों का स्तर बहुत नीचा था।

    ई.1869 में भरतपुर के पोलिटिकल एजेंट कर्नल सी. के. एम. वॉल्टर ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की कि भारतीय युवा पीढ़ी, विशेषकर राजपुत्रों में, बदलते विश्व परिवेश के अनुरूप भावनाएँ जाग्रत करने एवं उन्हें एक श्रेष्ठ व्यक्ति बनाने के लिए इस देश में भी 'ईटन' जैसी एक संस्था अपरिहार्य है। राजपूताना के एजीजी कर्नल कीटिंग्स ने वॉल्टर के सुझाव को महत्त्वपूर्ण माना तथा लॉर्ड मेयो ने भी इस सुझाव को महत्त्व प्रदान किया।

    ई.1870 में लॉर्ड मेयो ने अजमेर में आयोजित हुए राजपूताना शासकों के दरबार में लम्बा भाषण दिया जिसमें उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि वे राजकुमारों के लिये एक कॉलेज खोलना चाहते हैं। कलकत्ता लौटकर भी लॉर्ड मेयो ने इस योजना पर काम करना जारी रखा तथा राजाओं से कहा कि वे प्रस्तावित कॉलेज के लिये धन दें। (भारत सरकार ने इस अवधि में भारतीय राजकुमारों की शिक्षा के लिए राजकोट में राजकोट कॉलेज, अजमेर में मेयो कॉलेज, इन्दौर में डेली कॉलेज और कुछ समय बाद लाहौर में एचिसन कॉलेज के नाम से विशेष विद्यालय खोले।)

    मेयो ने राजाओं को विश्वास दिलाया कि ब्रिटिश सरकार भी इस कार्य के लिये पर्याप्त धन देगी। देशी राजाओं ने वायसराय के इस प्रस्ताव का उत्साह से समर्थन किया। प्रारंभ में कॉलेज की स्थापना के लिये चार लाख रुपये की आवश्यकता अनुभव की गई किंतु एजीजी कर्नल ब्रुक ने इसे बढ़ाकर छः लाख रुपया कर दिया जिसमें से आधी राशि ई.1871 में, चौथाई राशि ई.1872 में तथा शेष चौथाई राशि ई.1873 में देने की आवश्यकता जताई गई। मेयो कॉलेज की स्थापना के लिये भारत सरकार ने 6 लाख रुपये का अंशदान दिया।

    ब्रिटिश अधिकारियों की मांग पर राजपूताने के 18 में से 15 राजाओं ने भी मेयो कॉलेज के लिये 6,26,000 रुपये उपलब्ध करवाये। इनमें से उदयपुर महाराणा ने एक लाख रुपये, जयपुर महाराजा ने सवा लाख रुपये, जोधपुर महाराजा ने एक लाख रुपये, कोटा महाराव ने 70 हजार रुपये, भरतपुर महाराजा ने 50 हजार रुपये, बीकानेर महाराजा ने 50 हजार रुपये, झालावाड़ महाराजराणा ने 40 हजार रुपये, अलवर महाराव ने 35 हजार रुपये, करौली महाराजा ने 15 हजार रुपये, बूंदी महाराव राजा ने 10 हजार रुपये, प्रतापगढ़ महारावल ने 10 हजार रुपये, किशनगढ़ महाराजा ने 6 हजार रुपये, टोंक नवाब ने 5 हजार रुपये, बांसवाड़ा महारावल ने 4 हजार रुपये तथा सिरोही महाराव ने 3,750 रुपये उपलब्ध करवाये।

    शाहपुरा के राजाधिराज ने कोई राशि उपलब्ध नहीं करवाई। इस सहायता के अतिरिक्त कई राजाओं ने यह आश्वासन भी दिया के वे इस कॉलेज में पढ़ने वाले अपनी रियासत के लड़कों के लिये हॉस्टल भी बनायेंगे। इस कॉलेज की योजना पर महाराणा उदयपुर ने कहा कि यह एक अच्छा कार्य है। जयपुर महाराजा रामसिंह ने कहा कि वॉयसराय के मन में जिन राजकुमारों की भलाई के लिये रुचि है, यह कॉलेज उन राजकुमारों के मनोबल तथा बौद्धिक स्तर को काफी ऊँचा बढ़ायेगा तथा इससे अगणनीय लाभ होगा।

    टोंक नवाब ने कहा कि यह आनंद का स्रोत है, उन्होंने इस कार्य के लिये अधिक राशि देने की इच्छा व्यक्त की किंतु अनेक कारणों से केवल 25 हजार रुपये ही देने का प्रस्ताव भिजवाया। वॉयसराय ने इसमें से केवल 5 हजार रुपये ही स्वीकार किये। वायसराय के इस कार्य को जोधपुर महाराजा ने उदारता का कार्य बताया। कोटा महाराव छित्तरसिंह ने वॉयसराय की इच्छा की प्रशंसा की तथा राजकुमारों के भविष्य के लिये कल्याणकारी बताया।

    भरतपुर महाराजा जसवंतसिंह ने राशि भेजते समय सरकार के सदैव सहयोग की अपेक्षा की। बीकानेर महाराजा सरदारसिंह ने इस कार्य पर वास्तविक प्रसन्नता व्यक्त करते हुए आशा की कि उनकी रियासत में होने वाले दंगों पर सरकार अधिक अर्थदण्ड नहीं लगायेगी। झालावाड़ के महाराजाराणा पृथ्वीसिंह ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि कॉलेज का बहुत अच्छा प्रभाव होगा। अलवर महाराव ने इसे गर्व करने योग्य आवश्यक उद्देश्य बताया।

    बूंदी महाराव राजा ने कहा कि सरकार की इच्छा इस कॉलेज को खोलकर हृदय से देशी राजाओं का भला करने की है। किशनगढ़ महाराजा पृथ्वीसिंह ने इस प्रस्ताव को अत्यंत प्रशंसनीय बताया। सिरोही के महाराव ने इसे राजपुत्रों की सम्पूर्ण भलाई वाली योजना बताया। जब विभिन्न रियासतों द्वारा भेजी गई राशि एजीजी को प्राप्त हो गई तो वायसराय ने एजीजी को निर्देश दिये कि जब तक कॉलेज प्रबंधन के न्यासी तय नहीं हो जाते तथा कॉलेज का संविधान पूरा नहीं हो जाता, तब तक के लिये इस राशि को अजमेर-मेरवाड़ा के चीफ कमिश्नर तथा भारत सरकार के सचिव के संयुक्त नाम से राजकीय प्रतिभूति में निवेश कर दिया जाये।

    अजमेर के कमिश्नर को मेयो कॉलेज अजमेर की तरफ से राजकीय प्रतिभूति पर ब्याज लेने के लिये अटॉर्नी नियुक्त किया गया। जयपुर नरेश इस कॉलेज को जयपुर में बनवाना चाहते थे किंतु लॉर्ड मेयो ने इस कॉलेज के लिये अजमेर का चुनाव किया। ऐसा करने के तीन कारण थे- (1.) यह नगर, राजपूताने के केन्द्र में स्थित था। (2.) यह ब्रिटिश शासित क्षेत्र था जहाँ समस्त रियासतों के शासक बिना किसी भय के आपस में मिल सकते थे। (3.) यदि इस कॉलेज को किसी भी रियासत में बनाया जाता तो अन्य रियासतों के राजाओं के हृदय में ईर्ष्या उत्पन्न होती। भारत सरकार ने इस कॉलेज के मुख्य भवन तथा हॉस्टल के निर्माण के लिये भूमि उपलब्ध करवाई तथा छः लाख रुपयों की लागत से एक हॉस्टल भी बनवाया।

    लॉर्ड मेयो का मूल विचार यह था कि इस कॉलेज को एक श्रेष्ठ उद्यान के मध्य में खड़ा किया जाये। मुख्य भवन के चारों ओर विद्यार्थियों के लिये बंगले बनाये जायें। बंगलों के पास ही घुड़शालायें तथा अनुचरों के क्वार्टर्स हों। यह अनुभव किया गया कि अजमेर में पेयजल की उपलब्धता एक कठिन कार्य होगा, इसलिये भवनों की छतों के जल को भूमिगत टांकों में एकत्रित किया जाये। इस कॉलेज के लिये चर्च की बगल में, जयपुर जाने वाली सड़क के बाईं ओर स्थान निर्धारित किया गया।

    चूंकि उन्हीं दिनों में अजमेर में रेलवे लाइन तथा रेलवे स्टेशन के लिये भूमि का निर्धारण किया जाना था इसलिये मेयो कॉलेज के लिये स्थान का निर्धारण कुछ दिनों के लिये टाल दिया गया। अंत में मि. गोर्डन ने कॉलेज के लिये भूमि का चयन किया। यह एक पुरानी एजेंसी जागीर (ओल्ड रेजीडेंसी) थी जिसमें 88 एकड़ भूमि थी। इसके साथ ही 79 एकड़ भूमि कॉलेज पार्क के लिये और खरीदी गई। इस प्रकार कॉलेज के पास 167 एकड़ भूमि हो गई।

    लॉर्ड मेयो इस कॉलेज का नक्शा इस प्रकार का बनाना चाहते थे जिसमें एक विशाल हॉल हो और उसके चारों ओर कक्षायें हों। उनके बाहर की तरफ सजावटी स्तम्भों पर बने हुए बरामदे हों जो काफी हवादार और सजावटी हों। उन्होंने केवल इतना ही सुझाव दिया, कोई निश्चित नक्शा नहीं दिया। राजपूताने के एजीजी कर्नल लेविस पेली को मेयो के विचार से प्रसन्नता नहीं हुई। उसे लगा कि यदि कॉलेज बिल्डिंग भव्य और आकर्षक नहीं हुई तो राजा लोग नाराज हो जायेंगे किंतु वह भी इस भवन को अधिक अलंकृत नहीं बनाना चाहता था।

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