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  • अजमेर का इतिहास - 66

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 66

    उन्नीसवीं सदी के अंत में अजमेर (2)


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    मैगजीन के चारों ओर खाई भरकर उस पर घर बना दिये गये। दक्षिणी और पूर्वी बुर्ज की तरफ शहर का परकोटा तोड़कर वहाँ आधुनिक चिकित्सालय की नींव रखी गई। यह चिकित्सालय 16 जुलाई 1894 को बनकर पूरा हुआ। कर्नल ट्रेवर ने इसका उद्घाटन किया। इस चिकित्सालय के लिये सेठ मूलचंद सोनी और सौभाग ढढ्ढा ने सात-सात हजार रुपये चंदा दिया। इस चिकित्सालय के निकट से होकर एक सड़क निकाली गई। मैगजीन की जड़ में लड़कों का सरकारी स्कूल बन गया। मैगजीन का अस्थायी दरवाजा बंद होकर स्थायी वाला वास्तविक दरवाजा खुल गया। ऊसरी दरवाजे का नामोनिशान भी शेष न रहा।

    दरवाजे के पश्चिमी हिस्से में हलवाई की दुकान खुल गई। उधर का परकोटा भी तोड़ दिया गया। रिसाले का पूरा मैदान, अब्दुल्लाहपुरा की सराय तक आबाद हो गया। अब्दुल्लाहपुरा और मस्जिद की बाईं तरफ डाक बंगला रेवले से दक्षिण में जो कब्रिस्तन था, उसके मुर्दों की मिट्टी पलीद हुई। आधा रेल की पटरियों के नीचे और आधा स्टेशन की चाहरदीवारी में मालगोदाम के पास आ गया। सराय अब्दुल्लापुरा आधी नष्ट हो गई। अब्दुल्लाह खान की बीवी का मकबरा रेल के अहाते में चला गया और खुद नवाब अब्दुल्लाह की कब्र सराय में ही रह गई। उनके बीच से रेल की पटरी निकल गई।

    कच्ची कोठरियों के स्थान पर पक्की कोठरियां बन गईं। सराय के चारों तरफ जहाँ थोहर और गधे दिखाई देते थे, वहाँ सन् 1877 में कैसरगंज बसाया गया। ऊँचे टीलों पर सिरकी बंध कुंजड़ों की जगह पुतलीघर बन गया। उसके चारों तरफ कोठियां और बंगले खड़े हो गये। उसके पास ही गवर्नमेंट कॉलेज भी बन गया। ब्यावर और नसीराबाद की सड़कों के दोनों तरफ जहाँ तक दृष्टि जाती थी, बंगले ही बंगले बन गये। मेयो कॉलेज अपनी शैक्षणिक भव्यता के साथ दिखता था।

    पुरानी रेजीडेंसी के बंगले का नाम मिट गया। वहाँ रईसों की कोठियां बन गईं। श्रीनगर की सड़क के दोनों तरफ भी बंगले दिखाई देने लगे। नवाब कुम्हारबाय के कब्रिस्तान स्थित बीसला तालाब की पाल के निकट गिर्जाघर और रेल का तार लगा हुआ है। कैवेण्डिशपुरा की झौंपड़ियों में महल बन गये। शहर में सड़कें बन गईं। हर गली कूंचे में लालटेनें लग गईं। शहर में हजारों की संख्या में दो-तीन मंजिला पक्के मकान बन गये। नया बाजार में आटा पीसने वालों की दुकानों में कपड़ा बाजार लग गया।

    दूसरे राज्यों से हजारों लोग अजमेर में आकर बस गये। घर-घर में रेल कर्मचारी और सरकारी बाबू दिखाई देने लगे। दो रुपये मासिक का किराया अब दस रुपये मासिक हो गया। मकानों का किराया पेशगी देना पड़ता था। शहर के हर गली कूंचे में मद्रासी, गुजराती, काठियावाड़ी और पंजाबी दिखाई देने लगे। ख्वाजा साहब की कमेटी कुप्रबंधन के कारण टूट गई। दरगाह पर सरकारी प्रबंधन हो गया। मुंशी अल्लाह नूर खां टॉडगढ़ की नायब तहसीलदारी से तहसीलदार हो गये और दरगाह के प्रबंधक बन गये।

    ई.1870 में अजमेर शहर में पांच बग्घियां थीं। ई.1894 के आते-आते घर-घर गाड़ियां हो गईं। मुराद अली ने लिखा है- कुछ सेठों को छोड़ दें तो अजमेर के शेष रईस नीबू निचोड़ और भूखे हैं। सेठ मूलचंद सोनी को उसने दानवीर मर्द तथा रहमदिल साहूकार बताया है। दरगाह के दलबदल शामियाने की जगह नवाब इकबालउद्दौला वजीर हैदराबाद ने पत्थर का महफिलखाना बना दिया। ई.1896 के आसपास आनासागर में पानी कम हो गया और फॉयसागर में पानी की मात्रा काफी हो गई। अब फॉयसागर का पानी शहर के नलों में आने लगा। इस सागर का निर्माण फाई नामक इंजीनयिर ने नगरपालिका कमेटी के रुपयों से करवाया और अपने नाम पर इसका नामकरण किया।

    अंदरकोटी मुसलमान

    शहर के बाहर पुरानी आबादी में अंदर कोट था। इसमें मुस्लिम जनसंख्या रहती थी जिन्हें अंदरकोटी मुसलमान कहा जाता था। इसमें सब कौमों के मुसलमान रहते थे। सेठ-साहूकार, मालदार और सरदार लोग अपनी सुरक्षा के लिये अंदरकोटियों को नौकर रखते थे। लोग अपने दुश्मनों से बदला लेने के लिये भी किसी अंदरकोटी को दो-चार रुपये देकर उनको जूते पड़वाते थे। ख्वाजा साहब की देग को भी रस्म के रूप में अंदरकोटी मुसलमान लूटा करते थे। जब ताजिये निकलते थे तो अंदरकोटी लोग अखाड़ेबाजी और तलवार घुमाने का प्रदर्शन भी करते थे। उस समय नगर परकोटे का मुख्य द्वार बंद कर दिया जाता था। इस अखाड़ेबाजी और तलवार बाजी के कारण यदि कोई आम आदमी घायल हो जाता था तो भी वह शिकायत नहीं करता था।

    देसवाली मुसलमान

    ई.1894 के आसपास अजमेर में देसवाली लोगों के आठ मुहल्ले थे। देसवाली मूल रूप से राजपूत थे इनके पूर्वजों ने ई.1202 में तारागढ़ पर स्थित मीरान सैयद खनग सवार की दरगाह पर रात में धावा मारा था। इसके बदले में इन्हें पकड़कर मुसलमान बनाया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में अजमेर के चारों ओर देसवाली मुसलमानों की संख्या पचास हजार से ऊपर हो गई। ये अपने गोत्र खीची, चौहान, सांखला आदि लिखते रहे। ये बहुत गरीब थे। मेहनत मजदूरी करके तथा लकड़ियां बेचकर जीवन निर्वाह करते थे।

    इनके घरों में बात-बात पर झगड़ा होता था। उस समय में मुसलमानों की एक बड़ी आबादी ख्वाजा की दरगाह के खादिमों की भी खड़ी हो चुकी थी। अजमेर में मुसलमान जागीरदारों के पुराने घर भी बड़ी संख्या में थे जिनके पुरखों की जागीरें अजमेर के आसपास हुआ करती थीं। वे अब इतनी छोटी-छोटी रह गई थीं कि कई परिवारों के हिस्से में साल भर में तीन से चार सेर अनाज की आय ही रह गई थी।

    जागीरों की आय

    उस काल में बड़ी जागीरों के स्वामी बहुत कम रह गये थे। जिनमें ख्वाजा साहब की जागीर की आय 40 हजार रुपये वार्षिक, दरगाह मीरान सैयद हुसैन (तारागढ़) की आय 4400 रुपये वार्षिक, चिल्ला पीर दस्तगीर (तारागढ़) की आय 1800 रुपये वार्षिक, मंदिरों की जागीर आय 4000 रुपये वार्षिक, दीवान गयासुद्दीन अली खान शखुलमशाही दरगाह सज्जादा नशीन की आय लगभग 5000 रुपये वार्षिक, नवाब शम्सुद्दीन खां महावत खानी की आय 10,000 रुपये वार्षिक, राजा देवीसिंह गौड़ की आय 4500 रुपये वार्षिक, राजा विजयसिंह, जागीरदार गंगवाना की आय लगभग 5000 रुपये वार्षिक, सैयद इनायतुल्लाह शाह आय लगभग 4300 रुपये वार्षिक, खानदान मेहरबान अली की आय 5600 रुपये वार्षिक थी।

    उस समय अजमेर जिले में 32 ताजीमी पट्टेदार ठिकाने थे- 1. भिनाय, 2. मसूदा, 3. जूनिया, सावर, खरवा, पीसांगन, बांधनवाड़ा, देवलिया कलां, महरुलकलां, आदि प्रमुख थे। इनमें से भिनाय ठिकाना सबसे बड़ा था। राजा मंगल सिंह इसके जागीरदार थे। वे दानवीर और प्रजापालक माने जाते थे। ई.1877 में उन्हें दिल्ली के दरबार में सी.आई.ए. की उपाधि मिली थी। पीसांगन का नौजवान राजा और बासोढ़ी का बड़ा ठाकुर नाहरसिंह ई.1897 में नाबालिगी में ही चल बसे थे। उसके बाद उसका छोटा भाई ठाकुर हुआ। देवलिया का ठाकुमर हरिसिंह भी ई.1897 से पहले मर गया।

    अपराधियों का बोलबाला

    उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों का वर्णन करते हुए मुराद अली ने लिखा है- देशी रजवाड़ों की अपेक्षा ब्रिटिश शासित क्षेत्र अजमेर में चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार, जालसाजी, दगाबाजी की वारदातें अधिक हो रही हैं। यद्यपि आरंभ में अंग्रेजी शासन की बड़ी प्रशंसा हुई तथा यह कहा गया कि अंग्रेज के शासन में शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पीते हैं किंतु अब यह बात नहीं रही। मुजरिमों की रक्षा के लिये कानून बनाया गया है जिससे हजारों अपराधी बच जाते हैं। अपराधी को पकड़ लिये जाने पर वह तुरंत वकील करता है, वकील के सवालों से गवाह घबरा जाता है और अपराधी छूट जाता है। इससे अपराधियों के हौंसले बुंलद होते जा रहे हैं।

    वकीलों की मौज

    साण्डर्स के आने से पहले अजमेर में वकील बहुत ही कम थे। जब साण्डर्स अजमेर आया तो अजमेर-मेरवाड़ा विदेश विभाग के अधीन था। इसलिये साण्डर्स ने विदेश विभाग से अजमेर के लिये विशेष कानून बनवाया जिसे अजमेर रेगूलेशन एक्ट कहते थे। इसकी धारा 28 के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया कि अजमेर से बाहर का वकील बिना किसी विशेष परिस्थिति के, अजमेर की न्यायालयों में मुकदमे की पैरवी नहीं कर सकता था। इस कारण साण्डर्स के समय में भी वकीलों की संख्या बहुत कम थी। इससे न्यायालयों में बहस बहुत कम होती थी और मुकदमों का निस्तारण बहुत कम समय में हो जाता था।

    बाद में धारा 28 का प्रावधान हट जाने से पूरे देश से वकील अजमेर आने लगे जिससे बहसें लम्बी हो गईं और मुकदमों के फैसले विलम्ब से होने लगे। वकीलों की लम्बी बहसों का परिणाम यह हुआ कि अपराधी छूटने लगे और बेगुनाह सजा पाने लगे। मुराद अली लिखता है- जब कोई मालदार व्यक्ति मुकदमे बाजी में फंस जाता है तो न्यायालयों के कर्मचारियों तथा वकीलों की बांछें खिल जाती हैं।

    वकील और रीडर मन ही मन पुलाव पकाने लगते हैं। चपरासी भी इनाम की इच्छा से पूंछ हिलाने लगता है। न्यायाधिकारी यदि डिक्री दे भी दे तो वसूल कहां से हो। डिक्री को लेकर चाटते फिरो। ऐसी तकलीफों के कारण अजमेर के लोगों ने आपस में लेन देन बंद कर दिया। पहले लोग कच्चे कागज पर लिखवाकर रुपया उधार देते थे किंतु अब प्रोनोट लिखवाने लगे। बहुत से लोग मकान का किराया चुकाये बिना ही गायब हो गये थे इसलिये मकान मालिक भी किराया एडवांस मांगने लगे। झूठ, फरेब और दगाबाजी सीमा से अधिक बढ़ गई।

    बोहरों की मनमानी

    अजमेर नगर के आसपास के गांवों के किसान और निर्धन लोग अजमेर में आकर बोहरों से नमक, तेल, शक्कर, कपड़ा, गुड़, आदि उधार खरीदते थे। बोहरे इन्हें बहुत महंगा सामान देते थे। तोलते भी कम थे। फिर नगद पर सूद अलग वसूल करते थे। इस प्रकार उधार लेने वाले को हर सामान डेढ़ से दो गुनी कीमत पर मिलता था। फसल पकने पर बोहरे स्वयं ही किसान के खेत पर चले जाते। वे बाजार कीमत से कम दर पर अनाज लेते और तोलने में भी एक मन की जगह सवा मन तोल लेते। यदि किसान किसी तरह की आपत्ति करता तो बोहरे न्यायालय में मुकदमा ठोककर सूद पर सूद चढ़ाकर डिक्री करा लेते।

    दरगाह का प्रबंध सरकार के हाथों में

    ख्वाजा की दरगाह के सामने खड़े होकर प्रार्थना करने वालों के पास चिट्ठियां उतरा करती थीं। जिनमें सफेद कागज पर सुनहरी स्याही से बहुत ही खराब हस्तलेख से याचक की इच्छा पूरी होने की बात लिखी होती थी। ये इच्छायें धन एवं औरत मिलने की होती थीं। कुछ ही दिनों में उस याचक की इच्छा पूरी हो जाती थी। जब दरगाह का प्रबंध अंग्रेज सरकार ने अपने हाथ में ले लिया तो ये चिट्ठियां उतरनी बंद हो गईं।

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