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  • अजमेर का इतिहास - 65

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 65

    उन्नीसवीं सदी के अंत में अजमेर (1)



    उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में अजमेर नगर का चेहरा एक बार फिर बदलने लगा। उस समय आनासागर पानी से इस तरह भरा रहता था कि शाहजहानी बाग तथा पुष्करजी के रास्ते तक पानी ही पानी दिखाई देता था। पूरे नगर के कुण्ड मदार के पहाड़ तक आनासागर के पानी से लबालब रहते थे। बीसला तालाब सूखा हुआ होने के उपरांत भी उसके पूर्व की तरफ पक्की सीढ़ियों के पास दूर तक पानी जमा रहता था। मदार दरवाजे के सामने डिक्सन साहब का कुण्ड और सूरज कुण्ड जो दौलतबाग और शहर के बीच में थे, भरे रहते थे। इसी तरह ऊसरी दरवाजे की डिग्गी बारह महीने भरी हुई रहती थी। पूरा शहर इन कुण्डों का ही पानी पीता था। वन विभाग के अधिकारी पेड़ों पर लोहे की प्लेट चिपकवाते थे।

    अजमेर के निकट बजरंगनाग पहाड़ पर एक भी वृक्ष नहीं था। जिला कार्यालय, ऑनरेरी मजिस्ट्रेटों की कचहरियां, तहसीलदार कार्यालय, सैटलमेंट विभाग तथा पुलिस विभाग मैगजीन में स्थित थे। मैगजीन का मुख्य दरवाजा बंद रहता था, दूसरा दरवाजा खुला रहता था। मैगजीन के पूर्व तथा दक्षिण में वीराना था। डिप्टी कंजरवेटर फॉरेस्ट मुंशी अनवर खान, स्थान-स्थान पर सफाचट मैदानों को जंगल बनाने के लिये घेरते फिरते थे।

    उन्नीसवीं शती के नब्बे के दशक में अजमेर में नया चिकित्सालय बना जिसे ई.1892 में सेठ मूलचंद सोनी ने खरीद लिया। इसमें शेख मोहम्मद इलाही बख्श को चिकित्सक नियुक्त किया गया। धानमण्डी में पादरियों का चिकित्सालय था जिसमें पीरुलाल बाबर नियुक्त थे। दरगाह मीरां सैयद हुसैन खुनग (घोड़ासवार) तारागढ़ का प्रबंधन कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अधीन था। अजमेर की जनसंख्या 25 से 30 हजार थी। विदेशी कर्मचारियों में सैटलमेंट विभाग के पंजाबी बड़ी संख्या में थे। शेष शहर एक ही ढंग का था। जनजातियां बहुत ही बुरे हाल में थीं। विशेषतः कुंजड़े बहुत गरीब और कंगले थे। शहर में टके धड़ी तरकारी और अमरूद आदि मिलते थे। न पेट भर रोटी मिलती थी और न तन ढंकने को कपड़ा। अंदरकोट के रहने वालों का खूब जोर था। इन्हें अंदरकोटी कहते थे। ये लोग लड़ाकों के रूप में विख्यात थे तथा बगीचों के ठेके लिया करते थे। तमाम फल-फूल के मालिक यही थे। कुंजड़े और कुंजड़ियां उनकी गुलाम हुआ करती थीं। मालियों की हालत भी अच्छी नहीं थी।

    मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर उर्स के समय प्रतिवर्ष एक बड़ा शामियाना लगाया जाता था। बाद में उस स्थान पर पत्थरों से महफिल खाना बना दिया गया। इसमें लोहे की तीलियों पर बारीक लाल रंग का कपड़ा लगी फानूस रोशन की जाती थी। महफिल के दिन अव्वल मुतवल्ली दो चौबदारों एवं अर्दली को साथ में लेकर, महफिल में आकर बैठते थे। इसके बाद सज्जादा नशीन या उसका एक रिश्तेदार आता था। तब फातेहा ख्वानी होकर कव्वालियों के समारोह तथा सरोद की शुरुआत होती थी। अंतिम दिन पगड़ियां बंटती थीं। खादिम लोग एक के बदले बीस-बीस पगड़ियां मार लेते थे। लंगर और देगों का खाना बांटने में छूट रखी जाती थी। ये खाने अजमेर शहर में हर कहीं बिकते हुए दिखाई देते थे। उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में भी यह प्रथा जारी थी।

    आम तौर पर शहर के लोगों का व्यवहार शरीफाना था। कोई शख्स दगाबाजी करना नहीं जानता था। बिना लिखा पढ़ी के हर साहूकार विश्वसनीय आदमी को रुपया देता था। मकानों का कियारा बहुत सस्ता था। मकान भी हजारों सूने पड़े थे और दो-दो रुपये में अच्छी भली हवेली किराए पर मिलती थी। दो ढाई सौ रुपये में खासी जायदाद आदमी खरीद सकता था। शहर में हजारों बीघा जमीन वीरान पड़ी थी। सौ-डेढ़ सौ मकानों के अतिरिक्त समस्त मकान एक मंजिला थे। पक्की इमारतें बहुत कम थीं। (यादगार-ए-मुराद अली, 03.05.1998; मुराद अली द्वारा दिया गया यह विवरण सही नहीं जान पड़ता। एक ओर तो वह लिखता है कि शहर में व्यभिचार का बोलबाला था और रास्तों पर खतरा ही खतरा था। दूसरी ओर लिखता है कि कोई शख्स दगाबाजी करना नहीं जानता था। एक ओर वह लिखता है कि शहर में हजारों हवेलियां सूनी पड़ी थीं और उसी केसाथ लिखता है कि पक्की इमारतें बहुत कम थीं।)

    घी शुद्ध मिलता था। अनाज भी बहुत था। रुपये के पंद्रह सेर गेहूं, एक मन जौ, तीन सेर घी बिकता था। मिट्टी के तेल से कोई भी परिचित नहीं था। न उसकी बिक्री होती थी। सब तिल्ली का तेल ही जलाते थे। आर्यसमाज को कोई जानता न था। हिन्दू सनातन धर्म के पाबंद थे। संदेश वाहकों का बाजार गर्म था। बीकानेर, ब्यावर, उदयपुर आदि समस्त शहरों में पत्र संदेशवाहक ही पहुँचाते थे। बड़े शहरों के सिवाय डाकखाना कहीं नहीं था। जयपुर से अजमेर और अजमेर से पाली और पाली से आबू तक तार जाते थे। ब्यावर के लोग ऊपर की ओर मुंह उठाकार तार को देखा करते थे।

    लोहागल के रास्ते से अजमेर शहर की तरफ जाने पर एक नहर दिखाई देने लगी जो पादरी ग्रे के बंगले की तरफ से आनासागर की तरफ खोदी गई। हाजी मोहम्मद खान का हरा-भरा बगीचा उजड़ गया और वहाँ पर केवल एक कब्र बची। ऊँचे टीलों पर कोठियां दिखाई देने लगीं। आनासागर के पूर्वी कोने वाली बड़ी टेकड़ी पर एजेंट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना व चीफ कमिश्नर अजमेर-मेरवाड़ा का भव्य भवन दिखाई देने लगा। उस पर लाल सफेद पट्टियों वाला यूनियन जैक दूर से ही उड़ता हुआ दिखाई देता था।

    राय बंसीलाल का बगीचा भी अब शेष नहीं रहा था। महवेबाग वाली कोठी जहाँ एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर सैटलमेंट बैठते थे, वीरान हो गई। दूधिया कुएं के पास होकर आनासागर की जो चादर चलती थी, वह भी लुप्त हो गई। मछलियों के रहने के स्थान की जगह अब सड़कें बन गईं। सैलानी पीर की पूर्व वाली जमीन में दौलत बाग का विस्तार हो गया। बाग की पुरानी दीवार गायब हो गई।

    नगर की तरफ सूरजकुण्ड तक बाग फैल गया। वहाँ से पश्चिम में पहाड़ के नीचे बरगद के तले की कब्रें गायब हो गईं और उनके स्थान पर कनेर की झाड़ियां नजर आने लगीं। बाग के दरवाजों पर लोहे के फाटक लग गये जिन पर मसूदा के जागीरदार का नाम खुदा हुआ था। यह बाग सन् 1877 के कैसरे हिन्द दरबार की स्मृति में बनाया गया था। इस दरबार को अजमेर के लोग केसरी दरबार भी कहते थे। दिल्ली दरवाजे से एक सड़क सीधी दूधिया कुएं के पूर्व में होकर बाग वाली सड़क से जा मिली। अंधेरिया बाग से लेकर डॉक्टर हस्बैण्ड साहब की कोठी तक जो बाड़ियां और खेत थे, तथा जहाँ घने वृक्ष थे, वहाँ कैसर बाग लग गया।

    जहाँ डाक बंगला और पीली बंगलिया के बीच में वीराना हुआ करता था, वहाँ जिला कचहरी बन गई। पीली बंगलिया में नजारत का कार्यालय और डाक बंगले में कोर्ट ऑफ वार्ड्स का कार्यालय बन गया। आगरा गेट के बाहर गंज में जहाँ दो तीन कसाई और चटाई वाले थे, वहाँ पर हजारों पक्के मकान बन गये तथा तिल धरने को भी जगह नहीं रही।

    राय बहादुर मूल चंद सोनी के मंदिर का काम पूरा हो गया था तथा उसके दरवाजे लग गये थे। उसमें सोने चांदी और मीनाकारी की मूर्तियाँ लग गईं। मंदिर इतना भव्य था कि उसकी छत की लाल बुर्जियां आकाश से बातें करती थीं। आगरा दरवाजे से घूघरा घाटी तक, मदार दरवाजे से मदार के पहाड़ तक और मेयो कॉलेज से मोडिया भैंरू स्थित सड़क नसीराबाद तक 114 बंगले, 115 छोटी कोठियां और 109 सड़कें निकल गईं। मदार दरवाजे और मैगजीन के बीच तार बंगला बन गया। हाथी भाटा की जगह सवाईजी का मंदिर और धर्मशाला तैयार हो गये।

    मदार दरवाजे के बाहर बीसला को जाते हुए जो पुराने बाग का दरवाजा और कब्रिस्तान थे वे नष्ट होकर उन पर रेलवे कर्मचारियों के क्वार्टर बन गये। यहीं से मालपुए में होकर एक सड़क कचहरी जिला को गई जिसके दोनों तरफ सैंकड़ों मकान बन गये। मुंशी घासीराम की धर्मशाला बन गई। जहाँ मैदान था, वहाँ बबूल आदि के सैंकड़ों नए वृक्ष उग गए। सड़क के किनारे-किनारे हजारों मकान और बंगले बन गये। तालाब बीसला सुखा दिया गया। उसमें खेत बोये जाने लगे और घुड़दौड़ होने लगी।

    अजमेर के धोबी पहले आनासागर में कपड़े धोते थे, उन्नीसवीं सदी के अंत में धोबियों ने अपना जमावड़ा बीसला तालाब पर लगाया। मदार गेट के बाहर सैंकड़ों दुकानें बन गईं। जहाँ कुंजड़े बाजार लगाते थे। डिक्सन कुण्ड के दक्षिण में गंदा नाला और कांटों की झाड़ियों के स्थान पर दरगाह की चिश्ती चमन सराय बन गई। इस सराय के सामने मस्जिद के पास भटियारे और व्यापारी बैठते थे, उनकी जगह नगर निगम का मैदान बन गया। उसके पूर्वी कोने में घण्टाघर बन गया।

    पुख्ता सराय और इमलियों के पेड़ों की जगह रेलवे स्टेशन बन गया जिससे लगती हुई रेल की पटरियां बिछ गईं। कैवेण्डिशपुरा में सैंकड़ों पक्के मकान बन गये तथा वेश्याओं का चकला लग गया। मदार गेट से ऊसरी दरवाजे तक जहाँ मदार गेट से ऊसरी गेट तक, जहाँ खाइयां थी और दिन में भी डर लगता था, बहुत सारे घर बन गये।

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