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  • अजमेर का इतिहास - 64

     01.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 64


    ई.1875 में जब अजमेर में रेल पहुँची तो अजमेर नगर का चेहरा अचानक ही बहुत तेजी से बदलने लगा। ई.1878 में जब लोको मोटिव वर्कशॉप कार्य करने लगा तो अजमेर की जनसंख्या और तेजी से बढ़ने लगी। बी.बी.एण्डसी.आई. रेलवे कम्पनी ने वीसल झील तथा मदार पहाड़ी के बीच 52 बंगले बनाये। इस क्षेत्र को हजारी बाग कहा जाता था। यह क्षेत्र गवर्नमेंट कॉलेज के दक्षिण में स्थित था। आगरा एवं अन्य नगरों से बहुत से कर्मचारी अजमेर पहुँचने लगे। ई.1884 में अजमेर में रेलवे के सामान्य कार्यालयों की स्थापना की गयी।

    गाड़ीवानों का रोजगार ठप्प

    रेल आने से पहले अजमेर में सैंकड़ों तांगे वाले, ऊँट गाड़े वाले तथा बैल गाड़ियों वाले रोजगार कमाते थे किंतु रेल आने के बाद उनमें से अधिकांश लोग भूखे मरने लगे और धीरे-धीरे अजमेर शहर छोड़कर चले गये।

    मकानों का किराया बढ़ा

    रेल के आने के बाद अजमेर शहर की जनसंख्या तेजी से बढ़ने लगी और लगभग तीन गुनी हो गई। बाहर से बड़ी संख्या में मनुष्यों के आने से जिन लोगों के पास पक्के भवन थे, वे तेजी से मालदार हो गये। घरों तथा रिक्त भूमि का किराया भी आठ गुना तक बढ़ गया। रिक्त भूमि पर अस्थाई शौचालय बनाकर जिसने छप्पर डाल लिया, वह भी दो रुपये महीना कमाने लगा।

    नगर विस्तार योजनाएँ

    जनसंख्या वृद्धि के साथ ही अजमेर नगर के विस्तार की योजनाएं आरंभ की गईं। साण्डर्स ने पहली नगर विस्तार योजना अजमेर नगर के दक्षिण में कैसर गंज के रूप में आरम्भ की। कैसरगंज की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्ञी विक्टोरिया के दिल्ली दरबार आयोजन एवं कैसरे हिन्द की उपाधि धारण करने की स्मृति में की गई। अजमेर के लोग इसे केसरगंज कहकर पुकारते हैं।

    ई.1884-85 में केसरगंज बनकर तैयार हुआ। इसके केन्द्र में एक गोलाकार पार्क था। इस गोलाकार पार्क से सात सड़कें विभिन्न दिशाओं को जाती थीं। पूरा नियोजन बहुत सुंदर विधि से किया गया था। शीघ्र ही यह पूरा क्षेत्र दुकानों एवं घरों से भर गया। ई.1880 के दशक में नगरा, जोंसगंज, रामगंज, नारायण गंज आदि मौहल्ले बसने लगे। जोंसगंज की स्थापना ई.1880 में रेलवे ने उस समय की जब अजमेर में रेलवे शॉप्स की स्थापना हुई। इस कॉलोनी को बसाने के लिये रेलवे ने अपने कर्मचारियों को भूमि एवं अन्य सुविधायें उपलब्ध करवाईं।

    ई.1890 में पाल बीसला पर एक कॉलोनी विकसित हुई। इन्हीं दिनों में नसीराबाद रोड तथा श्रीनगर रोड के बीच पुराना जादूघर मौहल्ला विकसित हुआ। जब अजमेर की जनंसख्या काफी बढ़ गई तो आगरा गेट के बाहर गंज में भी बहुत भीड़-भाड़ हो गई जिससे इस क्षेत्र में लूंगिया तथा बापूगढ़ नामक मौहल्ले बस गये। इम्पीरियल रोड से लेकर दौलतबाग तक का क्षेत्र एवं जयपुर सड़क से लेकर कचहरी सड़क तक का क्षेत्र जो प्राचीन समय में सब्जियों एवं फलों के बगीचों से भरा हुआ था, वहाँ पर हाथी भाटा नाम से काफी भीड़भाड़ वाला मौहल्ला बस गया। बीसवीं सदी के आरंभ में ब्रह्ममपुरी नामक मौहल्ला बसा। कुछ ही दिनों में ये सारे क्षेत्र परकोटे के भीतर के मौहल्लों की भांति भीड़-भाड़ वाले हो गये।

    इसके बाद अजमेर के दक्षिण में, रेलवे शॉप्स के पास, जनसंख्या का विस्तार होना आरंभ हुआ। भगवानगंज, आसागंज(ट्रामवे स्टेशन के पास), भैरूगंज (नसीराबाद रोड के निकट), लोको शॉप तथा मेयो कॉलेज के बीच रबद्या बसा। नसीराबाद रोड पर उदयगंज एवं भजनगंज, जोन्सगंज के दक्षिण में गणेशगंज तथा आसागंज के दक्षिण में पहाड़गंज बसा। रेलवे लाइन एवं गवर्नमेंट हाईस्कूल के बीच में तोपदड़ा बसा। दौलतबाग के निकट पूर्व में लगे हुए कालाबाग तथा अन्य बागीचे लुप्त हो गये। वहाँ सिविल लाइन्स बनी जिसमें उच्च वर्ग के लोगों ने अपने निवास बनाये।

    अजमेर में महत्त्वपूर्ण भवनों का निर्माण

    अजमेर नगर में जब नई कॉलोनियां का विकास हो रहा था, तब उन दिनों में अजमेर में कई विशाल एवं महत्त्वपूर्ण भवनों का निर्माण हुआ। इनमें कैसरगंज क्षेत्र में दयानंद आश्रम, रेलवे हॉस्पीटल, रेलवे इंस्टीट्यूट, रोमन कैथोलिक कैथेड्रल, पुराना विक्टोरिया हॉस्पीटल, नया कचहरी भवन, जनरल पोस्ट एण्ड टेलिग्राफ ऑफिस, किंग एडवर्ड मेमोरियल, द गवर्नमेंट हाईस्कूल नया विक्टोरिया हॉस्पीटल रेलेव बिसेट इंस्टीट्यूट प्रमुख हैं।

    आगरा से आये सर्वाधिक लोग

    रेल आ जाने के कारण ई.1894 तक अजमेर शहर की जनसंख्या दो गुनी बढ़ गई। बाहर से आने वालों में आगरा के लोग सबसे अधिक थे।

    वेश्याओं का बोलबाला

    अजमेर शहर में व्यभिचार तो पहले से ही चला आ रहा था किंतु रेल के आने के बाद और भी बढ़ गया। अंतर केवल इतना आया कि पहले अजमेर में राजपूताना और अजमेर की औरतें उपलब्ध थीं, अब कहीं की भी औरतें मिलने लगीं। अजमेर में इतनी बड़ी संख्या में वेश्याओं के आने का कारण यह भी था कि अजमेर के चारों तरफ राजपूत रियासतें थीं जहाँ बदचलन औरतों को घर में ही मार दिया जाता था। राजा के कोप से डरने के कारण व्यभिचार से दूर रहते थे किंतु अजमेर में राजा का राज न था, अंग्रेजी कानून हर व्यक्ति की सहायता के लिये उपलब्ध था। इस कारण अजमेर में व्यभिचारी औरतों का जमावड़ा हो गया। अजमेर में आने वाली औरतें आसपास की रियासतों से आती थीं जो अपने घर, परिवार और समाज के अत्याचारों से दुखी होकर आती थीं। वे लौटकर अपने घरों को नहीं जाती थीं। इन्हें ढूंढने भी कोई नहीं आता था। ई.1870 के आसपास अजमेर में वेश्याओं के 11 ठिकाने थे किंतु ई.1897 में इनकी संख्या 20-21 हो गई। इन अड्डों पर कुटनियां भी रहती थीं जो हर वेश्या से अपना कमीशन पच्चीस पैसे लेती थीं।

    किरायेदारों ने बढ़ाया व्यभिचार

    रेल के आने के बाद बहुत से लोगों ने बाहर से आये लोगों को किरायेदार बनाकर अपने घरों में रखा। इन घरों में जवान बहू बेटियों ने अवैध बच्चों को जन्म दिया जिससे उन परिवारों को बहुत शर्मिंदगी झेलनी पड़ी।

    भिखारियों की भीड़

    रेल के आने से पहले ख्वाजा की दरगाह पर खादिमों के अतिरिक्त कुछ भिखारी भी दिखाई देते थे। इसी प्रकार पुष्कर में भी पण्डों के अतिरिक्त कुछ भिखारी दिखाई देते थे किंतु रेल के आने के बाद पूरे देश के भिखारी अजमेर के धार्मिक महत्त्व के कारण अजमेर और पुष्कर में आकर रहने लगे। ये दोनों शहर भिखारियों से भर गये। इनमें कुछ बदमाश एवं चोर आदि भी सम्मिलित रहते थे।

    कुंजड़ों की चांदी

    रेलवे के आने के बाद अजमेर में निचले तबके के लोगों की दौलत में अधिक तरक्की हुई। कुंजड़े, माली तथा मेवा बेचने वाले मालामाल होने लगे। रेल के आने से पहले एक रुपये में कई मन तरकारी मिलती थी किंतु रेल के आने के बाद तरकारी का भाव एक रुपये की आठ सेर हो गया। शहर में मिलावटी घी बिकने लगा।

    शराब का ठेका

    रेल के चलते ही अजमेर में बहुत से अंग्रेजों, पारसियों एवं हिन्दुस्तानी व्यापारियों ने बड़ी संख्या में अपनी दुकानें लगा लीं। इन लोगों ने अच्छा पैसा कमाया। रेल के आने से पहले ई.1870 में अजमेर का देशी शराब का ठेका दस-ग्यारह हजार रुपये में उठता था किंतु रेल आरंभ होने के बाद ई.1886 में एक लाख सत्तर हजार रुपये का ठेका उठा। अजमेर शहर में शराब का पहला ठेका दादाभाई पेस्तमजी नामक पारसी ने लिया किंतु चार साल में उन्हें बीस से तीस हजार रुपये का घाटा उठाना पड़ा क्योंकि ठेके की पूरी राशि वूसल नहीं हो पाती थी।

    चण्डू का चलन

    रेल के आने से पहले शहर में एक भी दुकान पर चण्डू नहीं बिकता था। चण्डू अफीम से बनने वाला मादक पदार्थ है जिसके सेवन से नशा होता है। इसकी लत वाले व्यक्ति को समय पर चण्डू नहीं मिलने से उसकी हालत खराब हो जाती है।रेल आरंभ होने के बाद अजमेर में चण्डू की कई दुकानें खुल गईं। मुराद अली के अनुसार मुरादाबाद का रहने वाला रहीम बख्श नामक एक बदमाश अजमेर में चण्डू लेकर आया। उसी ने अजमेर के नौजवानों को चण्डू पीना सिखाया। रेल के आने के बाद अजमेर में चण्डू का भी ठेका उठने लगा। मदार गेट के अंदर वेश्याओं के मौहल्ले में उसकी दुकान थी।

    वह किसी भी मालदार नौजवान से दोस्ती गांठता, फिर उसे अपनी दुकान में ले जाकर बिना पैसा लिये चण्डू के छर्रे पिलाता। हर रोज दोस्ती के नाम पर छर्रों की संख्या बढ़ा देता। इस प्रकार उस नौजवान को चण्डू की लत लग जाती। धीरे-धीरे सैंकड़ों बदमाश, उचक्के और जुआरी उसकी दुकान से चण्डू पीने लगे। रहीम बख्श चण्डू बेचकर प्रतिदिन 15-16 रुपये कमाने लगा। उसे देखकर अजमेर में और भी बहुत से लोगों ने चण्डू की दुकानें खोल लीं। यहाँ तक कि अजमेर में चण्डू की 32 दुकानें खुल गईं।

    जब यह संख्या समाचार पत्रों में छपी तो सरकार ने चण्डू की दुकानों के लिये लाइसेंस की व्यवस्था की। इसके बाद से मदक, चण्डू तथा अफीम का ठेका साथ ही छूटने लगा। अजमेर की सरकार ने अजमेर में केवल तीन दुकानों को ही चण्डू के लाइसेंस दिये। कुछ समय बाद अजमेर रेलवे के खलासी माल गोदाम से सामान चुराकर रहीम बख्श की दुकान पर बेचने लगे। ई.1890-91 तथा 1892 में पादरियों ने अफीम की खेती एवं सेवन का विरोध किया।

    पादरियों ने चण्डूबाजों के किस्से और चित्र लंदन के समाचार पत्रों- सेन्टीनल, बेनर और एशिया, मुम्बई के समचार पत्र- गारजियन आदि में छपवाये। इस आलोचना के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत के शहरों में चण्डू के लाइसेंस देने की प्रथा बंद कर दी। उस समय कर्नल ट्रेवर अजमेर का कमिश्नर था। उसने भी अजमेर में चण्डूखाने के लाइसेंस देने बंद कर दिये।

    अफीम बेचने के लाइसेंस भी बंद कर दिये गये किंतु मदक का ठेका जारी रहा। इसके बाद अजमेर शहर में चण्डू की दुकानें चोरी-छिपे चलने लगीं। इसके बाद कानून लागू हुआ कि कोई भी व्यक्ति ढाई तोला चाण्डू तथा पांच तोला अफीम अपने साथ रख सकता है। इसलिये अफीम और चण्डू के लाइसेंस बंद करने का परिणाम केवल इतना हुआ कि सरकार को राजस्व की हानि हुई। इन दोनों चीजों का उपयोग वैसे ही होता रहा।

    अजमेर के जुआघर

    रेल के आने से पहले अजमेर शहर में तीन जुआघर थे। इन तीनों जुआघरों का मालिक झूंथाराम जौहरी था। रेल आने के बाद मदार गेट के बाहर पाचं नये जुआघर खुल गये। पुलिसकर्मियों ने भी इन जुआघरों के कर्मचारियों से मिली भगत कर ली। धड़ल्ले से जुआ खिलवाया जाने लगा। जब पुलिस इंस्पेक्टर ब्लांचट को इन जुआघरों के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने भेस बदल कर जुआरियों एवं जुआघरों के कर्मचारियों को पकड़ा। जिससे सारे जुआघर बंद हो गये।

    पत्तेबाजों के गिरोह

    शहर में 15-20 पत्तेबाजों का एक गिरोह था जिनमें पन्नालाल और कल्लन आदि बदमाश अधिक कुख्यात थे। ये लोग तड़के सवेरे ही शहर से बाहर निकल जाते और खुल्लमखुल्ला मुसाफिरों को जुए से लूटा करते थे। पुष्कर, नसीराबाद और किशनगढ़ की सड़कों पर हर समय ये लोग मुसाफिरों की ताक में लगे रहते थे तथा प्रतिदिन सौ-सौ रुपये तक कमाकर आपस में बांट लेते। एक दिन इन जुआरियों ने एक फकीर को अपने जाल में फंसाकर उसके सारे कपड़े जीत लिये। सर्दियों का समय था। इसलिये फकीर ने कहा कि कम्बल छोड़ दो किंतु जुआरी न माने उन्होंने फकीर से कम्बल भी छीन लिया।

    इस पर दुखी होकर फकीर ने मदार गेट के बाहर स्थित डिक्सन कुण्ड में कूदकर आत्महत्या कर ली। इसके बावजूद लम्बे समय तक अजमेर में पत्तेबाजों का बाजार उसी तरह गर्म रहा। गंज के बाहर स्थित आगरा दरवाजे के जुलाहों और चटाईवालों का गिरोह तथा मदार गेट के बाहर के बदमाशों के गिरोह भी जबर्दस्त थे। ये कोसों दूर तक मुसाफिर का पीछा करते थे। पहले उसको अनजान बनकर दो तीन रुपये जितवा देते थे। फिर एक ही दांव में उसका सारा माल छीन लेते थे।

    उनका तरीका यह रहता था कि जब ये लोग जुआ खेल रहे होते तब जुआरियों के गिरोह का एक आदमी पास की झाड़ियों में छिपा रहता था और वह अचानक सामने आता और यह कहकर इन पर धावा बोल देता कि मैं पुलिस वाला हूँ और कई दिनों से तुम्हें ही खोज रहा हूँ। तुम सब कोतवाली चलो। यह सुनकर गिरोह के सदस्य भाग खड़े होते तथा मुसाफिर पकड़ लिया जाता। इस तरह उसका सब माल लूट लिया जाता। कुछ समय बाद पुलिस कार्यवाही की गई और कई जुआरी पकड़ लिये गये और उन्हें सजा दी गई।

    बादाम फोड़ने वाले बदमाश

    जब पत्तेबाजी का धंधा मंदा पड़ गया तो इनमें से कुछ लोगों ने बादाम फोड़ने का जुआ खेलना आरंभ किया। ये लोग अपनी जेब में ऐसे बादाम रखते थे जिनमें से कुछ में एक गिरी तथा कुछ में दो गिरी होती थी। ये बदमाश शर्त लगाकर बादाम फोड़ते कि इस बादाम में कितनी गिरी हैं। शर्त जीतने वाले को पैसे मिलते। इन बदमाशों को अच्छी तरह पहचान होती थी कि किस बादाम में कितनी गिरी है। ये लोग रास्ता चलते व्यक्ति को अपने खेल में शामिल कर लेते और उसका सारा माल लूट लेते।

    जब रेल आई तो बादाम का खेल भी बंद हो गया और उसका स्थान पटका ने ले लिया। एक बदमाश कुछ खोटा जेवर लेकर मुसाफिर के सामने चलता और उसके कुछ साथी, मुसाफिर के पीछे चलते। आगे चलने वाला बदश्माश अपना खोटा जेवर रास्ते में गिरा देता। जब मुसाफिर उसे उठाता तो मुसाफिर के पीछे चल रहे बदमाश मुसाफिर को पकड़ लेते और कहते कि इसमें हमारा भी हिस्सा है। जब ये लोग झगड़ा कर ही रहे होते कि आगे चलने वाला बदमाश रोता हुआ आता और कहता कि मेरा सौ-सवा सौ रुपये का कड़ा कहीं गिर गया। तुम्हें मिला हो तो बताओ। इस पर दूसरे बदमाश कड़ा मिलने से मना कर देते। जब पहले वाला बदमाश रोता हुआ चला जाता तो बाकी के बदमाश मुसाफिर से उस कड़े के बदले में बीस-पच्चीस रुपये ले लेते और कड़ा मुसाफिर को दे देते। इस कड़े की वास्तविक कीमत दो आने होती थी।

    गौमांस की दुकानें

    अजमेर में अंग्रेजों के आने से पहले गाय का मांस नहीं मिलता था। यहाँ तक कि मुगल बादशाहों ने भी अजमेर में गाय काटने तथा उसके मांस की बिक्री करने पर प्रतिबंध लगा रखा था। रेल के आने के बाद अजमेर में यूरोपियन्स ने गौमांस खाना आरंभ किया। नसीराबाद छावनी से गौमांस लाकर अजमेर में बेचा जाने लगा। मदार गेट के बाहर मोरी दरवाजे पर गौमांस की चार दुकानें खुल गईं।

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