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  • अजमेर का इतिहास - 6

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 6

    अजमेर के चौहान शासक (3)


    आठवीं शताब्दी में अजमेर

    दुर्लभराज (प्रथम)

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    गोविंदराज (प्रथम) के बाद दुर्लभराज (प्रथम) अजमेर का राजा हुआ। इसे दूलाराय भी कहते हैं। जब प्रतिहार शासक वत्सराज ने बंगाल के शासक धर्मपाल पर चढ़ाई की तब दुर्लभराज, प्रतिहारों के सेनापति के रूप में इस युद्ध में सम्मिलित हुआ। उसने बंगाल की सेना को परास्त कर अपना झण्डा बंगाल तक लहरा दिया। दुलर्भराय का गौड़ राजपूतों से भी संघर्ष हुआ। दुर्लभराज पहला राजा था जिसके समय में अजमेर पर मुसलमानों का सर्वप्रथम आक्रमण हुआ।

    खलीफा वली अब्दुल मलिक की सेना व्यापारियों के वेष में सिंध के मार्ग से अजमेर तक चढ़ आई। यह आक्रमण अत्यंत भयानक था। इस युद्ध में संभवतः कुछ प्रमुख चौहानों ने दुर्लभराज का साथ नहीं दिया। इस कारण दुर्लभराज के परिवार के प्रत्येक पुरुष ने युद्ध में तलवार लेकर शत्रु का सामना किया। चौहान रानियों ने जौहर का आयोजन किया। दुर्लभराज का युद्धक्षेत्र में ही वध कर दिया गया। तारागढ़ पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। दूल्हराय का छोटा भाई माणक राय सांभर भाग गया। वहाँ उसने शाकम्भरी देवी का मंदिर बनवाया।


    सम्मत सात सौ इकतालीस मालत पाने बीस।

    सांभर आया तात सरस माणक राय सर लीस।

    -पृथ्वीराज रासौ।


    कुछ इतिहासकारों के अनुसार अजमेर पर यह आक्रमण ई.724 से ई.726 के बीच, अब्दुल रहमान अल मारी के पुत्र जुनैद के नेतृत्व में हुआ जो खलीफा हाशम (ई.724 से ई.743) के अधीन, सिंध का कमाण्डर था। आक्रमण की यह तिथि अन्य साक्ष्यों से मेल नहीं खाती। अवश्य ही यह आक्रमण बाद के वर्षों में हुआ होगा। (दुर्लभराज प्रथम ई.724 में मृत्यु को प्राप्त हुआ, उसका पुत्र गूवक प्रथम हुआ जिसे ई.805 में नागावलोक की सभा में सम्मनित किया गया। इन दोनों तिथियों में 81 साल का अंतर है। यदि दुर्लभराज की मृत्यु के समय गूवक प्रथम की आयु 1 वर्ष भी हो तो नागावलोक की सभा में सम्मानित होते समय उसकी आयु 82 वर्ष ठहरती है। उस युग में किसी राजा का 81 वर्ष तक शासन करना एक कठिन जान पड़ने वाली बात है।)

    राजकुमार लोत का वध

    इस युद्ध में दुर्लभराज का सात वर्षीय पुत्र लोत एक तीर लगने से मर गया। वह शस्त्र लेकर युद्ध भूमि में लड़ रहा था। इस घटना ने उन चौहानों को बहुत प्रभावित किया जो अजमेर के युवा राजा दूलाराय की अवज्ञा कर रहे थे। जिस दिन राजकुमार लोत मारा गया, उस दिन को पवित्र दिन माना गया तथा राजकुमार लोत की प्रतिमा बनाकर देवताओं की तरह पूजी गई। लोत का निधन ज्येष्ठ माह की द्वादशी को सोमवार के दिन हुआ।

    राजा माणिकपाल (राय)

    कर्नल टॉड के अनुसार सिन्ध से किसी शत्रु ने अजमेर पर आक्रमण करके वहाँ के राजा माणिकपाल (राय) का वध किया। कुछ समय बाद हर्षराय चौहान ने नासिरुद्दीन से अजमेर छीन लिया। यह पर्याप्त संभव है कि अजमेर कुछ समय तक मुसलमानों के अधिकार में रहा। उस समय दुर्लभराज का भाई माणिकपाल जिसने कि संभवतः दुर्लभराज का साथ नहीं दिया था, अजमेर के पतन के बाद सांभर में जाकर रहा। पर्याप्त संभव है कि मुसलमानों ने सांभर पर भी आक्रमण किया हो तथा माणिकपाल भी मुसलमानों के हाथों मारा गया हो। इस युद्ध के बाद के किसी काल में दुर्लभराज प्रथम के पुत्र गूवक (प्रथम) ने तारागढ़ पर आक्रमण करके उसे अपने अधिकार में किया होगा। टॉड ने मुलसमानों से अजमेर लेने वाले राजा का नाम हर्षराय लिखा है। यह हर्षराय, गूवक (प्रथम) की उपाधि जान पड़ती है। क्योंकि गूवक के पूर्ववर्ती राजा माणिकपाल के नाम में भी राय लगा हुआ है तथा बारहवीं शताब्दी में पृथ्वीराज चौहान को राय पिथौरा कहा जाता था। हर्ष, भगवान शिव का नाम है जो कि अजमेर के चौहानों द्वारा पूज्य थे। गूवक ने अनंत क्षेत्र में हर्ष का मंदिर बनवाया था। संभवतः इसी से उसे हर्षराय कहा जाता था।

    अजमेर स्थित एक छतरी में ई.760 का शिलालेख उत्कीर्ण है जिसमें जैन मुनि रत्नकीर्ति के अनुयायी हेमराज की मृत्यु होने का उल्लेख है। इस छतरी में किसी राजा का उल्लेख नहीं किया गया है।


    नौवीं शताब्दी में अजमेर

    गूवक (प्रथम)

    दुर्लभराज प्रथम (दूलाराय) के बाद उसका पुत्र गूवक (प्रथम) अजमेर का शासक हुआ। संभवतः उसी ने आठवीं शताब्दी के किसी कालखण्ड में, मुसलमानों से अजमेर पुनः छीनकर अजमेर का उद्धार किया। वह सुप्रसिद्ध योद्धा हुआ। ई.805 में कन्नौज के शासक नागावलोक (नागभट्ट द्वितीय) की राजसभा में गूवक को वीर की उपाधि दी गई। गूवक (प्रथम) ने अनंत प्रदेश (वर्तमान में राजस्थान का सीकर जिला) में अपने अराध्य हर्ष महादेव का मंदिर बनवाया।

    चंद्रराज (द्वितीय) तथा गूवक (द्वितीय)

    गूवक (प्रथम) के बाद उसका पुत्र चंद्रराज (द्वितीय) अजमेर का शासक हुआ। उसके बाद गूवक (द्वितीय) अजमेर का राजा हुआ। उसकी बहिन कलावती का विवाह प्रतिहार शासक भोज (प्रथम) के साथ हुआ।

    चंदनराज

    गूवक द्वितीय के बाद चंदनराज अजमेर की गद्दी पर बैठा। चंदनराज ने दिल्ली के निकट तंवरावटी पर आक्रमण किया तथा उसके राजा रुद्रेन अथवा रुद्रपाल का वध कर दिया। चंदनराज की रानी रुद्राणी ने पुष्कर के तट पर एक सहस्र शिवलिंगों की स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा की।

    वाक्पतिराज

    चंदनराज का उत्तराधिकारी वाक्पतिराज हुआ जिसे बप्पराज भी कहा जाता है। उसका राज्य समृद्ध था। उसने अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। उसके राज्य की दक्षिणी सीमा विंध्याचल पर्वत तक जा पहुँची। वह एक महान योद्धा था। उसने 188 युद्ध जीते।

    चित्तौड़ की सहायता

    ई.753 के आसपास अजमेर के निकट जूनिया, सावर, देवलिया और श्रीनगर में गौड़ राजपूतों की जागीरें थीं। जिस समय बगदाद के खलीफा अलमामूं ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की उस समय चित्तौड़ पर खुंमाण (द्वितीय) का शासन था। (अब्बासिया खानदान का अलमामूं ई.813 से 833 तक बगदाद का खलीफा रहा। खुमांण (द्वितीय) ई.812 से 836 के बीच चित्तौड़ का शासक रहा।) खुंमाण की सहायता के लिये तथा चित्तौड़ की रक्षा के लिये काश्मीर से सेतुबंध तक के अनेक राजा चित्तौड़ आये। उनमें अजमेर से गौड़ों का आना लिखा है। भाटों ने इस युद्ध में तारागढ़ से रैवरों का खुमाण की सहायता के लिये आना लिखा है। यह तारागढ़ कौनसा है तथा रैवर कौनसे हैं, कहा नहीं जा सकता। अजमेर से प्राप्त कुछ छतरियों में ई.845, 854 तथा 871 की तिथियों के शिलालेख प्राप्त हुए हैं जिनमें जैन भट्टाराकों का उल्लेख है।

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