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  • अजमेर का इतिहास - 59

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 59

    चीफ कमिश्नर एवं एजीजी कर्नल जी. एच. ट्रेवर


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    कार्यवाहक एजीजी एवं चीफ कमिश्नर वॉल्टर की सेवानिवृत्ति के बाद भारत सरकार ने कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) कर्नल जी. एच. ट्रेवर को अजमेर-मेरवाड़ा का चीफ कमिश्नर तथा राजपूताने का एजीजी बनाया। कर्नल ट्रेवर ने 20 मार्च 1890 को नया पद भार संभाला। 20 मार्च 1895 तक वह इस पद पर रहा।

    रूस के शहजादे की सिफारिश

    ट्रेवर की नियुक्ति के सम्बन्ध में बारहठ कृष्णसिंह ने लिखा है कि वॉल्टर के स्थान पर नियुक्त होने के लिये कई अंग्रेजों ने कोशिश की किंतु कर्नल ब्रॉडफोर्ड, जो पूर्व में अजमेर में इस पद पर रह चुके थे तथा वर्तमान में इंगलैण्ड में विदेश कार्यालय में भारत सचिव के पद पर कार्यरत थे, ने अजमेर के कमिश्नर जी. एच. ट्रेवर को इस पद पर नियुक्त करने की सिफारिश की। कर्नल ट्रेवर ने जो कार्यवाही अजमेर की कमिश्नरी में की उससे ज्ञात होता है कि वह इस बड़े पद के योग्य नहीं है किंतु केवल ब्रॉडफोर्ड की सिफारिश से आबू पर मुकर्रर हुआ है। देखना चाहिये कि वह यहाँ कैसी कार्यवाही करता है।

    ट्रेवर की नियुक्ति के सम्बन्ध में मुराद अली ने लिखा है कि रूस के शहजादे की सिफारिश पर ट्रेवर को यह पद दिया गया। मुराद अली के कथन की सत्यता में संदेह है किंतु कृष्णसिंह तथा मुराद अली के कथनों से इतना स्पष्ट है कि ट्रेवर की इस नियुक्ति को लेकर अजमेर तथा सम्पूर्ण राजपूताने में तरह-तरह की चर्चाएं रही होंगी तथा यह भी स्पष्ट होता है कि राजपूताने की रियासतों में कर्नल ट्रेवर को पसंद नहीं किया जाता था।

    लैंसडाउन का अजमेर दरबार

    अक्टूबर 1890 में रूस का राजकुमार जारविच (यह बाद में रूस का जार बना।) भारत आया। इसी वर्ष भारत का गवर्नर जनरल एवं वायसरॉय लैंसडाउन अजमेर आया। इस अवसर पर एजीजी कर्नल ट्रेवर ने बूंदी, टोंक, किशनगढ़ और शाहपुरा के शासकों को अजमेर बुलवाया किंतु जब पोलिटिकल एजेंट थॉरण्टन ने एजीजी से शाहपुरा राजाधिराज नाहरसिंह की शिकायत की कि राजाधिराज अपने कामदार बाबू रामजीवन के बहकावे में आकर एजेंसी की नालिश करने की कोशिश में हैं, तो एजीजी ट्रेवर ने शाहपुरा राजाधिराज को लिख भेजा कि वे अजमेर नहीं आयें, यदि आये तो उनकी भेंट वायसरॉय से नहीं हो सकेगी।

    इस पर राजाधिराज अजमेर नहीं आया। बूंदी का महारावराजा रघुवीरसिंह, टोंक का नवाब इब्राहीम अली, किशनगढ़ का महाराजा शार्दूलसिंह, वायसरॉय के आने से पहले ही अजमेर पहुँच गये तथा वायसरॉय के स्वागत के लिये अजमेर रेलवे स्टेशन पर उपस्थित हुए। बीकानेर महाराजा गंगासिंह, कोटा का महाराव उम्मेदसिंह तथा टिहरी का राजा कीर्तिसिंह, उन दिनों मेयो कॉलेज में पढ़ रहे थे, अतः वे भी वायसरॉय के स्वागत के लिये रेलवे स्टेशन पर उपस्थित हुए।

    जब वायसरॉय ट्रेन से उतरा तो कर्नल ट्रेवर ने एक-एक करके राजाओं को वायसरॉय के सम्मुख पेश किया। लैंसडाउन ने राजाओं से हाथ मिलाया तथा अपने डेरे के लिये रवाना हो गया। अगले दिन वायसरॉय ने मेयो कॉलेज में दरबार का आयोजन करके कॉलेज के विद्यार्थियों को पुरस्कार बांटे। बाद में देवली, एरिनपुरा और नीम का थाना की सेनाओं की उपस्थिति ली। तीसरे पहर उपरोक्त छः रियासतों के शासक तथा धौलपुर का महाराजराणा निहालसिंह वायसरॉय से मिलने एक-एक करके उसके डेरे पर गये। प्रत्येक शासक के साथ नौ-नौ सरदार थे। प्रत्येक शासक ने वायसरॉय को एक सौ एक अशर्फियाँ भेंट कीं।

    प्रत्येक सरदार ने भी वायसरॉय को एक-एक अशर्फी नजर की। वायसरॉय ने राजाओं की अशर्फियों के हाथ लगाकर माफ कर दीं अर्थात् राजाओं को वापस लौटा दीं। जब ये राजा वायसरॉय से मिलने आये तो वायसरॉय ने बीकानेर, बूंदी, टोंक तथा कोटा के शासकों को आधे फर्श तक आगे आकर तथा शेष शासकों को दो-दो कदम आगे आकर उनकी पेशवाई की। इसके बाद वायसरॉय प्रत्येक राजा के डेरे पर भेंट करने गया। 30 तारीख को वायसरॉय बीटली का किला देखने गया तथा उसी रात ट्रेन से चित्तौड़ के लिये रवाना हो गया।

    अजमेर में फॉय सागर बना

    ई.1890-92 के बीच अजमेर-मेरवाड़ा में भयानक अकाल पड़ा। इस अकाल में लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाने के लिये म्युनिसपलिटी अजमेर ने ई.1891-92 में अजमेर रेल्वे स्टेशन से लगभग सात किलोमीटर दूर, बांडी नदी के कैचमेन्ट क्षेत्र में, फॉयसागर झील का निर्माण करवाया। इससे अजमेर नगर को जलापूर्ति की जाने लगी। 'फॉय' नामक इंजीनियर की इस झील के निर्माण में प्रमुख भूमिका थी। उसी के नाम से फॉयसागर को बनाया गया। उस समय इसकी लागत 2 लाख 69 हजार रुपये आयी। इस झील की गहराई 24 फुट है, इसमें 150 मिलियन फुट पानी भरता है। फॉयसागर के पूरा भरने के पश्चात् इसका पानी बांडी नदी के नालों से होता हुआ आनासागर पहुँचता है।

    अजमेर में वैदिक यंत्रालय तथा रोमन कैथोलिक मिशन

    ई.1890 में वैदिक यंत्रालय (प्रिंटिग प्रेस) इलाहाबाद से अजमेर लाया गया तथा इसी वर्ष अजमेर में रोमन कैथोलिक मिशन ने कार्य करना आरंभ किया।

    ट्रेवर को सी.एस.आई. की उपाधि

    क्वीन विक्टोरिया के शासन की वार्षिकी पर प्रति वर्ष 24 मई को अजमेर एवं राजपूताना रियासतों में उत्सव मनाया जाता था। इस अवसर पर राजाओं, प्रशासनिक अधिकारियों एवं सैन्य अधिकारियों को उपधियां दी जाती थीं। ई.1891 का उत्सव 30 मई को हुआ। इसमें राजपूताना के एजीजी कर्नल ट्रेवर को सी.एस.आई. की उपाधि दी गई।

    रेलवे स्टेशन पर राजाओं की पेशवाई बंद

    राजपूताना रियासतों के शासक रेल से यात्रा करते हुए जब भी अजमेर से निकलते थे तो अजमेर के कमिश्नर और चीफ कमिश्नर, रियासतों के शासकों की पेशवाई के लिये रेलवे स्टेशन पर जाते थे। जब ट्रेवर राजपूताने का एजीजी हुआ तब ई.1892 से यह परम्परा समाप्त कर दी गई। इस तरह की अंतिम पेशवाई उदयपुर के महाराणा की हुई, जब महाराणा उदयपुर से जोधपुर गया। इसके बाद जब किशनगढ़ महाराजा ट्रेन से उदयपुर गया तो, अजमेर रेलवे स्टेशन पर उसकी पेशवाई नहीं की गई।

    ट्रेवर ने समस्त रियासतों में नियुक्त पोलिटिकल एजेण्टों को निर्देश दिये कि अब केवल उन्हीं राजाओं की पेशवाई अजमेर रेलवे स्टेशन पर होगी, जो अजमेर रुकेंगे। और वह भी तब होगी जब वे अपने आने का कार्यक्रम कम से कम तीन दिन पहले भिजवायेंगे। महाराणा ने इस आदेश का विरोध करने के लिये जोधपुर के महाराजा को लिखा। इस पर जोधपुर महाराजा ने जवाब दिया कि जोधपुर रेलवे स्टेशन से भी अंग्रेज अधिकारी बीकानेर आते-जाते हैं, हम भी उनकी पेशवाई नहीं करते, इसलिये चीफ कमिश्नर ट्रेवर के आदेश का विरोध करने का कोई औचित्य नहीं है। इस पर महाराणा शांत होकर बैठ गया।

    अजमेर में विकास कार्य

    26 फरवरी 1891 को अजमेर में जनगणना की गयी। मार्च 1893 में मारवाड़ रियासत ने नावा (कुचामनरोड) से अजमेर तक की तार की लाइन बनवाने का निश्चय किया गया। ई.1893 में कैसरबाग में क्लबघर के सामने अजमेर के भूतपूर्व कमिश्नर साण्डर्स की स्मृति में सफेद छतरी बनकर तैयार हुई। ई.1893 में फॉयसागर बनकर तैयार हुआ। मई 1894 में रेलवे स्टेशन के सामने का घण्टाघर बनकर तैयार हुआ।

    मीना बाजार ध्वस्त

    जहाँगीर ने दौलतबाग तथा आनासागर की चादर के बीच पत्थर की एक मजबूत इमारत बनवाई थी जिसे सहेली बाजार कहते थे। इस भवन में बेगमों और महारानियों का साप्ताहिक मीना बाजार लगता था। जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अजमेर खरीद लिया तब इस भवन में कम्पनी के अधिकारियों के घरेलू नौकर रहने लगे। ई.1894 में मार्टिण्डल को डॉक्टरों ने राय दी कि इस मकान से हवा खराब होकर हैजा फैलाती है। इस पर मार्टिण्डल ने इस भवन को गिरवा दिया।

    विक्टोरिया जनरल हॉस्पिटल

    ई.1894 से पहले अजमेर में एक ही सरकारी चिकित्सालय था जिसे खैराती अस्पताल कहते थे किंतु उसमें अमीरों की पूछ अधिक होती थी। इस चिकित्सालय में प्रतिदिन सौ-सवा सौ रोगी आते थे। अधिकतर जनता वैद्यों एवं हकीमों से उपचार करवाती थी। 4 मार्च 1895 को विक्टोरिया जनरल हॉस्पिटल बिल्डिंग का निर्माण आरंभ हुआ। सेठ सौभागमल ढड्ढा ने चिकित्सालय के निर्माण में सात हजार रुपये दिये।

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