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  • अजमेर का इतिहास - 58

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 58

    कार्यवाहक चीफ कमिश्नर एवं एजीजी सी. के. एम. वॉल्टर


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    मेजर एडवर्ड आर. सी. ब्रॉडफोर्ड के इंगलैण्ड चले जाने से एजीजी का पद रिक्त हो गया। कर्नल सी. के. एम. वॉल्टर को कार्यवाहक एजीजी बनाया गया। द्वितीय श्रेणी का पोलिटिकल एजेण्ट होने के कारण उसे स्पष्ट कर दिया गया कि उसे पूर्ण रूपेण एजीजी नहीं बनाया जा सकता। 27 मार्च 1887 को वॉल्टर अजमेर-मेरवाड़ा का कार्यवाहक चीफ कमिश्नर एवं एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना नियुक्त हुआ। वह पुराना अधिकारी था। ई.1857 के सैनिक विद्रोह से भी पहले यह राजपूताना में रह चुका था। इस कारण अधिकांश लोगों से परिचित था।

    सेवानिवृत्ति बढ़वाने की योजना

    वॉल्टर का परम उद्देश्य किसी प्रकार इस कार्यवाहक नियुक्ति को सेवानिवृत्ति होने तक बनाये रखना था जिससे उसे अधिक पेंशन उपलब्ध हो सके। वह ई.1879 से ई.1887 तक मध्य मेवाड़ में रेजीडेण्ट रहा किंतु उसने वहाँ कभी भी समाज सुधार में रुचि नहीं दिखाई थी सितम्बर 1887 में वॉल्टर को सूचित किया गया कि 10 जून 1888 को उसे सेवानिवृत्त कर दिया जायेगा। उस समय डफरिन भारत का गवर्नर जनरल था। वॉल्टर को ज्ञात था कि डफरिन समाज सुधार के कार्य में बड़ी रुचि लेता था। अपनी सेवानिवृत्ति की तिथि बढ़वाने के लिये वॉल्टर को राजपूताने में समाज सुधार करने का मार्ग दिखाई दिया।

    राजपुत्र हितकारिणी सभा

    वॉल्टर द्वारा अक्टूबर 1887 में राजपूताना के समस्त राज्यों के पोलिटिकल अधिकारियों को एक सर्क्यूलर भेजा गया जिसमें प्रत्येक राज्य से 1 अधिकारी, 1 चारण और 1 जागीरदार को मार्च 1888 में अजमेर भेजने के लिये कहा गया। इस सम्मेलन का लक्ष्य राजपूतों में विवाह के अवसर पर खर्च को नियंत्रित करने के लिये कुछ नियम बनाना था। मृत्युभोज तथा उससे सम्बन्धित खर्च का इस परिपत्र में कोई उल्लेख नहीं था। वॉल्टर को ज्ञात था कि प्रायः समस्त राज्यों में विवाह सम्बन्धी व्यय नियंत्रित हो रहा था।

    वॉल्टर अपने शरत्कालीन भ्रमण (नवम्बर-मार्च 1887) पर विभिन्न राज्यों में गया और उसे यह आभास हो गया कि उसकी योजना का कोई विरोध नहीं होगा। 5 मार्च 1888 को भरतपुर, धौलपुर तथा बांसवाड़ा को छोड़कर समस्त राज्यों के प्रतिनिधि अजमेर में एकत्रित हुए। 9 मार्च तक इस सम्मेलन की कार्यवाही चलती रही। 10 मार्च को वॉल्टर इस सम्मेलन में औपचारिक रूप से भाग लेने के लिये गया जहाँ 41 प्रतिनिधि उपस्थित थे। इस सम्मेलन में मृत्युभोज सम्बन्धी खर्च कम करने तथा बूंदी के प्रतिनिधि के सुझाव पर लड़के-लड़कियों की विवाह की आयु निर्धारित करने के प्रस्ताव पारित किये गये।

    उदयपुर के प्रतिनिधि कविराजा श्यामलदास ने इस सम्मेलन में एक भाषण दिया तथा वॉल्टर के लक्ष्य को परोक्ष रूप से स्पष्ट किया। श्यामलदास ने खेद व्यक्त किया कि ऐसा अच्छा अंग्रेज अधिकारी शीघ्र ही इंगलैण्ड चला जायेगा। उसने आशा व्यक्त की कि अंग्रेज सरकार हम सबकी इच्छाओं का ध्यान रखते हुए वॉल्टर के सम्बन्ध में निर्णय लेगी।

    सेवानिवृत्ति बढ़ाने की याचना

    इस कार्यवाही के बाद वॉल्टर ने भारत सरकार को एक पत्र भेजा जिसमें मेवाड़ के ठाकुरों द्वारा विवाह पर अधिक धन व्यय के कुछ पुराने उदाहरण दिये। वॉल्टर ने इस बात का प्रयत्न किया कि इस कमेटी के कार्य की अधिक से अधिक चर्चा हो। उसने लंदन में हाऊस ऑफ लॉर्ड्स में राजस्थान के समाज सुधार पर प्रश्न पुछवाया और भारत सरकार के सचिव ड्यूरैण्ड को एक निजी पत्र में मार्च 1890 तक सेवा कार्यकाल में वृद्धि की याचना की।

    वॉल्टर द्वारा बुलाये गये इस सम्मेलन से लॉर्ड डफरिन भी प्रभावित हुआ। उसने वॉल्टर के कार्यकाल को 10 माह के लिये बढ़ा दिया। औपचारिक रूप में डफरिन ने तर्क दिया कि वॉल्टर के स्थान पर नए एजीजी की नियुक्ति आने वाला वायसरॉय ही करे। यह तर्क अनुचित था क्योंकि डफरिन के कार्यकाल में अभी 8 माह का समय शेष था।

    वॉल्टर हितकारिणी सभा की दूसरी बैठक

    अप्रेल 1889 तक सेवाकाल में वृद्धि मिल जाने के बाद वॉल्टर 1 वर्ष का कार्यकाल बढ़वाने में जुट गया। जनवरी 1889 में वॉल्टर ने राजपूताना रियासतों में नियुक्त समस्त पोलिटिकल अधिकारियों को एक परिपत्र भेजकर प्रत्येक राज्य से उन्हीं प्रतिनिधियों को 15 फरवरी 1889 को दुबारा अजमेर भेजने के लिये कहा जो मार्च 1888 में आये थे। वॉल्टर ने कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) को निर्देश दिये कि वह इन सदस्यों के एक सप्ताह तक अजमेर में ठहरने के लिये तथा सम्मेलन आयोजन के लिये एक भवन की व्यवस्था करे।

    \वॉल्टर ने अपने भ्रमण कार्यक्रम को इस प्रकार बनाया कि वह 15 फरवरी के आसपास अजमेर पहुँच जाये और फिर दुबारा भ्रमण पर चला जाये। वॉल्टर की पूरी कोशिश के उपरांत पिछली बार के 41 सदस्यों में से केवल 20 सदस्य ही पुराने थे। 14 सदस्य नये आये थे। इन 20 में से 4 न तो चारण थे और न राजपूत। वॉल्टर इस कमेटी से 22 फरवरी 1889 को मिला और उन्हें कुछ नियम पारित करने के सुझाव दिये। इन सुझावों में सबसे प्रमुख सुझाव यह था कि इस सभा का नाम वॉल्टरकृत राजपुत्र हितकारिणी सभा रखा जाये। वॉल्टर पुराने सदस्यों की उपस्थिति पर इसलिये जोर दे रहा था ताकि इसे 1888 से ही बनी हुई मानी जाये।

    कार्यकाल में ग्यारह माह की वृद्धि

    इस सभा के गठन के बाद वॉल्टर अपने वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति में लग गया। उसने फरवरी 1889 के पश्चात् अपने कार्यकाल में 11 महीने की वृद्धि चाही जिससे उसे एजीजी के पद की पूरी पेंशन मिल सके। इस समय उसने यह तर्क दिया कि समाज सुधार के कार्य को ढंग से दिशा निर्देशन देने के लिये कार्यकाल में वृद्धि मांगी जा रही है। इस वृद्धि को उसने वरदान कहकर मांगा। समाज सुधार के निर्देशन के लिये 11 माह के अतिरिक्त कार्यकाल को पर्याप्त तर्क नहीं समझा गया फिर भी उसके कार्यकाल में वृद्धि कर दी गई।

    आधुनिक काल का सबसे बड़ा पाखण्ड

    अक्टूबर 1889 में उसने अपना कार्यकाल पुनः 2 वर्ष बढ़ाने की मांग की जिससे वह समाज सुधार की प्रगति की देखभाल कर सके। उसकी समाज सुधार की वार्षिक रिपोर्ट देखकर मध्य भारत के एजीजी ने आधुनिक समय के सबसे बड़े पाखण्डों में से एक कहा। उस फाइल पर वॉल्टर के समर्थक ड्यूरैण्ड ने ही तीखी आलोचना की। वॉल्टर को केवल मध्य योग्यता का एजेण्ट स्वीकार किया गया और उसके अति शीघ्र बूढ़ा होने के कारण उसे सेवानिवृत्त कर दिया गया।

    विक्टोरिया की जुबली

    ई.1888 में आनासागर की बारादरियां, ढाई दिन का झौंपड़ा तथा मैगजीन का जीर्णोद्धार किया गया। विक्टोरिया के शासन के गोल्डन जुबली वर्ष ई.1888 में रेलवे स्टेशन के सामने विक्टोरिया क्लॉक टावर का निर्माण किया गया। विक्टोरिया के शासन के हीरक जुबली वर्ष में अजमेर में विक्टोरिया हॉस्पीटल खोला गया। जुलाई माह में कोर्ट ऑफ वार्ड्स स्थापित किया गया।

    डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की स्थापना

    ई.1888 में दी अजमेर-मेरवाड़ा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की स्थापना की गयी।

    आर्यसमाज संस्थाओं का विकास

    ई.1888 में अजमेर में आर्य प्रतिनिधि सभा राजस्थान एवं मालवा की स्थापना की गयी। ई.1889 में अजमेर में दयानंद एंग्लोवैदिक हाई स्कूल की स्थापना हुई।

    अजमेर में भयानक अकाल

    ई.1899-1900 में अजमेर-मेरवाड़ा में भयानक अकाल पड़ा।

    अजमेर में अतिथियों का आगमन

    ई.1889 में भारत का कमाण्डर इन लॉर्ड रोवर्ट्स अजमेर आया। 17 फरवरी 1890 को ड्यूक ऑफ क्लेरेंस प्रिंस अलबर्ट विक्टर अजमेर आया। वह प्रातः साढ़े आठ बजे अजमेर पहुँचा तथा उसी रात 11.36 पर चित्तौड़ के लिये रवाना हो गया। उसके स्वागत के लिये खरवा, भिनाय, मसूदा, पीसांगन, जूनिया एवं बांदनवाड़ा के ठाकुर अजमेर में उपस्थित हुए।

    इतिहास दाखिल दफ्तर

    कर्नल वॉल्टर ने अनुभव किया कि अजमेर के मेयो कॉलेज में जो इतिहास पढ़ाया जाता है, वह या तो दूसरे देशों का है, या फिर भारत के अन्य जिलों का है, जबकि इस कॉलेज में राजपूताना का इतिहास पढ़ाया जाना चाहिये। इस पर उसने उदयपुर रियासत के प्रसिद्ध इतिहासकार कविराजा श्यामलदास के पास इस पुस्तक के लिखने का प्रस्ताव भिजवाया। श्यामलदास उन दिनों वीर विनोद लिख रहे थे, इसलिये उन्होंने मना कर दिया तथा साथ ही यह भी लिखा कि यदि वे चाहें तो मेरे विभाग में कार्यरत मौलवी अबेदुल्ला फ़रहती को यह काम दे दें, मैं उसकी सहायता कर दूंगा। वॉल्टर ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

    जब मौलवी ने राजपूताना का इतिहास तैयार करके उसे उदयपुर के राजकीय मुद्रणालय में छपवाया। इस पुस्तक पर बहुत लोगों ने आपत्तियाँ कीं। इस पर महाराणा ने पुस्तक पर रोक लगा दी। वॉल्टर ने महाराणा से अनुरोध किया कि आप इसमें से आपत्तिजनक बातें निकाल दीजिये किंतु पुस्तक पर रोक मत लगाइये। इस पर महाराणा ने एक समिति बनाई किंतु वह भी कोई सही कार्य नहीं कर पाई इस पर महाराणा ने उस पुस्तक को जब्त करके दाखिल दफ्तर कर दिया।

    एजीजी के विरुद्ध पर्चे

    मेयो कॉलेज भवन का निर्माण करने वाले ओवरसीयर का नाम बाबू हरनामसिंह था। वह एक ईमानदार आदमी था किंतु असिस्टेण्ट इंजीनियर बाबू राजेश्वर मित्र (बंगाली) से उसकी पटरी नहीं बैठती थी। इसलिये राजेश्वर मित्र, यूरोपियन इंजीनियर मि. जोस्लीन को ओवरसीयर के विरुद्ध भड़काता रहता था। हरनामसिंह ने राजेश्वर मित्र पर सरकारी लकड़ियों की चोरी का इल्जाम लगाया। इस पर राजेश्वर मित्र ने मि. जोस्लीन के कान भरे।

    मि. जोस्लीन ने ओवरसीयर हरनामसिंह पर बहुत अत्याचार किये तथा हरनामसिंह को ड्यूटी से अनुपस्थित बताकर उसे नौकरी से निकाल दिया। बाबू हरनामसिंह स्वाभिमानी आदमी था। उसने इंजीनियर मि. जोस्लीन, असिस्टेण्ट इंजीनियर राजेश्वर मित्र, उनसे मिले हुए समस्त अधिकारियों, कर्नल वॉल्टर और कर्नल ट्रेवर के विरुद्ध मोचो खोल दिया तथा उनके विरुद्ध समाचार पत्रों में लिखवाया तथा पर्चे छपवाकर अजमेर शहर में बंटवाये किंतु किसी अधिकारी ने उन्हें जवाब नहीं दिया। जोस्लीन के बाद मि. फाई (फॉय), अजमेर का इंजीनियर बना।

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