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  • अजमेर का इतिहास - 55

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 55

    साण्डर्स के समय अजमेर का प्रशासनिक दृश्य


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    एल. एस. साण्डर्स के कार्यकाल (ई.1871-1885) में अजमेर के प्रशासनिक दृश्य का चित्रण करते हुए मुराद अली ने लिखा है- अजमेर में साण्डर्स की तूती खूब बोल रही थी। वह अधिकांश कर्मचारियों को पंजाब से अपने साथ लेता आया था। विशेषतः महकमा बंदोबस्त (सैटलमेंट डिपार्टमेंट) में समस्त कर्मचारी पंजाबी थे। साण्डर्स ने बड़े-बड़े पदों पर अधिकारियों की नियुक्तियां स्वयं ही कीं। उसने मुंशी अमीनचंद को ई.1877 में सरदार बहादुर का खिताब दिलवाया। अमीनचंद खत्री पंजाब के गुरदासपुर जिले का रहने वाला था तथा पंजाब का पूर्व एक्सट्रा असिस्टेण्ट कमिश्नर था।

    वह अजमेर में ज्युडीशिल असिस्टेंण्ट कमिश्नर एवं जज अदालत गुप्तचर नियुक्त हुआ। साण्डर्स से उसकी निकटता थी। पण्डित महाराज किशन, कश्मीरी था। वह लाहौर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र कोहिनूर का पूर्व सम्पादक था। वह अजमेर में एक्सट्रा कमिश्नर बंदोबस्त नियुक्त हुआ। पण्डित भागराम जो बाद में रायबहादुर और मेम्बर काउंसिल जम्मू कश्मीर हुआ, कमिश्नर के कार्यालय में हैड क्लर्क बनाया गया। मुंशी छुट्टनलाल (ऐश) कमिश्नर का रीडर नियुक्त हुआ जिसने बाद में कानून की एक बड़ी किताब लिखी। इन पदाधिकारियों के अतिरिक्त दीवान बूटासिंह और उसके छापेखाने को भी भी साण्डर्स लाहौर से अजमेर लाया था। इस प्रेस का नाम मेयो प्रेस रखा गया।

    मेयो प्रेस के अतिरिक्त दूसरा कोई छापाखाना अजमेर में न था। लोग समझते थे कि मेयो प्रेस के सिवाय दूसरा प्रेस खड़ा करना ही जुर्म है। जब मैंने (मुराद अली ने) मेयो प्रेस से अलग होकर छापाखाना चराग़-ए-राजस्थान जारी किया तब लोगों का संदेह मिटा। कमिश्नर के आदेश से समस्त राजकीय प्रकाशन का कार्य मेयो प्रेस में होता था। साण्डर्स के समय में बाबू ईशानचंद्र मुखर्जी अजमेर का एक्स्ट्रा कमिश्नर एवं ट्रेजरी अधिकारी था। एक दिन डिप्टी कमिश्नर मेजर रैप्टन बहादुर, अपनी बग्घी में बैठकर दिल्ली दरवाजे होकर शहर से दौलत बाग स्थित अपनी कोठी को जा रहा था।

    दिल्ली दरवाजे के बाहर उसे दूर से कुछ लोग जुआ खेलते हुए सड़क के किनारे दिखाई दिये। रैप्टन ने अपने अर्दली की सहायता से उनको बंदी बनाकर पुलिस में भेज दिया। पुलिस से चालान होकर ये जुआरी बाबू ईशानचंद्र मुखर्जी की अदालत में पेश हुए। मुखर्जी बाबू ने चश्मदीद गवाह मांगा। पुलिस और अर्दली ने कहा कि चश्मदीद गवाह तो डिप्टी कमिश्नर रैप्टन साहब हैं। मुखर्जी ने उसी क्षण एक अंग्रेजी चिट्ठी रैप्टन के नाम लिखकर उन्हें सूचित किया कि यदि आपने जुआरियों को जुआ खेलते देखा है तो इस अदालत में उपस्थित होकर गवाही दीजिये।

    रैप्टन ने अपने अधीनस्थ अधिकारी का ऐसा आदेश देखकर बहुत बुरा माना तथा अर्दली के हाथ कहला भेजा कि हमने देखा अवश्य है। क्या तुम हमारे कहने का विश्वास नहीं करते? हम तुम्हारी कोर्ट में नहीं आयेंगे। बाबू साहब ने यह जवाब सुनकर निम्न पंक्तियां फाइल में लिखीं- इस मुकदमे के चार मुजरिम जुआ खेलने के जुर्म में तीन रुपये तथा ताश के तीन पत्तों के साथ मेरे समक्ष पुलिस ने पेश किये हैं किंतु चश्मदीद गवाह इस मुकदमे में स्वयं डिप्टी साहब के अतिरिक्त और कोई नहीं। और साहब तलब करने के उपरांत भी इस अदालत में नहीं आते और गवाही नहीं देते, अतः हम मुजरिमों को सजा नहीं दे सकते। मुजरिम रिहा किये जायें तथा कागज फाइल कर दिये जायें और जुआ खेलने के साधन जब्त करके जमा किये जायें।

    एल. एस. साण्डर्स जब अजमेर का कमिश्नर नियुक्त होकर आया तो उसने कोर्ट्स ऑफ वार्ड्स की स्थापना की जहाँ से कर्जा न चुकाने वाले रईसों के विरुद्ध कुर्कियां जारी की जाने लगीं। कमिश्नर के आदेश से मेजर रैप्टन तथा मुंशी अमीन चंद ने अजमेर रेग्यूलेशन का मसौदा तैयार किया। साण्डर्स ने अजमेर पुलिस की उन कुप्रथाओं को समाप्त किया। साण्डर्स के इस कदम से समस्त सरकारी कर्मचारियों के मन में ब्रिटिश सरकार का भय बैठ गया।

    एक बार अजमेर के कोतवाल ने एक महाजन को जुआ खेलने के आरोप में बंदी बनाकर बुरी तरह पीटा तथा और भी कई शारीरिक यातनाएं दीं। किसी व्यक्ति ने उसी समय साण्डर्स को कोतवाल के इस कृत्य की सूचना दी। साण्डर्स ने उसी समय कोतवाल को बंदी बनाकर बुलवाया तथा उसके विरुद्ध शिकायत की जांच की। शिकायत सही पाई गई। इस पर साण्डर्स ने कोतवाल को ढाई साल के लिये जेल भेज दिया। इस घटना के बाद पुलिस एवं सरकारी कर्मचारी कमिश्नर से भय खाने लगे।

    साण्डर्स न्याय प्रिय अधिकारी था। वह रईसों, ईमानदार व्यक्तियों तथा अपने साथ लाये हुए अधिकारियों एवं कर्मचारियों से कुछ नहीं कहता था किंतु जिसके पीछे पड़ जाता था, उसे तहस-नहस करके छोड़ता था। जो उसका आदेश नहीं मानता था, उसको वह दुश्मन जानता था। एक बार उदयपुर से विदेशी पठानों को दंगा करने के आरोप में नौकरी से निकाला गया। रेजीडेंट ने उन्हें पेशावर जाने के आदेश दिये। उन्हें अजमेर से पेशावर तक का रेल टिकट दिलवाया जाना था।

    उदयपुर का एक रिसाला उन पठानों को उदयुपर से लेकर अजमेर आया। कमिश्नर के आदेश से मार्ग में खरवा के राव द्वारा उन्हें रसद दी जानी थी किंतु खरवा के राव ने रिसाले को रसद नहीं दी। इस पर उदयपुर का रिसाला पठानों को लेकर विलम्ब से नसीराबाद पहुँचा। कमिश्नर साण्डर्स पहले से ही वहाँ उपस्थित था। उसने पठानों के लिये अपनी तरफ से खाना बनवा रखा था। कमिश्नर ने रिसालदार से विलम्ब का कारण पूछा तो उसने खरवा के राव की शिकायत की।

    साण्डर्स ने उसी समय खरवा के राव को बुलाकर सबके सामने बेइज्जत किया। उसने खरवा के राव को सिपाही से कॉलर पकड़वाकर इजलास से बाहर निकलवाया तथा कहा कि तू हमारा आदेश नहीं मानता, मैं तुझको खराब कर दूंगा। (यादगार-ए-मुराद अली, 19.04.98; यह घटना अतिरंजित लगती है। सैयद मुराद अली, लाहौर में साण्डर्स के अधीन डिप्टी इंसपेक्टर ऑफ पुलिस था तथा साण्डर्स से नौकरी पाने की आस में ई.1873 में लाहौर छोड़कर अजमेर आया था। साण्डर्स ने उसे अजमेर का तहसीलदार लगाया किंतु वेतन 50 रुपये प्रतिमाह होने से मुराद अली ने यह पद स्वीकार नहीं किया। इस पर साण्डर्स ने मुराद अली को मेयो प्रेस से छपने वाले राजपूताना ऑफीशियल बजट का सम्पादक नियुक्त किया। यहाँ उसे 80 रुपये मासिक मिलते थे। मुराद अली ने यह नौकरी स्वीकार कर ली तथा सात वर्ष तक इस पद पर कार्य करता रहा। बाद में गजट बंद हो जाने के कारण उसने अपना स्वयं का छापाखाना लगाया। तब से ऑफीशियल गजट का हिस्सा 'राजपूताना गजट' प्रकाशित किया जाने लगा। मुराद अली ने साण्डर्स को प्रसन्न करने वाली कई झूठी-सच्ची बातें अपनी पुस्तक में लिखी हैं।)

    ई.1877 में साण्डर्स ने सज्जादानशीन दरगाह ख्वाजा साहब दीवान गयासुद्दीन अली खां को दिल्ली दरबार में शेखल मशायरण का खिताब दिलवाया। उसने मसूदा के ठाकुर बहादुरसिंह, खरवा के ठाकुर माधोसिंह और बांदनवाड़ा के ठाकुरों को राव का और भिनाय के रईस राजा मंगलसिंह को सी. आई. ई. का खिताब दिलवाया। साण्डर्स के कार्यकाल में गवर्नमेंट कॉलेज अजमेर, ऊसरी गेट के बाहर अब्दुल्लापुरा की सराय के पश्चिमी कोने में चलता था।

    उसमें गोल्डिंग प्रिंसीपल और हैरिस हैडमास्टर था। बाबू रामजीवन लाल मुंशी तथा हजारीमल नाहर मास्टर थे। मौलाना हकीम मोहम्मद हुसैन अमरोहवी अरबी का अव्वल मुदर्रिस (वरिष्ठ शिक्षक) था। मौलवी शेख इलाही बख्श फारसी का मोअल्लिम (शिक्षक) था।

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