Blogs Home / Blogs / अजमेर नगर का इतिहास - पुस्तक / अजमेर का इतिहास - 54
  • अजमेर का इतिहास - 54

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 54

    कमिश्नर एल. एस. साण्डर्स (3)


    सर एडवर्ड आर. सी. ब्रॉडफोर्ड

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    दिल्ली दरबार का सारा प्रबंध अंग्रेज अधिकारी सर एडवर्ड आर. सी. ब्रॉडफोर्ड के हाथों में था। उसके काम से प्रसन्न होकर, सर एल्फ्रेड लॉयल के बाद 23 मार्च 1878 को मेजर सर एडवर्ड आर. सी. ब्रॉडफोर्ड को अजमेर-मेरवाड़ा का चीफ कमिश्नर बनाया गया। ब्रॉडफोर्ड एक हाथ से विकलांग था। इसलिये सारा काम एक हाथ से ही करता था। कहते हैं कि एक बार शेर का शिकार करते समय शेर ने उनका हाथ चबा लिया था।

    क्लॉक टॉवर का निर्माण

    ई.1879 में विक्टोरिया के शासन की स्वर्ण जयन्ती वर्ष के अवसर पर रेल्वे स्टेशन के सामने विक्टोरिया क्लॉक टॉवर बना।

    अजमेर में विभिन्न विकास कार्य

    17 फरवरी 1881 को अजमेर जिले में जनगणना की गयी। इसी वर्ष अजमेर में आर्यसमाज की स्थापना हुई। 1 दिसम्बर 1881 को अजमेर से खण्डवा तक ब्रांच रेलवे लाइन खोली गई। ई.1882 में वीसल झील पर चर्च ऑफ इंग्लैण्ड की स्थापना की गयी। अमरीकी मेथोडिस्ट्स ने अजमेर में एक मिशन की स्थापना की।

    अजमेर में महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों का आगमन

    ई.1876 में उदयपुर के महाराणा सज्जनसिंह ने अजमेर का भ्रमण किया। ई.1877 में कमाण्डर इन चीफ ऑफ इण्डिया तथा बम्बई के गवर्नर ने अजमेर का भ्रमण किया। ई.1879 में भारत के वायसराय लॉर्ड लिटन ने अजमेर का भ्रमण किया। इसी वर्ष उदयपुर के महाराणा अजमेर आये। ई.1880 में बम्बई का गवर्नर अजमेर आया। 19 नवम्बर 1881 को भारत का गवर्नर जनरल एंव वायसराय मारकीस ऑफ रिपन अजमेर आया।

    लॉर्ड रिपन से म्युन्सिपल्टी की शिकायत

    अजमेर की म्युनिसपल्टी हमेशा बदनाम रही। जनता कमेटी की सख्तियों से हमेशा परेशान रही। जब लॉर्ड रिपन ने लोकल सैल्फ गवर्नमेंट का कानून लागू किया तो म्युनिसपल्टी सरकारी अधिकार से स्वतंत्र होकर जनता के हाथों में आ गई। पादरी डॉक्टर हसबैण्ड साहब चेयरमैन बना। सेठ सुमेरमल डिप्टी चेयरमैन बना। मास्टर हजारीलाल सेक्रेटरी बना। कमेटी के शेष सदस्य आम चुनावों में चुनकर आये। इस कमेटी ने जनता को बहुत परेशान किया।

    जब नवम्बर 1881 में भारत का गवर्नर जनरल लॉर्ड रिपन अजमेर आया तो जनता ने उससे म्युन्सिपल्टी की शिकायत की। रिपन ने इन शिकायतों की जांच करवाई। शिकायतें सही पाई गईं। इस पर रिपन ने म्युनिन्पल्टी की खूब लानत-मलानत की तथा चीफ कमिश्नर ब्रेडफोर्ड को अठारह माह की अवधि देते हुए निर्देश दिये कि कमेटी इन परिस्थितयों को सुधारे तथा जनता पर जो अत्याचार हो रहे हैं, उन्हें बंद करे अन्यथा कमेटी के विरुद्ध कार्यवाही की जायेगी।

    स्वामी दयानंद सरस्वती का निधन

    महर्षि दयानंद सरस्वती को जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय की वेश्या नैनी बाई ने विष दे दिया। इस पर स्वामीजी को अजमेर लाया गया और उनके उपचार के प्रयास किये गये किंतु उन्हें बचाया नहीं जा सका। 30 अक्टूबर 1883 को दीपावली के दिन महर्षि दयानंद सरस्वती का अजमेर में भिनाय हाउस में निधन हो गया। अगले दिन उनका दाह संस्कार किया गया।

    चर्चिल एवं ग्रिफन की अजमेर यात्रा

    ई.1884 में ग्रेट ब्रिटेन एंव आयरलैण्ड के एक्स चांसलर ऑफ रैण्डोल्फ चर्चिल ने अजमेर का भ्रमण किया। सर लेपेल ग्रिफन ने अजमेर की यात्रा की।

    अजमेर के साहूकारों की पैठ

    अजमेर के साहूकारों की पैठ पूरे राजपूताने में थी। बहुत सी रियासतों के जागीरदार, राजकुमार एवं रानियां अपना धन अजमेर तथा किशनगढ़ के सेठों के यहाँ रखते थे। जोधपुर रियासत का खजाना तथा उनका हिसाब अजमेर के सेठ सुमेरमल के यहाँ रहता था। जब जोधपुर राज्य को रुपयों की आवश्यकता होती थी, तो सेठ सुमेरमल के यहाँ से मंगवा लिए जाते थे। इसी प्रकार जब राज्य को लगान आदि की आय होती थी, तब वे रुपये सेठ सुमेरमल के पास भेज दिए जाते थे।

    ई.1885 तक यही व्यवस्था चलती रही। 1 अप्रेल 1885 को मारवाड़ राज्य में ट्रेजरी की स्थापना की गई। उसके बाद यह व्यवस्था बंद हो गई।

    साण्डर्स के कार्यकाल में अजमेर में सेठ सुमेरमल, सेठ चांदमल और सेठ मूलचंद, सेठ कानमल पुत्र प्रतापमल और सेठ सौभागमल कुचामनवाला, सेठ रामरतन घसीटी वाला, उसका बेटा सेठ घीसूलाल और सेठ छीतरमल तापड़िया आदि की तूती बोलती थी। सेठ मूलचंद सोनी सहृदय व्यक्ति था। जयपुर सेठ सदासुख के निधन पर उनकी विधवा, जयपुर नरेश रामसिंह से मनमुटाव होने पर जयपुर से अजमेर भाग आई। उसने बीकानेर के एक परिवार से सौभागमल को गोद ले लिया। सौभागमल ढड्ढा व्यवहार कुशल था इसलिये उसने जयपुर दरबार में फिर से अपनी पैठ बना ली किंतु इस परिवार के पास जयपुर सेठ होने का उत्तराधिकार लौट कर नहीं आया।

    बूंदी नरेश से विवाद

    साण्डर्स हर व्यक्ति से तू तेरा कहकर बात करता था। एक बार बूंदी नरेश रामसिंह जोधपुर से अपने पुत्र का विवाह करके लौटे तथा अपने लाव लश्कर के साथ अजमेर में ठहरे। साण्डर्स को महाराव की अगवानी के लिये नियुक्त किया गया। जब साण्डर्स ने महाराव का स्वागत किया तो बोला- तेरा मिजाज अच्छा है? मैं तेरे लिये नियुक्त किया गया हूँ। तुझको मेयो कॉलेज आदि स्थानों की सैर करवाऊँगा। जिस बात की तुझे तकलीफ हो, तू मुझे बोल।' साण्डर्स की इस भाषा से महाराव चिढ़ गया और उसने तार के द्वारा चीफ कमिश्नर कर्नल ब्रॉडफोर्ड से साण्डर्स की शिकायत की। कर्नल ने कमिश्नर को खूब लताड़ा। इस पर कमिश्नर ने तर्क दिया कि एक व्यक्ति के लिये तू सही है। अंततः यह निष्कर्ष निकाला गया कि साण्डर्स को अच्छी तरह हिन्दी नहीं आती। फिर भी साण्डर्स को महाराव से क्षमा याचना करनी पड़ी।

    बेईमान साण्डर्स

    साण्डर्स पैसों के मामले में बेईमान था। मुराद अली ने लिखा है- नाबालिगों (नाबालिग जागीरदारों) के बालिग होने पर (उन्हें) जागीर और जायदाद के अधिकार सौंपते समय वह अच्छी खासी राशि और ऐशोआराम का सामान उससे खरीदवा लेता था।

    साण्डर्स द्वारा परी बेगम पर मेहरबानी

    राजपूतना ऐजंसी के हैड क्लर्क तथा मारवाड़ रियासत के प्रधानमंत्री नवाब मुहम्मदखां के मरने के बाद उसकी सबसे बड़ी बीवी को छोड़कर शेष पंद्रह बीवियों ने दूसरे पति कर लिये। मुहम्मदखां की सबसे बड़ी बीवी के गर्भ से उत्पन्न हुई दो लड़कियों में से एक अजमेर के ऑनरेरी मजिस्ट्रेट ख्वाजा सईदुद्दीन अहमद को ब्याही गई तथा दूसरी बेटी मुंशी सलामुद्दीन को ब्याही गई। मुहम्मदखां की दूसरी बीवी परी कहलाती थी। इसके पेट से नवाब अब्दुल्लाहखां पैदा हुआ जिसे अजमेर के कमिश्नर साण्डर्स ने बहुत सारी जागीर, अधिकारी और धन प्रदान किया।

    इसके बाद मुहम्मद खां की इन दोनों बीवियों के बीच जायदाद को लेकर अजमेर के डिप्टी कमिश्नर की अदालत में लम्बी मुकदमे बाजी चली। इस मुकदमे की लम्बे समय तक अजमेर में चर्चा रही। इस मुकदमे में बड़ी बीवी जीत गई और दूसरी बीवी (परी बेगम) तथा उसके पुत्र (नवाब अब्दुल्लाखां) से सारी जायदाद छीन ली गई। इस पर परी बेगम ने साण्डर्स की अदालत में अपील की। साण्डर्स ने परी बेगम तथा उसके पुत्र के पक्ष में निर्णय दिया। इसके बाद रुपये में से दस आना दौलत परी बेगम तथा उसके पुत्र नवाब अब्दुल्लखां को मिली और रुपये में से छः आना दौलत बड़ी बेगम और उसकी दोनों बेटियों को मिली।

    साण्डर्स की छतरी

    3 मार्च 1885 को एल. एस. साण्डर्स राजस्व कमिश्नर होकर अमरावती चला गया। डिप्टी कमिश्नर मेजर रैप्टन का खण्डवा स्थानांतरण हो गया। सैटलमेंट विभाग का मैनेजर मिस्टर ला टाउच कमिश्नर बनकर बनारस चला गया। साण्डर्स के बाद 4 मार्च 1885 से 25 जून 1885 तक कर्नल डब्लू ट्वीडी तथा 26 जून 1885 से 13 नवम्बर 1885 तक आईसीएस अधिकारी टी.सी. प्लॉवडेन अजमेर के कमिश्नर रहे। कुछ समय पश्चात् एलचीपुर की सड़क पर घुड़सवारी करते समय एल. एस. साण्डर्स का निधन हो गया। जब यह समाचार अजमेर पहुँचा तो अजमेर के नागरिकों ने बहुत शोक मनाया। उसकी स्मृति में कैसरगंज में एक छतरी बनाई गई।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×