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  • अजमेर का इतिहास - 53

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 53

    कमिश्नर एल. एस. साण्डर्स (2)


    ई.1873 का अजमेर

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    ई.1873 के आसपास के अजमेर नगर का वर्णन करते हुए मुराद अली ने लिखा है- बीसला की पाल के उत्तर में कुम्हार बाय के नवाब का बगीचा या कब्रिस्तान है। उसमें एक कश्मीरी दरवेश भगवा वस्त्रों में रहते थे जिनको लोग पीले मियां कहते थे। ये बूढ़े फकीर नंगे पांव फिरा करते थे। मेयो कॉलेज की नींव भी नई पड़ी थी। बस नक्शों के मुताबिक नाप जोख हो रही थी। मसाला ला-ला कर डाला जा रहा था।

    इस नवाह में एक फूस का बंगला पुराने युग का था। जिसको रेजीडेंसी का बंगला कहते थे। इस बंगले में रेलवे के एक लंगड़े कर्नल कालिट चंद रोज से आकर ठहरे थे। रेलवे लाइन का कहीं नाम निशान नहीं था। पैमाइश हो रही थी। जिसके घोड़े मेहनत के कारण सूखकर कांटा हो रहे थे। शकरमॉन के घोड़ों और ऊँटगाड़ियों के ऊँटों का मरना था।

    साहब रेजीडेण्ट राजपूताना और चीफ कमिश्नर अजमेर के लिये कोई मकान न था। जब वे आते अपना कैम्प कायम करते और अक्सर बाजा इमलियों में जहाँ अब सैंकड़ों बंगले हैं, उस जमीन में खेत और वीरान था, ठहरा करते थे। चीफ कमिश्नर साहब के साथ 18 रियासतों के वकील और एक गारद जंगी पलटन की छावनी ऐरनपुरा के सिख रिसाले के दोनों तरफ रहा करते थे। इसके अलावा रेजीडेंसी का कर्मचारी आदि का दल भी साथ रहता था। इतना होने पर भी डाकू कैम्प पर हमला कर देते थे।

    ई.1873 में जब कर्नल ब्रुक (यह 15 जून 1870 से 20 जून 1873 तक अजमेर-मेरवाड़ा का चीफ कमिश्नर रहा।) एजेंट टू गवर्नर जनरल एलियों में ठहरा हुआ था, डाकुओं ने वहीं छापा मारा और कई ऊँटों को भगा ले गये। जिले की कचहरियां, आनासागर के किनारे दौलतबाग में होती थी।

    सर एल्फ्रेड लॉयल

    पेली के बाद, 12 नवम्बर 1874 को सर एल्फ्रेड लॉयल अजमेर का चीफ कमिश्नर बना। इससे पूर्व वह भारत का विदेश सचिव रह चुका था तथा स्वभाव से उदार था। उसका भाई सर जेम्स लॉयल, पंजाब का लेफ्टीनेंट गवर्नर था। सर एल्फ्रेड लॉयल पांच साल तक अजमेर का चीफ कमिश्नर तथा एजेण्ट टू गवर्नर जनरल रहा।

    अजमेर का आधुनिकीकरण

    ई.1872 में अजमेर में नये जेल भवन का निर्माण किया गया। अजमेर में नये न्यायालय भवन का निर्माण हुआ तथा नया बाजार में एक चिकित्सालय खोला गया। ई.1873 में कैप्टेन रैप्टन की अध्यक्षता में जागीर कमेटी गठित की गयी। ई.1874 में दी अजमेर-मेरवाड़ा फॉरेस्ट रेगूलेशन 6 ऑफ 1874 पारित किया गया। ई.1875 में अजमेर का टॉपोग्राफिकल सर्वें पूरा किया गया। इसके साथ ही व्यवस्थित विकास एवं आधुनिकीकरण का काम आरम्भ हुआ। नये सरकारी भवन बन गये तथा विद्यालय खोले गये।

    नॉर्थबुक अजमेर में

    2 दिसम्बर 1875 को भारत का गवर्नर जनरल लॉर्ड नार्थबुक अजमेर आया।

    पोस्ट ऑफिस में भ्रष्टाचार

    ई.1874 में अजमेर के पोस्ट ऑफिस के पोस्ट मास्टर बाबू हरदयालसिंह आगरा के रहने वाले एक ब्राह्मण थे। उन दिनों राजपूताना के पोस्ट ऑफिसों की स्टेशनरी का वार्षिक व्यय अठारह हजार रुपये था। समस्त स्टेशनरी अलीगढ़ पोस्ट ऑफिस प्रेस से छपकर आती थी। उन दिनों राजपूताना के डाकघरों का सर्वोच्च अधिकारी चीफ इंस्पेक्टर (पोस्ट ऑफिस) कहलाता था, उसका कार्यालय माउण्ट आबू में हुआ करता था।

    उस समय इस पद पर अंग्रेज अधिकारी मि. मिलर नियुक्त था। उसका हैडक्लर्क बाबू माजुजद्दीन मुरादाबाद का अय्याश नौजवान था। अजमेर का पोस्ट मास्टर बाबू हरदयालसिंह, राजपूताना का चीफ इंस्पैक्टर (पोस्ट ऑफिस) तथा हैडक्लर्क बाबू माजुजद्दीन मिलकर भ्रष्टाचार करते थे। पोस्ट मास्टर बाबू हरदयालसिंह अजमेर के उम्मीदवारों को डाकखाने में भरती करता था तथा रिश्वत में एक से तीन माह का वेतन लेता था।

    इस राशि को ये तीनों व्यक्ति आपस में बांट लेते थे। इन तीनों ने मिलकर डाकखाने की स्टेशनरी अलीगढ़ पोस्ट ऑफिस प्रेस की बजाय मेयो प्रेस अजमेर से छपवाने का निर्णय लिया ताकि कुछ बचत हो सके। दीवान बूटासिंह ने इन तीनों को पांच सौ रुपये सालाना की रिश्वत देना निर्धारित किया। कुछ दिन बाद पांच सौ रुपये के बदले कश्मीर की दो टोपियां, एक शॉल, दो जोड़ी मोजे, पशमीने का एक साफा बाबू माजुजुद्दीन को भिजवाकर चुप लगा ली।

    बाबू माजुजुद्दीन ने दीवान बूटासिंह के ग्यारह सौ रुपये का बिल गबन करके भुगतान उठा लिया। इसके बाद माजुजुद्दीन, हरदयालसिंह तथा मि. मिलर ने मिलकर अजमेर में एक प्रेस लगाई और डाकखाने की स्टेशनरी मेयो प्रेस की बजाय इस प्रेस से छपवानी आरंभ कर दी। उन्होंने दीवान बूटासिंह के कुछ कर्मचारी भी तोड़ लिये। बूटासिंह ने इस सारे कबाड़े की जानकारी साण्डर्स को दी। साण्डर्स ने, माजुजुद्दीन तथा हरदयालसिंह को सरकारी कर्मचारी होते हुए भी छापाखाना लगाने के जुर्म में नौकरी से निकालकर जेल में डाल दिया। माजुजुद्दीन को आठ साल की तथा हरदयालसिंह को सात साल की जेल हुई। मि. मिलर का केवल इतना ही बिगड़ा कि उसे माउण्ट आबू से नैनीताल स्थानांतरित कर दिया गया।

    अजमेर में रेल का विकास

    ई.1873-74 में राजपूताना स्टेट रेलवे के लिये अर्थवर्क आरंभ किया गया। 1 अगस्त 1875 को रेल आगरा से अजमेर आई। 14 फरवरी 1876 को रेल नसीराबाद पहुँच गई। मुख्य लाइन अहमदाबाद तक जोड़ी गई। ई.1878 में जोधपुर महाराजा जसवंतसिंह (द्वितीय) ने, अजमेर से आबू को जानेवाली, 'राजपूताना-मालवा रेल्वे' की लाईन के लिये मारवाड़़ की सरहद में निःशुल्क भूमि प्रदान की। ई.1879 में अजमेर में रेलवे लोको एण्ड कैरिज वर्कशॉप खोली गयी।

    मिट्टी के तेल से हादसा

    रेल की पटरी बनाने वाले लोग अपना खाना बनाने के लिये ईंधन के रूप में मिट्टी का तेल काम में लेते थे जबकि अजमेर में रेल के आने तक मीठा तेल ईंधन के तौर पर प्रयुक्त होता था। अजमेर में रेल के आने के बाद घर-घर में मिट्टी का तेल जलने लगा। ई.1874 में रेल की पटरी बनवाने वाली ग्लैवर कम्पनी के कर्मचारी, गुजराती बाबू लाखन कोठरी नाम की बड़ी हवेली में रहते थे। उनमें से एक बाबू ने रात के समय एक वेश्या को अपने कमरे पर बुलाया।

    दोनों ने शराब पी तथा नशे की हालत में कैरोसिन के लैम्प में ठोकर लगने से आग लग गई। पास में ही कैरोसिन से भरा हुआ पीपा पड़ा था। उसमें भी आग लग गई। इससे वह कर्मचारी और वेश्या जलकर मर गये। आग से फर्श के पत्थर तक तड़क गये। मिट्टी के तेल से हुई इस विनाश लीला को देखकर अजमेर के नागरिक बुरी तरह सहम गये। वे मिट्टी के तेल की इस विध्वंसकारी शक्ति से पहली बार परिचित हुए।

    चिड़ियों के झुण्ड की तरह उड़ गये पंजाबी

    ई.1875 ई. में अजमेर में ला टाउच का प्रथम बीस वर्षीय स्थाई बंदोबस्त (सैटलमेंट) पूरा हुआ। इसके बाद अजमेर से सैटलमेंट विभाग उठ गया तथा अजमेर में नियुक्त पंजाबी कर्मचारी चिड़ियों के झुण्ड की तरह उड़ गये। डॉक्टर मरी भी मर गया और बावर पेंशन लेकर विलायत चला गया।

    हरकेलि नाटक के चौके मिले

    ई.1875 में संस्कृत में लिखे हरकेलि नाटक के छः चौके अढ़ाई दिन के झौंपड़े से प्राप्त हुए जो राजपूताना म्यूजियम में रखे गये। ये लेख चौहान शासक वीसलदेव के समय के हैं तथा इन पर 22 नवम्बर 1153 की तिथि अंकित है।

    बकरियां चराते हुए राजा बना

    राजगढ़ का ठिकाणा लगभग ई.1800 से अब तक जब्ती में चल रहा था। ई.1858 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का स्थान ब्रिटिश सरकार ने ले लिया था किंतु ठिकाणेदार के उत्तराधिकारियों के लाख प्रयासों के उपरांत भी उसे ठिकाणा नहीं लौटाया गया। जब साण्डर्स अजमेर का कमिश्नर बनकर आया तो उसे ठिकाणेदार के उत्तराधिकारियों पर बड़ा तरस आया। उसने अपने स्तर पर प्रयास करके ब्रिटिश सरकार को इस बात के लिये सहमत किया कि राजगढ़ का ठिकाणा इसके पूर्व ठिकाणेदार के उत्तराधिकारी को लौटा दिया जाये।

    इस प्रकार लगभग 77 साल बाद इस ठिकाणे के वारिस ठाकुर देवीसिंह को राजगढ़ ठिकाणा प्राप्त हो गया। जिस समय ठिकाणा बहाल होने की सूचना देवीसिंह के पास पहुँची, वह बकरियां चरा रहा था। सरकार ने अपनी ओर से दस हजार रुपये लगाकर उसके राजतिलक का समारोह आयोजित किया तथा उसे राजगद्दी पर बैठाया। इस समारोह में मेजर रैप्टन, मुंशी अमीनचंद, अजमेर जिले के समस्त ठिकाणेदार सम्मिलित हुए। तब से यह ठिकाना भारत को स्वतंत्रता मिलने तक कायम रहा।

    कैसरे हिन्द

    ई.1877 में महारानी विक्टोरिया ने कैसर-ए-हिन्द अर्थात् भारत की साम्राज्ञी की उपाधि ग्रहण की। इस अवसर पर दिल्ली में एक भव्य दरबार का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पीसांगन के ठाकुर प्रतापसिंह को राजा की उपाधि दी गई। मसूदा, खरवा, बांदनवाड़ा तथा जूनिया के ठाकुरों को राव साहिब की उपाधि दी गई।

    निजाम अली की हत्या

    हकीम निजाम अली जागीरदार झड़वासा का रहने वाला था। ई.1877 में उसे अंग्रेज सरकार ने अजमेर का ऑनरेरी मजिस्ट्रेट बनाया। उसने झड़वासा के एक भौमिया राजपूत सबलसिंह को गांव में आग लगने के आरोप में कैद कराया। जब राजपूत रिहा होकर बाहर आया तो उसने अजमेर से एक तलवार खरीदी और दिन दहाड़े निजाम अली की हवेली में पहुँचकर उसका सिर काट दिया। इसके बाद वह बिना किसी खौफ के तलवार घुमाता हुआ चला गया।

    जब इसकी सूचना अजमेर के कमिश्नर को मिली तो उसने तुरंत अजमेर शहर के सारे दरवाजे बंद करवाकर घुड़सवार पुलिस को सारे अजमेर में दौड़ाया गया किंतु मुजरिम कहीं न मिला। कमिश्न ने उसकी गिरफ्तारी पर 2 हजार रुपये का इनाम रखा। कई साल बाद किसी की गुप्त सूचना के आधार पर इस मुजरिम को रियासत पालतियाना से पकड़कर हाजिर किया गया किंतु बहुत से लोगों की राय में वह सबलसिंह नहीं था। इसलिये उसकी पहचान न हो सकी और उसे छोड़ देना पड़ा।

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