Blogs Home / Blogs / अजमेर नगर का इतिहास - पुस्तक / अजमेर का इतिहास - 52
  • अजमेर का इतिहास - 52

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 52

    कमिश्नर एल. एस. साण्डर्स (1)


    कमिश्नर प्रणाली पुनः आरम्भ

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ई.1853 से ई.1857 तक अजमेर में कमिश्नर प्रणाली प्रचलन में थी किंतु ई.1857 से अजमेर में कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) के स्थान पर डिप्टी कमिश्नर की नियुक्ति की जाने लगी। इस अवधि में अजमेर और मेरवाड़ा में अलग-अलग डिप्टी कमिश्नर होते थे जो कि एजीजी (राजपूताना) के अधीन कार्य करते थे। ई.1871 में फिर से कमिश्नर व्यवस्था आरम्भ की गई।

    साण्डर्स की नियुक्ति

    पंजाब के सैटलमेंट विभाग के प्रमुख अधिकारी एल. एस. साण्डर्स को कमिश्नर (अजमेर-मेरवाड़ा) के पद पर नियुक्त किया गया। मुराद अली ने अजमेर में कमिश्नर नियुक्त होने का एक रोचक किस्सा लिखा है। उसके अनुसार मेजर रपटन (रैप्टन) जब यहाँ लम्बे समय तक (डिप्टी कमिश्नर के पद पर) काम कर चुका तो उसे कमिश्नर बनने का शौक हुआ। उसने सरकार को लिखा कि इस (अजमेर) जिले में अब काम बढ़ गया है। रेल भी आने वाली है। बंदोबस्त भी आरंभ होने वाला है। अतः यहाँ कमिश्नर नियुक्त होना चाहिये। रपटन को लगता था कि मुझसे बढ़कर अधिकारी कौन है। अगर कमिश्नर के पद की स्वीकृति हुई तो मैं ही अजमेर का कमिश्नर बनूंगा। रपटन की अर्जी तो सरकार ने मंजूर कर ली किंतु लाहौर से सैटलमेंट विभाग के अधिकारी साण्डर्स को कमिश्नर नियुक्त करके अजमेर भेज दिया। रैप्टन साहब बहुत हैरान ओर परेशान हो गये किंतु क्या करते! अब कमिश्नर साण्डर्स जिले के मालिक थे।

    साण्डर्स और रप्टन में विवाद

    ई.1871 में एल. एस. साण्डर्स को अजमेर का कमिश्नर नियुक्त किया गया। अप्रेल 1868 से कैप्टन रैप्टन अजमेर के डिप्टी कमिश्नर के सर्वोच्च पद पर कार्यरत था। उसका उच्च अधिकारी चीफ कमिश्नर था जिसका मुख्यालय आबू में था। इसलिये रैप्टन को नये कमिश्नर के आदेश मानना और उसके अधीन रहकर कार्य करना अपमानजनक लगता था। जबकि साण्डर्स अपने आदेश के बिना एक पत्ता हिलना भी पसंद नहीं करता था। साण्डर्स नागरिक सेवा का अधिकारी था जबकि रैप्टन सैनिक अधिकारी था। इसलिये आये दिन दोनों में अनबन होने लगी। कुछ दिनों बाद रैप्टन का खण्डवा स्थानांतरण हुआ। इस पर मुराद अली ने चुटकी लेते हुए लिखा है कि साण्डर्स ने मेजर साहब (रैप्टन) को बगली घूंसा समझकर ऐसा निकाला कि (रैप्टन ने) खण्डवा में जाकर दम लिया।

    मेयो प्रेस की स्थापना

    साण्डर्स अजमेर-मेरवाड़ा का कमिश्नर बनकर आया तो अपने साथ लाहौर से दीवान बूटासिंह को भी लेकर आया। बूटासिंह लाहौर में अपना छापाखाना चलाता था। उसने छापाखाने की मशीनें लाहौर से अजमेर मंगवा लीं तथा अजमेर में मेयो प्रेस के नाम से छापाखाना लगा लिया। साण्डर्स के आदेश पर समस्त राजकीय विभाग मुद्रण का समस्त कार्य इस प्रेस से करवाने लगे। इससे पहले सरकारी विभागों की स्टेशनरी आगरा एवं दिल्ली से छपकर आती थी। एक बार जिला पुलिस अधीक्षक बावर ने आगरा-देहली गजट प्रेस से कुछ स्टेशनरी छपवाई। साण्डर्स ने इस स्टेशनरी का भुगतान नहीं किया तथा स्टेशनरी का व्यय बावर को अपनी जेब से करना पड़ा।

    किशनगढ़ का कागज उद्योग बर्बाद

    साण्डर्स की नियुक्ति से पूर्व, अजमेर के न्यायालयों में किशनगढ़ में बने देशी कागज का प्रयोग होता था। दीवान बूटासिंह ने सैटलमेंट विभाग के लिये ई.1871 में पहली बार पेपर मिल कलकत्ता से मेहंदी रंग का कागज मंगवाया। उसने एक रिम के दो-दो रिम बनाकर पैसे बनाये। उसकी देखरेख में समस्त सरकारी विभागों में मेहंदी रंग का कागज प्रयुक्त होने लगा। इससे किशनगढ़ के कागज का कारखाना बर्बाद हो गया और कारखाने में काम करने वाले भूखों मरने लगे।

    जोधपुर के महाराजकुमार का अजमेर में निवास

    जुलाई 1872 में मारवाड़ नरेश तख्तसिंह के द्वितीय पुत्र महाराज कुमार जोरावरसिंह ने नागौर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। दोनों पक्षों में समझौता हो गया। इसके बाद महाराज कुमार जोरावरसिंह कुछ दिनों तक अजमेर में आकर रहा।

    लुईस पेली से साण्डर्स का विवाद

    21 जून 1873 को कर्नल सर लुईस पेली अजमेर-मेरवाड़ा का चीफ कमिश्नर बना। वह नवम्बर 1874 तक इस पद पर रहा। कर्नल पेली का स्वभाव बहुत सख्त था। एक बार कमिश्नर साण्डर्स ने चीफ कमिश्नर लुईस पेली को लिखा कि आपको म्युनिसपल कमेटी में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। इस पर चीफ कमिश्नर ने जवाब भिजवाया कि हमें तो यह अधिकार है कि कमेटी ही भंग कर दें। उन दिनों अजमेर के सिविल सर्जन डॉ. मरी तथा सेठ सुमेरमल लोढ़ा अजमेर की म्युन्सिपल कमेटी में सदस्य हुआ करते थे। बाबू ईशानचंद्र इस समिति का सैक्रेटरी था। वह कमेटी के सदस्यों से बदजुबानी करता था। एक बार उसने डॉ. मरी से कहा कि क्या तुम बिल्ली की सी आंखें निकाल कर मुझे डराते हो।

    डॉ. मरी ने इसकी शिकायत कमिश्नर साण्डर्स से की। साण्डर्स ने बाबू ईशानचंद्र को कमेटी के सैक्रेटरी पद से हटा दिया। इस पर ईशानचंद्र ने चीफ कमिश्नर कर्नल सर लुइस पेली की अदालत में अपील की। जब पेली ने ईशानचंद्र से पूछा कि क्या तुमने ऐसा कहा? इस पर बाबू ने जवाब दिया कि मैंने क्या झूठ कहा। आपकी और सारे यूरोपियनों की आंखें बिल्ली जैसी हैं। साण्डर्स इस बात के प्रतिवाद में कुछ नहीं कह पाया और बाबू ईश्वरचंद्र को फिर से कमेटी का सैक्रेटरी बना दिया गया। कुछ दिनों बाद जब पेली का स्थानातंरण हुआ तो पेली ने बाबू ईश्वरचंद्र को कोटा रियासत में नौकरी दिलवा दी क्योंकि अब साण्डर्स और मरी, बाबू ईशानचंद्र के दुश्मन हो गये थे।

    कर्नल पेली का फतहगढ़ महाराजा से विवाद

    एक बार पेली ने फतहगढ़ के महाराजा से बैठने के लिये कहा किंतु फतहगढ़ महाराजा ने अपने बैठने का क्रम किशनगढ़ के महाराजा से नीचे देखकर, बैठने से मना कर दिया क्योंकि वह हमेशा किशनगढ़ महाराजा से क्रम में ऊपर बैठता आया था। इस पर पेली बहुत नाराज हुआ तथा उसने मऊ तथा आगरा तार भेजकर फौजें अजमेर रवाना करने के आदेश दिये। अंत में फतहगढ़ के महाराजा को किशनगढ़ के महाराजा से नीचे के क्रम में बैठना पड़ा।

    एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर पं. भागराम

    ई.1873 में पुष्कर की छोटी और बड़ी बस्ती के ब्राह्मणों में मुकदमेबाजी चल रही थी। उन्हीं दिनों कमिश्नर कार्यालय का हैड क्लर्क पण्डित भागराम, अजमेर का एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर नियुक्त हुआ। बड़ी बस्ती वालों ने पण्डित भागराम को रिश्वत की पेशकश करके कहा कि आप इस मुकदमे का निर्णय हमारे पक्ष में कर दें। इस पर भागराम ने उनसे कहा कि ले आना। इस पर बड़ी बस्ती वाले अशर्फियां लेकर भागराम के निवास पर पहुँचे।

    पण्डित ने अपने घर पर पहले से ही पुलिस को बुलाकर छिपा रखा था। ज्यों ही ब्राह्मणों ने अशर्फियां पण्डित के सामने कीं, पुलिस ने उन्हें बंदी बना लिया। अदालत के आदेश से उन ब्राह्मणों को सजा मिली तथा अशर्फियां भागराम को सौंप दी गईं। जब चीफ कमिश्नर को पता चला तो उसने अशर्फियां जब्त करके सरकारी खजाने में जमा करवाईं।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×