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  • अजमेर का इतिहास - 51

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 51

    अठारह सौ सत्तर का अजमेर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    उन दिनों के एक लेखक मुराद अली ने ई.1870 के अजमेर नगर का बहुत ही रोचक विधि से आंखों देखा विवरण लिखा है। वह लिखता है- 15 जुलाई 1870 को दिन के बारह बजे हम शतुर (ऊँट) पर सवार होकर शेखावाटी की गर्म हवा खाते हुए लोहगल के रास्ते से अजमेर में दाखिल हुए। उस समय पादरी जेम्स ग्रे का बंगला, डॉक्टर मारी का बंगला, पादरी डॉक्टर हस्बैण्ड का बंगला, बस ये तीन ही बंगले उस पंक्ति में थे।

    बड़ी कचहरी के पश्चिम में जिस बंगले में जिले की ट्रेजरी का कार्यालय है, उसमें वन विभाग का एक यूरोपियन अधिकारी रहा करता था। यह पीली बंगलिया कहलाती थी। उससे कुछ फासले पर किशनगढ़ की सड़क के किनारे डाक बंगला था जिसमें अब (ई.1889) कोर्ट्स ऑफ वार्ड्स का दफ्तर है। इस दफ्तर के उत्तर में एक गिर्जाघर की नींव पड़ रही थी। इनके अतिरिक्त जेलखाना तक कोई भवन नहीं था।

    आनासागर के टीलों पर नवाब हाजी मोहम्मद खान की कोठी के अतिरिक्त और कोई बंगला या भवन नहीं था। उस कोठी के तले पूर्व में एक हराभरा बगीचा था और कुंए के निकट नवाब मजकूर की संगमरमर से बनी हुई कब्र थी जो कुछ दिन पहले ही पुष्कर के मेले में कत्ल हुए थे।

    उससे आगे बढ़कर स्वर्गीय राय बंशीलाल भूतपूर्व एक्सट्रा असिस्टेण्ट कमिश्नर जो कि अजमेर के रईस थे, का बगीचा था। वह बगीचा उन दिनों बहुत ही हराभरा था। उससे आगे चलकर एक पुल मिलता था। उसके नीचे होकर थोड़ा-थोड़ा पानी बहता था। छोटी-छोटी मछलियां उसमें तैरती रहती थीं। (इसे उन्नीसवीं सदी में ही पाट दिया गया था।) पुल और दौलतबाग के बीच में होकर एक सड़क नगर को आती थी। जहाँ अब (ई.1889) दूधिया कुएं के पूर्व में होकर सड़क निकली है, रेता था और कीचड़ जमा रहता था।

    दौलतबाग एक पक्की दीवार के अंदर था जिसकी पूर्वी सीमा सैलानी पीर की कब्र तक थी। (यह उन्नीसवीं सदी के अंत में बाग के बीच में आ गई थी।) आगरा दरवाजे के निकट, पूर्व दिशा में किशनगढ़ की सड़क पर गिर्जाघर बन चुका था। उसकी दीवार से लगी हुई सुमेरमल बनिये की कोठियों का सिलसिला था। सुमेरमल की उत्तर में जो कोठी है, उसमें एक सौदागर ब्रुक एण्ड सन रहता था।

    सड़क के दूसरी तरफ छोटा सा डाकखाना था (यह उन्नीसवीं सदी के अंत में नया और बड़ा बन गया था।) डाकखाने के सामने एक नोहरा वीरान पड़ा था। उस नोहरे से लगा हुआ जो मंदिर सेठ मूलचंद सोनी का है, उसकी नींव लग रही थी।

    अहाते की दीवार बन चुकी थी। मंदिर के पूर्व में सड़क के किनारे वाले बंगले में सरकारी तारघर था जिसके खम्भे किशनगढ़ की सड़क पर गड्ढे थे। यह एक ही तारघर था। भिनाय की कोठी मौजूद थी और किशनगढ़ की कोठी में हालसन मैंजू नामक अंग्रेज सौदागर शराब की दुकान चलाता था। आगे चलकर दाहिनी तरफ जो कब्रिस्तान है (इसे बम्बेका कहते थे।) उसके कौने पर जो तकिया था, उसमें दिन भर ख्वाजा की दरगाह के सेवकों का जमघट रहता था जो हिन्दुस्तान भर से आने वाले मुसाफिरों को ख्वाजा के दरबार में ले जाता था।

    उसके सामने सेठ सुमेरमल लोढ़ा का बगीचा था किंतु कोई भी मकान बगीचे में न था। बीच में एक छप्पर वाली कच्ची इमारत थी। बस आगे पीली बंगलिया, जेलखाना, डाकखाना और मेरवाड़ा पलटन के अतिरिक्त कुछ न था। जहाँ अब कैसरबाग बना है, वहाँ मालियों की बाड़ियां और बगीचे थे। इनमें अनार, बेर और इमलियों के इतने घने पेड़ थे कि दिन में भी अंधेरा रहता था। मैगजीन की जड़ों में पश्चिम से पूर्व तक फैली हुई खाइयां थीं। वे बारहों महीने गंदे पानी और हड्डियों से भरी रहती थीं। मैगजीन के बाहरी दरवाजे के सामने एक पुल था जो खंदक पर बना हुआ था। इसकी जड़ में ई.1857 के गदर की पुरानी तोपें तोड़कर गाड़ दी गई थीं। मैगजीन के पश्चिमी बुर्ज के सामने उपरोक्त खाई और सड़क के किनारे एक कच्ची चौकी बनी थी जिसमें सिपाही पहरा देते थे।

    यहाँ से मदार दरवाजे तक जहाँ अब तारघर है, वहाँ गन्ने और अनाज के खेत थे। उस खेत में एक काश्तकार माली का मकान था। जहाँ अब बड़ा पीपल, ऊंटों के रहने के नोहरे तथा एक फकीर का मकान तारघर के सामने है। यह जगह वीरान थी। अक्सर मालियों की बाड़ियां थीं। फकीर के मकान की जगह एक काले रंग के पत्थर का तराशा हुआ हाथी पड़ा था जिस पर फारसी में शेर खुदे हुए थे। जहाँगीर के समय किसी ने पत्थर को तराशकर हाथी बनाया था। यहाँ से बड़ी कचहरी तक खेत और वीरान मैदान था जिसको मालपुआ कहते थे। उस मैदान में हिन्दू देवी-देवताओं के छोटे-छोटे मंदिर थे। कोई सड़क नहीं थी। इसलिये सरदार बहादुर रामचंद ने उसी मैदान में एक साल दशहरा का मेला भरवाया था।

    तारघर के पूर्व में जो सड़क कचहरी और रेलवे की तरफ जाती थी, उस सड़क पर मशरिफ में जहाँ अब रेलकर्मियों के घर हैं, यहाँ से लेकर उस रेलवे फाटक तक जिसमें से होकर बीसला जाते हैं, एक पुराना कब्रिस्तान था जिसका आलीशान पक्का दरवाजा अपनी जीर्णशीर्ण अवस्था तथा आने वाली मुसीबत को याद कर आठ-आठ आंसू बहाता था। यह दरवाजा किसी बाग का था जो कभी उस धरती में गल गया होगा। उसी समय में या उसके बाद उसी धरती पर कब्रिस्तान बन गया होगा।

    उसकी दीवार आदि के कोई अंश शेष न थे। कब्रें और आलीशान दरवाजा ही था। यहाँ से मदार दरवाजे को चलते समय दाहिनी तरफ, शहर की जड़ में कुछ घर सूने पड़े थे और बाईं तरफ पुल के मशरिफ में फकीर का चबूतरा और कब्रें थीं। पुल के पास जो तीन चार दरवाजों का एक छोटा और सूना घर था, उसमें परदेशी कंगले और कुत्ते लोटा करते थे। आगे चलकर डिक्सन साहब का कुण्ड है। यह पानी से लबालब रहता था।

    आधे से अधिक नगर, इस कुण्ड का पानी पीता था। औरतों के झुण्ड यहाँ पानी भरने के लिये आते थे। मदार दरवाजे के आगे कुछ पक्की दुकानें थीं। किसी-किसी दुकान में एकाध वेश्या नजर आती थी। अक्सर इक्कों वाले और ऊंट गाड़ियां वाले जो यहाँ से जयपुर को जाते थे, रहते थे। उन गाड़ियों का चौधरी हुसैन बक्श नामक जयपुर का चालक था। जहाँ सायर और हलवाइयों की दुकानें हैं, वह बिल्कुल वीरान था।

    यहाँ से रेलवे स्टेशन की तरफ जाने वाली दोनों तरफ चंद दुकानों के बाद सिरकियों के छप्पर नजर आते थे, उनमें वेश्याएं रहती थीं। मस्जिद के गिर्द घोड़ों के सौदागर तथा खाना बनाने वाली औरतें, एक नीम के नीचे पड़े रहते थे। और कुछ झौंपड़े भी थे, वहाँ अब घण्टाघर और तारघर के हलके में मैदान है। जिस जगह सराय चिश्ती चमन का दरवाजा है, वहाँ सिरकियों की झौंपड़ियाँ थीं जिनमें वेश्याओं का जमघट रहता था।

    यह जमघट चिश्ती चमन की सीमा पर समाप्त होता था। उस सीमा से एक नाला बीसला तालाब को जाता था। उसके कांटेदार पेड़ थे और मुर्दों की हड्डियां भी मिलती थीं। मस्जिद और घण्टाघर के पश्चिम में रेलवे दरवाजे के पास जहाँ से अब सड़क निकली है और रेल का बगीचा है, पुरानी और पक्की सराय थी। उसका दरवाजा पश्चिम की तरफ था। अजमेर में आने वाले यात्री इस सराय में ठहरते थे। मस्जिद के दक्षिण में पुलिस की छोटी चौकी और एक कसाई की दुकान थी।

    पश्चिम में सड़क के किनारे से लेकर परकोटे की खंदक तक कुम्हारों के झौंपड़े थे, उनको कैवेण्डिश ने बसाया था। उस स्थान का नाम कैवेण्डिश पुरा था। सराय चिश्ती चमन के पश्चिम में होकर एक सड़क निकली थी, जो आगे चलकर दो हो गई थी। इनमें से एक ब्यावर को और दूसरी नसीराबाद को जाती थी। उस ओर कोई बंगला न था। जहाँ पुतलीघर है, वहाँ ऊँची-ऊँची पहाड़ी चट्टानें थीं। उन पर कंजर और नट पड़े रहते थे। नसीराबाद की सड़क पर एक पक्का कुंआ मिलता था जो वीरान पड़ा था। लाल फाटक से जो सड़क मेयो कॉलेज को गई है, यह कच्चा रास्ता श्रीनगर को जाता था।

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