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  • अजमेर का इतिहास - 50

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 50

    लॉर्ड मेयो का अजमेर दरबार


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    राजस्थान के इतिहास में भारत के गवर्नर जरनल एवं वॉयसराय लॉर्ड मेयो द्वारा 22 अक्टूबर 1870 को अजमेर में आयोजित दरबार का बड़ा महत्त्व है। यह दरबार 1857 के सैनिक विद्रोह के समाप्त होने के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा देशी नरेशों के प्रति अपनाई गई विनम्र नीति का हिस्सा था। गवर्नर जनरल लॉर्ड मेयो की अध्यक्षता में आयोजित इस दरबार में राजपूताना के समस्त राजाओं को आमंत्रित किया गया।

    इस दरबार में उदयपुर, जोधपुर, कोटा, बूंदी, करौली, टोंक, किशनगढ़ तथा झालावाड़ के शासकों ने भाग लिया। राजपूताना के शासकों में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त महाराणा के स्वागत-सम्मान की औपचारिकता का विशेष प्रबंध किया गया। 4 अक्टूबर 1870 को महाराणा शंभुसिंह अपने 6-7 हजार व्यक्तियों के साथ उदयपुर से रवाना हुआ। 19 अक्टूबर को अजमेर में प्रवेश करने से पूर्व मोखमपुरा में ब्रिटिश अधिकारियों ने महाराणा की पेशवाई की तथा उसे तारागढ़ के नीचे निर्धारित डेरे तक ले आये।

    20 अक्टूबर 1870 को लॉर्ड मेयो भरतपुर, जयपुर एवं सांभर होता हुआ अजमेर पहुँचा। लॉर्ड मेयो के आगमन के समय मध्याह्न तीन बजे सभी राजा अजमेर से दो कोस दूर, हाफिज जमाल के बिहले के पास सड़क के दोनों ओर पंक्तिबद्ध उपस्थित हुए। दायीं पंक्ति में सबसे पहले मेवाड़ महाराणा, उसके बाद किशनगढ़, अलवर तथा झालावाड़ नरेश आरूढ़ थे। बायीं पंक्ति में जोधपुर के महाराजा, कोटा, बूंदी तथा टोंक नरेश हाथी पर आरूढ़ थे। वायसरॉय के आगमन पर समस्त नरेशों ने उसका अभिवादन कर उसका स्वागत किया। देशी नरेशों का अमला शोभा यात्रा के रूप में वायसरॉय को उसके डेरे तक पहुंचाने गया। वायसरॉय का शिविर अजमेर के मीरशाली बाग में लगाया गया था। वॉयसराय की शोभा यात्रा ने आगरा गेट से अजमेर में प्रवेश किया तथा नया बाजार होता हुआ दिल्ली गेट से बाहर निकलकर मीरशाली बाग पहुँचा।

    21 अक्टूबर को समस्त देशी नरेश वायसरॉय की मिजाजपोशी के लिये उसके डेरे पर बारी-बारी से गये। महाराणा अपने सरदारों सहित वायसरॉय के डेरे पर गया। वायसरॉय ने फर्श तक उपस्थित होकर महाराणा का स्वागत किया तथा महाराणा को अपने डेरे में ले गया। वायसरॉय ने महाराणा को अपनी दायीं ओर कुर्सी पर बिठाया। स्वागत सत्कार की रस्में हुईं तत्पश्चात् महाराणा विदा हुआ। इसी प्रकार अन्य राजा भी बारी-बारी से पहुँचे।

    22 अक्टूबर को प्रातः 9 बजे आम दरबार आयोजित हुआ। राजपूताना के नरेश एक-एक करके, वायसरॉय के आने से पहले दरबार स्थल पर पहुँचे। महाराणा शंभूसिंह अपने सरदारों सहित शामियाने में प्रविष्ट हुआ। उस समय ब्रिटिश अधिकारियों ने महाराणा को 19 तोपों की सलामी दी। अन्य राजाओं को भी उनकी हैसियत के अनुसार तोपों से सलामियां दी गईं। समस्त नरेशों ने खड़े होकर महाराणा का स्वागत किया। शाहपुरा का नरेश नाहरसिंह अपने खेमे में बैठा रहा और उसने महाराणा की ताजीम नहीं की।

    शामियाने के मध्य तख्त पर वायसरॉय की कुर्सी लगी थी, जिससे कुछ दूरी पर दायें तथा बायें दो कतारों में कुर्सियां लगी थीं। दायीं कतार में सर्वप्रथम महाराणा, तत्पश्चात् पॉलिटिकल एजेंट निक्शन, उसके बाद जोधपुर महाराजा तख्तसिंह, पॉलिटिकल एजेंट एवं अन्य शासक तथा उनके पॉलिटिकल एजेंट की कुर्सियां लगी थीं। शासकों की पीठ पीछे क्रमबद्ध उनके सरदार बैठे थे। वायसरॉय के आने की प्रतीक्षा थी। जोधपुर महाराजा की कुर्सी खाली पड़ी थी।

    कुछ समय पश्चात् वायसरॉय ने महाराणा को संदेश भेजा कि मैं जोधपुर महाराजा के आगमन की प्रतीक्षा में बैठा हूँ और देरी के लिये क्षमा चाहता हूँ किंतु जब जोधपुर महाराजा दरबार में नहीं आया तो वायसरॉय शामियाने में प्रविष्ठ हुआ। 21 तोपों की सलामी हुई। सबने खड़े होकर वायसरॉय का स्वागत किया। महाराणा ने दस्तापोशी कर वायसरॉय का स्वागत किया। वायसरॉय अपनी कुर्सी पर बैठा। उसके बाद मेवाड़ के 9 सरदारों ने वायसरॉय को एक-एक स्वर्ण मुहर नजर पेश की। इसी प्रकार अन्य नरेशों तथा सरदारों ने भी नजर पेश की रस्म अदा की। कुछ देर बाद वायसरॉय ने खड़े होकर अपना भाषण पढ़ा। उसके तुरंत बाद फॉरेन सेक्रेटरी ने उसका अनुवाद पढ़ा। भाषण के बाद इत्र-पान पेश किया। वायसरॉय ने महाराणा को तथा फॉरेन सेक्रेटरी ने अन्य नरेशों तथा सरदारों को इत्र-पान पेश किया। तत्पश्चात् वायसरॉय ने समस्त नरेशों से विदा ली। प्रस्थान के समय भी तोपों की सलामी हुई।

    उसी सायं लॉर्ड मेयो महाराणा शंभुसिंह से भेंट करने उसके डेरे पर गया। महाराणा ने फर्श तक उपस्थित होकर वायसरॉय का स्वागत किया तथा डेरे में ले जाकर कुर्सी पर अपने दाहिनी ओर बैठाया। महाराणा ने वायसरॉय को हीरे का हार पहनाया तथा महाराणा के सरदारों ने वायसरॉय को स्वर्ण मुहर की नजर पेश की। स्वागत की औपचारिकता के बाद दोनों में बातचीत हुई। महाराणा ने कहा कि आपसे भेंट करके मुझे बेहद प्रसन्नता अनुभव हो रही है। प्रत्युत्तर में वायसरॉय ने भी महाराणा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। महाराणा ने लॉर्ड मेयो को उदयपुर आने का निमंत्रण दिया। लॉर्ड मेयो ने महाराणा से उदयपुर के रमणीक स्थलों की तस्वीरें भिजवाने का अनुरोध किया जिन्हें वह लंदन भेजना चाहता था।

    इसके बाद दोनों में शिकार तथा घोड़ों के विषय में वार्तालाप हुआ। विदाई की औपचारिक रस्में अदा हुईं। इसी रात्रि में जोधपुर महाराजा तख्तसिंह भी महाराणा से भेंट करने उसके डेरे पर गये तथा दरबार के दौरान अपनी अनुपस्थिति का कारण स्पष्ट करते हुए बताया कि उन्हें महाराणा से निम्न बैठक पर बैठने में आपत्ति नहीं है किंतु उदयपुर के पॉलिटिकल एजेण्ट के नीचे बैठने पर अपमान का अनुभव हुआ। महाराणा को अफवाहों पर विश्वास करके आपसी सम्बन्धों को विकृत नहीं करना चाहिये।

    जोधपुर महाराजा की अजमेर दरबार में अनुपस्थिति का विवाद स्वयं ब्रिटिश नीति की उपज थी। जिसके अंतर्गत प्रत्येक शासक के साथ उस राज्य के पॉलिटिकल एजेण्ट की कुर्सी लगाकर विवाद पैदा किया गया। अन्य राज्य के शासक को किसी पॉलिटिकल एजेण्ट से निम्न बैठना स्वीकार्य नहीं था। इस व्यवस्था को जोधपुर के महाराजा ने अत्यंत गंभीरता से लिया तथा दरबार में अनुपस्थित रहा। जबकि बायीं ओर ब्रिटिश अधिकारियों के लिये निर्धारित पंक्ति में पॉलिटिकल एजेण्टों को बैठाकर विवाद शांत किया जा सकता था। इसके विपरीत ब्रिटिश सरकार ने दुष्प्रचार किया कि जोधपुर महाराजा, मेवाड़ महाराणा के समकक्ष बैठना चाहते थे। ब्रिटिश अधिकारियों का तर्क था कि मेवाड़ के महाराणा को 19 तोपों की तथा जोधपुर नरेश को 17 तोपों की सलामी स्वीकृत थी इसलिये जोधपुर नरेश को मेवाड़ महाराणा के समकक्ष नहीं बैठाया जा सकता था। ब्रिटिश अधिकारियों ने यह तर्क भी दिया कि ई.1832 के अजमेर दरबार के दौरान जो बैठक व्यवस्था नरेशों के लिये की गई थी, उसी का पालन इस दरबार में किया गया।

    झालावाड़ राज्य का निर्माण कोटा राज्य में से किया गया था। झालावाड़ का महाराजराणा, अंग्रेजों का बनाया हुआ राजा था इसलिये राजपूताना के अन्य राजाओं ने उसे राजा मानने से मना कर दिया। इस पर अंग्रेज अधिकारियों ने महाराणा शंभुसिंह की सेवा में उपस्थित होकर निवेदन किया कि वे झालावाड़ के राजा को अपने पास बैठने का सम्मान दें ताकि राजपूताना के अन्य शासक उसे राजा मान लें। महाराणा शम्भूसिंह ने महाराजराणा को अपने दरबार में मोरछल, चवंर तथा अन्य राजकीय लवाजमे सहित आने की अनुमति दी और उसे अपने बायीं ओर बैठाकर कोटा के राजा जैसा सम्मान दिया।

    25 अक्टूबर 1870 को लॉर्ड मेयो नसीराबाद चला गया। उसके बाद अन्य राजा भी अपने-अपने राज्यों को चले गये। शाहपुरा नरेश नाहरसिंह, महाराणा शंभुसिंह से रुखसत लिये बिना ही अपनी जागीर शाहपुरा को प्रस्थान कर गया। इस पर महाराणा ने काछोला के पट्टे पर जब्ती भेजकर शाहपुरा नरेश की जागीर खालसा कर ली। अजमेर दरबार के कार्यों से निवृत्त होकर महाराणा शंभुसिंह पुष्करजी गया जहाँ उसने चांदी का तुलादान किया।

    ई.1870 में अजमेर आने से पूर्व लार्ड मेयो ने जयपुर का भी दौरा किया। जयपुर नरेश सवाई रामसिंह तथा भरतपुर के रेजीडेण्ट कर्नल वॉल्टर ने जागीरदारों और अंग्रेजों के लड़कों को अंग्रेजी शिक्षा देने के लिये जयपुर में राजकुमार कॉलेज खोलने का प्रस्ताव रखा। मेयो ने अजमेर में अंग्रेज अधिकारियों की अधिक संख्या देखते हुए अजमेर में राजकुमार कॉलेज खोलने की अनुमति दी। ई.1872 में अण्डमान जेल में लॉर्ड मेयो की हत्या के बाद इस स्कूल का नाम मेयो कॉलेज कर दिया गया।

    एजीजी का काम बढ़ा

    विलियम बैंटिक ने ई.1832 में तथा मेयो ने 1870 में अजमेर का दौरा किया था। इस प्रकार दोनों के दौरों में 38 साल का अंतर था किंतु ई.1870 के दशक में राजपूताना के शासकों और सामन्तों को सभ्य बनाने के उद्देश्य से ब्रिटिश नीति निर्धारित की गई कि वायसराय, एजीजी, वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारी एवं ब्रिटिश राजवंश के सदस्य, राजस्थान का भ्रमण करें तथा व्यक्तिगत सम्पर्क बढ़ायें। इसके बाद एजीजी साल में पांच महीने विभिन्न राज्यों में घूमने लगा। ब्रिटिश राज परिवार के सदस्य एवं वायसरॉय भी अब जल्दी-जल्दी अजमेर तथा उसके चारों ओर विस्तृत राज्यों का दौरा करने लगे।

    इन सभी दौरों में राजाओं तथा राज्याधिकारियों को ब्रिटिश सर्वोच्चता का अहसास बड़ी सावधानी से करवाया जाने लगा। जब ई.1870 के अजमेर दरबार में जोधपुर नरेश ने ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा बनाई गई व्यवस्था के अनुसार बैठने से मना कर दिया तो जोधपुर नरेश को तुरंत अजमेर से निकाल दिया गया। उसकी तोपों की सलामी घटा दी गई। उसके अपमान की घटना गजट में प्रकाशित करवाई गई तथा उस गजट की प्रति राजपूताना के प्रत्येक राजा को दी गई।

    लॉर्ड मेयो एक उदार प्रशासक था। उसने अजमेर में मेयो कॉलेज की स्थापना करके न केवल अजमेर अपितु सम्पूर्ण राजपूताना के विकास का नया मार्ग खोला। 8 फरवरी 1872 को अण्डमान की जेल में एक कैदी शेरअली द्वारा लॉर्ड मेयो की हत्या कर दी गई। वह अपनी अन्यायपूर्ण जेल के लिये अंग्रेज अधिकारियों को दोषी मानता था। मेयो के शव को आयरलैण्ड ले जाकर एक मध्यकालीन कब्रिस्तान में दफनाया गया।

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