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  • अजमेर का इतिहास - 48

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 48

    अट्ठारह सौ सत्तावन की रक्त-रंजित क्रांति


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    ई.1857 में देश में असफल रक्त-रंजित क्रांति हुई। अंग्रेजों ने इसे गदर, बगावत तथा सैनिक विद्रोह कहा। भारतीयों ने इसे सैनिक क्रांति कहा तथा वीर सावरकर ने इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहकर इसका अभिनंदन किया। इस क्रान्ति की पहली चिन्गारी 10 मई 1857 को मेरठ में प्रज्ज्वलित हुई। मेरठ और दिल्ली से यह चिन्गारी अजमेर पहुंची।

    अजमेर का तोपखाना बंगाल इन्फैण्ट्री की 15वीं रेजीमेंट के अधीन था। यह सेना कुछ समय पहले ही मेरठ से नसीराबाद आई थी। जिस समय विद्रोह हुआ, अजमेर-मेरवाड़ा का कमिश्नर कर्नल डिक्सन ब्यावर में था। उसने अजमेर मैगजीन (शस्त्रागार) को विद्रोहियों के हाथों में जाने तथा अजमेर को बचाने का निर्णय लिया। अजमेर का मैगजीन, अजमेर की सघन बस्ती के बिल्कुल निकट स्थित था तथा इसका भवन बहुत पुराना था। तोप का एक गोला उस भवन को ध्वस्त करने के लिये पर्याप्त था। इसमें इतना बारूद, शस्त्र, तोपें तथा राजकीय खजाना मौजूद था कि पूरे राजस्थान के विद्रोहियों को आपूर्ति करने के लिये पर्याप्त था।

    कर्नल डिक्सन ने अपने सहायक, ऑफिशियेटिंग सैकण्ड इन कमाण्ड लेफ्टिनेंट डब्लू कारनेल को रात्रि में ही ब्यावर से मेरवाड़ा बटालियन की दो कम्पनियों के साथ अजमेर के लिये रवाना किया ताकि यह रात में ही अजमेर पहुँचकर मैगजीन पर अधिकार कर ले। ले. कारनेल अगली प्रातः मैगजीन के समक्ष प्रकट हुआ। जब कारनेल ने ब्रिटिश ऑफीसर इन कमाण्ड से अपनी सेना सहित मैगजीन से बाहर जाने के लिये कहा तो ब्रिटिश ऑफीसर इन कमाण्ड ने मैगजीन खाली करने से मना कर दिया। इस पर ले. कारनेल ने उस पर दबाव बनाया और मैगजीन पर कब्जा करके 15वीं बंगाल इन्फैण्ट्री को मैगजीन से बाहर निकाल दिया। इसके बाद कारनेल अंग्रेज अधिकारियों के परिवारों को इस मैगजीन के भीतर ले आया और उसने मैगजीन की बुर्जों पर पुरानी तोपें चढ़ा दीं। इसके बाद कारनेल ने मैगजीन के बीचों बीच एक कुआं खोदा तथा पर्याप्त रसद जमा करके, किसी भी आपात् स्थिति के लिये तैयार होकर बैठ गया।

    जब 15वीं इण्डियन इनफैण्ट्री नसीराबाद पहुँची तो उनके साथियों ने उन्हें इस बात के लिये धिक्कारा कि उन्होंने निम्न जाति के मेर लोगों को मैगजीन सौंप दी।

    राजपूताना के एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल कर्नल जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस को 19 मई 1857 के दिन इस विद्रोह का समाचार मिला। उस दिन वह माउण्ट आबू में था। एजीजी ने कोटा कण्टिन्जेण्ट को भी अजमेर आने के लिये निर्देश दिया किंतु तब तक उसे आगरा भेजा जा चुका था। एजीजी ने नसीराबाद की हिन्दुस्तानी सेना को आतंकित करने के लिये डीसा की लाइट इन्फैन्ट्री को नसीराबाद भेजने की प्रार्थना की। 23 मई 1857 को लॉरेंस ने राजपूताना की समस्त रियासतों के राजाओं से अपील की कि वे अपने राज्यों में व्यवस्था बनाये रखें तथा अपनी सेनाओं को ब्रिटिश शासन की सहायता के लिये राज्यों की सीमा पर तैनात करें। 23 मई को ही डीसा से लाइट इन्फैण्ट्री नसीराबाद के लिये चल पड़ी। उसके साथ लाइट फील्ड तोपखाना भी था। इमसें पूरी तरह यूरोपियन सैनिक थे। लॉरेन्स ने अपने सहायक, कैप्टेन फोर्ब्स को इसके साथ नसीराबाद के लिये रवाना किया। 15वीं नेटिव इन्फैण्ट्री की ग्रेनेडियर कम्पनी को भी अजमेर भेजा गया तथा उसे अजमेर दुर्ग में तैनात किया गया ताकि डीसा से आने वाली लाइट इन्फैण्ट्री को मजबूती दी जा सके।

    नसीराबाद छावनी के बाहर यूरोपियन अधिकारियों के बंगले थे। छावनी क्षेत्र में एक असिस्टेण्ट कमिश्नर, एक सिविल सर्जन तथा उसकी पत्नी, गवर्नमेंट कॉलेज का प्रिंसीपल, उसका एक सहायक तथा आधा दर्जन नॉन कमीशन्ड अधिकारी तोपखाने के पास ही रहते थे।

    28 मई 1857 को नसीराबाद की दो रेजीमेन्ट्स में विद्रोह हुआ और सैनिकों ने शस्त्र उठा लिये। सबसे पहले 15 वीं रेजीमेन्ट ने ही विद्रोह किया जो बहुत उद्दण्ड तथा अनुशासनहीन मानी जाती थी। इसके सैनिकों को व्यंग्य से पुरबिया (पूर्व के रहने वाले) कहा जाता था। उन्होंने शस्त्रागार से बन्दूकें लूट लीं और सरकारी बगंलों तथा निजी आवासों में घुसकर जमकर लूटपाट की और उन्हें जला दिया। फर्स्ट बॉम्बे कैवेलरी तथा 30वी नेटिव इनफैण्ट्री भी नसीराबाद में नियुक्त थीं। इन्होंने भी अपने अधिकारियों का सहयोग करने से इन्कार कर दिया किंतु जब ब्रिटिश अधिकारियों के बच्चे नसीराबाद से अजमेर के लिये रवाना हुए तो फर्स्ट बॉम्बे कैवेलरी ने स्त्रियों तथा बच्चों को पूरी सुरक्षा प्रदान की।

    विद्रोहियों द्वारा इस टुकड़ी के दो अधिकारी मार डाले गये। कर्नल स्पॉट्सवुड को गोली मारी गई तथा कर्नल न्यूबरी को टुकड़ों में काट दिया गया। लेफ्टीनेंट लॉक तथा केप्टेन हार्डी को बुरी तरह से घायल कर दिया गया। यह हमला होते ही अंग्रेज अधिकारियों ने अजमेर की सड़क पकड़ी। 30वीं नेटिव इन्फैण्ट्री के कैप्टेन फेनविक ने नसीराबाद छोड़ने से मना कर दिया। इस पर कुछ वफादार सिपाहियों ने कैप्टेन से प्रार्थना की कि वह भी अजमेर चला जाये किंतु फेनविक ने मना कर दिया। सिपाही उसे मारना नहीं चाहते थे। इसलिये चार सिपाही उसे पकड़कर ले गये और छावनी के बाहरी छोर पर ले जाकर छोड़ दिया।

    अंग्रेज अधिकारी कुछ विश्वस्त भारतीय सैनिकों को अपने साथ लेकर अजमेर की तरफ चल दिये किंतु ब्रिगेडियर मकाउ के निर्देशों पर वे अजमेर न जाकर ब्यावर की तरफ मुड़ गये। 30वीं नेटिव इन्फैण्ट्री के 120 मजबूत सिपाही तथा एक भारतीय अधिकारी के सरंक्षण में ये अंग्रेज अधिकारी ब्यावर पहुँच गये। जैसे ही विद्रोही सैनिकों को ज्ञात हुआ कि अंग्रेज अधिकारी नसीराबाद छोड़कर चले गये, लूटपाट और आगजनी तेज हो गई। चर्च तथा अधिकारियों के बंगलों में आग लगा दी गई तथा खजाना लूट लिया गया। रात भर अधिकारियों के बंगलों में लूट चलती रही। उसके बाद दुकानों में लूट आरंभ हुई। विद्रोहियों ने सदर बाजार के कोने पर तोप लगा दी और धमकी दी कि यदि कोई उनके मार्ग में आया तो उसे तोप से उड़ा दिया जायेगा किंतु किसी को नहीं मारा गया न घायल किया गया। बंगाल नेटिव इन्फेंटरी के सैनिक लूट का धन लेकर दिल्ली की ओर कूच कर गये।

    आशा की जा रही थी कि बंगाल नेटिव इन्फेंटरी के सैनिक नसीराबाद लूटने के बाद अजमेर पर आक्रमण करेंगे किंतु उन्होंने अजमेर की बजाय दिल्ली का रास्ता पकड़ा। बंगाल नेटिव इन्फेंटरी के सैनिक अजमेर पर आक्रमण करने में क्यों असफल रहे, इस पर ट्रेवर ने कई तर्क दिये हैं। प्रथमतः उन्होंने नसीराबाद से लूट का इतना अधिक माल प्राप्त कर लिया था कि उनमें और अधिक धन प्राप्त करने की इच्छा ही नहीं रही थी। दूसरा तर्क यह दिया गया है कि अजमेर की मैगजीन लूटने का कार्य बड़ा कठिन था। तृतीयतः उन्हें इस बात का भय था कि डीसा से फौज न आ जाये क्योंकि 83वीं पैदल टुकड़ी को वहाँ से कूच करने के लिये लिखा जा चुका था। राजपूताना की तरफ से भी यूरोपीय सैन्य दल अजमेर की तरफ चल पड़ा था। चौथा तर्क यह दिया गया है कि उन्हें भय था कि अजमेर के धनी साहूकार कहीं ब्रिटिश अधिकारियों का साथ न दें क्योंकि साहूकारों एवं अंग्रेजों के हित एक समान थे। पंचम तर्क यह है कि बॉम्बे कैवेलरी के विद्रोही सैनिकों के साथ पत्नियां तथा बच्चे भी थे इसलिये वे उनके प्राणों का खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे।

    विद्रोही सैनिक द्रुतगति से कूच करते गये। लूट के सामान से लदे होने तथा खराब सड़कों के उपरांत भी उन्होंने लम्बी यात्रा जारी रखी। उनके साथ उनकी बीमार स्त्रियां, बच्चे तथा बहुत सारा सामान भी था अतः लूटे जाने की आशंका के बावजूद वे तेजी से आगे बढ़ रहे थे। उन्हें लूट का एक भाग रास्ते में ही छोड़ देना पड़ा था।

    अजमेर के असिस्टेण्ट कमिश्नर ले. वॉल्टर्स तथा राजपूताना की फीर्ल्ड फोर्सेज के डिप्टी असिस्टेण्ट क्वार्टर मास्टर जनरल ले. हीथकोट ने विद्रोहियों का पीछा किया। उनके साथ एक हजार सिपाही थे। यह टुकड़ी राज ट्रूप्स कहलाती थी। इसमें निकटवर्ती जयपुर तथा जोधपुर रियासतों के सैनिक थे। इन सैनिकों ने विद्रोहियों पर आक्रमण नहीं किया। इन्होंने इस बात को छिपाया भी नहीं कि उन्हें विद्रोहियों से सहानुभूति है क्योंकि उन्हें विश्वास था कि ब्रिटिश लोग उनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहे थे।

    जिस असाधारण तेजी से विद्रोही दिल्ली की तरफ बढ़ रहे थे, उसका एक कारण नसीराबाद की विद्रोह पूर्ण घटना थी। कार्नेल, जो उस समय अजमेर में सुरक्षा का सैन्य अधिकारी था, अंदर बाहर के खतरों के बावजूद दिन रात जागते हुए तेजी से आगे बढ़ रहा था। उस समय वह काफी हताश भी था। उसने जोधपुर के महाराजा द्वारा भेजी गयी विशाल सेना को भी अजमेर में रहने की अनुमति नहीं दी। अजमेर की स्थिति का लाभ न उठाकर विद्रोही सेना तेजी से दिल्ली की तरफ बढ़ती ही चली गई।

    12 जून को लाइट इन्फैण्ट्री डीसा से नसीराबाद पहुँच गई। अजमेर से 100 मील की दूरी पर एरिनपुरा छावनी में अनयिमित सेना थी जिसे जोधपुरी लीजियन कहा जाता था। इसके अतिरिक्त ब्रिटिश अधिकारियों के अधीन दो स्थानीय कोर थे जिनमें से एक भील कोर थी जिसमें सैनिकों की भरती उदयपुर के निकट रहने वाले भीलों से की गई थी। दूसरी सेना खेरवाड़ा की मेरवाड़ा बटालियन थी जिसकी भरती कर्नल डिक्सन के द्वारा की गई थी। ये दोनों सेनायें अंग्रेजों के प्रति स्वामिभक्त बनी रहीं। जब फर्स्ट बंगाल इंफैण्ट्री ने विद्रोह किया तो भील कोर ने उसे विफल कर दिया।

    विद्रोहियों के दिल्ली रवाना होने के कुछ दिन बाद 12वीं बॉम्बे नेटिव इन्फैण्ट्री की इकाई, जोधपुर लीजियन की इकाई, सैकेण्ड बॉम्बे नेटिव इन्फैण्ट्री, तीन तोपें, बॉम्बे हॉर्स आर्टिलरी तथा हिज मैजस्टी की 83वीं बटालियन के 200 सिपाहियों ने नसीराबाद पहुँचकर स्थानीय लोगों को अभयदान दिया। (बॉम्बे हॉर्स आर्टिलरी एवं हिज मैजस्टी की 83वीं टुकड़ी में केवल यूरोपीयन सैनिक ही होते थे।) जो अंग्रेज अधिकारी विद्रोह के दिन नसीराबाद छोड़कर ब्यावर चले गये थे, वे इन टुकड़ियों के साथ नसीराबाद लौट आये।

    12 जून को फर्स्ट बॉम्बे लांसर्स का एक घुड़सवार घोड़े पर सवार होकर अपने सैनिकों की पंक्ति के समक्ष खड़ा हो गया तथा उसने अपने साथियों को विद्रोह के लिये आमंत्रित किया। बॉम्बे लांसर्स ने उसका पीछा किया, विद्रोही ट्रूपर, 12वीं बॉम्बे नेटिव इन्फैण्ट्री की पंक्तियों में भाग गया जहाँ उसे शरण मिल गई। ब्रिगेडियर हेनरी मकाउ ने 12वीं बॉम्बे नेटिव इन्फैण्ट्री को बैरकों से बाहर आने के आदेश दिये। इस पर केवल 40 सैनिक बाहर आये। ब्रिगेडियर ने तोपें मंगवा लीं तथा 83वीं पैदल टुकड़ी को उन्हें दण्डित करने का निर्देश दिया। थोड़ी देर में ही विद्रोही घुड़सवार को एक तोपची ने मार गिराया। उसके पांच विद्रोही साथियों को फांसी पर चढ़ा दिया गया। तीन को आजीवन कारावास दिया गया तथा पच्चीस सैनिकों के हथियार छीनकर दूसरे सैनिकों को दे दिये गये।

    एजीजी तथा पोलिटिकल एजेंट ने जोधपुर महाराजा से, बागी सिपाहियों को मारवाड़़ में न घुसने देने की प्रार्थना की। पोलिटिकल एजेंट मॉन्क मैसन की प्रार्थना पर जोधपुर नरेश तख्तसिंह ने 2000 सैनिक तथा 6 तोपें लेफ्टिीनेंट कारनेल की सहायता के लिये अजमेर भिजवाई। यह सेना अजमेर में आनासागर के किनारे रही। इसे मैगजीन में प्रवेश नहीं करने दिया गया। कुचामन का ठाकुर केसरीसिंह भी अपने सैनिकों को लेकर अजमेर पहुँचा तथा कई सप्ताह तक अजमेर मैगजीन में रहा।

    जब 16 जून को पंवार अनाड़सिंह और महता छत्रसाल आदि उस सेना का वेतन बांटने को भेजे गए, तब वहाँ के अंग्रेज अधिकारियों ने आनासागर तक सामने आकर इनका सत्कार किया। इसके बाद ये लोग ब्यावर जाकर एजीजी से मिले। उसके सेक्रेटरी ने भी उसी प्रकार आगे आकर इन्हें मान दिया। जब विद्रोही आउवा में एकत्रित हुए तब एजीजी ने अजमेर से अंग्रेजी सेना साथ लेकर, आउवा पर चढ़ाई की। इसी समय जोधपुर का पॉलिटिकल एजेन्ट कैप्टिन मेसन आउवा के लिये रवाना हुआ। अपने दुर्भाग्य से कैप्टिन मेसन अंग्रेजी सेना के बदले बागियों की सेना मे जा पहुँचा। उसे अकेला पाकर बागियों ने उसे मार डाला। इसके बाद आसोप ठाकुर शिवनाथसिंह ने हमला कर अंग्रेजी सेना की बहुत सी तोपे छीन लीं। इससे अंग्रेजी फौज, मैदान छोड़ आंगदोस की तरफ हट गई। वहाँ से एजीजी अजमेर चला गया।

    इस विद्रोह से कर्नल डिक्सन को इतना आघात पहुँचा कि 25 जून 1857 को उसका ब्यावर में निधन हो गया। सर हेनरी लॉरेंस ने अजमेर मेरवाड़ा के कमिश्नर का कार्यभार संभाला। इस समय तक मैगजीन भवन की मरम्मत कर ली गई थी तथा उसे पर्याप्त मजबूत बना लिया गया था। इसमें छः माह की रसद जमा कर ली गई थी। एजीजी कर्नल लॉरेंस ने अब अजमेर को ही अपना मुख्यालय बना लिया। वह मैगजीन के निकट रहने लगा। उसकी सुरक्षा के लिये उसके निवास के चारों ओर मेर रेजीमेंट नियुक्त की गई। उसने नसीराबाद तथा ब्यावर का लगातार दौरा करके तीनों स्थानों पर शांति स्थापित की।

    3 जून 1857 को नीमच में विद्रोह हुआ। उसे दबाने के लिये 10 जुलाई 1857 को कर्नल लॉरेंस ने नसीराबाद से हर मेजस्टी की 83वीं रेजीमेंट के 100 सैनिक, 12वीं बॉम्बे नेटिव इन्फैण्ट्री के 200 सैनिक, सैकेण्ड बॉम्बे कैवलेरी का एक स्क्वैड्रन तथा अजमेर मैगजीन से दो तोपें नीमच भेजीं। 9 अगस्त 1857 को अजमेर जेल में विद्रोह हुआ तथा पचास आपराधिक बंदी भाग छूटे। अजमेर की घुड़सवार पुलिस ने इन अपराधियों का पीछा किया तथा पकड़कर बेरहमी से काट डाला। इस प्रकार कुछ ही समय में अजमेर तथा नसीराबाद में हुए विद्रोह को पूरी तरह दबा दिया गया।

    अजमेर नगर, अजमेर स्थित मैगजीन तथा सरकारी कोष की रक्षा केवल इसलिये संभव हो सकी थी क्योंकि ले. कारनेल विद्रोह की सूचना मिलते ही रातों रात ब्यावर से चलकर अजमेर पहुँच गया था तथा मैगजीन को अपने अधिकार में लेने में सफल रहा था। उसकी सफलता में मेरों की स्वामिभक्ति की बहुत बड़ी भूमिका थी। ब्रिगेडियर जनरल लॉरेंस ने भारत सरकार को 1858 में एक पत्र लिखा कि अजमेर के महत्त्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। इसकी महत्ता राजपूताना के लिये वही है जो भारत के लिये दिल्ली की है। ले. प्रिचार्ड का मानना था कि यदि अजमेर का पतन हो जाता तो राजपूताना की रियासतों का भी पतन हो जाता और ब्रिटिश हितों तथा ब्रिटिश सत्ता की भी समाप्ति हो जाती।

    नाना साहब पेशवा नाग पहाड़ियों में

    ई.1857 की सैनिक क्रांति के दिनों में नाना साहब पेशवा ने कुछ समय अजमेर की नाग पहाड़ियों में छिपकर व्यतीत किया।

    डिप्टी कमिश्नर की नियुक्ति

    ई.1857 में नोर्थ-वेस्ट प्रोवीन्स सरकार तथा एजेन्ट टू गवर्नर जनरल राजपूताना के अधीन अजमेर-मेरवाड़ा के पहले डिप्टी कमिश्नर की नियुक्ति की गईं और कैप्टेन बी. पी. लॉयड को इस पद पर लगाया गया। लॉयड ई. 1849 से 1853 तक कर्नल डिक्सन का सहायक रहा था। लॉयड शीघ्र ही अवकाश पर चला गया और उसकी अनुपस्थिति में कैप्टेन जे. सी. ब्रुक ने उसका कार्य संभाला। वह फरवरी 1859 तक इस पद पर कार्य करता रहा। ई.1857 में सरोठ तथा राजगढ़ की तहसीलें समाप्त कर दी गयीं।

    अजमेर में बाढ़

    16 जुलाई 1858 से 1 अगस्त 1858 तक अजमेर जिले में भारी वर्षा हुई जिससे सारे तालाब भर गये तथा उनमें से कई तालाब टूट गये। आनासागर ओवरफ्लो हो गया। उसके किनारे बने हुए घरों में पानी घुस गया। इस अतिवृष्टि से खरीफ की फसल असफल हो गई।

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