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  • अजमेर का इतिहास - 47

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 47

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा अजमेर में शिक्षा का विकास


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    ईस्ट इण्डिया कम्पनी के आने से पहले अजमेर में कई पाठशालायें, पोसालें, उपासरे, मकतब तथा मदरसे थे। चटशालाओं तथा पोसालों में हिन्दू बच्चों को तथा मकतबों में मुस्लिम बच्चों को प्राथमिक स्तर की शिक्षा दी जाती थी। पाठशालाओं में हिन्दू बच्चों को, उपासरों में जैन बच्चों को तथा मदरसों में मुस्लिम बच्चों को उच्च स्कूली शिक्षा दी जाती थी। इन सभी स्कूलों में बच्चों के व्यक्तित्व विकास पर अधिक जोर दिया जाता था।

    उन्हें उच्च चारित्रिक शिक्षा, नैतिकता और संस्कारों की शिक्षा दी जाती थी। जिस समय अंग्रेजों ने राजपूताना रियासतों से 'अधीनस्थ सहायक संधियां' की तथा सिंधिया से अजमेर प्राप्त किया, उस समय तक मराठे, राजपूताने के सभ्य जीवन को बुरी तरह से कुचल कर नष्ट कर चुके थे। स्थिति यहाँ तक खराब थी कि जयपुर रियासत का योग्यतम व्यक्ति माना जाने वाला दीवान नाजिम मोहनराम एक भी अक्षर लिखना नहीं जानता था तथा ठीक से कुछ भी नहीं पढ़ सकता था। इसलिये अजमेर के अधीन होते ही मारकीस ऑफ हेस्टिंग्स (ई.1813-23) जिसे लॉर्ड मोयरा भी कहा जाता है ने ई.1819 में ही अजमेर में स्कूल खोलने की तरफ ध्यान दिया।

    ई.1819 में अजमेर के ब्रिटिश रेजीडेंट सर डेविड ऑक्टरलोनी के अधीन, क्रिश्चियन मिशनरी जुबेज कैरे को अजमेर-मेरवाड़ा का पहला सुपरिंटेण्डेण्ट ऑफ एज्यूकेशन निुयक्त किया गया।कैरे की नियुक्ति लॉर्ड मोयरा द्वारा गैर सरकारी तौर पर 200 रुपये प्रतिमाह के वेतन पर की गई थी। जुबेज कैरे का पिता डॉ. विलियम कैरे, सीरमपुर का प्रसिद्ध बपतिस्त मिशनरी था। कैरे ने मई 1819 में 47 बच्चों के साथ, अजमेर में पहला लेंकैस्टेरियन स्कूल खोला। उसी साल पुष्कर में भी 37 बच्चों के साथ दूसरा स्कूल खोला गया। इन स्कूलों में अंग्रेजी शिक्षा के साथ-साथ ईसाई धर्म की भी शिक्षा दी जाती थी जिससे लोगों में यह भय फैल गया कि इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को धर्म परिवर्तन के लिये कलकत्ता भेजा जायेगा।

    जुबेज कैरे ने सरकार को लिखित में वचन दिया था कि वह धर्म परिवर्तन नहीं करेगा फिर भी उसका उद्देश्य ठीक नहीं था। वह हिन्दुस्तान के लोगों को जंगली मुर्गा समझता था और उनमें क्राइस्ट के गोस्पल (ईसा मसीह के सिद्धांत )का प्रचार करना चाहता था। इसलिये उसने लॉर्ड हेस्टिंग्स द्वारा निषेध किये जाने के बाद भी अपने स्कूलों में ईसाई शिक्षाओं, न्यू टेस्टामेंट्स एवं गोस्पल को सम्मिलित किया। इससे लोगों में सरकार के खिलाफ अंसतोष बढ़ रहा था। गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स द्वारा ब्रिटिश रेजीडेंट को लिखे एक पत्र में कहा गया कि खेदपूर्ण बात है कि आदरणीय कैरे ने हाल ही में राजपूताना जैसे समाज में, अपनी संस्थाओं में अत्यंत अन्याय पूर्वक ढंग से अत्यंत आपत्तिजनक पाठ्यक्रम आरंभ किया है। इसने लोगों के मस्तिष्क में ब्रिटिश अधिकारियों के उद्देश्यों के प्रति चेतावनी की घण्टी बजा दी है। सरकार ने जुबेज कैरे को निर्देश दिये कि वह अपने अधीन समस्त स्कूलों में सभी प्रकार की धार्मिक शिक्षा बंद कर दे।

    फरवरी 1822 में जुबेज कैरे का वेतन बढ़ाकर 300 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया। अप्रेल 1822 में भिनाय में तथा मई 1822 में केकड़ी में भी ऐसे ही स्कूल खोले गये। जनवरी 1824 में इन समस्त स्कूलों को गवर्नर जनरल (लॉर्ड एमहर्स्ट) द्वारा नियुक्त जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इन्सट्रक्शन्स कलकत्ता के अधीन कर दिया। ई.1827 तक इन स्कूलों में बच्चों की संख्या बहुत कम रही। इसलिये भारत सरकार ने पुष्कर, केकड़ी एवं भिनाय के स्कूल बंद कर दिये जबकि अजमेर का स्कूल 200 बच्चों के साथ चलता रहा। अंत में लोगों के लगातार असहायोग एवं विरोध के चलते यह स्कूल भी ई.1831 में बंद हो गया।

    7 मार्च 1835 को गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियिम बैंटिक द्वारा मैकाले के दृष्टिकोण को अंगीकार कर लिया गया तथा अंग्रेजी को ही भारत में शिक्षा का बेहतर माध्यम माना गया। ई.1836 में अजमेर में ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा आधिकारिक रूप से राजपूताने का पहला अंग्रेजी कॉलेज खोला गया। वास्तव में यह एक स्कूल था किंतु इसे कॉलेज नाम दिया गया। इसका नियंत्रण, जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इन्सट्रक्शन्स बंगाल के अधीन रखा गया। इस स्कूल के लिये समुचित शिक्षित मि. कारकस हारे को नसीराबाद छावनी से लाकर, कम वेतन पर हैडमास्टर रखा गया। उसकी सहायता के लिये दो भारतीय अध्यापक हिन्दी तथा उर्दू पढ़ाने के लिये रखे गये। इस स्कूल में किसी बच्चे को फीस नहीं चुकानी पड़ती थी। इसलिये यह स्कूल तीन साल में ही जम गया।

    ई.1837 में इस स्कूल में 219 बच्चे पढ़ते थे जिनकी संख्या ई.1840 में घटकर 143 रह गई। 76 बच्चे विविध कारणों से स्कूल छोड़कर चले गये। ई.1842 में इस स्कूल में बच्चों की शिक्षा 171 हो गई जिनमें से 125 हिन्दू बच्चे थे, 41 मुस्लिम बच्चे थे तथा 5 ईसाई बच्चे थे। ई.1842 की परीक्षाओं में 171 में से केवल 70 लड़के ही परीक्षा देने के लिये उपस्थित हुए। शेष लड़कों ने लज्जाजनक तरीका अपनाते हुए परीक्षाओं से मुक्ति प्राप्त कर ली। इसके तीन कारण थे। पहला तो यह कि परीक्षा के परणिाम बहुत ही खराब रहते थे। दूसरा यह कि ये लड़के परीक्षा के लिये फीस नहीं देना चाहते थे तथा तीसरा यह कि उस समय अजमेर में अकाल पड़ा हुआ था। इस अकाल के कारण 1 जनवरी 1843 को यह स्कूल भी बंद कर दिया गया।

    अजमेर में स्कूल चलाने के सरकारी प्रयास इसलिये भी सफल नहीं हुए क्योंकि स्थानीय लोग इन स्कूलों के उद्देश्य को संदेह की दृष्टि से देखते थे। लोगों में अपनी शिक्षा पद्धति को विकसित करने की मानसिकता जोर पकड़ती जा रही थी। कर्नल सदरलैण्ड का मत था कि मौजूदा व्यवस्था के साथ ही सहयोग करना चाहिये।

    ई.1846-47 की सर्दियों में नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंस के ले. गवर्नर थॉमसन अजमेर आये। उन्होंने इस यात्रा में अजमेर में फिर से स्कूल खोलने का प्रस्ताव दिया। उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जयपुर आदि रियासतों में अंग्रेजी स्कूल चल रहे थे किंतु राजपूताना के केन्द्र में तथा ब्रिटिश क्षेत्र में होने के बावजूद अजमेर में कोई स्कूल नहीं चल रहा था। उन्होंने गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग्ज को अपना सुझावा भेजा कि अजमेर को अंग्रजी शिक्षा में पहल करनी चाहिये तथा अन्य रियासतों के लिये आदर्श स्थापित करना चाहिये।

    इस समय तक देशी जनता में अंग्रेजी की शिक्षा तथा स्वतंत्र शिक्षा के प्रति मांग उठने लगी थी तथा इस समय नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंस में शिक्षण कार्य के विस्तार की शक्तियां आगरा की स्थानीय सरकार को दी जा चुकी थीं। अतः अजमेर में, बंगाल की बजाय आगरा से शैक्षिक कार्य का नियंत्रण अधिक अच्छी तरह से हो सकता था। यह अनुभव किया गया कि नये कॉलेज की स्थापना पर 40 हजार रुपये प्रतिवर्ष का व्यय आयेगा तथा इसके भवन को बनाने के लिये 5 हजार रुपये का खर्च आयेगा। अतः कोष की कमी के कारण इस परियोजना को छोड़ दिया गया। मि. थॉमसन ने सुझाव दिया कि इस कार्य के लिये देशी राज्यों से चंदा लिया जाये किंतु लॉर्ड रीडिंग ने यह कहकर यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया कि ऐसा करना शोभनीय नहीं होगा क्योंकि 40 हजार रुपये में से अधिकांश रुपया यूरोपीय अध्यापकों के वेतन पर व्यय होगा। इस प्रकार काफी लम्बे विचार-विमर्श के बाद 19 फरवरी 1848 को नये स्कूल की स्वीकृति हो गई तथा यह निर्णय लिया गया कि इसे कॉलेज के रूप में विस्तारित करने का कार्य भविष्य पर छोड़ दिया जाये।

    अजमेर के सुपरिण्टेण्डेण्ट ले.कर्नल डिक्सन को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया गया कि अजमेर में नया स्कूल खोलने के लिये लोगों को विश्वास में लिया जाये। डिक्सन ने जवाब दिया कि अजमेर के लोग उस प्रकार का स्कूल खोलने में सहयोग देने को उत्सुक हैं जिस प्रकार के 17 देशी स्कूल पहले से ही अजमेर में चल रहे हैं जिनमें 493 बच्चे पढ़ रहे हैं। साथ ही लाला बृंदाबनलाल ने पहले से ही अजमेर में एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल खोल दिया है। लाला बृंदाबनलाल अजमेर में पोस्ट मास्टर था।

    अंत में ब्रिटिश सरकार ने अजमेर में स्कूल खोलने का निर्णय ले लिया। इसके लिये पुराना कचहरी घर उपलब्ध करवाया गया। एक सुशिक्षित सज्जन डॉ. बुच को 400 रुपये मासिक के वेतन पर स्कूल का सुपरिण्टेंडेंट नियुक्त किया गया। उनके साथ जी विगिन्स, सुखदेव बुक्स, रामा चंद मुकर्जी, मौलवी मोहम्मद मुजुर, मुंशी मीर अली, पण्डित देवदत्त एवं पण्डित रसिक लाल को भी अध्यापक नियुक्त किया गया। मि. विगिन्स को 250 रुपये मासिक वेतन दिया गया जबकि भारतीय शिक्षकों को 26 रुपये से 80 रुपये के बीच वेतन दिया गया। 25 मार्च 1851 को अजमेर स्कूल को मान्यता दी गई। एजीजी कर्नल जॉन लो की अध्यक्षता में एक स्थानीय समिति का गठन किया गया जिसमें कुल पांच सदस्य थे। इनमें से मौलवी मुजीदुद्दीन (यह अजमेर का सदर अमीन था।) एक मात्र भारतीय सदस्य था। इस समिति ने छात्रों से चार आना से लेकर एक रुपया मासिक तक का शुल्क निर्धारित किया। प्रवेश शुल्क को कुछ समय के लिये स्थगित कर दिया गया।

    अजमेर स्कूल ने तेजी से उन्नति की। ई.1851 में इसमें 230 लड़के पढ़ते थे। कुछ ही सालों में उनकी संख्या 340 हो गई। ई.1861 में इस स्कूल को हाई स्कूल एण्ट्रेस एग्जाम के लिये कलकत्ता यूनिवर्सिटी से सम्बद्ध कर दिया गया। 17 फरवरी 1868 को इसे कला विषय के इण्टमीडियेट कॉलेज में क्रमोन्नत कर दिया गया तथा इसे कलकत्ता यूनिवर्सिटी से ही सम्बद्ध रखा गया। इस प्रकार यह राजपूताना में अंग्रेजी शिक्षा का पहला कॉलेज बन गया।

    कर्नल डिक्सन ने अजमेर मेरवाड़ा क्षेत्र की जनता पर एज्यूकेशनल सेस लगाया। इससे लोगों में तीव्र असंतोष उत्पन्न हुआ। डिक्सन की मृत्यु के बाद 1857 में इस कर का इतना उग्र विरोध हुआ कि वे समस्त स्कूल बंद रखे गये जिन्हें सरकारी सहायता नहीं मिलती थी। इस कारण ई.1859 में यह कर हटा दिया गया तथा अजमेर-मेरवाड़ा के 12 कस्बों में स्थित स्कूलों को 44-44 रुपये की सहायता दी गई।

    ई.1854 में वुड्स डिस्पैच ने पश्चिमी शिक्षा के साथ-साथ देशी भाषा को भी बराबर के महत्त्व के साथ पढ़ाये जाने की पद्धति विकसित की। इस प्रकार यूरोपीय ज्ञान को देशी भाषाओं के माध्यम से आम आदमी तक पहुँचाया गया। इसी क्रम में अजमेर के आसपास के गांवों में वर्नाक्यूलर प्राइमरी स्कूल खोले गये। इनके ऊपर एंग्लो वर्नाक्यूलर हाई स्कूल खोले गये तथा जिला स्तर पर इनसे सम्बद्ध महाविद्यालय खोले गये।

    ई.1856 में अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र में लगभग 500 देशी स्कूल चलते थे। अजमेर के स्कूल अधीक्षक ने इन पाठशालाओं को बच्चों के व्यक्तित्व विकास की दिशा में अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी बताया। ब्रिटिश अधिकारियों एडम मुनरो, एल्फिंस्टन, वुड एवं हण्टर आदि अंग्रेज अधिकारियों ने भी इन पाठशालाओं को बनाये रखने एवं उनका विकास करने की वकालात की थी। आगे चलकर ई.1870-71 ई. में मि. डी मिलो ने सुझाव दिया कि इन स्कूलों को सरकार द्वारा न्यायपूर्वक नियंत्रित एवं विकसित किया जाना चाहिये तथा इन्हें सरकारी सहायता दी जानी चाहिये।

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