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  • अजमेर का इतिहास - 46

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 46

    पॉलिटिकल अधिकारियों द्वारा सामाजिक बुराइयों का निषेध


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    राजपूताना रियासतों में कन्यावध प्रथा, स्त्रियों के व्यापार की प्रथा, डाकन प्रथा, राजपूतों में विवाह के अवसर पर त्याग एवं टीके की प्रथा तथा सती प्रथा जैसी बुराइयां व्याप्त थीं। ई.1818 में समस्त राज्यों को ईस्ट इण्डया कम्पनी द्वारा सहायक संधियों के माध्यम से अपने चंगुल में फांस लिये जाने के बाद ये बुराइयाँ अपने चरम पर पहुँच गईं।

    सती प्रथा पर रोक

    ई.1829 में लॉर्ड विलियम बैंटिक ने ब्रिटिश भारत में सती प्रथा को गैर कानूनी घोषित करके भारत में अंग्रेजों की नई सामाजिक नीति की शुरुआत की किंतु राजपूताना में सती प्रथा पर रोक का प्रभाव न के बराबर था। अंग्रेज अधिकारी इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहते थे क्योंकि उन्हें भय था कि यदि सख्ती की गई तो यह प्रथा घटने की बजाय बढ़ जायेगी। इसलिये अजमेर का एजीजी भारत सरकार को उन रियासतों की रिपोर्टें भिजवाता रहा जिनमें सती की घटनायें स्वतः ही कम हो रही थीं।

    जनवरी 1832 में विलियम बैंटिक ने अजमेर दरबार के दौरान राजस्थान के शासकों एवं ब्रिटिश अधिकारियों को नयी सामाजिक नीति को राजस्थान में अपनाने के लिये प्रेरित किया। ई.1846 में एजीजी ने पहली बार राज्यों के पोलिटिकल एजेंटों को निर्देश दिये कि वे अपने-अपने राज्यों में सती प्रथा के विरुद्ध कानून बनवायें। ई.1854 से 1859 के बीच राजपूताना के एजीजी तथा मेवाड़ के पॉलिटिकल एजेंट ने महाराणा को सती प्रथा पर रोक लगाने के लिये कई बार प्रेरित किया किंतु महाराणा ने सती प्रथा को दण्डनीय नहीं बनाया। अंत में ई.1860 में महाराणा स्वरूपसिंह ने इसे प्रतिबंधित किया तथा इसके साथ ही पूरे राजस्थान में सती प्रथा पर रोक लग गई।

    कन्यावध प्रथा पर रोक

    ई.1834 में पहली बार कोटा राज्य में कन्यावध को विधि विरुद्ध घोषित किया जा सका। ई.1844 में राज

    पूताना के एजीजी सदरलैण्ड, जयपुर में पोलिटिकल एजेंट लुडलो तथा नीमच के पॉलिटिकल एजेण्ट रॉबिन्सन के संयुक्त प्रयासों से राजपूताना के समस्त राज्यों में कन्यावध को प्रतिबंधित कर दिया गया।

    डाकन प्रथा पर रोक

    अक्टूबर 1853 तक एजीजी के निर्देश पर महाराजा मेवाड़ को छोड़कर समस्त शासकों ने डाकन प्रथा को गैर कानूनी करार देकर असहाय की सहायता के लिये प्रेरित किया।

    दास प्रथा पर रोक

    1839 में जयपुर राज्य की संरक्षक परिषद के अध्यक्ष ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट ने जयपुर राज्य में दास व्यापार को न केवल प्रतिबंधित किया बल्कि दासों के गोला-गोली जैसे अपमान जनक सम्बोधन पर भी रोक लगा दी थी। 1 दिसम्बर 1840 को जोधपुर राज्य में भी दास व्यापार को प्रतिबंधित कर दिया गया।

    लड़के-लड़कियों के क्रय-विक्रय पर रोक

    1847 में राजस्थान के सभी राज्यों ने लड़के-लड़कियों की खरीद बेच को गैर कानूनी घोषित कर दिया था। 5 फरवरी 1847 को जयपुर संरक्षण परिषद ने जयपुर राज्य में नागाओं, दादूपंथियों, सादों इत्यादि द्वारा चेला बनाने के लिये की जाने वाली बच्चों की खरीद को गैरकानूनी करार दे दिया।

    समाधि प्रथा पर रोक

    अंग्रेज अधिकारियों ने समाधि प्रथा पर रोक लगाने के लिये प्रयास आरंभ किये। हाड़ौती के पॉलिटिकल एजेंट कैप्टेन रिचार्ड ने 28 अप्रेल 1840 को एक परिपत्र द्वारा कोटा, बूंदी एवं झालावाड़ के शासकों को समाधि जैसी अमानवीय प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की इच्छा प्रकट की।

    जॉन लुडलो जुलाई 1844 में जयपुर में इसे प्रतिबंधित करवाने में सफल रहा। एवं इसी प्रकार कैप्टेन मैलकम ने ई.1847 में जोधपुर राज्य में समाधि पर प्रतिबंध लगवाने में सफलता प्राप्त की। धीरे-धीरे इस प्रथा पर सम्पूर्ण राजस्थान में ही रोक लगा दी गयी। ई.1861 में समाधि के लिये भी उसी सजा का प्रावधान किया गया जो सती प्रथा को प्रोत्साहित करने के अपराध के बदले दी जाती थी।

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