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  • अजमेर का इतिहास - 45

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 45

    उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में राजपूताने का प्रशासनिक परिदृश्य


    पॉलिटिकल एजेंट पद की उत्ति

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    18वीं शताब्दी के मध्य में जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी बंगाल में व्यापारिक कम्पनी के स्थान पर राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने लगी तब रेजीडेंसी अथवा पॉलिटिकल एजेंसी प्रचलन में आई। 14 दिसम्बर 1764 को कॉमर्शियल रेजीडेंट विलियम वाट्स के स्थान पर सैम्मुअल मिडल्टन को बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद के दरबार में पहला रेजीडेंट नियुक्त हुआ। उसने कम्पनी के राजनीतिक हितों को बहुत लाभ पहुँचाया। इसके बाद भारतीय राजदरबारों में रेजीडेंट्स को नियुक्त करने की परम्परा आरंभ हुई। भारतीय राजाओं ने ब्रिटिश पॉलिटिकल ऑफीसर को अपने दरबार में नियुक्त किया जाना अपनी शक्ति में वृद्धि होने तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी से अच्छे सम्बन्ध होने का प्रतीक माना क्योंकि अब तक समस्त भारतीय नरेश, ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सैन्य शक्ति से अच्छी तरह परिचित हो चुके थे। राजपूताने में इस तरह की पहली नियुक्ति ई.1818 में हुई जब कैप्टेन जेम्स टॉड को मेवाड़ तथा हाड़ौती का पॉलिटिकल एजेंट नियुक्त हुआ।

    पॉलिटिकल एजेंटों के कारनामे

    पॉलिटिकल एजेंटों ने राज्यों में शासन की वास्तविक शक्तियाँ हड़प लीं। उन्होंने कितने ही राजाओं को अपदस्थ करवाया, कितने ही राजकुमारों को उत्तराधिकार से वंचित किया, कितनी ही रानियों का मान मर्दन किया।

    राजपरिवार के कितने ही सदस्यों की हत्याएँ करवाईं। ई.1820 में राजपूताने के रेजीडेण्ट ऑक्टरलोनी ने महाराणा भीमसिंह की इच्छा के विरुद्ध उदयपुर राज्य के अधीन आने वाला मेरवाड़ा क्षेत्र ब्रिटिश शासित प्रदेश में मिला लिया। ई.1843 में कैप्टेन लडलो ने जोधपुर महाराजा मानसिंह की इच्छा के विरुद्ध नाथों को पकड़ कर अजमेर भिजवा दिया। ई.1835 में जयपुर के 16 माह के शिशु राजा रामसिंह को अंग्रेजों ने अपने संरक्षण में ले लिया जिससे जयपुर राज्य में बड़ी उत्तेजना फैली तथा अंग्रेज अधिकारी मि. ब्लैक की हत्या कर दी गयी। ई.1838 में कोटा नरेश रामसिंह तथा झाला जालिमसिंह के वंशज मदनसिंह के झगड़े को समाप्त करने के लिये कोटा राज्य में से कुछ हिस्सा अलग करके झालावाड़ रियासत का निर्माण किया गया ई.1845 में अंग्रेजों ने डूंगरपुर के राजा जसवंतसिंह को पदच्युत करके वृंदावन भेज दिया तथा उसके स्थान पर दलपतसिंह को शासक बना दिया।

    अजमेर का प्रशासन

    राजपूताना की रियासतों पर कड़ा नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से अजमेर को ब्रिटिश शासन के प्रत्यक्ष अधीन रखा गया। अजमेर प्रांत का प्रशासन राजपूताना के एजीजी के अधीन रखा गया। राजपूत रियासतों तथा अजमेर-मेरवाड़ा की संलग्नता तथा भौगोलिक निरंतरता, जागीरदारों की उपस्थिति तथा देशी शासकों पर नियंत्रण की समस्याओं के मिश्रण के कारण अजमेर के प्रशासन में जटिलता उत्पन्न हो गई। चूंकि देशी राजाओं के साथ ब्रिटिश सम्बन्धों के नियंत्रण का काम एजीजी को करना था, इसलिये अजमेर का सामान्य प्रशासन भी एजीजी के अधीन रखना ही उचित समझा गया।

    राजाओं की वरिष्ठता का क्रम

    निर्धारित ई.1842 में राजपूताना के एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल जेम्स सदरलैण्ड ने राजपूताना के शासकों की वरिष्ठता का क्रम निर्धारित किया। यह क्रम इस प्रकार से था- उदयपुर, जोधपुर, जयपुर, बूंदी, कोटा, बीकानेर, जैसलमेर, भरतपुर, अलवर, किशनगढ़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, करौली, सिरोही, धौलपुर, टोंक एवं झालावाड़।

    तोपों की सलामी

    देशी राजाओं के गवर्नर जनरल के दरबार में भाग लेने पर अथवा किसी ब्रिटिश छावनी से गुजरने पर तोपों की सलामी दी जाती थी किंतु इनका कोई निश्चित नियम नहीं था। ई.1855 में ब्रिटिश सरकार ने इन शासकों को तोपों की सलामी देने का निश्चित नियम बनाने का प्रयास किया। इसके लिये राजपूताना के एजीजी हेनरी लॉरेंस ने राजपूताना की विभिन्न रियासतों में नियुक्त पॉलिटिकल एजेंटों से उनके विचार आमंत्रित किये।

    जयपुर के पोलिटिकल एजेंट कैप्टेन सी. बी. बर्टन, जोधपुर के पोलिटिकल एजेंट सर रिचमण्ड शेक्सपीयर तथा हाड़ौती के कार्यकारी पोलिटिकल एजेंट ले. मॉन्क मेसन ने समस्त राजाओं को बराबर संख्या में तोपों की सलामी देने का सुझाव दिया। बर्टन तथा शेक्सपीयर ने सभी राजाओं को 17 तोपों की सलामी का सुझाव दिया तथा मेसन ने सभी राजाओं को 13 तोपों की सलामी का सुझाव दिया किंतु एजीजी हेनरी लॉरेन्स ने राजाओं के दो वर्ग बनाये।

    पहले वर्ग में उदयपुर, जोधपुर एवं जयपुर को 17-17 तथा दूसरे वर्ग के शासकों को 15-15 तोपों की सलामियां स्वीकृत कीं। जब हेनरी को यह ज्ञात हुआ कि भरतपुर का राजा अब तक 17 तोपों की सलामी लेता रहा है, तब हेनरी ने सरकार से अनुरोध किया कि भरतपुर के राजा को भी 17 तोपों की सलामी वाले राजाओं में रखा जाये। चूंकि बीकानेर, कोटा एवं बूंदी के शासकों का स्तर भी भरतपुर के शासक के समान ही था। इसलिये उन्हें भी 17 तोपों की सलामी वाले शासकों की सूची में रखे जाने की अनुशंसा की।

    इस प्रकार भारत सरकार द्वारा, राजपूताना के एजीजी हेनरी लॉरेन्स की अनुशंसा पर उदयपुर, जोधपुर, जयपुर, बीकानेर, कोटा, बूंदी एवं भरतपुर को 17-17 एवं धौलपुर, किशनगढ़, जैसलमेर, झालावाड़, टोंक, अलवर, करौली, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर एवं सिरोही के राजाओं को 15-15 तोपों की सलामी स्वीकृत की गई।

    एजीजी मुख्यालय माउण्ट आबू स्थानानंतरित

    ई.1856 में एजीजी का मुख्यालय अजमेर से हटाकर माउण्ट आबू कर दिया गया। भौगोलिक एवं प्रशासनिक दृष्टि से यह एक गलत निर्णय था।

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