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  • अजमेर का इतिहास - 44

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 44

    सदरलैण्ड द्वारा अजमेर में मेडिकल कॉलेज की स्थापना के प्रयास


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    भारत में अपनी सेनाओं के उपचार के लिये अंग्रेजों को यूरोपीय पद्धति के चिकित्सकों की आवश्यकता थी किंतु यूरोप से पर्याप्त संख्या में डॉक्टर भारत में सेवा देने के लिये तैयार नहीं थे। इसलिये ई.1835 में अंग्रेजों ने कलकत्ता तथा मद्रास में मेडिकल कॉलेजों की स्थापना की। ई.1845 में राजपूताना का पहला अंग्रेजी अस्पताल तथा डिस्पेंसरी जयपुर में खुले। जून 1846 में एजीजी सदरलैण्ड ने गवर्नर जनरल को लिखा कि जयपुर की तरह राजपूताना की प्रत्येक रियासत की राजधानी में अंग्रेजी अस्पताल एवं डिस्पेंसरी खोली जानी चाहिये किंतु इस कार्य के लिये भारत में पर्याप्त डॉक्टर उपलब्ध नहीं थे। इस पर सदरलैण्ड ने जयपुर डिस्पेंसरी के इंचार्ज डॉ. अर्नेस्ट कॉलरिज (सदरलैण्ड ने डॉक्टर अर्नेस्ट कॉलरिज को दक्षिण अफ्रीका से भारत लाकर जयपुर अस्पताल का इंचार्ज बनाया था।) से बात की। उसने सलाह दी कि कलकत्ता से कुछ सब-असिस्टेंट सर्जन्स को अजमेर लाकर उनकी सहायता से अजमेर में एक छोटा मेडिकल कॉलेज खोला जाये। (जयपुर राज्य, भारी कर्ज के दबाव में होने से इस कॉलेज का खर्चा उठाने को तैयार नहीं था।) अर्नेस्ट का विचार था कि इस कॉलेज के लिये आर्थिक सहायता अजमेर जिले की जनता आसानी से दे देगी।

    जयपुर का पॉलिटिकल एजेण्ट लुडलो भी एजीजी को सुझाव भेज चुका था कि एक छोटा मेडिकल कॉलेज जयपुर में भी खोला जाये। भारत सरकार एक ही तरह की दो संस्थायें अलग-अलग स्थानों पर एक साथ खोलने को तैयार नहीं हुई। इसलिये सरकार ने मेडिकल बोर्ड से जयपुर में एक छोटा मेडिकल कॉलेज खोलने की राय मांगी किंतु बोर्ड ने जयपुर में कॉलेज खोलने का प्रस्ताव यह कहकर ठुकरा दिया कि मेडिकल कॉलेज खोलने की आवश्यता अजमेर अथवा केन्द्रीय भारत के ऐसे नगर में अधिक है जहाँ की हिन्दू जनता अधिक अंधविश्वासी है। मानव चिकित्सा के लिये मानव शरीर तथा शवों की चीड़फाड़ आवश्यक है जबकि अंधविश्वासी जनता चीरफाड़ के लिये मानव शरीर अथवा शव उपलब्ध नहीं करवायेगी। अतः जयपुर में मेडिकल कॉलेज खोलना अनावश्यक है। भारत सरकार ने बोर्ड की यह राय, एजीजी सदरलैण्ड को भिजवा दी।

    इस पर सदरलैण्ड ने भारत सरकार पर दुबारा जोर डालते हुए लिखा कि अजमेर में एक मेडिकल स्कूल खोल दिया जाये। उसने अपने पत्र में कहा कि मेडिकल स्कूल की स्थापना देशी राज्यों की जनता के उपचार के लिये अत्यंत आवश्यक है। आवश्यकता पड़ने पर अजमेर मेडिकल स्कूल के चिकित्सकों को भिनाय एवं मसूदा में उपचार के लिये भेजा जा सकेगा।

    सदरलैण्ड ने भारत सरकार को लिखा कि मेरी योजना है कि देशी राज्य अपनी पसंद के युवाओं को अजमेर के मेडिकल स्कूल में पढ़ने के लिये भेजें। जब ये लड़के डॉक्टर बन जायेंगे तब वे अपने-अपने राज्यों में अस्पताल एवं डिसपेंसरियां खोलेंगे। ये अस्पताल एवं डिस्पेंसरियां ही अजमेर के मेडिकल स्कूल का खर्चा उठायेंगी।

    एक अन्य पत्र में सदरलैण्ड ने लिखा- जयपुर, भरतपुर, बीकानेर तथा अलवर आदि कई देशी राज्यों ने इस मेडिकल स्कूल में पढ़ने के लिये कुछ नाम भी भिजवाये हैं। सदरलैण्ड ने एक प्रोसपेक्टस भी तैयार करवाकर वितरित करवाया जिसमें यूरोपीय तथा देशी लोगों के द्वारा दिये जाने वाले चंदे का विवरण दिया गया था। अपने प्रस्ताव को और भी मजबूत बनाने के लिये सदरलैण्ड ने सरकार को लिखा कि नॉर्थ वेस्ट प्रोविंस के ले. गवर्नर जेम्स थॉमसन ने विश्वास दिलाया है कि राजपूताना के लोगों की भलाई के लिये वे मेडिकल कॉलेज हेतु शैक्षिक कोष में से प्रति वर्ष 10 हजार रुपये भिजवाते रहेंगे। इस संस्था पर प्रतिवर्ष 40 हजार रुपये का खर्चा आयेगा। 29 अगस्त 1846 को उसने देहली गजट में अजमेर में मेडिकल स्कूल के खुलने की सूचना छपवा दी।

    भारत सरकार ने एजीजी के हितकारी उद्देश्यों को जानते हुए भी एजीजी को फटकार लगाई कि उसे, इस सम्बन्ध में देशी राज्यों से पत्राचार करने से पहले सरकार से पूछ लेना चाहिये था। सरकार ने एजीजी को यह भी लिखा कि गवर्नर जनरल के एजेण्ट की तरफ से देशी राज्यों को किसी उद्देश्य के लिये सहयोग मांगने के लिये किया गया पत्राचार न्यूनाधिक मात्रा में निर्देशात्मक होना चाहिये था तथा इस तरह की संस्था गवर्नमेंट एजेण्ट के अधीन होनी चाहिये। कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स निःसंदेह चाहेंगे कि यह उनके अपने मेडिकल ऑफीसर्स के अधीक्षण में हो जो कि अपने आचरण के लिये कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के प्रति जवाबदेह हों।

    इसके जवाब में एजीजी ने सरकार को लिखा कि देशी नरेशों के साथ पत्राचार नहीं किया गया है अपितु उनके वकीलों के साथ सामान्य विचार-विमर्श के दौरान देशी राज्यों को इस स्कूल में पढ़ने के लिये छात्रों को भेजने का निमंत्रण दिया गया है। एजीजी यहाँ तक तैयार था कि यदि आवश्यक हो तो मेडिकल कॉलेज के व्यय के लिये, उसके आरंभ होने से पहले ही राशि एकत्रित कर ली जाये।

    सदरलैण्ड स्वयं को नैतिक रूप से इस वचन से बंधा हुआ अनुभव करता था कि वह डॉ. अर्नेस्ट कॉलरिज को प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज का सुपरिण्टेंडेंट बनाये जिसने कि दक्षिण अफ्रीका में सदरलैण्ड का उपचार करके उसकी जान बचाई थी किंतु सदरलैण्ड के हितकारी उद्देश्यों की अनदेखी करके व्यक्तिगत हित साधने का आरोप लगाना उसके साथ अत्याचार होगा। उसके हितकारी उद्देश्यों को पहचान कर ही जोधपुर के महाराजा तख्तसिंह तथा जयपुर की रीजेंसी कौंसिल ने अजमेर के मेडिकल स्कूल के लिये चंदा देना स्वीकर कर लिया था। सीकर के रावराजा ने भी पांच या दस हजार रुपया देना स्वीकर किया था।

    दो साल का समय निकल गया किंतु भारत सरकार की अनुमति नहीं आई। तब सदरलैण्ड ने भारत सरकार की अनुमति के बिना ही अजमेर में मेडिकल स्कूल खोलने का मन बनाया। उसने भारत सरकार को पत्र लिखकर सूचित किया कि- 'मैंने मद्रास तथा हैदराबाद के मेडिकल स्कूलों का जो अनुभव लिया है, उसने मुझे प्रेरित किया है कि मैं अजमेर में भी, डॉ. कॉलरिज (एम.आर.सी.एस. ऑफ लंदन) के अधीक्षण में एक मेडिकल कॉलेज की स्थापना करूं।' इसी पत्र में सदरलैण्ड ने लिखा कि अजमेर में एक मेडिकल स्कूल हाउस है जिसके लिये मैंने 4500 रुपये दिये हैं तथा मैंने राज्यों से कुछ विद्यार्थी इस स्कूल में पढ़ने के लिये भेजे हैं।

    डॉ कॉलरिज इस संस्था में उन्हें पढ़ा रहे हैं। इसके बाद सदरलैण्ड ने अपने पत्र में लिखा कि डॉ. कॉलरिज राजपूताना एजेंसी में ड्यूटी कर रहे हैं तथा जब एजीजी दौरे पर होता है तो सदरलैण्ड के साथ रहते हैं। ऐसी स्थिति में डॉ. कॉलरिज मेडिकल स्कूल के प्रति अपने दायित्वों का ढंग से निर्वहन नहीं कर पाते हैं। इसलिये मेरा सुझाव है कि मेडिकल स्कूल की देखरेख का काम अजमेर के सिविल सर्जन को दे दिया जाये तथा मेडिकल स्कूल सक्रिय रूप से संचालन में आ जाये। भारत सरकार को यह प्रस्ताव पसंद नहीं आया। उसने एजेंट को लिखा कि सरकार वर्तमान में अजमेर में मेडिकल स्कूल स्थापित करने का खर्चा नहीं उठाना चाहती है।

    इस प्रकार सदरलैण्ड द्वारा अजमेर में मेडिकल स्कूल खोलने के समस्त प्रयास व्यर्थ हो गये। संभवतः इसी बात से व्यथित होने के कारण, 24 जून 1848 को भरतपुर में सदरलैण्ड की मृत्यु हो गई। ई.1861 में डॉ. किंग्सफोर्ड बर तथा पॉलिटिकल एजेंट मेजर बु्रक के प्रयासों से जयपुर नरेश रामसिंह ने जयपुर में मेडिकल कॉलेज खोलने की अनुमति दी।

    7 सितम्बर 1861 को महाराजा ने इसका औपचारिक उद्घाटन भी कर दिया। इस प्रकार राजपूताना का पहला मेडिकल कॉलेज जयपुर में ही खुला। ई.1865 में डॉ. बर तथा जयपुर के नये पॉलिटिकल एजेण्ट कैप्टेन बेटन के बीच गलतफहमी पैदा हो गई। जिससे डॉ. बर को निलम्बित कर दिया गया तथा 1868 में जयपुर का मेडिकल स्कूल बंद हो गया।

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