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  • अजमेर का इतिहास - 43

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 43

    कर्नल जे. डिक्सन और नया युग


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    17 फरवरी 1842 को कर्नल मैकनॉटन अजमेर से स्थानांतरित हो गया तथा कर्नल जे. डिक्सन अजमेर तथा मेरवाड़ा दोनों जिलों का सुपरिण्टेण्डेण्ट बना। कर्नल डिक्सन अजमेर के लिये वरदान साबित हुआ। मि. ला टाउच (भारतीय लोग इस अधिकारी का सही नाम उच्चारित नहीं कर पाते थे तथा इसे लाटूश कहते थे।)ने लिखा है कि जिस दिन से उसने अजमेर के सुपरिण्टेण्डेण्ट पद का कार्यभार ग्रहण किया उस दिन से अजमेर में एक नया युग आरंभ हुआ। उसके समय में पुराने तालाबों की मरम्मत की गई तथा नये तालाब बनाये गये। इन कार्यो पर उसने 4,52,707 रुपये व्यय किये।

    अजमेर का कमिश्नर सदरलैण्ड तथा अजमेर का सुपरिण्टेण्डेण्ट कर्नल डिक्सन, दोनों यह चाहते थे कि किसानों का लगान घटाकर एक तिहाई कर दिया जाये किंतु सरकार ने लगान घटाने से मना कर दिया। फिर भी इसे एक बटा दो (पचास प्रतिशत) से घटाकर दो बटा पांच (चालीस प्रतिशत) कर दिया गया। ई.1842 में जब डिक्सन ने तालाबों का निर्माण आरंभ किया तब उसने एक बड़ी जागीर के प्रबंधक की तरह कार्य किया। उसने तालाबों के किनारों पर झौंपड़ियों की स्थापना की। जो लोग कुंआ खोदना चाहते थे, उन लोगों को उसने जमीनें बहुत ही कम दरों पर किराये पर दीं। उसने नये तालाबों के आस पास की बंजर जमीनें उन लोगों को वितरित कर दीं जो वहाँ बनाई गई झौंपड़ियों में रहकर खेती करना चाहते थे। ई.1842 में कर्नल डिक्सन ने आनासागर झील के किनारे कई पक्के घाट बनाए।

    नाथों के विरुद्ध कार्यवाही

    उन दिनों मारवाड़ रियासत में नाथों का बड़ा उपद्रव था। जोधपुर के पोलिटिकल एजेण्ट मि. लडलो ने नाथों के सामने प्रस्ताव रखा कि उन्हें हर वर्ष राज्य की ओर से तीन लाख रुपये दिये जायेंगे, वे मारवाड़ राज्य में हस्तक्षेप न करें परन्तु नाथों ने उसके प्रस्ताव पर ध्यान नहीं दिया और नित्य नए उपद्रव करने लगे। इससे तंग आकर अप्रेल 1843 में, उसने दो उपद्रवी नाथों को पकड़ कर अजमेर भेज दिया। इस घटना से महाराजा मानसिंह के चित्त में इतनी ग्लानि हुई की उसने दो दिन तक भोजन नहीं किया, और फिर सन्यास लेकर अनाज खाना छोड़ दिया। 4 सितम्बर 1843 की रात्रि में महाराजा का निधन हो गया।

    अजमेर में नव निर्माण

    ई.1843 में राजपूताना एजेंसी के मीर-मुंशी मीर सादत अली ने आज के अजमेर रेलवे स्टेशन के पीछे एक मस्जिद बनाई जो प्रारंभ में बहुत छोटी थी किंतु बाद में लगातार बढ़ती हुई काफी बड़ी हो गई। ई.1844 में पुष्कर में रंगजी का मंदिर बनाया गया। उसी वर्ष कर्नल डिक्सन के अनुरोध पर सेठ माणकचंद के पुत्र सेठ लक्ष्मीचंद और सेठ मोतीलाल के पुत्र सेठ मूलचंद ने आनासागर पर एक घाट बनवाया। बाद में रामबल्लभ गुलखण्डिया ने इसे माणकचंद मिलापचंद से क्रय कर लिया तब से यह गुलखण्डियों का घाट कहलाने लगा।

    गुलखण्डियों के घाट से आगे एक खुला स्थान था जिसे धोबीघाट कहते थे और धोबी यहाँ पर कपड़े धोते थे। ई.1846 में नॉर्थ वेस्ट प्रोविंस के गवर्नर मि. थॉमसन ने अजमेर की यात्रा की। 6 सितम्बर 1846 को सेठ किशनचंद कानमल ने कर्नल डिक्सन से सनद लेकर आनासागर पर नवग्रह घाट बनवाया। इससे संलग्न एक उद्यान का भी निर्माण किया गया। 1840-50 की अवधि में सेठ रामप्रसाद अग्रवाल के तीसरे नम्बर के अनुज नरसिंहदास अग्रवाल ने कड़क्का चौक में एक हवेली बनवाई जो नरसिंहदासजी की हवेली के नाम से प्रसिद्ध हुई। बाद में इसे डेक्कानी बाड़ा के नाम से प्रसिद्धि मिली।

    ई.1840 से 1850 की अवधि में नाहर मौहल्ला में रामप्रसादजी की हवेली का निर्माण हुआ। ई.1850 में सेठ सुजानमल लोढ़ा के पिता सेठ हमीरसिंह लोढ़ा ने नया बाजार में लोढ़ा हाउस का निर्माण करवाया। ई.1865 में जोधपुर रियासत के मंत्री नवाब हाजी मुहम्मदखां ने धानमंडी के निकट मुबारक महल का छोटा से मकान खरीद कर उस स्थान पर एक बड़ी हवेली बनवाई जो हाजी मुहम्मदखां की हवेली के नाम से प्रसिद्ध हुई।

    ई.1847-48 में आनासागर पर बक्शीजी का घाट बना। इसी वर्ष कर्नल डिक्सन के अनुरोध पर शाहपुरा के राजा ने आनासागर पर शाहपुरा घाट बनवाया। इसके साथ एक उद्यान भी संलग्न था। बाद में इसे भारत की परोपकारिणी सभा घाट कहा जाने लगा। इस पर एक सरस्वती मंदिर भी बन गया। ई.1848 में कर्नल डिक्सन के अनुरोध पर आनासागर पर सेठ हमीरसिंह लोढ़ा ने शाहपुरा घाट तथा खजांचियों का घाट के बीच में लोढ़ां का घाट बनवाया। इसके साथ भी एक उद्यान संलग्न था।

    एजीजी सदरलैण्ड की मृत्यु

    24 जून 1848 को अजमेर के कमिश्नर कर्नल सदरलैण्ड की भरतपुर में मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि वह अजमेर में एक मेडिकल कॉलेज खोलना चाहता था किंतु भारत सरकार ने उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, इस सदमे से उसकी मृत्यु हुई।

    अजमेर समृद्धि की ओर

    23 अक्टूबर 1847 से अप्रेल 1848 के बीच लेफ्टीनेंट डी. सी. वारिएरेंस द्वारा अजमेर मेरवाड़ा का प्रथम त्रिज्यामितीय सर्वेक्षण किया गया। इसी वर्ष ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अजमेर में एक हाई स्कूल खोला तथा फूलिया का परगना अजमेर से अलग किया। ई.1847-48 में आनासागर झील पर शाहपुरा घाट (अब परोपकारीणी सभा घाट) तथा लोढ़ों का घाट बनाये गये। ई.1848 में अजमेर नगर की जनगणना की गयी। ई.1850 में कर्नल डिक्सन का बीस वर्षीय सैटलमेंट तैयार हुआ जिसे बाद में लागू किया गया। ई.1851 में अजमेर नगर में पहली सार्वजनिक डिस्पेंसरी सदर चैरीटेबल डिस्पेंसरी के नाम से बालाजी का मंदिर आगरा गेट के पास खुली। ई.1853 में कर्नल डिक्सन द्वारा पहली बार टीकाकरण आरंभ करवाया गया। ई.1854 में अजमेर के सेठों के दान से सूरजकुण्ड के नाम से एक जलाशय का निर्माण करवाया गया।

    इस प्रकार कर्नल डिक्सन ने अजमेर तथा मेरवाड़ा की समृद्धि की नींव रखी। उसने सैंकड़ों तालाब, बांध एवं कुंए बनवाये ताकि अजमेर जिले को सूखे से बचाया जा सके। वह अंतिम ब्रिटिश अधिकारी था जिसने स्वयं को अजमेर तथा मेरवाड़ा के लोगों के साथ खड़ा किया। उनमें अच्छी तरह घुल मिल गया। (उससे पहले मि. मैकनॉटन अजमेर के लोगों से इसी तरह घुलमिल गया था।) वह लोगों के सामाजिक उत्सवों में जाता था और लोगों की दैनंदिनी में सम्मिलित होता था। उसके काल में अजमेर नगर ने अच्छी प्रगति की। उसकी प्रेरणा से आनासागर झील के घाट बनाये गये। उसने अजमेर में मदार गेट के बाहर सूरजकुण्ड, नगर के परकोटे के बाहर दिल्ली गेट एवं आगरा गेट के निकट चंद्रकुण्ड, घासकटला के निकट नाहर कुण्ड एवं तारागढ़ की तलहटी में डिग्गी नामक चार बड़े जलाशय बनवाये। उसने सूरजकुण्ड, चंद्रकुण्ड, घासकटला तथा नाहर कुण्ड को एक नहर के माध्यम से आनासागर से जोड़ा। (बीसवीं शताब्दी के आने से पूर्व ही ये तीनों बूरे जा चुके थे केवल डिग्गी बची थी। 1980 के दशक में जब मैं अजमेर में चार साल रहा, तब तक केवल डिग्गी बाजार ही इसकी पहचान रह गई थी।)

    अजमेर में कमिश्नर प्रणाली

    कर्नल जे. डिक्सन ई.1842 से अजमेर तथा मेरवाड़ा दोनों जिलों के सुपरिण्टेण्डेण्ट के पद पर कार्य कर रहा था। ई. 1853 में अजमेर में कमिश्नर प्रणाली आरंभ की गई तथा डिक्सन को अजमेर तथा मेरवाड़ा का कमिश्नर नियुक्त किया गया। इसके बाद वह ई.1857 में अपनी आकस्मिक मृत्यु तक इस पद पर बना रहा। उसकी मृत्यु के बाद सर हेनरी लॉरेंस ने कुछ समय के लिये अजमेर-मेरवाड़ा के कार्यकारी कमिश्नर के रूप में कार्य किया।

    इस प्रकार ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने विल्डर से लेकर डिक्सन तक, अजमेर के अंदर निर्जन में शहर बनाया और बसाया। आगरा दरवाजा बनाया। दरवाजे के बाहर गंज आबाद किया। डिग्गी से लेकर ऊसरी दरवाजे तक आबादी बढ़ाई। कैवेण्डिशपुरा बसा। कर्नल डिक्सन ने मदार दरवाजे के सामने एक कुण्ड का निर्माण करवाया। खबरदार-खबरदार की आवाजें बंद हुईं। काले कपड़ों वाले चौकीदार बरछियां उठाए हुए शहर में नजर आने लगे। यह अलग ही तरह का दृश्य था।

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