Blogs Home / Blogs / अजमेर नगर का इतिहास - पुस्तक / अजमेर का इतिहास - 42
  • अजमेर का इतिहास - 42

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 42

    ब्रिटिश अधिकारियों को अग्रवाल सेठों का सहयोग


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    1 जुलाई 1832 से मेजर अलैक्जेण्डर स्पीयर्स अजमेर के सुपरिण्टेण्डेण्ट के पद पर कार्य कर रहा था। वह 16 अप्रेल 1834 तक इस पद पर कार्य करता रहा।

    एडमंस्टन

    स्पीयर्स के बाद 17 अप्रेल 1834 को मि. एडमंस्टन अजमेर का सुपरिण्टेण्डेण्ट बनकर आया। वह अजमेर के लोगों को अविवेकी, अदूरदर्शी तथा गरीबी के मारे हुए कहता था। उसके कार्यकाल में दरगाह बाजार का विस्तार किया गया, धान मण्डी बनायी गयी तथा अजमेर नगर में एक अंग्रेजी विद्यालय खोला गया। उसके कार्यकाल में ई.1834 में अजमेर में दुर्भिक्ष पड़ा। एडमंस्टन ने अग्रवाल सेठों से सहयोग से लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाने का निर्णय लिया। उसने सेठ रामप्रसाद अग्रवाल से आग्रह किया कि वह इस भयावह दुर्भिक्ष में लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाये। इस पर सेठ रामप्रसाद अग्रवाल ने आनासागर झील पर एक घाट बनवाया जो रामप्रसादजी का घाट के नाम से विख्यात हुआ। इस घाट के साथ एक उद्यान का भी निर्माण किया गया। इसके निर्माण के लिये अजमेर के सुपरिण्टेण्डेण्ट एडमंस्टन ने सेठ रामप्रसाद के पिता आसकरण को 18 जुलाई 1834 को सनद प्रदान की।

    एडमंस्टन के अनुरोध पर सेठ रामनारायण सिरिया ने आनासागर पर जगदीश घाट बनाया। इसके साथ एक मंदिर भी बनाया गया। सेठ रामनारायण सिरिया ने इस कार्य के लिये तेली समाज से पट्टा प्राप्त किया। बाद में इस घाट पर मारवाड़ी अग्रवाल पंचायत बनाई गई। एडमंस्टन ने 10 वर्षीय सेटलमेंट बनाया। वह 30 जून 1836 तक इस पद पर कार्य करता रहा। उसी वर्ष मेरवाड़ा जिले को भी नॉर्थ वेस्ट प्रोविंस के अधीन कर दिया गया।

    ट्रेवेलिन

    एडमंस्टन का उत्तराधिकारी मि. ट्रेवेलिन हुआ। वह 1 जुलाई 1836 से 25 जुलाई 1837 तक इस पद पर रहा। उसके कार्यकाल में ई.1836 में अजमेर में एक अंग्रेजी स्कूल, जो 1834 में बंद हो गया था, पुनः गवर्नमेंट कॉलेज के नाम से आरंभ किया गया। गवर्नमेंट कॉलेज स्थापना ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स के एक सदस्य द्वारा ब्लू कैसल नामक भवन में की गई। वर्तमान गवर्नमेंट कॉलेज अजमेर, इसी का विकसित स्वरूप है। अब यह एक नये भवन में चलता है तथा ब्लू कैसल भी अजमेर में आज तक मौजूद है। ई.1835 में मेरवाड़ा के सुपरिण्टेण्डेण्ट कैप्टेन डिक्सन ने ई.1835 में नया नगर की नींव रखी जो आगे चलकर ब्यावर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ई.1836 में ब्यावर में मुख्य बाजार बनाया गया और उसने काम चालू किया। 26 फरवरी 1837 को अजमेर जिले की जनगणना करवायी गई।

    सेठों ने बढ़ाई अजमेर की रौनक

    अजमेर के अंग्रेज प्रशासकों द्वारा दिये गये संरक्षण से प्रभावित होकर ई.1830 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में अजमेर में जयपुर तथा मारवाड़ से कई प्रतिष्ठित वैश्य परिवार आकर बस गये।

    झुंझुनूं का अग्रवाल परिवार

    झुंझुनूं के सेठ आसकरण के चार पुत्र थे। उनके बड़े पुत्र रामप्रसाद अग्रवाल सबसे पहले अजमेर आये। वे जन सामान्य में प्रशंसित व्यक्ति थे। उनके आने से अजमेर नगर एवं अजमेर की प्रजा को बहुत लाभ हुआ। ई.1834 में रामप्रसाद अग्रवाल ने आनासागर के घाट पर सेठ रामप्रसादजी का घाट बनवाया ताकि अजमेर की प्रजा को दुर्भिक्ष के समय में काम मिल सके। आगे चलकर जब कर्नल डिक्सन ने अजमेर की प्रजा के लिये पेयजल की सुविधा हेतु चार जलाशय बनाने का तथा इस कार्य के लिये धन जुटाने हेतु प्रजा से चंदा एकत्रित करने का निर्णय लिया तो सेठ रामप्रसाद ने चार में से दो जलाशय अपने धन से बनवाये। उन्होंने तारागढ़ की तलहटी में डिग्गी का निर्माण करवाया जिससे अजमेर नगर के दक्षिणी भाग में जलापूर्ति की जाती थी।

    सेठ रामप्रसाद ने दूसरा जलाशय नाहर के नाम से नया बाजार में बादशाही इमारत के पास बनवाया जिससे अजमेर नगर के उत्तरी भाग में जलापूर्ति की जाती थी। सेठ रामप्रसाद ने अजमेर की प्रजा को जलापूर्ति करने के उद्देश्य से दौलत बाग तथा दूधिया कुंए के निकट शक्कर कुई नामक कुआं खुदवाया। इस कुएं के लिये सरकार ने 25 जुलाई 1840 को सेठ रामप्रसाद को पट्टा एवं परवाना प्रदान किया।

    सेठ रामप्रसाद ने पुरानी पुष्कर घाटी सड़क बनवाई तथा पहाड़ी की चोटी पर एक कुण्ड का निर्माण करवाया। इस कुण्ड तथा सड़क के अवशिष्ट चिह्न भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तक दिखाई देते थे। सेठ रामप्रसाद ने अजमेर के हिन्दू मंदिरों में तिबारों का निर्माण करवाया। इनमें अजयपाल तथा बैजनाथ प्रमुख थे। सेठ रामप्रसाद अग्रवाल ने नया बाजार में नृसिंहजी का मंदिर बनवाया।

    सेठ रामप्रसाद अग्रवाल ने नया बाजार (ब्यावर) को लोकप्रिय बनाने में कर्नल डिक्सन की बड़ी सहायता की। इससे उपकृत होकर कर्नल डिक्सन ने सेठ रामप्रसाद के व्यापार सम्बन्धी अभियोजनों में लगने वाली कोर्ट फीस आधी कर दी तथा चुंगी चौथाई कर दी। ई.1837 में जब सेठ रामप्रसाद अग्रवाल गया की तीर्थ यात्रा पर गया तो राजपूताना के एजीजी एवं कमिश्नर मेजर नेटहैनील अल्वेस ने सेठ रामप्रसाद के मार्ग में पड़ने वाले समस्त अंग्रेज अधिकारियों को एक परिपत्र भिजवाकर उन्हें निर्देशित किया कि सेठजी की तीर्थयात्रा में हर संभव सहायता की जाये। कर्नल डिक्सन ने भी 1 फरवरी 1837 को सेठ रामप्रसाद अग्रवाल को एक परिपत्र दिया कि सेठ रामप्रसाद अग्रवाल के तीर्थयात्री दल में 900 तीर्थयात्री, 100 शस्त्रधारी, 75 बैलगाड़ी, 2 रथ, 50 ऊँट, 26 घोड़े, 5 पालकी तथा 3 चपरासी हैं। समस्त ब्रिटिश अधिकारी इनकी सहायता करें।

    पूर्णमल गनेरी परिवार

    सेठ रामप्रसाद अग्रवाल ने अपने सम्बन्धी पूर्णमल गनेरी को भी अजमेर आने के लिये प्रेरित किया। सेठ पूरणमल ने सेठ रामप्रसाद का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तथा नया बाजार अजमेर में तीन नोहरे तथा तीन घर बनवाये। इनमें से एक घर बाद में खरवा हाउस के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सेठ पूरणमल ने पुष्कर में प्रसिद्ध रंगजी का मंदिर बनवाया।

    पटवारी परिवार

    ई.1830 से ई.1840 की अवधि में अजमेर आने वाला तीसरा प्रमुख परिवार परबतसर का पटवारी परिवार था। इस परिवार में मोहनलाल, जवाहरलाल तथा छोटूलाल नामक तीन भाई थे। सेठ मोहनलाल ने पुष्कर में एक मंदिर बनवाया तथा नया बाजार घास कटला में चार दुकानें बनवाईं। जवाहरलाल ने नाहर मौहल्ले के कौने पर जहाँ गजमालजी की गली और नाहर गली मिलती थीं, एक विशाल हवेली का निर्माण करवाया। सेठ छोटूलाल ने सेठ रामप्रसाद अग्रवाल के लघु भ्राता सेठ करणीदान की हवेली के पड़ौस में अपनी हवेली बनवाई।

    रामप्रसाद अग्रवाल के लघु भ्राता सेठ करणीदान ने एक और हवेली सेठ रामप्रसादजी की हवेली के निकट बनवाई। रामप्रसाद अग्रवाल के चौथे भ्राता दीनानाथ ने नाहर कुण्ड के सामने अपनी हवेली बनवाई। इन सेठों के अजमेर में बसने एवं विशाल हवेलियां और दुकानें बनाने से अजमेर की रौनक बढ़ गई। जो मुर्दानगी पूरे मुस्लिम एवं मुगल काल में छाई रही थी, वह समाप्त हो गई। अजमेर फिर से जीवंत हो उठा। यद्यपि यह जीवंतता, पृथ्वीराज चौहान के अजमेर की तुलना में बहुत ही फीकी थी, जिस जीवंतता की प्रशस्ति हसन निजामी ने तेरहवीं शताब्दी में गाई थी।

    पटवा हवेली

    ई.1830 के दशक में जैसलमेर के सेठ मगनीराम जोरावरमल पटवा ने अजमेर के कड़क्का चौक में नाहर मौहल्ले की गली के प्रवेश पर, पौने दो लाख रुपये की लागत से पटवा हवेली का निर्माण करवाया। यह अजमेर का सबसे सुंदर आवास था। इसके पत्थरों की घड़ाई इतनी सुंदर थी कि ऐसी घड़ाई और कहीं देखने को नहीं मिलती। इसकी बालकनियां जब कड़क्का चौक पर झूमने लगीं तो कड़क्का चौक की भी रौनक देखने योग्य हो गई। इस हवेली के झरोखों को बनाने के लिये पत्थर एवं कारीगर जैसलमेर से आये थे। पटवों की इतनी ही सुंदर हवेली जैसलमेर में भी है।

    मैकनॉटन

    ट्रेवेलिन का उत्तराधिकारी लैफ्टीनेंट मैकनॉटन 26 जुलाई 1837 को अजमेर का सुपरिण्टेण्डेण्ट हुआ। उसके समय में एजीजी एवं अजमेर के कमिश्नर कर्नल सदरलैण्ड ने भारत सरकार से, अजमेर में तालाब बनवाने तथा उसी प्रकार का बंदोबस्त करने की मांग की, जिस तरह का बंदोबस्त कैप्टेन डिक्सन ने मेरवाड़ा में आरंभ किया था किंतु ब्रिटिश सरकार ने सरकारी व्यय को बढ़ाने की स्वीकृति नहीं दी। इस इन्कार के चलते ई.1837-38 से ई.1840-41 तक के चार साल अजमेर में बहुत कष्ट भरे रहे। अजमेर जिले के खालसा गांवों में भारी राजस्व आकलन से गरीबी अत्यंत बढ़ गई।

    तालाब टूट गये तथा कुएं मरम्मत के अभाव में सूख गये। खालसा गांवों में गरीबी अत्यंत भयानक दिखाई देने लगी जबकि जागीरी गांवों की दशा काफी अच्छी दिखाई देती थी। ई.1839 में राजपूताना में कोषाधिकारी एवं मथुरा निवासी राधाकृष्ण ने 6 नवम्बर 1839 को कर्नल डिक्सन से सनद लेकर आनासागर पर खजांचियों का घाट बनवाया। इसके साथ एक उद्यान भी संलग्न था।

    एजीजी द्वारा जोधपुर के विरुद्ध कार्यवाही

    अन्य राजाओं की तरह जोधपुर नरेश मानसिंह ने भी ई.1818 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी से अधीनस्थ संधि की थी किंतु मानसिंह उस संधि की शर्तों की पालना नहीं करता था। उसके स्वतंत्र आचरण के कारण अंग्रेज अधिकारी तो उससे नाराज थे ही, साथ ही महाराजा मानसिंह के सरदार भी उसके विरोधी हो गये थे। उन्होंने एजीजी कर्नल सदरलैण्ड को मानसिंह के विरुद्ध उकसाया। इस पर मार्च 1839 में सदरलैंड, पोलिटिकल एजेन्ट मि. लडलो तथा 10,000 सैनिकों को अपने साथ लेकर अजमेर से पुष्कर और मेड़ता होता हुआ जोधपुर की तरफ चला।

    मारवाड़़ के बहुत से सरदार भी उसके साथ हो लिए। यह समाचार सुनकर जोधपुर महाराजा मानसिंह अपने दुर्ग से बाहर निकलकर सदरलैण्ड के रास्ते में बनाड़ तक आया तथा जोधपुर दुर्ग की चाबियां सदरलैण्ड को सौंप दीं। सदरलैण्ड ने दुर्ग की चाबियां लेने से इनकार कर दिया। इस पर मानसिंह सदरलैण्ड को जोधपुर ले गाया। सरदलैण्ड अपनी सेना सहित कुछ माह तक दुर्ग में रहा। इसके बाद पोलिटिकल एजेन्ट लडलो जोधपुर में रहने लगा और कर्नल सदरलैंड लौटकर अजमेर आ गया।

    ई.1839 में सरकारी खजांची राधा किशन ने आनासागर पर खजांचियों का घाट बनवाया। ई.1840 के अंत में कर्नल सदरलैण्ड ने मेरवाड़ा के सुपरिण्टेण्डेण्ट कैप्टेन डिक्सन को निर्देश दिये कि वह अजमेर में तालाबों के निर्माण पर एक रिपोर्ट तैयार करे। ई.1841 तक अजमेर खालसा के गांवों की स्थिति इतनी भयावह हो चुकी थी कि मि. ला टाउच को यह स्वीकार करना पड़ा कि 23 साल के ब्रिटिश प्रशासन ने अजमेर जिले को अधम निर्धनता में पहुँचा दिया। ई.1840 में मैकनॉटन ने जनता के सहयोग से अजमेर से पुष्कर के बीच की घाटी को काटकर एक कच्ची सड़क बनवाई।

    जनेऊधारी अंग्रेज

    लैफ्टीनेंट कर्नल मैकनॉटन 17 फरवरी 1842 तक अजमेर का सुपरिण्टेण्डेण्ट रहा। वह अत्यंत लोकप्रिय अधिकारी था। उसने लागों की भलाई के लिये बहुत कार्य किया। वह प्रायः संभ्रांत भारतीयों की तरह के वस्त्र पहनता था। अपने घोड़े पर वह भारतीयों की तरह ही काठी रखता था। वह जनेऊ धारण करता था तथा एक ब्राह्मण से अपनी रसोई बनवाता था। वह प्रायः धोती पहनकर भोजन ग्रहण करता था। वह बहुत बड़ा दानवीर था तथा लोगों को बड़े उपहार देता रहता था। राजगढ़ का राजा चमनसिंह उसका गहरा मित्र था।

    मैकनॉटन प्रायः राजगढ़ जाता रहता था तथा भारतीयों की तरह मनोरंजन करने को पसंद करता था। अजमेर के लोग उससे प्रेम करते थे। वह अजमेर के निकट स्थित नौसर के भवानी चीता को भवानी चाचा कहता था। वह प्रायः मारवाडी भाषा में बात किया करता था। मारवाड़ी भाषा में वह धाराप्रवाह बोल सकता था। वह प्रायः पुष्कर झील में नहाने के लिये जाता रहता था। ई.1840 में उसने जनता से एक लाख रुपये एकत्रित करके पुष्कर की पहाड़ियों में रास्ता बनवाया।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×