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  • अजमेर का इतिहास - 41

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 41

    रेशमी कीड़ा कवच से बाहर आया


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ई.1833 में एक चार्टर एक्ट के माध्यम से ईस्ट इण्डिया कम्पनी की व्यापारिक गतिविधियां समाप्त कर दी गयीं। ईस्ट इण्डिया कम्पनी रूपी रेशम का कीड़ा उसी रेशम को काटकर पूरी तरह बाहर निकल आया था जिस रेशम को उसने अपने रक्षा कवच की तरह इस्तेमाल किया था।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने ब्रिटिश भारतीय प्रांतों तथा रियासतों में प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति के लिये पॉलिटिकल एण्ड फॉरेन डिपार्टमेंट की स्थापना की। इस डिपार्टमेंट में नियुक्त अधिकारी पॉलिटिकल ऑफीसर कहलाते थे। ये एम्बेसडर, हाई कमिश्नर, एजेंट टू दी गवर्नर जनरल, रेजीडेंट तथा पॉलिटिकल एजेंट के पदों पर नियुक्त होते थे। ब्रिटिश पॉलिटिकल ऑफीसर, स्वयं को अन्य राजनीतिक पदाधिकारियों की अपेक्षा अधिक अभिजात्य एवं अधिक अधिकार सम्पन्न समझते थे।

    भारतीय नरेशों के दरबार में नियुक्त पॉलिटिकल अधिकारी, लॉर्ड एलनबर्ग का उदाहरण देते थे जो ब्रिटिश सरकार की मित्रता एवं शक्ति का प्रतिनिधि था। इसी प्रकार राजपूताना की रियासतों में नियुक्त पोलिटिकल ऑफीसर दोहरे कार्य करते थे। एक तरफ तो वे राज्य में पूर्णाधिकारी बन गये थे तो दूसरी ओर वे परमोच्च शक्ति के प्रतिनिधि थे। इस प्रकार वे रियासतों में संधि के पालन का अवलोकन करते थे एवं रियासत में सामान्य प्रशासन तथा शांति पर नियंत्रण रखते थे।

    एजीजी

    एजेंट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना (एजीजी) एक वरिष्ठ पोलिटिकल ऑफीसर होता था जिसके नीचे रियासतों का एक समूह होता था। एजीजी के अधीन पॉलिटिकल एजेंटों का एक समूह नियुक्त किया जाता था। कम्पनी में एजीजी की हैसियत रेजीडेंट के समकक्ष होती थी (रेजीडेण्ट एक पॉलिटिकल अधिकारी होता था जो प्रयक्षतः गवर्नर जनरल के अधीन आता था। वह अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा में रहकर, देशी रियासत से व्यवहार करता था। हैदराबाद तथा ग्वालियर रियासतों के लिये अलग से एक-एक रेजीडेंट नियुक्त था। जबकि राजपूताने की समस्त रियासतों को एक ही एजीजी के अधीन रखा गया था।) इस कारण वह रेजीडेंट की समस्त शक्तियों का उपयोग करता था। वह रेजीडेंट की ही तरह ब्रिटिश सरकार से सीधे पत्र व्यवहार करता था। जब वह अपने मुख्यालय पर होता था अथवा अधीनस्थ कार्यक्षेत्र के दौरे पर होता था, तब उसे रेजीडेंट की ही तरह सुरक्षा दी जाती थी। जब वह अपने अधीनस्थ रियासतों का दौरा करता था तो उसे 13 तोपों की सलामी दी जाती थी। पॉलिटिकल अधिकारियों में वह हैदराबाद के रेजीडेंट से एक क्रम नीचे था।

    पॉलिटिकल एजेंट

    एजेंट टू दी गवर्नर जनरल के नीचे पॉलिटिकल एजेंट पदस्थापित होता था जो कि रेजीडेंट से एक क्रम नीचे का पद था। पॉलिटिकल सुपरिण्टेण्डेण्ट का पद पॉलिटिकल एजेंट के समकक्ष होता था। पॉलिटिकल सुपरिण्टेण्डेण्ट तथा पॉलिटिकल एजेंट, देशी रियासतों में एजेंट टू दी गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि होते थे। पॉलिटिकल अधिकारियों में सबसे निचला पद असिस्टेंट टू दी एजेंट टू दी गवर्नर जनरल का होता था। पॉलिटिकल सुपरिण्टेण्डेण्ट तथा पॉलिटिकल एजेंट को अपने कार्यक्षेत्र की रियासत में 11 तोपों की सलामी लेने का अधिकार था। जब वे राजा के दरबार में जाते थे तथा वहाँ से लौटते थे तो उन्हें रियासत की ओर से 11 तोपों की सलामी दी जाती थी। सर्वोच्च सत्ता का प्रतिनिधि होने के कारण पॉलिटिकल सुपरिण्टेण्डेण्ट तथा पॉलिटिकल एजेंट अलंघ्य थे। उनकी बेइज्जती अथवा उनके प्रति की गई हिंसा, ब्रिटिश सरकार की बेइज्जती मानी जाती थी।

    हाड़ौती के कार्यकारी पोलिटिकल एजेंट डॉ. कॉरडेट के साथ बूंदी के महाराव द्वारा दुर्व्यवहार किये जाने की सूचना मिलने पर तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक ने बूंदी महाराव का स्पष्टीकरण मांगा। बैंटिक ने राव के व्यवहार पर अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए बूंदी रियासत के सम्बन्धों को सीधे ही अजमेर स्थित एजेंट के अधीन कर दिया। इससे महाराव को असुविधा अनुभव हुई। महाराजा ने कॉरबेट के साथ किये गये दुर्व्यवहार के लिये दोष स्वीकार किया तथा गवर्नर जनरल से अनुरोध किया कि उनके रियासत के सम्बन्ध हाड़ौती के पॉलिटिकल एजेंट के अधीन किये जायें। महाराव द्वारा दोष स्वीकार कर लिये जाने पर बैंटिक ने महाराव की प्रार्थना स्वीकार कर ली।

    भारतीय नरेशों की स्थिति

    यद्यपि भारतीय नरेश परस्पर बराबरी का व्यवहार करते आये थे किंतु ब्रिटिश सरकार ने उनके स्तर तथा रैंक में कुछ अंतर किया। ये समस्त राजा, गवर्नर जनरल के अधीन माने जाते थे किंतु राजपूताना एजेंसी के मामले में ऐसा नहीं था। उदयपुर, जयपुर एवं जोधपुर के राजाओं के अतिरिक्त राजपूताना के अन्य समस्त राजा, एजेंट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना के बराबर माने जाते थे। एजेंट टू दी गवर्नर जनरल, उदयपुर, जयपुर एवं जोधपुर के राजाओं के प्रति उनकी उच्च स्थिति का सम्मान करता था। वह जब भी इन राजाओं को खरीता भेजता तो उसमें इन राजाओं को ई.1817-18 की संधियों द्वारा स्वीकृत उनकी पारिवारिक उपाधियों के साथ-साथ करम फरमाये या आलीशान या अन्य सम्मान सूचक शब्दों से भी सम्बोधित करता था। जबकि अन्य राजाओं को खरीता भेजते समय वह केवल राजा को उसकी पारिवारिक उपाधियों से ही सम्बोधित करता था। रियासत के भीतर रियासत का राजा, पोलिटिकल सुपरिण्टेंडेंट अथवा पोलिटिकल एजेंट से उच्च स्तर रखता था किंतु पोलिटिकल सुपरिण्टेंडेंट अथवा पोलिटिकल एजेंट, राजा के भावी उत्तराधिकारियों से उच्च स्तर रखता था।

    अन्तर्राष्ट्रीय वकील कोर्ट्स

    अजमेर के चारों तरफ देशी राज्यों का विस्तार था। इन राज्यों के लिये अंतर्राज्य सम्बन्धों और सीमाओं पर हुई लूटमार की घटनाओं को हल करना अत्यंत कठिन कार्य था। क्योंकि प्रत्येक राजा अपने शरणागत के अधिकार का खुला प्रयोग करने को तत्पर रहता था। इस अधिकार का दुरुपयोग एक राज्य दूसरे के विरुद्ध किसी छोटे से लाभ के लिये कर लेता था और उसकी प्रतिरक्षा, आत्म सम्मान तथा प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता था। इस समस्या को हल करने के लिये अंग्रेजों ने वकील कोर्ट्स का प्रयोग आरंभ किया। चूंकि प्रत्येक राज्य अपने को स्वावलम्बी मानता था इसलिये इसको इन्टरनेशनल वकील कोर्ट्स पद्धति कहा गया और शीघ्र ही कुछ वर्षों में चार इण्टरनेशनल कोर्ट्स ऑफ वकील्स स्थापित कर दिये गये- मेवाड़, मारवाड़, जयपुर और हाड़ौती एजेन्सियों के मुख्यालयों में स्थापित किये गये। इन चारों स्थानों पर वहाँ का पोलिटिकल अधिकारी इस कोर्ट की अध्यक्षता करता था। उस पोलिटिकल एजेन्सी के तहत जितने राज्य आते थे उनके वकील उसके सदस्य होते थे।

    अजमेर में भी एक इण्टरनेशनल कोर्ट आफ वकील था। इसका क्षेत्र अजमेर, किशनगढ़ और धौलपुर तक था। लेकिन इस कोर्ट का कार्यक्षेत्र अन्य कोर्ट ऑफ वकील्स से अपीलें सुनना भी था। अपील सुनने के समय एजीजी इसकी अध्यक्षता करता था। विभिन्न वकील अपने-अपने राज्यों का प्रतिनिधित्व करते थे और शासक की ओर से कोई भी समझौता उन मुकदमों के सम्बन्ध में कर सकते थे। यह पद्धति अंतर्राज्य झगड़ों को निबटाने में बहुत सीमा तक सफल रही। ये कोर्ट्स अंग्रेजी संदेश विभिन्न राज्यों तक अनौपचारिक रूप से पहुँचाने में सफल रहे। वे एक राज्य के वकील से सर्वोपरि सत्ता की इच्छाओं को मनवा सकते थे।

    अजमेर में राज्यों के वकीलों के रहने से उन्हें यह पता रहता था कि क्या करने से राज्य को एजीजी की कृपा मिल सकती थी। इससे पहले कि एजीजी राज्यों के शासकों को औपरचारिक रूप से लिखे वकीलों के माध्यम से उन्हें अंग्रेज अधिकारियों की इच्छा की स्थापना के माध्यम से अंग्रेजी प्रभाव को परोक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ने में अधिक सहायता मिली। इन वकील कोर्ट्स में उन अपराधों के मुकदमे आते थे जो एक राज्य की भूमि पर दूसरे राज्य के निवासियों द्वारा घटित होते थे। इन कोर्ट्स में कैद अथवा जुर्माने की सजा होती थी।

    कैद की स्थिति में उस अपराधी को उसी के राज्य के बंदीगृह में बंदी बनाकर रखा जाता था। जुमार्ने की स्थिति में एजेन्सी का कोषाध्यक्ष वह राशि उस व्यक्ति को चुका देता जिसकी सम्पत्ति लूट ली गई थी। वह कोषाध्यक्ष राजदरबार से उस राशि को मांगता जो राज्य द्वारा चुकाई जाती। कालांतर में जुर्माना करना ही सबसे सरल और सुगम हो गया।

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