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  • अजमेर का इतिहास - 40

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 40

    अजमेर में एजीजी की नियुक्ति तथा विलियम बैण्टिक का दरबार


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी की ओर से ई.1818 से ई.1832 तक चली आ रही व्यवस्था में राजपूताना रियासतों के साथ नीति संचालन एक अधिकारी के नियंत्रण में नहीं था। कुछ रियासतें मध्य भारत के रेजीडेण्ट के तथा कुछ रियासतें अजमेर के सुपरिण्टेण्डेण्ट के अधीन थीं। इन रियासतों में नियुक्त अंग्रेज अधिकारी दिन पर दिन शक्तिशाली होते जा रहे थे। इनमें से अधिकांश सनकी नवयुवक थे जो रियासतों के राजाओं और पूरे प्रशासनिक तंत्र की नकेल कसते थे। गोद लेने और उत्तराधिकार के समस्त प्रश्न अंग्रेजी स्वीकृति मिल जाने के पश्चात् ही हल होते थे। राज्य के प्रत्येक तत्त्व- महाराजा, महारानी, राजमाता, प्रधान, दीवान तथा सामन्त को भलीभाँति अनुभव करा दिया गया कि वे सत्ता का प्रयोग केवल अंग्रेजी अनुमति से ही कर सकते थे।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी सैद्धांतिक रूप से अब तक व्यापारिक कम्पनी बनी हुई थी जबकि व्यवहारिक रूप में वह शक्तिशाली सरकार बन गई थी। अनेक प्रचण्ड राजवंशों एवं प्रतापी राज्यों के चिह्न भारत के मानचित्र से सदैव के लिये विलुप्त कर देने वाली इस कम्पनी के सनकी नौजवान अधिकारियों के कदमों में बड़े-बड़े राजाओं के मुकुट पड़े हुए थे। नवाब और बेगमें उनकी चिलम और मुट्ठियां गर्म करने में लगे हुए थे तथा कई राजा एवं रानियां उनके कदमों की धूल चाटकर अपने को धन्य समझते थे। इसलिये अब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सरकार की तरह सोचना आरंभ किया।

    अजमेर में एजीजी की नियुक्ति

    भारत का गवर्नर जनरल विलियम बैन्टिक चाहता था कि भारत में ब्रिटिश अधीन क्षेत्रों को एक साम्राज्य के भागों की तहर गठित किया जाये तथा उदारवादी एवं मानववादी दृष्टिकोण को अंग्रेजी प्रभुता के ढांचे में समन्वित किया जाये। 19 जनवरी 1832 को दिल्ली के रेजीडेण्ट चार्ल्स मेटकाफ ने अपने एक पत्र में लिखा कि लॉर्ड विलियम बैन्टिक ने निश्चय कर लिया है कि राजपूताने में दिल्ली के नियंत्रण से मुक्त एक पृथक् रेजीडेन्सी होगी। उस समय तक बैन्टिक ने मेटकाफ से ए. लॉकेट को एजीजी बनाने के लिये सम्मति ले ली थी। इस क्षेत्र में स्थित रियासतों को प्रायोगिक बनाने के लिये ई.1832 में राजपूताना एजेंसी स्थापित की गई जिसमें 'एजेंट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना' का पद बनाया गया। उसका मुख्यालय अजमेर में रखा गया।

    राजपूताना रियासतों के साथ-साथ पालनपुर, दांता, ईडर तथा विजयनगर रियासतें भी राजपूतना एजीजी के अधीन थीं जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गुजरात में शामिल की गयीं। इस नई व्यवस्था के तहत ई.1832 में अजमेर को भारत सरकार के नॉर्थ वेस्ट प्रोविंस के अधीन कर दिया गया। इसे बाद में यूनाइटेड प्रोविंस ऑफ आगरा एवं अवध कहा गया। इसे संक्षिप्त नाम से यू. पी. (यूनाइटेड प्रोविंस) कहते थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यू. पी. को उत्तर प्रदेश नाम दिया गया। उसी वर्ष ले.कर्नल ए. लॉकेट को एजेंट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना (एजीजी) एवं कमिश्नर ऑफ अजमेर-मेरवाड़ा नियुक्त किया गया। इस नई व्यवस्था के तहत राजाओं से कहा गया कि वे अपने वकीलों की नियुक्ति करें जो अजमेर में रहकर एजीजी के सम्पर्क में रहें ताकि एजीजी उन्हें राज्य के सम्बन्ध में दिशा निर्देश दे सके।

    विलियम बैंटिक का अजमेर दरबार

    ई.1832 में अजमेर को एन.डब्लू.पी.(नॉथ वेस्ट प्रोविन्स) में स्थानान्तरित कर दिया गया जिसका गवर्नर, स्वयं भारत का गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक था। विलियम बैंटिक ने उसी वर्ष अजमेर की यात्रा की। अजमेर की यात्रा करने वाला वह भारत का प्रथम गवर्नर जनरल था। उसने राजपूताना के विभिन्न राजाओं को मिलने के लिये अजमेर बुलवाया। (जैसलमेर, बीकानेर एवं सिरोही के शासकों को इस दरबार में आमंत्रित होने के लिये निमंत्रण नहीं दिया गया।) उसे आगरा से अजमेर आने तथा वापस आगरा पहुँचने तक कुल तीन माह का समय लगा। उसकी यात्रा में हाथी, घोड़े, ऊँट तथा पालकियों का प्रयोग किया गया। सामान लादने के लिये बैलगाड़ियां काम में ली गईं। वह प्रतिदिन दस से बारह मील चला।

    18 जनवरी 1832 को गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक अजमेर पहुँचा। उसके स्वागत के लिये 23 जनवरी 1832 को किशनगढ़ का महाराजा कल्याण सिंह उससे मिलने आया। महाराजा को बैंटिक के कैम्प तक लाने के लिये सवारों की एक टुकड़ी नियुक्त की गई। महाराजा को 11 तोपों की सलामी दी गई। महाराजा के स्वागत में बैंटिक अपनी कुर्सी से उठकर खड़ा हुआ तथा उसने महाराजा कल्याणसिंह एवं उसके सरदारों को बैठने के लिये अनुरोध किया। बैंटिक एवं कल्याणसिंह के वार्तालाप के दौरान पूरे समय तक अंग्रेजी बैण्ड बजता रहा। अंत में उत्तर एवं पान की रस्म हुई। महाराजा के लौटने के समय भी उसे ग्यारह तोपों की सलामी दी गई।

    30 जनवरी 1832 को टोंक का नवाब अमीरखां, गवर्नर जनरल से मिलने आया। उसके साथ दो-तीन बटालियनें थीं, 2-3 हजार घुड़सवार थे तथा कुछ तोपखाना भी था। उसे भी वही सम्मान दिया गया जो किशनगढ़ के राजा को दिया गया था। अंतर केवल इतना था कि उसे 13 तोपों की सलामी दी गई तथा बैंटिक ने अपने हाथ की अंगुली में से पन्ने की अंगूठी उतारकर अमीरखां को पहनाई। इस भेंट के अवसर पर कुल बीस हजार मनुष्य उपस्थित थे। अगली प्रातः बैंटिक अपने स्टाफ को साथ लेकर अमीरखां के डेरे पर गया। वह उसकी सेना में कई तरह के भारतीय घोड़े देखकर प्रसन्न हुआ। नवाब से विदा लेते समय बैंटिक ने अपनी कमर से तलवार निकालकर नवाब को भेंट की। 3 फरवरी 1832 को कोटा का महाराव रामसिंह गवर्नर जनरल से मिलने अजमेर आया। उसका भी किशनगढ़ के महाराजा की तरह स्वागत किया गया।

    5 फरवरी को उदयपुर का महाराणा जवानसिंह अजमेर आया। उसकी सवारी बहुत भव्य थी। बैंटिक ने महाराणा की अगवानी के लिये एक प्रतिनिधि मण्डल भेजा जिसमें बैंटिक के स्टाफ के छः अधिकारी सम्मिलित थे। महाराणा के स्वागत के लिये बैंटिक के टेण्ट के सामने स्किनर्स कोर का रिसाला नियुक्त किया गया। महाराणा के स्वागत में 17 तोपों की सलामी दी गई। बैंटिक स्वयं कुछ कदम आगे आया और महाराणा को एक सिंहासन तक ले गया। यह वही सिंहासन था जिस पर पहले किशनगढ़ के राजा को और बाद में टोंक के नवाब को बैठाया गया था। बैंटिक ने महाराणा को मूल्यवान उपहार दिये। महंगी साज सज्जा से युक्त एक हाथी और दो घोड़े भी दिये।

    महाराणा जवानसिंह का अजमेर दरबार में उपस्थित होना, ब्रिटिश सरकार के लिये एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। महाराणा इस दरबार में आना नहीं चाहता था किंतु उसे गया की यात्रा करने के लिये अंग्रेज सरकार की सहायता की आवश्यकता थी, इसलिये उसने अजमेर दरबार में उपस्थित होना स्वीकार कर लिया। महाराणा जवानसिंह को अजमेर पहुँचने पर ज्ञात हुआ कि अगले दिन बूंदी का राव रामसिंह भी अजमेर आने वाला है और वह मेवाड़ की सेना के बीच से होकर गुजरेगा। राव रामसिंह के दादा ने महाराणा जवानसिंह के दादा की हत्या की थी इसलिये महाराणा के आदमियों ने महाराणा को सलाह दी कि बूंदी राव पर आक्रमण करके अपने दादा की हत्या का बदला निकाल लें किन्तु महाराणा जवानसिंह ने गवर्नर जनरल को कह भिजवाया कि मेरे दादा का हत्यारा रामसिंह मेरी सेना के बीच से होकर न निकले। गवर्नर जनरल ने बूंदी के राव का मार्ग बदलवाया और झगड़ा होने से बच गया।

    जयपुर का महाराजा सवाईं जयसिंह इस समय 18 साल का युवक था। उसका स्वागत एवं सम्मान भी उदयपुर के महाराणा के जैसा ही किया गया। बून्दी के महाराव रामसिंह का स्वागत, किशनगढ़ के महाराजा जैसा किया गया। जोधपुर के महाराजा ने, अजमेर न पहुँच सकने के लिये क्षमा याचना भिजवाई।

    ई.1832 के अजमेर दरबार में भाग लेने के लिये बम्बई का गवर्नर लॉर्ड क्लेयर तथा कर्नल स्किनर भी स्किनर्स घोड़ों के साथ अजमेर आये। 8 फरवरी 1832 को गवर्नर जनरल बैंटिक, बम्बई के गवर्नर लॉर्ड क्लेयर के साथ एक हाथी पर चढ़कर अपने स्टाफ तथा अंगरक्षकों के साथ महाराणा उदयपुर से मिलने उसके डेरे पर गया। वहाँ भी पहले की तरह उपहारों का लेनदेन किया गया। अगले दिन बैंटिक जयपुर के महाराजा से मिलने उसके डेरे पर भी गया। वह बूंदी महाराव तथा दो अन्य राजाओं के डेरे पर भी गया किंतु उन्हें कुछ उपहार नहीं दिया। विलियम बैंटिक के अजमेर आगमन के अवसर पर भारत भर से ब्रिटिश सेना के एक लाख सैनिक अपने अपने कमाण्डरों के साथ अजमेर पहुँचे। कुल दो सौ तोपें भी अजमेर लाई गईं। इसी यात्रा के दौरान लॉर्ड विलियम ने अजमेर के तारागढ़ को गिराने के आदेश दिये। इसके बाद वह किशनगढ़, जयपुर, अलवर तथा भरतपुर होता हुआ आगरा लौट गया।

    हैरानी की बात है कि उस समय राजपूताने में अन्तर्राज्य लूट की सर्वाधिक घटनायें जोधपुर, जयपुर, जैसलमेर, बीकानेर तथा सिरोही राज्यों में हो रही थीं, फिर भी इस दरबार में इन घटनाओं के सम्बन्ध में कोई विचार-विमर्श नहीं हुआ। इस दरबार में जैसलमेर, बीकानेर तथा सिरोही रियासतों के शासकों को तो आमंत्रित ही नहीं किया गया। स्पष्ट है कि इस समय तक भारत सरकार इस स्थिति में नहीं आई थी कि वह अपने प्रभाव का प्रयोग करके इन रियासतों द्वारा की जाने वाली अन्तर्राज्यीय लूट को रोक पाती।

    ई.1832 में सुविख्यात फ्रांसीसी प्रकृति विज्ञानी विक्टर जैमॉन्ट ने अजमेर तथा मेरवाड़ा की यात्रा की। इसी वर्ष अजमेर में पटवां की हवेली बननी आरंभ हुई जो ई.1840 में बनकर पूरी हुई।

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