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  • अजमेर का इतिहास - 4

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 4

    अजमेर के चौहान शासक (1)


    चौहानों का उद्भव

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    छठी शताब्दी ईस्वी के लगभग चौहानों का उदय हुआ। उन्होंने सांभर झील के आसपास अपनी शक्ति बढ़ाई। (फुलेरा तथा अजमेर के बीच, 260 53' से 270 1' उत्तरी अक्षांशों तथा 740 54' से 750 14' पूर्वी देशांतरों के बीच 20 मील लम्बी तथा 2 से 7 मील चौड़ी खारे पानी की झील। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 90 वर्गमील है।) राजशेखर द्वारा लिखित प्रबंधकोष के अनुसार चौहान शासकों में वासुदेव पहला शासक था जिसने ई.551 में सपादलक्ष (सांभर) में शासन किया। बिजोलिया अभिलेख कहता है कि वासुदेव सांभर झील का प्रवर्तक था। उसका पुत्र सामंतदेव हुआ। सामंतदेव का वंशज अजयराज था। अजयराज के वंशज प्रतिहार शासकों के अधीन रहकर राज्य करते थे किन्तु ईसा की ग्याहरवीं शताब्दी के लगभग उन्होंने स्वयं को प्रतिहारों से स्वतन्त्र कर लिया।

    चौहान शासकों की उपाधियाँ

    चौहानों का प्रारंभिक शासन सपादलक्ष देश पर था। उनकी राजधानी शाकंभरी (सांभर) थी। इसलिये वे शाकंभरीश्वर तथा शंभरीराज कहलाते थे। गूवक प्रथम को हर्षराय भी कहा गया है जो कि उसकी उपाधि जान पड़ती है। हर्षनाथ भगवान शिव का भैरव अवतार माना जाता है जो कि चौहानों द्वारा पूज्य था। वि.सं.1215 (ई.1158) के नरहड़ लेख में विग्रहराज चतुर्थ के नाम के आगे परमभट्टारक-महाराजाधिराज परमेश्वर श्रीमद्, तथा नाम के पीछे देवराज्ये अंकित किया गया है। ये उपाधियाँ चौहानों के सम्पूर्णप्रभुत्व सम्पन्न शासक होने की घोषणा करती हैं। पृथ्वीराज चौहान को राय पिथौरा कहा जाता था। राय उसकी उपाधि जान पड़ती है तथा पिथौरा का आशय पृथ्वीराज से है।

    अजमेर की स्थापना

    इतिहासकार अजमेर का स्थापना काल ई.145 से लेकर ई.1153 (वि.सं. 1170) के लगभग बताते हैं जो कि एक बहुत ही लम्बा समय है। कर्नल टॉड ने एनल्स एण्ड एण्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान, हण्टर ने इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इण्डिया, तथा वाटसन ने गजेटियर ऑफ अजमेर में अजमेर की स्थापना का काल 145 ईस्वी बताया है जो कि अजमेर नगर की स्थापना की सबसे प्राचीन तिथि है।

    समस्त इतिहासकार इस बात को स्वीकार करते हैं कि अजमेर की स्थापना चौहान राजा अजयपाल ने की और अजमेर का प्राचीन नाम अजयमेरु था। उसका सही समय अभी तक निर्धारित नहीं हो सका है। हर बिलास शारदा ने अजयपाल का शासन काल छठी शताब्दी ईस्वी का अंत अथवा सातवीं शताब्दी का आरंभ माना है। अपने इस मत के समर्थन में उन्होंने चौहान राजाओं की उस वंशावली का उल्लेख किया है जो राजशेखर द्वारा लिखित ग्रंथ प्रबंधकोश में दी गई है। इस वंशावली के अनुसार अजमेर का संस्थापक अज या अजयपाल, शाकम्भरी (सांभर) के चौहान शासकों के क्रम में तीसरा था तथा इसे अजयराज भी कहा जाता था। वह चौहान वासुदेव का पौत्र तथा चौहान सामंतदेव का पुत्र था।

    डॉ.दशरथ शर्मा ने अर्ली चौहान डाइनेस्टीज में अजयराज को अजमेर का संस्थापक माना है तथा उसके दो और नाम अजयदेव तथा अल्हन भी बताये हैं। उन्होंने अजमेर की स्थापना का काल 1170 विक्रमी ( ई.1113) के आसपास निश्चित किया है। उन्होंने अपना मत अपभ्रंश काव्यत्रयी के आधार पर प्रस्तुत किया है जिसके लेखक जिनदत्त सूरी, अर्णोराज के समकालीन थे। यह पुस्तक प्रबंधकोश से भी पुरानी है। इसके आधार पर चौहान राजा अजयराज शाकाम्बरी के राजाओं के क्रम में पच्चीसवें नम्बर पर आता है। इस प्रकार से एक वंशावली में राजा का क्रम तृतीय तथा दूसरी वंशावली में उसी राजा का क्रम पच्चीसवां है। पर्याप्त संभव है कि ये दो अलग राजा हों। इसलिये इनका कालक्रम भी अलग हो। यद्यपि प्रबंधकोश अपभ्रंश काव्यत्रयी से बाद का है तथापि प्रबंधकोश के मत को पूर्णतः त्याग देना तर्कसंगत नहीं है।

    डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने भी अजयराज को अजमेर का संस्थापक माना है तथा अजमेर का स्थापना काल ई.1113 माना है। मुराद अली ने लिखा है कि जिस राजा ने पटन (जहाँ सोमनाथ का मंदिर था) बसाया, उसी ने अजमेर को भी आबाद किया।

    शाकाम्बरी के चौहान राजाओं के क्रम में सभी इतिहासकार यह स्वीकार करते हैं कि इस क्रम में प्रथम राजा वासुदेव था। प्रबंधकोश में इस राजा का काल 608 विक्रमी (551 ई.) दिया गया है। साथ ही भण्डारकर के आधार पर दशरथ शर्मा भी यह स्वीकार करते हैं कि उसका काल 627 ईस्वी के लगभग था। यह अंतर उतना नहीं जितना कि अजयराज के काल के सम्बन्ध में है। इस कारण प्रबंधकोश का मत अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

    यद्यपि हर बिलास शारदा ने प्रबंधकोश के आधार पर शाकाम्बरी के पहले चौहान राजा वासुदेव के काल को 551 ईस्वी तथा उस श्रेणी में तृतीय अजयराज को छठी शताब्दी से पहले के काल में मानकर अजमेर की स्थापना इसी काल में बताई है परंतु वे अपने इस मत के समर्थन में ऐसा कोई निश्चित तर्क प्रस्तुत नहीं कर सके हैं जिसके आधार पर इस तिथि को निर्विवाद रूप से सही माना जा सके। डॉ. दशरथ शर्मा द्वारा बताया गया अजमेर का स्थापना काल 1170 विक्रमी (1113 ई.) के लगभग को भी पूर्ण रूपेण सही नहीं माना जा सकता क्योंकि ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे कि अजमेर नगर के इस समय से पूर्व स्थित होने का ज्ञान मिलता है।

    कर्नल टॉड ने लिखा है कि चावड़ावंश का राजा बीरदेव कन्नौज का अधिपति था। उसकी एक पुत्री का नाम मिलन देवी (मीनल देवी) था। यह राजकुमारी, अजमेर के चौहान राजा को ब्याही गई थी। उसकी पंद्रहवीं पीढ़ी में कुमारपाल हुआ। वस्तुतः टॉड ने गलती से चौलुक्य राजा को चावड़ा राजा लिखा है। क्योंकि कुमार पाल चौलुक्य था न कि चावड़ा। कुमार पाल ने ई.1143 से 1171 तक गुजरात पर शासन किया। यदि वह वीरदेव की पंद्रहवीं पीढ़ी में था तो वीरदेव का काल लगभग 300 से 350 साल पहले का अर्थात् ईसा की आठवीं शताब्दी का ठहरता है। अतः इससे भी अनुमान होता है कि आठवीं शताब्दी में अजमेर नगर अस्तित्व में था।

    तारीखे फरिश्ता में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जिनके अनुसार अजमेर वि.सं. 1170 (1113 ई.) से काफी पहले मौजूद था। अजमेर का सबसे पहले नाम उस समय आता है जिस समय ई.997 में सुबुक्तगीन के विरुद्ध लाहौर के शासक की सहायता के लिये अजमेर के राय ने अपनी सेना भेजी थी। डॉ. दशरथ शर्मा इस वर्णन को सही नहीं मानते क्योंकि मध्ययुगीन इतिहासकार जैसे उतबी, इब्न उल अथर एवं निजामुद्दीन आदि लेखकों के ग्रंथों में इस घटना का उल्लेख नहीं है। इसलिये वह तारीख ए फरिश्ता में लिखित अजमेर को शाकाम्बरी मानते हैं। तथापि जब तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता कि अजमेर की स्थापना उस काल में नहीं हुई थी, तब तक हम फरिश्ता के कथन को पूर्ण रूपेण असत्य नहीं मान सकते। डॉ. दशरथ शर्मा स्वयं स्वीकार करते हैं कि भले ही यह बाद में लिखा गया ग्रंथ है किंतु यह अन्य मुस्लिम ग्रंथों से अधिक विस्तृत है तथा स्थान-स्थान पर इसकी सूचनायें प्राचीन हिन्दू ग्रंथों से मिलती हैं। इस ग्रंथ में कुछ सामग्री उन ग्रंथों से भी ली गई है जो अब उपलब्ध नहीं हैं। इस कारण जब तक तारीखे फरिश्ता के विरुद्ध कोई ठोस प्रमाण नहीं मिल जाता, तब तक फरिश्ता के कथन को त्यागा नहीं जा सकता। इस आधार पर अजमेर का स्थापना काल 997 ई.से पहले आ जाता है।

    हर बिलास शारदा ने इस काल से पहले के भी कुछ उदाहरण अजमेर के अस्तित्व में होने के सम्बन्ध में दिये हैं। उनके अनुसार अजमेर में दिगम्बर जैन मुनियों के थड़ों एवं छत्रियों में 8वीं एवं 9वीं शताब्दी के शिलालेख मिले हैं। इनमें भट्टाकर रत्न कीर्ति के शिष्य हेमराज की कीर्ति समाधि पर अंकित शिलालेख पर तिथि विक्रमी 817 (760 ई.) है और इस प्रकार अजमेर कम से कम इस काल में एक सम्पन्न नगर था। यद्यपि यह संभव है कि अजमेर की स्थापना से पूर्व भी जैन मुनियों की स्मृति में इन थड़ों एवं छत्रियों का निर्माण किया गया हो। अन्य छतरियों में ई.845, ई.854 तथा ई.871 की तिथियां दी गई हैं।

    आठवीं से 10वीं शताब्दी में राजा धरणीवराह ने अपने भाइयों को नव कोट दिए जिसका एक पद्य इस प्रकार से है- मण्डोवर सावंत हुवो अजमेर अजैसू। गढ पूंगल गजवंत हुवो लुद्रवै भाणभू। भोजराज धर धाट हुवो हांसू पारक्कर। अल पल्ल अरबुद्द भोजराजा जालंधर। नव कोड़ किराडू संजुगत, थिर पंवार हर थपिप्या। धरणीवराह धर भाइयां, कोट वांट जू जू कियो।

    इस कवित्त से भी यह सिद्ध होता है कि अजमेर दसवीं शताब्दी से पूर्व एक प्रमुख नगर था।

    कलचुरि संवत 490 (वि.सं. 796 तथा ई.सन् 739) का चालुक्य पुलकेशी दानपत्र कहता है कि अरब के खलीफा हशाम (ई.724 से 743) के भारतीय प्रदेशों के शासक जुनैद की सेना ने मारवाड़, भीनमाल, अजमेर तथा गुजरात आदि पर चढ़ाई की। इससे भी प्रकट होता है कि अजमेर आठवीं शताब्दी से पहले अस्तित्व में था।

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