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  • अजमेर का इतिहास - 39

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 39

    कैवेण्डिश से स्पीयर्स तक


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    24 अक्टूबर 1827 को मि.कैवेण्डिश अजमेर का सुपरिण्टेण्डेण्ट बनकर आया। उसने अजमेर नगर का आधुनिकीकरण किया तथा प्रशासन में भी कई सुधार किये। उसने अजमेर नगर को मदार गेट के बाहर, पूर्व की तरफ ठीक उसी स्थान पर बढ़ाना आरंभ किया जिस स्थान पर मराठा सरदार ने सांतुपुरा की स्थापना की थी जिसे बाद में बालाजी इंगलिया ने तोड़ दिया था। कैवेण्डिश ने मदारगेट के बाहर बाजार एवं कॉलोनी बसाई। यह नया क्षेत्र कैवेण्डिशपुरा के नाम से जाना गया। कैवेण्डिश ने अजमेर नगर के दक्षिण में डिग्गी दरवाजे के निकट परकोटे को विस्तारित किया तथा उसरी गेट बनवाया। यह कार्य ई.1828 में आरंभ होकर 18 अक्टूबर 1831 को पूरा हुआ।

    जनवरी 1831 में मेवाड़ पॉलिटिकल एजेंसी समाप्त कर दी गई तथा महाराणा से राजनीतिक सम्बन्धों का कार्यभार अस्थाई रूप से अजमेर के सुपरिण्टेण्डेण्ट एण्ड पोलिटिकल एजेण्ट को दे दिया गया। 28 नवम्बर 1831 को कैवेण्डिश का स्थानांतरण हो गया।

    मूर तथा अलैक्जेण्डर स्पीयर्स

    कैवेण्डिश ने अपने सहायक मि. मूर को कार्यभार सौंपा जो 1 जुलाई 1832 तक इस पद पर कार्य करता रहा। मूर के बाद मेजर अलैक्जेण्डर स्पीयर्स अजमेर का सुपरिण्टेण्डेण्ट हुआ। वह 16 अप्रेल 1834 तक इस पद पर कार्य करता रहा।


    1832 का अजमेर

    ई.1832 में फ्रैंच प्रकृति विज्ञानी मि. विक्टर जैक्मॉन्ट ने अजमेर का भ्रमण किया। उसने लिखा है कि मैंने उत्तरी भारत के मैदानों में अजमेर जितना सुंदर शहर और कोई नहीं देखा। ई.1832 में गढ़ बीठली के कुछ भाग को ध्वस्त करके यहाँ क्षय रोगियों के इलाज के लिए सैनीटोरियम की स्थापना की गई। इससे रास्तों को भी सुगम बनाने में सहायता मिली। दुर्ग के दक्षिणी भाग वाले रास्ते से नसीराबाद छावनी में सैनिक आते थे, जबकि अन्य लोगों के लिए इन्द्रकोट वाला मार्ग था। दुर्ग पर जाने के लिए मुख्य मार्ग के अतिरिक्त दो पगडण्डियां भी थीं। एक पगडण्डी गरीब नवाज की दरगाह के पीछे बड़ा पीर तथा नाना साहब के झालरे से खिड़की दरवाजा होते हुए दुर्ग तक जाती थी। दूसरी पगडण्डी खिड़की बुर्ज से सोमलपुर होते हुए दुर्ग तक जाती थी। इसके मध्य में लक्ष्मी पोल आती थी। लक्ष्मीपोल, तारागढ़ तथा चामुण्डा माता के पहाड़ के बीच की घाटी में रमणीय दृश्य देखने को मिलते थे।

    लक्ष्मी पोल से फूटा दरवाजा होते हुए किले के मुख्य द्वार तक पहुँचा जा सकता था। इसे दुर्ग का बड़ा दरवाजा भी कहा जाता था। अन्य पोलों में भवानी पोल, हाथी पोल और कोट दरवाजा प्रमुख थे। किले की सुरक्षा के लिये 14 बड़े बुर्ज थे, बड़े दरवाजे से पूर्व की ओर से घूंघट बुर्ज, गगड़ी बुर्ज, फूटा बुर्ज, नकारची बुर्ज, सिंगार चंवरी बुर्ज, अट्टा बुर्ज, जानुनायक बुर्ज, पीपली वाला बुर्ज, इब्राहीम शाहिद बुर्ज, दौराई बुर्ज, बन्दर बुर्ज, इमली बुर्ज, खिड़की का बुर्ज तथा फतेह बुर्ज कहते थे। फतहबुर्ज मुख्य द्वार के बिल्कुल समीप था। इनमें सबसे ऊंचा खिड़की का बुर्ज था और इसके दक्षिण में 'हक्कानी बक्कानी' सैयद का बुर्ज महत्त्वपूर्ण बुर्ज था। इस बुर्ज के आस-पास विषम चट्टानें तथा पानी के दो कुण्ड या चश्मे थे। इसके दक्षिण में हुसैन बुर्ज था जिसके निकट से नसीराबाद को रास्ता जाता था।

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