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  • अजमेर का इतिहास - 38

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 38

    हेनरी मिडिल्टन


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    22 अप्रेल 1825 को हेनरी मिडिल्टन अजमेर का सुपरिण्टेण्डेण्ट बनकर आया। उसने देखा कि विल्डर द्वारा किये गये बंदोबस्त (सैटलमेंट) में राजस्व की दरें काफी ऊँची थीं। बहुत से काश्तकार जो ब्रिटिश राज के पहले साल में अजमेर आये थे, वे वापस चले गये थे क्योंकि एक ओर तो फसलें खराब हुई थीं तथा दूसरी ओर उनसे अधिक राजस्व वसूला गया था। हेनरी मिडिल्टन ने बकाया राजस्व को नगद राशि की बजाय वस्तु में लेने की वकालत की।

    फ्रांसिस विल्डर की भांति हेनरी मिडल्टन ने भी व्यापारियों को सहयोग व प्रोत्साहन देने में दिलचस्पी ली। अजमेर में कारोबार करने वाले व्यापारियों की वह अप्रत्यक्ष रूप से भी सहायता करता था- जैसे अजमेर में किसी व्यापारी का रुपया बाहर के किसी आदमी में अटक जाता था तो वह वहाँ के अधिकारी को लिखकर उसका रुपया लौटवाने का प्रयत्न करता था। इस आशय का एक पत्र उसकी ओर से पहाड़ी व सिख रियासतों के सुपरिण्टेण्डेण्ट कैप्टिन रोस के नाम दिनांक 16 फरवरी 1823 ई.को लिखा गया। इस पत्र में मिडल्टन ने लिखा है- एक बहुत ही सम्मानित सेठ मिर्जामल जिसने अजमेर की व्यापारिक उन्नति के लिये बड़ा काम किया है, उसकी एक कोठी पटियाला में है और पटियाला के राजा के दीवान ने मिर्जामल से जो रुपया उधार लिया था वह अपने वादे के मुताबिक अभी तक नहीं लौटाया है। इतः आप इस संदर्भ में उसकी मदद करें और इसके लिये हम दोनों आपके आभारी होंगे।

    हेनरी मिडलटन की ओर से सम्मानित मिर्जामल के नाम लिखे गये अनेक पत्र हैं। 29 जनवरी 1823 को मिडलटन ने सेठ मिर्जामल को लिखा- तुम्हारी अर्जी बीकानेर सकुशल पहुँचने की तथा महाराजा साहब की मुलाजिमत करने की और दूसरी बातों की देखी। सारे हालात मामूम हुए। तुम्हारे शीघ्र ही अजमेर पहुँचने की सूचना से खुशी हासिल हुई। लाजिम है कि सरकार दौलतमदार कम्पनी अंग्रेज बहादुर की दौलतख्वाही के लिये आस पास तथा अजमेर की मण्डी में तिजारत व्यापार में अच्छी तरक्की करने पर ही सारा दारोमदार है। तिजारत की बढ़ौतरी से ही सल्तनत की खुशहाली है। पूरी लगन के साथ लगे रहो और हुजूर की तवज्जह और रंगबत मेहरबानी हमेशा अपने शामिल हाल समझो। अधिक क्या लिखा जाये।

    दिनांक - 29 जनवरी 1823 हेनरी मिडलटन की ओर से 17 जून 1824 को सम्मानित मिर्जामल सेठ के नाम से लिखे गये पत्र का मुख्यांश इस प्रकार से है- इसलिये कि हुजूर को व्यापारी लोगों की खुशी और उनकी भलाई, तरक्की आदि का बहुत ख्याल रहता है जिससे अजमेर की मण्डी की आबादी और रौनक का ख्याल रहता है और हमेशा मण्डी की रौनक के लिये ही विचार रहता है। चाहिये कि हमेशा अजमेर की मण्डी की आबादी और रौनक में लगे रहो ताकि मेहरबानी रियायतें मुनासिब की जा सकें। ई जानिब की खुशी, रजामंदी अजमेर की मण्डी की आबादी में ही समझो।

    एक अन्य पत्र में हेनरी मिडलटन ने सम्मानित सेठ मिर्जामल को लिखा है- तुम्हारे गुमाश्ते हरीराम की अर्ज से और तुम्हारी अर्जी मीर तेगअली के नाम की रसीद पूछताछ की कि तुम अजमेर आकर वहाँ की मण्डी को आबाद करने का इरादा रखते हो। चूंकि ई जानिब हुजूर को, विल्डर साहब के दस्तूर के मुआफिक अजमेर की आबादी खुशहाली रौनक मंजूर है एवं लिखा जाता है कि तुम पूर्ण विश्वास तसल्ली के साथ अजमेर में आओ। अजमेर की मण्डी की आबादी में लग जाओ एवं ई जानिब हुजूर की पूरी तवज्जह तथा मेहरबानियां अपने शामिल हाल समझो। दिनांक 14 जून सन् 1825 ईस्वी।

    यहाँ यह बता देना समीचीन होगा कि मिर्जामल 19वीं शताब्दी के ख्याति प्राप्त बैंकर तथा व्यापारी थे। उनका व्यापार उत्तर में काश्मीर से दक्षिण में मालवा तक एवं पश्चिम में मुलतान से पूर्व में कलकत्ता तक के विस्तृत क्षेत्र में फैला था। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी वे आयात-निर्यात का काम करते थे जो इनकी बम्बई स्थित जिंदाराम मिर्जामल नामक फर्म के माध्यम से संचालित होता था। यह फर्म इंगलैण्ड को काश्मीरी शॉलों का निर्यात करती थी और बढ़िया किस्म के काश्मीरी शॉलों की वहाँ अच्छी मांग रहती थी। भारत से निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में रुई सर्वप्रमुख थी। रेशम, जूट, शॉल, कॉफी, चीनी, हांथीदांत, कछुओं की खाल की ढालें, टिन मसाले, बबूल का गोंद, दालचीनी, कालीमिर्च, तेजपत्ता, जायफल, सौंठ, इवाइयां, कपूर, सनाय, इलायची, हींग, गोंद, लोबान, आदि का भी निर्यात होता था।

    फरवरी 1826 में बिशप हैबर ने अजमेर की यात्रा की। इसी वर्ष पुष्कर में बिहारीजी का मंदिर बनवाया गया। ई.1827 में मि. मिडल्टन ने अजमेर का तीसरा रेवेन्यू सैटलमेंट किया। 23 अक्टूबर 1827 तक मिडिल्टन अजमेर के सुपरिण्टेण्डेण्ट के पद पर रहा।

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