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  • अजमेर का इतिहास - 37

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 37

    फ्रांसिस विल्डर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा 18 जुलाई 1818 को दिल्ली के असिस्टेण्ट रेजीडेण्ट फ्रांसिस विल्डर को अजमेर का पहला ब्रिटिश सुपरिन्टेंडेन्ट बनाया गया। विल्डर तथा उसके उत्तराधिकारी अंग्रेज सुपरिंटेन्डेन्टों एवं अधिकारियों ने अजमेर नगर के विकास एवं लोगों के जीवन के उत्थान के लिये काम करना आरम्भ किया। कुछ इतिहासकारों ने इस बात की आलोचना की है कि अंग्रेज अधिकारियों ने अजमेर के नागरिकों के जीवन स्तर को सुधारने का कार्य किया। उन दिनों के एक अंग्रेज अधिकारी मिस्टर ला टाउच ने लिखा है कि मिस्टर विल्डर ने लोगों का जीवन स्तर सुधारने के लिए कुछ नहीं किया। इसी वर्ष कर्नल जेम्स टॉड ने अजमेर नगर की यात्रा की। ई.1818 में जब अंग्रेज अजमेर के शासक हुए तो राजगढ़ के पूर्व ठिकाणेदार ने अपना ठिकाणा वापस मांगा। इस ठिकाणे को नजराना न देने के जुर्म में मराठों ने जब्त कर लिया था। पूर्व ठिकाणेदार ने अपना ठिकाणा वापस लेने के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी से काफी लिखत-पढ़त की किंतु उसका ठिकाणा नहीं लौटाया आया।

    जोधपुर द्वारा विल्डर की सहायता लेने से इन्कार

    दिसम्बर 1818 में जब मारवाड़ में सरदारों का उत्पात बढ़ गया तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने विल्डर को निर्देश दिये कि वह मारवाड़ नरेश मानसिंह की सहायता करे। विल्डर अजमेर से चलकर जोधपुर पहुँचा तथा महाराजा से कहा कि सरदारों के उत्पात को दबाने के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी, महाराजा की सहायता करने को तैयार है। महाराजा मानसिंह ने कम्पनी से सहायता लेने से मना कर दिया क्योंकि उसे भय था कि इस सहायता के बाद मारवाड़ रियासत में कम्पनी का हस्तक्षेप बढ़ जायेगा। इस पर विल्डर फरवरी 1819 में अजमेर लौट गया।

    मेरों का दमन

    मेरवाड़ा क्षेत्र एक अनुपजाउ पहाड़ी इलाका था जहाँ जंगली आदिम जातियाँ निवास करती थीं। वे लोग खेती अथवा पशुपालन नहीं करते थे, लूटपाट ही उनके जीवन का एक मात्र ध्येय था। मेर लोग अपने आप को पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) की संतान बताते हैं। उनके अनुसार पृथ्वीराज ने एक मीणा कन्या से विवाह किया था जिससे अन्हल तथा अनूप नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। उन्हीं की संतानें मेर कहलाईं। कुछ मेर अपना सम्बन्ध मारवाड़ में धारा नगर की स्थापना करने वाले परमार धारा नाथ से बताते हैं।

    मेरों के बहुत से कबीले थे जिनमें से कुछ को बाद में इस्लाम में परिवर्तित कर लिया गया। एक बार इन मेरों ने मारवाड़ राज्य के कुछ गांव लूट लिये। जोधपुर नरेश गजसिंह ने अपने दीवान मुहणोत नैणसी को मेरों को दण्ड देने के लिए भेजा। मुहणोत नैणसी ने इनके 15 गांव जलाकर राख कर दिये। एक बार मेरों ने जहाँगीर का कैम्प लूट लिया। मेरों ने दक्षिण की यात्रा पर जा रहे औरंगजेब पर भी हमला करके उसकी सेना को लूट लिया। मिर्जा राजा जयसिंह (ई.1621-1667) ने इस क्षेत्र में घुसकर आदिम जातियों के लुटेरों को दण्डित किया।? किंतु वह झाक से आगे नहीं बढ़ सका। उसके बाद और कोई राजा मेरों को छेड़ने का साहस नहीं कर सका।

    मार्च 1819 में विल्डर ने नसीराबाद से एक विशाल सेना मेरवाड़ा में भेजी। मारवाड़ की सेना ने भी इस कार्य में अंग्रेजों की सहायता की। अंग्रेजी सेना ने कई गांवों पर अधिकार करके उन्हें जलाकर नष्ट कर दिया और मेरों के घर धरती में मिला दिये। अंग्रेजी सेना से आतंकित होकर मेर पहाड़ियों में भाग गये। झाक, शामगढ़ तथा तूलावा में मजबूत पुलिस चौकियां स्थापित की गईं। झाक तथा चांग नामक दो महत्त्वपूर्ण गांवों को पूर्णतः नष्ट करके उन्हें मैदान में बदल दिया गया। मेवाड़ के महाराणा ने भी मेरवाड़ा क्षेत्र में कई स्थानों पर अपने थाने स्थापित कर लिये।

    अजमेर नगर का विस्तार

    विल्डर के कार्यकाल में ई.1819 में अजमेर के बाहर की चारदीवारी का विस्तार किया गया। ई.1820 में अजमेर में आगरा गेट बनवाया गया। इसी वर्ष मि. विल्डर ने अजमेर का पहला रेवेन्यू सेटलमेंट तैयार किया। ई.1820 तक नया बाजार का काम पूरा हो गया। ई.1820 के आसपास ही मोती कटरा का काम पूरा हुआ। मोती बेगम, सर डेविड ऑक्टरलोनी की पत्नी थी। उसी के नाम पर इसका निर्माण करवाया गया था। जिस समय इसकी नींव रखी गई, इसका नाम नसीरगंज रखा गया क्योंकि दिल्ली के बादशाह ने ऑक्टरलोनी को नासिरउद्दौला की उपाधि दी थी किंतु जब यह बनकर पूरा हुआ तो इसका नामकरण मोती कटरा किया गया।

    ब्रिटिश शासित प्रांत अजमेर-मेरवाड़ा की स्थापना

    ई.1820 में मेरों ने अंग्रेजों द्वारा स्थापित पुलिस चौकियों के सारे आदमी मार डाले और पुलिस चौकियां लूट लीं। मेरों ने लूला तथा झाक को घेरकर, अंग्रेजों द्वारा स्थापित थानों को नष्ट कर दिया। इस पर अंग्रेजों की विशाल सेना ने पूरे मेर क्षेत्र में भयानक मार काट मचाई। इस अभियान में जोधपुर तथा उदयपुर राज्यों से भी सहायता ली गई। मेवाड़ ने फिर से मेरवाड़ा पर आक्रमण किया। नसीराबाद से लेफ्टीनेंट कर्नल मैक्सवैल के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने उदयपुर की सेना का साथ दिया। मेवाड़ की सेना ने शामगढ़, झाक तथा बोरवा पर अधिकार जमा लिया। ब्रिटिश सेना द्वारा अथूण पर भी आक्रमण किया गया।

    कर्नल जेम्स टॉड ने मेरवाड़ा क्षेत्र में अपने नाम से टॉडगढ़ तथा मेवाड़ महाराणा भीमसिंह के नाम पर भीमगढ़ की स्थापना की तथा एक छोटी सैनिक टुकड़ी वहॉं पर स्थाई रूप से नियुक्त की। इस अभियान को तीन माह में पूरा किया जा सका। उस समय मेरवाड़ा का एक हिस्सा अजमेर के अधीन, दूसरा उदयपुर के अधीन तथा तीसरा जोधपुर के अधीन था। मेर लोग एक राज्य में लूट मार करके, दूसरे राज्य में भाग जाते थे। अतः इन तीनों राज्यों ने एक सन्धि की और मेरवाड़ा के लिये अलग से अधिकारी नियुक्त किया गया जिसे दीवानी और फौजदारी मुकदमों का निर्णय करने का अधिकार था। इस अधिकारी को सेना की 8 कम्पनियां दी गईं। प्रत्येक कम्पनी में 70 सिपाही थे। मेरवाड़ा को अधीन करने के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अजमेर तथा मेरवाड़ा क्षेत्रों को मिलाकर ब्रिटिश शासित प्रदेश-'अजमेर-मेरवाड़ा' की स्थापना की।

    विल्डर के समय अजमेर का प्रशासन

    ई.1822 में मि.विल्डर ने अजमेर का दूसरा रेवेन्यू सैटलमेंट किया। 28 जून 1822 को कैप्टेन हॉल के नेतृत्व में मेरवाड़ा बटालियन का गठन किया गया। 15 दिसम्बर 1824 तक विल्डर अजमेर के सुपरिण्टेण्डेण्ट के पद पर कार्य करता रहा। विल्डर का छः साल का कार्यकाल अजमेर में शांति पूर्ण रहा। इस अवधि में नगर की कोई विशेष उन्नति तो नहीं हुई किंतु नगर में शांति की स्थापना उसकी महत्त्वपूर्ण उपलब्ध कही जा सकती है। उसने अजमेर जिले के समस्त जागरदारों को बुलाया और अथूण, शामगढ़ तथा झाक के ठाकुरों को संरक्षण का वचन दिया। उसने कस्टम तथा राजस्व विभाग की उन कुप्रथाओं को चलते रहने दिया जिनसे धन मिलता था। उसने अजमेर के सुपरिण्टेण्डेण्ट, जोधपुर, जैसलमेर तथा किशनगढ़ के पोलिटिकल एजेण्टों के कार्यालयों को अपने से जोड़ा। वह राजसी ठाठबाट के साथ हाथियों, घुड़सवारों तथा चोबदारों से घिरा रहता था। उसका प्रशासन अभावों से ग्रस्त था। उसके समय में अजमेर जिले में राजस्व एवं पुलिस संस्थापन का कुल मूल्य 1,374 रुपये प्रतिमाह था।

    यह मूल्य मि. विल्डर के अपने मासिक वेतन के आधे से भी कम था। विल्डर को प्रतिमाह 3000 रुपये वेतन मिलता था। ई.1823 तक उसके कार्यालय में किसी भी कानून की कोई प्रति उपलब्ध नहीं थी। कलकत्ता गजट की प्रति उसके द्वारा अस्वीकृत कर दी गई। कुछ समय बाद एक यूरोपीय सहायक की नियुक्ति की गई।

    व्यापारियों को सुरक्षा

    फ्रांसिस विल्डर की प्रमुख उपलब्धि यह भी रही कि उसने देश के हर कौने से व्यापारियों को अजमेर आकर बसने के लिये आमंत्रित किया। इस समय अजमेर में कम्पनी की अपनी कोई मुद्रा नहीं थी। अजमेर में छः टकसालों से ढले हुए सिक्के प्रचलन में थे। पहली टकसाल अजमेर में थी जो एक वर्ष में डेढ़ लाख रुपये के सिक्के ढालती थी इन्हें श्री शाही सिक्का कहा जाता था। किशनगढ़ की टकसाल में किशनगढ़ी रुपया ढाला जाता था। कुचामन के ठाकुर द्वारा कुचामन की टकसाल में कुचामनी रुपया ढाला जाता था। शाहपुरा, चित्तौड़ी तथा जयपुर में ढला हुआ झाड़शाही रुपया चलता था। विल्डर ने इन समस्त मुद्राओं को अस्वीकार कर दिया तथा केवल फर्रुखाबाद रुपये को मान्यता प्रदान की।

    वाणिज्य एवं व्यापार को प्रश्रय

    अंग्रेज अधिकारी, प्रदेश की आर्थिक समृद्धि के लिये वाणिज्य एवं व्यापार की उन्नति आवश्यक मानते थे। फ्रांसिस विल्डर ने अजमेर को व्यापारिक केन्द्र बनाने में बड़ी दिलचस्पी ली। उसने देशी राज्यों में बसने वाले समृद्ध व्यापारियों को पत्र लिखकर अजमेर में बसने एवं व्यापार करने के लिये प्रोत्साहित किया। उसने व्यापारियों को हर प्रकार की सुविधा एवं सुरक्षा प्रदान की। उनकी अन्य समस्याओं को भी सुलझाने में रुचि दिखाई।

    देशी रियासतों के जो व्यापारी अपना माल अन्य मार्गों से ले जाते थे, उन्हें अजमेर के रास्ते से माल लाने-ले जाने के लिये उत्साहित किया गया। विल्डर ने महसूल आदि की दरों में कमी करके उसे अन्य स्थानों के बराबर कर दिया। इन प्रयत्नों के फलस्वरूप व्यापारिक उन्नति के साथ-साथ नगर की रौनक एवं जनसंख्या बढ़ी। प्रजा में सम्पन्नता आई। सरकार की आय में भी वृद्धि हुई। इस संदर्भ की बहुत सारी मूल सामग्री चूरू के पोतेदार एवं अभिलेख संग्रह में सुरक्षित है। इन पोतेदारों की दुकानें एवं व्यापारिक कोठियां अजमेर में थीं। अतः इस अभिलेख संग्रह में अजमेर की दुकानों की बहियां एवं राजकीय मोहर छाप शुदा सरकारी दस्तावेज हैं जिनसे अजमेर की तत्कालीन व्यापारिक स्थिति एवं अंग्रेजों की व्यापार नीति पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है।

    पोतेदार संग्रह में उपलब्ध प्रथम राजकीय दस्तावेज 22 जुलाई 1818 का है। इस पर फ्रांसिस विल्डर बहादुर के नाम की, फारसी एवं हिन्दी भाषा में, चौकोर मोहर लगी हुई है। मोहर के बाईं ओर अंग्रेजी में विल्डर के हस्ताक्षर एवं तिथि अंकित है। मूल कागज फारसी में चूरू के चतुर्भुज-जिंदाराम साहूकारान के नाम लिखा हुआ है जिसमें कहा गया है कि तुम लोग विश्वास के साथ अपनी-अपनी दुकानें अजमेर में लगाओ और माल आस-पास से मंगवाओ। हर हालत में तुम व्यापारियों की परवरिश सरकारवाला से की जायेगी।

    दूसरा दस्तावेज 28 अप्रेल 1821 का है जिस पर फ्रांसिस विल्डर बहादुर की वैसी ही मोहर एवं हस्ताक्षर हैं। यह दस्तावेज फारसी लिपि, हिन्दी भाषा एवं शेखावाटी बोली में लिखा हुआ है जिसमें कहा गया है कि अब इलाका जोधपुर के हासिल का बंदोबस्त हो गया है जो नागौर के रास्ते शेखावाटी-पाली मार्ग पर चार रुपये चार आने के हिसाब से लगेगा। अतः अब अजमेर का भी उसी माफिक लगेगा। किसी से ज्यादा नहीं लिया जायेगा और न ही किसी को परेशान किया जायेगा। अतः पूरी जमाखातिरी से माल अजमेर के रास्ते ही लाओ।

    तीसरे दस्तावेज पर भी फ्रांसिस विल्डर की मोहर व हस्ताक्षर हैं। यह कागज भी फारसी एवं हिन्दी दोनों में लिखा गया है। इसमें कहा गया है कि तुम्हारी अर्जी आई, हाल मालूम हुआ। तुमने चैत बदी दो को हुजूर से मिलने के लिये रवाना होने की बात लिखी है तो ठीक है। तुम्हारी कोशिश एवं दौलतख्वाही से हुजूर को बड़ी खुशी हुई। तुम्हारे साथ के लिये दो सवार यहाँ से सुरक्षा हेतु भेजे जा रहे हैं सो इन सवारों के साथ जमा खातिरी से आ जाओ।

    चौथा दस्तावेज फ्रांसिस विल्डर की ओर से इज्जत आसार सेठ मिर्जामल के नाम तसल्लीनामा के रूप में 24 मई 1822 को लिखा गया है। इस पर भी वैसी ही मोहर एवं हस्ताक्षर हैं। इसमें कहा गया है कि तुम पूरी जमा खातिरी से अजमेर की मण्डी में दुकानें एवं कारखाने स्थापित कर व्यापार करो। यह बात छिपी नहीं है कि अधिकतर राजपूत सरदार कम्पनी अंग्रेज सरकार के खैरख्वाह बन चुके हैं। वे भी तुम्हें किसी प्रकार से कष्ट नहीं दे पायेंगे। तुम बड़ी खुशी से दुकानें खोलो, दिसावरों- पाली, मुम्बई, जैसलमेर, भावनगर, भिवानी आदि से माल अजमेर के रास्ते लाओ-ले जाओ। हासिल वगैरह सब नियमानुसार वसूल किया जायेगा, कोई ज्यादती नहीं होगी। तुम्हें किसी प्रकार का अन्देशा नहीं, चाहे जहाँ आना-जाना रखो। कोई भी भोमिया या मकानदार तुम्हारे साथ अनुचित व्यवहार नहीं करेगा और कदाचित किसी की तरफ से तुम्हारे हक में ज्यादती होगी तो सरकार की ओर से तुम्हारी मदद की जायेगी तथा उससे बदला लिया जायेगा।

    पांचवा दस्तावेज 29 दिसम्बर 1822 का है। सेठ मिर्जामल हरभगत पोतेदार ने अजमेर में बसने के लिये 20 दिसम्बर 1822 को फ्रांसिस विल्डर के सामने 10 शर्तें रखी थीं, जिन्हें 29 दिसम्बर 1822 को फ्रांसिस विल्डर ने इस दस्तावेज के माध्यम से स्वीकृति प्रदान की। इससे ज्ञात होता है कि विल्डर हर प्रकार से व्यापारियों को संतुष्ट करके उन्हें अजमेर में बसाने का इच्छुक था।

    छठे दस्तावेज से ज्ञात होता है कि सुपरिण्टेण्डेण्ट विल्डर फ्रांसिस ने मोहनदास रामजीदास को अजमेर में बाग लगवाने के लिये 15 बीघा, 17 बिस्वा जमीन दी जिसमें उन लोगों ने बड़ा सुहावना बगीचा बनाया और बाद में गर्वनर जनरल की ओर से भी इसकी मंजूरी मिल गई थी। गवर्नर जनरल ने अजमेर के चौधरियों व अहलकारों आदि के नाम आदेश दिया कि सम्मानित मोहनराम और रामजीदास ने फ्रांसिस विल्डर साहब बहादुर की आज्ञानुसार उक्त शहर के पास के जमीन के हिस्से में जो खालसा सरकार दौलत मदार की आराजी है, 15 बीघा 17 बिस्वा में एक बेहतरीन बाग एक हिस्से में लगाया, तामीर और बड़े ढंग से बगीचे को तरतीब दी है। सिलसिले से बराबर मेवेदार फलदार दरख्त लगाये हैं। बहुत ही सुहावना बगीचा लगाया है और इस आराजी की सनद, पट्टा मिलने की बाबत बहुजूर नवाब गवर्नर जनरल साहब बहादुर की सेवा में अर्जी पेश की है।

    सरदार दौलत मदार की हमेशा दिली लगन, तवज्जही यही है कि सरकार वाला की जनता को फायदा हो और वह खुशहाल और सुखी रहे। तमाम मुमालिके मेहरुसा के मुताअल्लिक के शहर, कस्बे और देहात एवं खास तौर पर दारुल खैर अजमेर शहर के सरसब्जो-शाबाद हरे-भरे रहें और जिससे रौनक खुशहाली हो। बस इन्हीं खयालात से, कौंसिल की बैठक में बहुत ही मेहरबानी फरमा कर उक्त आराजी बख्श दी जाने बाबत आदेश प्रदान किया। तुम्हें चाहिये कि उक्त बाग में जिसकी जमीन 15 बीघा 17 बिस्वा की आराजी है, किसी भी प्रकार से उलझन न डालें, रोकथाम नहीं होवे। और उक्त दोनों व्यक्ति अपने आपको अपने वारिसों को पीढ़ी दर पीढ़ी असलन बाद नसल ऊपर लिखी आराजी पर गांव कुआं और तमाम वृक्षों आदि पर अपना कब्जा और हक बिना किसी की शिरकत के समझें और इस लिखे को पुख्ता मुसतनद सनद समझें और इस बख्शीश का शुक्रिया अदा करते रहें। दिनांक 11 मार्च 1825 ईस्वी, मुताबिक दिनांक 20 रजब सन् 1240 हिजरी को लिखी गई।

    फ्रांसिस विल्डर की ओर से दिनांक 1 अक्टूबर 1819 को अंग्रेजी में लिखे गये दो कागज परिचय पत्र के रूप में मिले हैं। ये दोनों परिचय पत्र रामगढ़ के व्यापारी मिर्जामल को दिये गये हैं जो दिल्ली जा रहा था। इनमें से एक परिचय पत्र तो सर डेविड ऑक्टरलोनी के नाम लिखा गया है किंतु दूसरा किसके नाम लिखा गया है, यह स्पष्ट नहीं होता। इन परिचय पत्रों से ज्ञात होता है कि मिर्जामल ने अजमेर में कई दुकानें खोली हैं और अजमेर की तात्कालिक समृद्धि में उसका बड़ा योग रहा है।

    उन दिनों अजमेर में कारोबार करने वाला कोई व्यापारी जब बाहर जाता था तब कम्पनी सरकार की ओर से क्षेत्र के चौकीदारों को लिखित निर्देश दिये जाते थे कि वे उक्त व्यापारी के साथ किसी भी प्रकार का अनुचित व्यवहार न करें और उसे अपनी सीमा से सुरक्षित निकाल दें। इस आशय का एक पत्र संग्रह में मिला है जिस पर फ्रांसिस विल्डर की मोहर, हस्ताक्षर एवं 10 जून 1822 की तिथि अंकित है। इस पत्र का सारांश इस प्रकार से है-

    दस्तक राहदारी चौकीदारान व गुजरबानांन तमाम बंदोबस्त करने वाला रास्ता इलाका सरकार के नाम का जो मिर्जामल फोतेदार रामगढ़ का जिसकी एक कोठी तिजारती अजमेर की मण्डी में है। किसी काम के लिये जयपुर के रास्ते होकर दिल्ली जा रहा है और महीना आसोज में वहाँ से वापिस आयेगा। तो चाहिये कि रास्ते में कोई किसी तरह से उनके साथ मुजाहिम गैर वाजिब नहीं करे और अपनी हद से अच्छी तरह पहुँचा देवे। उनके साथ आदमी 30, हथियार 15 एवं 8 घोड़े और ऊँट हैं।

    ई.1824 के मध्य में जब मि. विल्डर का स्थानांतरण सौगोर तथा नर्बदा क्षेत्र में किया गया तब अजमेर तथा उसके चारों ओर भयानक अकाल पड़ा हुआ था। 16 दिसम्बर 1824 से 21 अप्रेल 1825 तक मूर के पास अजमेर के सुपरिण्टेण्डेण्ट के पद का कार्यभार रहा।

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