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  • अजमेर का इतिहास - 36

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 36

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी का नियंत्रण


    स्वामियों की अदला-बदली

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    सातवीं शताब्दी के आरंभ में अपनी स्थापना से लेकर ई.1192 तक, लगभग 600 वर्ष की अवधि में अजमेर, चौहान शासकों के आधिपत्य में रहा। ई.1192 से ई.1405 तक की 213 वर्ष की अवधि में अजमेर प्रायः दिल्ली सल्तनत के अधीन रहा। ई.1405 में राव चूण्डा ने अजमेर पर पहली बार अधिकार किया। तब से लेकर ई.1558 तक 153 वर्ष की अवधि में यह प्रायः मारवाड़ के राठौड़ों के अधिकार में रहा। इस बीच मेवाड़ के महाराणाओं, माण्डू के सुल्तानों तथा शेरशाह सूरी और उसके सूबेदारों ने भी अलग-अलग अवधि में अजमेर पर शासन किया।

    ई.1558 में अकबर ने अजमेर को मुगल सल्तनत में सम्मिलित किया। तब से लेकर ई.1719 में फर्रूखसीयर की हत्या होने तक 161 वर्ष की अवधि में अजमेर मुगलों के अधीन रहा। ई.1719 में यह पुनः अपने पुराने स्वामियों अर्थात् राठौड़ों के अधीन चला आया। ई.1791 में महाराजा विजयसिंह की पराजय के बाद यह मराठों के हाथों में खिसक गया। इस प्रकार यह 72 वर्ष तक पुनः राठौड़ों के अधिकार में रहा। बीच-बीच में मराठे इस पर अधिकार करते रहे। मराठे अजमेर पर अंतिम बार ई.1791 से ई.1818 तक अर्थात् 27 वर्ष ही शासन कर पाये। इस बीच कुछ समय के लिये राठौड़ महाराजा मानसिंह ने भी इस पर अधिकार जमाया किंतु वह अस्थाई था। ई.1818 में अजमेर के नये स्वामियों ने अजमेर का द्वार खटखटाया।

    भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का आगमन ई.1600 में हुआ जब 24 अगस्त को सूरत के मामूली से बंदरगाह पर अंग्रेजों के व्यापारिक जहाज 'हेक्टर' ने लंगर डाला। जहाज का कप्तान विलियम हॉकिंस नाविक कम लुटेरा अधिक था। वह सूरत से आगरा की ओर चला जहाँ उसकी भेंट बादशाह जहाँगीर से हुई। हॉकिंस की दृष्टि में बादशाह जहाँगीर इतना धनवान और सामर्थ्यवान था कि उसकी अपेक्षा इंग्लैण्ड की रानी अत्यंत साधारण सूबेदारिन से अधिक नहीं ठहरती थी। अंग्रेज इस देश में आये तो व्यापारिक उद्देश्यों से थे किंतु उन्होंने अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये एक हाथ में धर्म का झण्डा और दूसरे हाथ में तलवार थाम रखी थी। हॉकिन्स जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ। जहाँगीर ने उसे 400 का मन्सब तथा एक जागीर प्रदान की।

    ई.1615 में सर टामस रो ने अजमेर में जहाँगीर के समक्ष उपस्थित होकर भारत में व्यापार करने की अनुमति मांगी। जहाँगीर ने अंग्रेजों को बम्बई के उत्तर में अपनी कोठियां खड़ी करने और व्यापार चलाने की अनुमति दी। शीघ्र ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी के दो जहाज प्रति माह भारत आने लगे। वे जो माल इंग्लैण्ड ले जाते थे वह अत्यधिक ऊंचे दामों पर बिकता था।

    गौरांग महाप्रभु

    ई.1619 में सर टॉमस रो ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को सलाह दी- 'मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि भारतीयों के साथ सबसे अच्छा व्यवहार तभी किया जा सकता है जब एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में संवादवाहक की छड़ी हो।' पूरे डेढ़ सौ साल तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी इस सलाह पर अमल करती रही। फिर भी इस अवधि में अंग्रेज व्यापारी ही बने रहे। इस काल में उन्होंने 'व्यापार, न कि भूमि' की नीति अपनाई।

    मुगलों के अस्ताचल में जाने एवं पुर्तगाली, डच तथा फ्रैंच शक्तियों को परास्त कर भारत में अपने लिये मैदान साफ करने में अंग्रेजों को अठारहवीं सदी के मध्य तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। 23 जून 1757 के प्लासी युद्ध के पश्चात् ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भारत में प्रथम बार राजनीतिक सत्ता प्राप्त हुई। इसके बाद लॉर्ड क्लाइव (ई.1758-67) ने अपनी नीति 'भूमि, न कि व्यापार' कर दी। ई.1765 के बक्सर युद्ध के पश्चात् हुई इलाहाबाद संधि के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी पूर्णतः राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हुई। वारेन हेस्टिंग्स (ई.1772-1785) ने स्थानीय शक्तियों की सहायता से साम्राज्य विस्तार की नीति अपनाई। उसके समय में ई.1784 में पिट्स इण्डिया एक्ट आया जिसमें घोषणा की गयी कि अब भारत में किसी भी नये क्षेत्र को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के क्षेत्र में जबर्दस्ती नहीं मिलाया जायेगा किंतु ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इस नीति का अनुसरण कभी नहीं किया।

    शीघ्र ही अनुभव किया जाने लगा कि यदि भारत के स्थानीय राज्यों को अधीनस्थ स्थिति में नहीं लाया गया तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी। इससे प्रेरित होकर लॉर्ड कार्नवालिस (ई.1786-1793) ने आधा मैसूर राज्य, ईस्ट इण्डिया कम्पनी के क्षेत्र में मिला लिया। लॉर्ड वेलेजली (ई.1798-1805) ने अधीनस्थ संधियों के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को समस्त भारतीय राज्यों पर थोपा ताकि अधीनस्थ राज्य, ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध किसी तरह का संघ न बना सकें। उसने मैसूर राज्य का अस्तित्व ही मिटा दिया तथा 'सहायता के समझौतों' से ब्रिटिश प्रभुत्व को और भी दृढ़ता से स्थापित कर दिया। मुगलों के पतन के पश्चात् मराठे एवं पिण्डारी पूरे उत्तर भारत को रौंद रहे थे। वे हर समय राजपूताने में घूम-घूम कर लूटपाट करते रहते थे।

    इससे उत्तर भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिये खतरा बना रहता था। इसलिये कम्पनी के लिये आवश्यक हो गया कि वह राजपूताने की रियासतों पर नियंत्रण स्थापित करे। राजपूताना राज्यों को भी मराठों, पिण्डारियों तथा अपने ही सामंतों द्वारा की जा रही शत्रुतापूर्ण कार्यवाहियों से बचने के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी जैसे प्रबल संरक्षक एवं मित्र की आवश्यकता थी। लॉर्ड वेलेजली के समय में ई.1803 से 1805 के बीच अलवर, भरतपुर तथा धौलपुर राज्यों के साथ संधियां की गयीं।

    राजपूताने पर शिकंजा

    गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स (ई.1813-1823) द्वारा पद संभालने के समय अलवर, भरतपुर और धौलपुर को छोड़कर समस्त राजपूताना, अंग्रेजी नियन्त्रण से बाहर था। हेस्टिंग्स ने इन्हें अपने अधीन करने का निर्णय लिया। उसने दिल्ली स्थित ब्रिटिश रेजीडेंट चार्ल्स मेटकाफ को राजपूत शासकों के साथ समझौते करने का आदेश दिया। गवर्नर जनरल का पत्र पाकर चार्ल्स मेटकॉफ ने समस्त राजपूत शासकों के नाम पत्र भेजे जिसमें उसने राजाओं से अपना प्रतिनिधि भेजने तथा संधि वार्ता करने के लिये कहा।

    कम्पनी ने राजपूताना के 15 राज्यों के साथ सहायक संधियां कीं। करौली, टोंक तथा कोटा के साथ ई.1817 में, जोधपुर, उदयपुर, बूंदी, बीकानेर, किशनगढ़, बांसवाड़ा, जयपुर, प्रतापगढ़, डूंगरपुर तथा जैसलमेर के साथ ई.1818 में तथा सिरोही राज्य के साथ ई.1823 में संधि की गयी। बाद में जब झालावाड़ राज्य अस्तित्व में आया तब ई.1838 में झालावाड़ राज्य के साथ संधि की गयी। कम्पनी से संधि करने वाले राज्यों के शासकों को अपने आंतरिक मामलों में स्वतंत्र आचरण करने का अधिकार था किंतु उन्हें अपने खर्चे पर ब्रिटिश फौजों को अपने राज्य में रखना पड़ता था तथा एक राज्य को दूसरे राज्य से संधि करने के लिये पूरी तरह ब्रिटिश राज्य पर निर्भर रहना पड़ता था। बदले में कम्पनी ने राज्य की बाह्य शत्रुओं से सुरक्षा करने तथा आंतरिक विद्रोह के समय राज्य में शांति स्थापित करने का जिम्मा लिया।

    मराठों से अजमेर का सौदा

    राजपूताने में उस समय 17 रियासतें थीं जिनसे ईस्ट इण्डिया कम्पनी अधीनस्थ सहायता के समझौते कर चुकी थी। इन 17 राज्यों को दिल्ली से नियंत्रित करना संभव नहीं था। इसलिये अब कम्पनी को एक प्रादेशिक राजधानी की आवश्यकता थी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गवर्नर जनरल मारकीस ऑफ हेस्टिंग्स की दृष्टि, इन 17 राज्यों के ठीक केन्द्र में स्थित अजमेर नगर पर पड़ी। यह स्थान प्रादेशिक राजधानी स्थापित करने के लिये सर्वाधिक उचित था। उसने मराठों से अजमेर प्राप्त करने की योजना बनाई तथा 25 जून 1818 को दौलतराव सिंधिया के साथ एक संधि की। इस सन्धि के अनुसार दौलतराव सिंधिया ने अजमेर ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दे दिया।

    अजमेर पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का अधिकार

    29 जून 1818 को दिल्ली का रेजीडेण्ट जनरल सर ऑक्टरलोनी तथा कर्नल निक्सन पैदल सेना की आठ रेजीमेंट्स लेकर अजमेर आये। वे मदार पहाड़ी की तलहटी में ठहरे। उन्होंने दौलतराव सिंधिया के गवर्नर बापू सिंधिया को दौलतराव सिंधिया का हुक्मनामा भिजवाया जिसके द्वारा बापू सिंधिया को निर्देश दिया गया था कि वह तुरंत अजमेर खाली करके उसका अधिकार अंग्रेजों को सौंप दे। बापू सिंधिया ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया और विद्रोह करने पर उतारू हो गया। इस पर सर डेविड ऑक्टरलोनी ने अपनी सेनाओं को कार्यवाही करने के लिये तैयार किया। बड़े रक्तपात की आशंका से बापू सिंधिया, गढ़ बीठली को खाली करके अपने परिवार सहित ग्वालियर के लिये रवाना हो गया।

    नसीराबाद छावनी की स्थापना

    जनरल ऑक्टरलोनी ने तत्काल, 9 जुलाई 1818 को अजमेर नगर अपने अधिकार में ले लिया तथा 28 जुलाई को तारागढ़ पर भी अधिकार जमा लिया। 20 नवम्बर 1818 को जनरल ऑक्टरलोनी तथा ब्रिगेडियर नॉक्स ने अजमेर से 14 मील दूर बिर तथा नांदला गांवों के बीच एक सैन्य छावनी स्थापित की। इस छावनी को नसीराबाद नाम दिया गया।

    जनरल डी ऑक्टर लोनी को मुगल बादशाह ने ई.1804 में नसीरउद्दौला की उपाधि दी थी। इसी उपाधि की स्मृति को बनाये रखने के लिये ऑक्टर लोनी ने इस छावनी को नसीराबाद नाम दिया।

    मैगजीन की स्थापना

    जनरल ऑक्टर लोनी ने अजमेर में स्थित अकबर के महल अर्थात् दौलतखाना को मैगजीन में बदल दिया। मैगजीन के चारों ओर ऊँची और मजबूत दीवार बनायी गयी। इस मैगजीन में ब्रिटिश सेना के शस्त्र रखे जाने लगे।

    अजमेर की दशा

    ई.1818 में जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अजमेर पर अधिकार किया, तब अजमेर नगर तारागढ़ पहाड़ी की तलहटी में एक परकोटे के भीतर बसा हुआ था। इस परकोटे के भीतर 24 हजार मनुष्य रहते थे। यह उत्तर भारत का एक ऐसा महत्त्वपूर्ण शहर था जो किसी नदी के किनारे पर नहीं था। जबकि दिल्ली, आगरा, लखनऊ, मथुरा, बनारस आदि समस्त नगर बड़ी नदियों के किनारों पर स्थित थे। इस कारण अजमेर नगर में जल की कमी सदैव बनी रहती थी। मराठों और पिण्डारियों की लूट खसोट के कारण अजमेर के किसान, व्यापारी एवं आम आदमी की दशा अत्यंत दयनीय हो गई। चारों ओर मुर्दनी छाई हुई थी तथा खेत सूखे पड़े थे। उस समय अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र में 591 गांव थे जो 19 परगनों में विभक्त थे। अजमेर जिले का क्षेत्रफल 2,059 वर्ग किलोमीटर था, मेरवाड़ा क्षेत्र का क्षेत्रफल 602.99 वर्गमील था।

    अजमेर नगर के चारों ओर जागीरी ठिकाणे थे। सावर को छोड़कर समस्त जागीरी ठिकाणों के ठिकाणेदार जोधपुर के राठौड़ राजवंश के वंशज थे। इसलिये वे सदैव जोधपुर के राठौड़ शासक को ही अपना स्वामी मानते आये थे। जब ई.1818 में अंग्रेजों ने अजमेर पर अधिकार किया तब अजमेर नगर में भी मारवाड़ से आये लोग ही सर्वाधिक संख्या में रहते थे। उनकी भाषा, वेशभूषा, उनके सामाजिक व्यवाहर तथा परम्परायें भी मारवाड़ क्षेत्रवासियों जैसी ही थीं। उत्पत्तीय दृष्टि से, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक दृष्टि से अजमेर के लोग मारवाड़ का ही हिस्सा थे।

    नये युग में प्रवेश

    ई.1818 की संधि के बाद अजमेर शक्तिशाली गौरांग महाप्रभुओं अर्थात् अंग्रेजों के अधीन हुआ। इसी के साथ अजमेर ने एक नये युग में प्रवेश किया। ई.1818 के बाद अजमेर के आसपास के ग्रामीण क्षेत्र भी ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकार में जाने आरंभ हो गये। ई.1818 तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा राजपूताने की समस्त रियासतों से संधि कर लेने के बाद युद्धों का चलन समाप्त हो गया।

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