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  • अजमेर का इतिहास - 35

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 35

    अजमेर पर मराठों का शासन (2)


    उन्नीसवीं शताब्दी में अजमेर


    बीठली गढ़ का पतन

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    मेजर लुइस बोरगिन पांच महीनों तक गढ़ बीठली पर तोपों से गोले बरसाकर उसे गिराने के निरर्थक प्रयास करता रहा। जब वह गढ़ को तोपों से हासिल नहीं कर सका तो कैप्टेन साइमेस को भेजा गया। साइमेस ने दुर्ग के भीतर स्थित सैनिकों को रिश्वत दी तथा 8 मई 1801 को गढ़ उसके हाथ आ गया। इसके बाद मराठों ने मॉन्स पैरोन को अजमेर का गवर्नर बनाया तथा पैरोन की सहायता के लिये मिस्टर लॉ को अजमेर जिले का प्रशासक नियुक्त किया। ई.1801 में जोधपुर नरेश भीमसिंह ने पुष्कर में जयपुर नरेश प्रतापसिंह की पुत्री से विवाह किया। महाराजा प्रतापसिंह का विवाह जोधपुर नरेश विजयसिंह की पौत्री अजब कंवर के साथ किया गया। इस अवसर पर मसूदा ठाकुर भैंरूसिंह, भिनाय का राजा उदयभान, पीसांगन का ठाकुर नाथूसिंह तथा खरवा का ठाकुर सवाईसिंह जोधपुर के महाराजा के सरदार होने के नाते उसकी चाकरी में उपस्थित हुए।

    महाराजा भीमसिंह का निष्फल प्रयास

    ई.1802 में जोधपुर नरेश महाराजा भीमसिंह ने भण्डारी धिराजमल को अजमेर पर अधिकार करने के लिये भेजा। धिराजमल ने भीषण आक्रमण किया किंतु उसका प्रयास निष्फल हो गया। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में अजमेर के आसपास के ग्रामीण क्षेत्र मराठों के अधीन चले गये।

    बालाराव इंगलिया

    ई.1803 में मराठा गवर्नर बालाराव इंगलिया ने अजमेर में सांतूजी द्वारा निर्मित सांतुपुरा को नष्ट कर दिया गया तथा वहाँ के भवनों में रहने वाले नागरिकों को अकबर द्वारा यात्रियों के लिये निर्मित सराय में रहने के आदेश दिये। इस सराय में 27 गुम्बदाकार कमरे थे। इनके सामने एक विशाल दरवाजा था जिस पर गणपति की मूर्ति स्थापित की गई और इस स्थान को गणपतपुरा कहने लगे। बालाराव इंगलिया ने मदार पहाड़ी के निकट बालापुरा नामक गांव की स्थापना की। उसने अजमेर नगर की प्राचीर की मरम्मत कराई तथा उसके चारों ओर खाई भी खुदवाई। ई.1803 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकारी एच. बी. डब्ल्यू ग्रेरिक ने गढ़ बीठली के सम्बन्ध में लिखा है कि इस किले का आकार-प्रकार ठीक है तथा यहाँ बढ़िया रास्ते से आसानी से पहुँचा जा सकता है।

    मानसिंह का अजमेर पर अधिकार

    ई.1803 में सिंधिया और ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच युद्ध आरंभ हुआ। इस समय बालाराव इंगलिया अजमेर का गवर्नर था। जोधपुर महाराजा मानसिंह ने सुअवसर देखकर अजमेर नगर पर अधिकार कर लिया तथा अजमेर जिले में कई स्थानों पर अपने थाने बैठा दिये। जब जसवन्तराव होल्कर अंग्रेजों से हारकर अजमेर की तरफ आया, तब महाराज ने मित्रता दिखला कर उसके कुटुम्ब को अपनी रक्षा में ले लिया। इससे जसवन्तराव होल्कर निश्चिन्त होकर मालवे की तरफ चला गया। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ ही समय बाद मराठों ने अजमेर पर अधिकार जमा लिया। जोधपुर महाराजा मानसिंह और जसवंतराव होलकर के बीच समझौता होने से ईस्ट इण्डिया कम्पनी को चिंता हुई और ई.1803 में कम्पनी ने महाराजा मानसिंह के साथ एक समझौता किया।

    मानसिंह ने इस संधि का तो अनुमोदन कर दिया किंतु साथ ही एक नई संधि का प्रस्ताव भी कम्पनी के गवर्नर जनरल को भिजवाया। संधि के इस नये मसौदे में अन्य शर्तों के साथ यह शर्त भी थी कि यदि युद्ध के दौरान अजमेर कम्पनी के हाथ लगता है तो अजमेर, महाराजा मानसिंह को सौंपा जायेगा और यदि महाराजा अजमेर को प्राप्त करने के लिये युद्ध अभियान करता है तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी इस कार्य में महाराजा की सहायता करेगी। गवर्नर जनरल ने नई संधि को स्वीकार नहीं किया तथा साथ ही, ई.1803 की संधि को भी निरस्त कर दिया। इस संधि के निरस्त होने के कुछ समय बाद महाराजा मानसिंह ने पुनः अजमेर पर अधिकार कर लिया।

    ई.1803 में महाराजा भीमसिंह की अचानक मृत्यु होने के बाद महाराजा मानसिंह जोधपुर का स्वामी हुआ। उसके राजतिलक के अवसर पर देवलिया का ठाकुर अजीतसिंह, भिनाय का राजा उदयसिंह, खरवा का ठाकुर भैंरूसिंह, जोधपुर दरबार की चाकरी में उपस्थित हुए। ई.1806 तक अजमेर महाराजा मानसिंह के अधिकार में रहा।

    मराठों का फिर से अजमेर पर अधिकार

    ई.1806 में मराठों ने फिर से अजमेर को अपने अधिकार में ले लिया। बालाराव इंगलिया को फिर से अजमेर का गवर्नर बनाया गया ई.1807 में बालाराव ने 60 हजार सैनिकों को लेकर मेरवाड़ा पर आक्रमण किया किन्तु परास्त होकर लौट आया। ई.1807 में बालाराव इंगलिया ने दौलतराव सिंधिया की ओर से गढ़ बीठली में स्थित खनग सवार की दरगाह में उत्तरी दालान बनवाया। बालाराव इंगलिया ई.1808 तक अजमेर का सूबेदार रहा। ई.1808 में तीन माह के लिये हीराखां भी सिंधिया की तरफ से अजमेर का गवर्नर रहा। ई.1809 में कर्नल टी. डी. बर्टन अजमेर आया। उसने लिखा है कि तारागढ़ किले पर जाने के लिए टेढ़े-मेढ़े संकरे रास्तों से पहाड़ पर चढ़कर जाना पड़ता है।

    तात्यां सिंधिया

    ई.1809 में तात्यां सिंधिया (गुमनाजी राव) सिंधिया की ओर से अजमेर का गवर्नर नियुक्त हुआ जो ई.1816 तक इस पद पर रहा। ई.1809 में उसने पुष्कर में ब्रह्माजी के मन्दिर का पुनर्निर्माण किया गया। इसी वर्ष दौलतराव सिंधिया अजमेर आया। उसने सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर में एक शिलालेख खुदवाया। ई.1810 में पिण्डारी अमीर खां के आदमियों मुहम्मद शाह खां तथा राजा बहादुर ने झाक पर आक्रमण किया किन्तु असफल रहे। तात्यां सिंधिया ने ई.1813 में खनग सवार की दरगाह में पश्चिम का दालान बनवाया।

    बापू सिंधिया

    ई.1816 में दौलतराव सिंधिया ने बापू सिंधिया को अजमेर का गवर्नर बनाया। वह ई.1818 तक अजमेर में रहा। उसने अजमेर में बापूगढ़ मंदिर का निर्माण एवं बजरंगगढ़ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। ई.1816 में मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह ने बरार (मेरवाड़ा) के विरुद्ध सेना भेजी किन्तु महाराणा की सेना को सफलता नहीं मिली।

    अजमेर में हवेलियों का निर्माण

    ई.1791 से 1818 की मराठा अवधि में अजमेर में ओसवाल सेठ गजमल लूणिया ने नाहर मौहल्ला में एक हवेली बनवाई जो गजमलजी की हवेली के नाम से प्रसिद्ध हुई। मराठों के शासनकाल में लाखन कोठरी में मामाइयों की हवेली का निर्माण हुआ। लाखन कोठरी में बनी अन्य प्रमुख हवेलियों में कनकमल लोढ़ा की हवेली, बहादुर मल अग्रवाल की हवेली, केसरी चंद मेहता की हवेली, सहसकरण मेहता की हवेली, प्रतापमल-कानमल मेहता की हवेली, जेठमल मेहता की हवेली, किशनचंद मेहता की हवेली सम्मिलित थीं।

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