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  • अजमेर का इतिहास - 34

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 34

    अजमेर पर मराठों का शासन (1)


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    ई.1790 में मराठों ने फिर से राजपूताना पर आक्रमण किया। उनके फ्रांसिसी जनरल डी बोग्ने ने अजमेर पर आक्रमण किया। वह 15 अगस्त 1790 को अजमेर आया। उसने दुर्ग को घेरने के लिये दो हजार तोप सेना तथा पैदल सेना अजमेर में छोड़ दी तथा स्वयं जोधपुर पर आक्रमण करने चला गया। इस समय सिंघी धनराज, खरवा का ठाकुर सूरजमल तथा भिनाय का राजा, देवलिया का बखतसिंह, टंटोती का ठाकुर गुलाबसिंह तथा मसूदा का ठाकुर भोपालसिंह अजमेर नगर के प्रभारी थे। सिंधिया ने अपनी जीत के लिये हनुमानजी का जप करवाने पर तीन लाख रुपये व्यय किये। होलकर की सेनाएं भी सिंधिया से आ मिलीं। सिंधिया ने डीबोग्ने से कहा कि मैं दिल्ली पर साम्राज्य स्थापित करना चाहता था किंतु राठौड़ों ने मेरा खेल खराब कर दिया है। इसलिये राठौड़ों से बदला लेना है। राठौड़ों को झुकाने के लिये मैं कोई भी मूल्य चुकाने को तैयार हूँ।

    मराठों का अजमेर नगर पर अधिकार

    जनरल डी बोग्ने ने अपनी तोपें आनासागर के किनारे जमाईं तथा अजमेर शहर पर बमबारी आरंभ कर दी। 22 अगस्त 1790 को तोपों की भयानक बमबारी से अजमेर नगर का परकोटा टूट गया। दस हजार मराठा घुड़सवार अजमेर नगर में घुस गये। अवसर पाकर मुसमलानों ने शहर के भीतरी दरवाजे भी खोल दिये। इससे मराठा घुड़सवार शहर के भीतरी भागों में घुसकर अजमेर को लूटने लगे। अजमेर नगर को हाथ से निकला हुआ देखकर धनराज सिंघी अपने 101 सरदारों को लेकर गढ़ बीठली में जा घुसा तथा चारों ओर से किलेबंदी कर ली। मराठों ने धनराज को बाहर निकालने के लिये गढ़ पर दो आक्रमण किये किंतु गढ़ बीठली अजेय खड़ा रहा।

    अजेय बीठली गढ़

    मराठों के फ्रैंच जनरल डीबोग्ने की सेना के एक अधिकारी ने 1 सितम्बर 1790 को एक पत्र में लिखा कि हम विगत 15 दिनों से इस दुर्ग पर घेरा डाले हुए हैं किंतु इस दुर्ग पर हम एक चिह्न तक नहीं छोड़ पाये हैं। हमारी तोपें काफी ऊँचाई पर रखी हुई हैं तथा लगातार बमबारी कर रही हैं किंतु प्रकृति ने इसे संकरी गलियों से इतना सुरक्षित बना रखा है कि गोले, दुर्ग की दीवारों तक नहीं पहुँच पाते। कुछ बड़े पत्थर गिरते हैं तो देर तक घाटियों में आवाजें गूंजती हैं। उनके पास दुर्ग में छः महीने का पानी और एक साल की रसद है।

    धनराज सिंघी का बलिदान

    छः महीने तक डी बोग्ने की सेनायें गढ़ बीठली के चारों ओर घेरा डाले हुए बैठी रहीं किंतु वे गढ़ को छू भी नहीं सकीं। जोधपुर नरेश महाराजा विजयसिंह ने इस शौर्य प्रदर्शन के लिये सिंघी धनराज तथा खरवा के ठाकुर सूरजमल को धन्यवाद ज्ञापित किया। इस बीच मेड़ता में जोधपुर की सेनाएं मराठों से परास्त हो गईं तथा दोनों पक्षों में संधि हो गई। 19 फरवरी 1791 को महाराजा विजयसिंह ने ठाकुर सूरजमल को लिखकर सूचित किया कि अजमेर दक्खिनियों को दे दिया जाये।

    सिंघी धनराज न तो अजमेर का दुर्ग छोड़ना चाहता था और न महाराजा विजयसिंह के आदेशों की अवहेलना करना चाहता था, इसलिये उसने जहर खा लिया। उसने अपने आदमियों से कहा कि महाराजा से जाकर कहना कि मैं चाहता था कि दक्खिनी यदि अजमेर पर अधिकार करना चाहते हैं तो मेरे शव पर से गुजरें तथा मैं यह भी चाहता था कि महाराजा की आज्ञा की अवहेलना कभी न हो। ये दोनों कार्य एक साथ इसी प्रकार संभव हो सकते थे। इस प्रकार अजमेर नगर दौलतराव सिंधिया को मिल गया किंतु अजमेर जिले के कई ठिकाणे लम्बे समय तक मारवाड़ रियासत के अधीन बने रहे।

    लखवा दादा को अजमेर की जागीर

    दौलतराव सिंधिया ने अजमेर की जागीर लक्ष्मणजी अनंत (लखवा दादा) को दे दी। उसी वर्ष अर्थात् ई.1791 में ही शिवाजी नाना को अजमेर का गवर्नर बनाया गया।

    महाराजा विजयसिंह की मृत्यु

    जोधपुर नरेश महाराजा विजयसिंह की ती इच्छायें थीं। पहली यह कि उसकी पासवान गुलाबराय मारवाड़ की महारानी बने। दूसरी यह कि मराठों को उत्तरी भारत से हमेशा के लिये दक्खिन में धकेल दिया जाये तथा तीसरी यह कि अजमेर मारवाड़ के अधीन रहे। महाराजा ने अपना पूरा जीवन तीनों लक्ष्यों को प्राप्त करने में लगाया किंतु जब ई.1790 में मराठों ने अजमेर पर आक्रमण किया तब महाराजा विजयसिंह की आयु 64 वर्ष हो चुकी थी। वह चालीस वर्ष तक शासन करके थक चुका था तथा चारों ओर षड़यंत्रों से घिरा हुआ था। फिर भी उसने पूरी हिम्मत से मराठों को सामाना किया किंतु अजमेर को बचा नहीं सका।

    13 अप्रेल 1792 को महाराजा विजयसिंह के पौत्र भीमसिंह ने जोधपुर दुर्ग पर छल से अधिकार कर लिया। 16 अप्रेल 1792 को राठौड़ सरदारों ने महाराजा विजयसिंह की पासवान गुलाबराय की हत्या कर दी गई। अजमेर हाथ से निकल जाने तथा तथा गुलाबराय के मार दिये जाने से महाराजा अत्यंत विकल हो उठा और 8 जुलाई 1793 को उसकी जोधपुर में मृत्यु हो गई। इस प्रकार तीनों अूधरे स्वपनों को लेकर वह इस असार संसार से चला गया।

    शिवाजी नाना

    शिवाजी नाना ई.1797 तक अजमेर का गवर्नर रहा। उसने तारागढ़ पर एक झालरा बनवाया जो नाना साहब का झालरा कहलाता था। उसने अजमेर में नया बाजार का डिजाइन तैयार किया तथा नया बाजार बसाना आरंभ किया। ई.1797 में नया बाजार की दुकानें बननी आरंभ हो गईं। शिवाजी नाना ने अजमेर पर कठोरता से शासन किया तथा जिले में शांति व्यवस्था स्थापित की। उसने अपना ध्यान मेर लोगों पर केन्द्रित किया तथा मेरवाड़ा क्षेत्र में कई थाने स्थापित किये। उसने शामगढ़ पर आक्रमण किया तथा उन जागीरदारों को दण्डित किया जिन्होंने पिछले युद्ध के बाद जोधपुर राज्य की अधीनता स्वीकार कर ली थी। उसने शाहपुरा से तीन लाख रुपये तथा सरवाड़ से 48 हजार रुपये जुर्माना वसूल किया।

    अन्य ठिकाणों से तीन साल का राजस्व वसूल किया तथा उन्हें अजमेर खालसा में सम्मिलित कर लिया। जब भिनाय के राजा उदयभान ने शिवाजी नाना को कर देने से मना कर दिया तो शिवाजी नाना का पुत्र बिस्वपत राव भाउ भिनाय के राजा को बंदी बनाकर अजमेर ले आया। इससे नाराज होकर भिनाय के सैनिकों ने भिनाय के तहसीलदार रामभाउ को बंदी बना लिया तथा लूटपाट मचाई। इस पर मराठों को विवश होकर उदयभान को मुक्त करना पड़ा। तालुकेदारों द्वारा दिया जाने वाला राजस्व घटा दिया तथा उनके साथ स्थाई बंदोबस्त किया। भिनाय के राजपूतों ने भी रामभाउ को मुक्त कर दिया।

    मराठों ने स्थानीय जागीरदारों से नजराना मांगा किंतु राजगढ़ के ठिकानेदार ने नजराना देने से मना कर दिया। इस पर मराठों ने राजगढ़ ठिकाणा जब्त कर लिया। ई.1792 में जनरल पैरॉन अजमेर छोड़कर दोआब चला गया तथा सिंधिया की सेना में भर्ती हो गया। ई.1793 में बदनौर के ठाकुर जयसिंह ने अथूण को जीत लिया, सरोत दुर्ग तथा अजीतगढ़ दुर्ग को नष्ट कर दिया तथा अजीतगढ़ में एक झील खुदवाई। ई.1794 में महादजी सिंधिया की मृत्यु हो गई तथा उसके स्थान पर दौलतराव सिंधिया ग्वालियर की गद्दी पर बैठा। ई.1797 में शिवाजी नाना ने अजमेर नगर में मुख्य गली नया बाजार का निर्माण करवाना आरंभ किया। उसी वर्ष शिवाजी नाना का देहांत हो गया।

    जसवंतराव भाऊ

    दौलतराव सिंधिया ने शिवाजी नाना के पुत्र जसवंतराव भाउ को अजमेर का गवर्नर बनाया। ई.1798 में दौलतराव सिंधिया की सेना में पूना में विद्रोह हुआ। इसी समय महादजी सिंधिया की विधवा ने भी दौलतराव सिंधिया के विरुद्ध युद्ध आरंभ कर दिया। दौलतराव को संकट में देखकर मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह ने अजमेर में जमे हुए मराठों पर आक्रमण किया। मराठों को संकट में देखकर दौलतराव सिंधिया के सेनापति गुलाबजी कदम ने नई सेना की भर्ती की जिसके बल पर अम्बाजी इंगलिया ने महाराणा को करारी मात दी।

    अम्बाजी इंगलिया

    ई.1800 में अम्बाजी इंगलिया ने लखवा दादा से अजमेर की जागीर छीन ली। अतः लखवा दादा विद्रोही हो गया। इस पर जनरल पैरॉन को आदेश दिये गये कि वह लखवा दादा का दमन करे। जब जनरल पैरॉन अजमेर की तरफ बढ़ा तो 14 नवम्बर 1800 को लखवा दादा अजमेर खाली करके मालवा चला गया। इस पर मेजर बोरगिन को अजमेर पर अधिकार करने के लिये भेजा गया। दिसम्बर 1800 में मेजर लुईस बोरगिन अजमेर दुर्ग के सामने पहुँचा। उसने दुर्ग पर लोहे से भी अधिक मजबूत धातु के गोले बरसाने आरंभ किये।

    मेजर लुईस बोरगिन का आक्रमण

    जब अठारहवीं शताब्दी के अंतिम दिवस पर सूर्य देव अस्ताचल को गये तो मेजर लुईस बोरगिन गढ़ बीठली के बाहर बैठा हुआ उस पर तोपों से गोले बरसा रहा था तथा अजमेर नगर पर मि. लो का अधिकार था। इस प्रकार हम देखते हैं कि अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में अजमेर दिल्ली के मुगलों के अधीन रहा जबकि अधिकांश समय या तो वह जोधपुर के राठौड़ों के पास रहा या फिर ग्वालियर के सिंधिया के पास। जिले का 60 प्रतिशत भाग जागीरी क्षेत्र था तथा यह जागीरी क्षेत्र पूरी शताब्दी के दौरान मारवाड़ रियासत के अंतर्गत बना रहा।

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