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  • अजमेर का इतिहास - 33

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 33

    विच्छिन्नता का युग (3)


    महादजी सिंधिया का अजमेर पर अधिकार

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    गढ़ बीठली में बंद मराठों ने महादजी सिंधिया के पास संदेश भेजकर कहलवाया कि या तो तुरंत सहायता भेजें या फिर हमें गढ़ खाली करना पड़ेगा। महादजी ने संदेश भिजवाया कि दस दिन तक गढ़ खाली न करें, मैं आ रहा हूँ। तण्टोटी का ठाकुर शेरसिंह अजमेर नगर के मुख्य द्वार के मोर्चे का प्रभारी था। बिशनसिंह इंदरकोट में अम्बा बाव के मोर्चे का प्रभारी था। जमादार साहिब खां चांदपोल का प्रभारी था। मारोठ का हाकिम तथा अन्य सरदार नूरचश्मा के पास मोर्चा जमाये हुए थे। 12 जून 1761 को गढ़ की तरफ से रात्रि में अचानक आक्रमण किया गया। यह आक्रमण इंदरकोट में अम्बाबाव के मोर्चे पर हुआ। इस आक्रमण में कुछ लोग मारे गये। चूण्डावत रतनसिंह तथा जगराम, अजमेर नगर से कटान बाव (इंदरकोट में) की तरफ आगे बढ़े तथा उन्होंने गढ़ वालों पर प्रत्याक्रमण किया। उन्होंने मराठा सेना को किले में वापस लौट जाने के लिये विवश कर दिया। इसके बाद बालू जोशी अपनी सेना लेकर इंदरकोट आया और सारे दिन अम्बाबाव में जमा रहा।

    जब यह सूचना आई कि महादजी सिंधिया विशाल सेना लेकर तेजी से अजमेर की ओर आ रहा है तो बालू जोशी ने मारवाड़ का तोपखाना मेड़ता भेज दिया तथा स्वयं भी अजमेर छोड़कर दस मील दूर भांवता चला गया। इसके बाद महाराजा विजयसिंह के धाभाई जग्गू ने गुलाबराय आसोप को संधिवार्ता के लिये महादजी सिंधिया के पास भेजा। सिन्धिया सेना लेकर बुधवाड़ा आ गया और यहाँ से वह बालू जोशी के शिविर की तरफ बढ़ा। दोनों तरफ से गोलाबारी आरंभ हो गई। इसी बीच उदावत, सुरतानोत तथा केशादासोत सरदार सिन्धिया से मिले और उससे कहा कि वे रात के समय बालू जोशी को बंदी बनाकर सिन्धिया को सौंप देंगे। बालू जोशी को यह समाचार मिल गया और वह ठाकुर फतहसिंह की सहायता से सामेल चला गया। रात्रि में वह बालूंदा चला गया। अगली सुबह वह मेड़ता में धाभाई जग्गू से जा मिला। इस प्रकार अजमेर पर फिर से सिन्धिया का अधिकार हो गया। विजयसिंह फिर से अजमेर को लेने की ताक में लग गया।

    महादजी सिंधिया ने ई.1763 से 1767 तक बापूराव पण्डित को अजमेर का गवर्नर बनाया। ई.1767 में महाराजा विजयसिंह पुष्कर आया। उसने भरतपुर के जाट राजा जवाहरसिंह को भी पुष्कर आमंत्रित किया। दोनों राजाओं ने एक दूसरे से सहयोग करने का वचन दिया। ई.1787 तक अजमेर सिन्धिया के पास ही रहा। उसने ई.1767 से 1769 तक संतूजी को अजमेर का गवर्नर बनाया। संतूजी ने ई.1769 में मदार गेट के बाहर एक उद्यान लगावाया इसे चिश्ती चमन कहा जाता था। यह उद्यान ख्वाजा की दरगाह को समर्पित किया गया। इसके निकट ही उसने एक मौहल्ला भी बसाया जिसे सांतूपुरा कहा जाता था।

    महादजी ने ई.1769-1770 तक अनवर बेग को, ई.1770 से 1773 तक संतूजी को अजमेर का गवर्नर बनाया। ई.1773 में मिर्जा चमन बेग ने अजमेर में आज के गवर्नमेंट कॉलेज के निकट ईदगाह का निर्माण करवाया यह आदिल बेग का पुत्र था तथा सिंधिया की ओर से मालवा का सूबेदार नियुक्त हुआ था। इसकी मस्जिद 130 गज लम्बी और 40 गज चौड़ी थी। ईदगाह में पांच दरवाजे थे। मस्जिद के सामने 130 फुट लम्बा तथा 52 फुट चौड़ा खुला स्थान था।

    महादजी सिंधिया ने ई.1774 से 1778 तक जीवाराम को अजमेर का गवर्नर बनाया। ई.1778 में जोधपुर नरेश विजयसिंह ने चांग (मेरवाड़ा) के विरुद्ध सेना भेजी। ई.1779 में रायपुर के ठाकुर अर्जुनसिंह ने जोधपुर राज्य की ओर से कोट किराना (मेरवाड़ा) पर आक्रमण किया। इस युद्ध में जोधपुर की सेना परास्त हो गयी। सिंधिया की ओर से ई.1783 से 1787 तक अनवर बेग को अजमेर का गवर्नर बनाया गया।

    महाराजा विजयसिंह का फिर से अजमेर पर अधिकार

    अजमेर अब भी महाराजा विजयसिंह की आंखों में घूमता था। उसके दो ही स्वप्न थे। एक तो अजमेर पर अधिकार करना तथा दूसरा, मराठों को राजपूताने से बाहर निकालना। वह दिन रात इसी उधेड़बुन में लगा रहता था। दुर्भाग्य से उसके सरदार तथा उसकी पासवान गुलाबराय में गहरी शत्रुता थी इसलिये विजयसिंह की बहुत सी ऊर्जा अपने दरबार की लड़ाई निबटाने में लग जाती थी। फिर भी वह मराठों को हानि पहुँचाने का कोई अवसर हाथ से न जाने देता था। यही कारण था कि महाराजा विजयसिंह ई.1754 में मेड़ता में मिली करारी हार के बावजूद ई.1787 में तुंगा के मैदान में मराठों के विरुद्ध लड़ने को तैयार हो गया। उसने अपनी सेनाओं को भीमराज सिंघी की अध्यक्षता में, जयपुर नरेश प्रतापसिंह की सहायता करने के लिये जयपुर भेजा किंतु ऐन वक्त पर जयपुर राज्य की सेनाएं मैदान से पीछे हट गईं। इस पर भी उसका सेनापति भीमराज सिंघी अपनी सेनाओं के साथ, तुंगा के मैदान में मराठों के विरुद्ध ताल ठोककर खड़ा रहा।

    ई.1787 में विजयसिंह ने तुंगा की लड़ाई में महादजी सिन्धिया को करारी मात दी। इस युद्ध से पहले सिन्धिया ने पराजय का स्वाद तक न चखा था। सिन्धिया मार खाकर आगरा की ओर भाग गया। राठौड़ों का सेनापति भीमराज सिंघी जब जयुपर से जोधपुर लौट रहा था तो उसने मार्ग में अजमेर पर भी आक्रमण किया तथा अजमेर में सिन्धिया के गवर्नर मिर्जा अनवर बेग से अजमेर छीन लिया। बेग ने स्वयं को गढ़ बीठली में बंद कर लिया। इस पर नागौर से मेहता रायचंद को चार तोपें तथा एक हजार सैनिकों के साथ अजमेर भेजा गया। जालौर से भी दो हजार सैनिक अजमेर भेजे गये। दो महीने तक गढ़ बीठली का घेरा चलता रहा। इसी बीच सिन्धिया ने अम्बाजी इंगलिया के नेतृत्व में सात हजार सैनिक अजमेर भेजे। उसे निर्देश दिये गये कि वह किशनगढ़ के राजा के निर्देशानुसार कार्य करे। इस पर विजयसिंह ने जालोर से भण्डारी शिवचंद के नेतृत्व में दो हजार सैनिक तथा 200 घुड़सवार पुष्कर भेजे गये। जोधपुर से सिंघी अखयराज, चाणोद से ठाकुर बिशनसिंह, रामदत्त ओझा तथा कई युवा सरदारों को अजमेर भेजा गया।

    मराठा सरदार अम्बाजी इंगलिया ने अजमेर से आठ मील दूर कयार में शिविर लगाया। चांदावत राठौड़ों की 20 तोपों ने रात होने पर तब तक अपने आप को बचाया जब तक अम्बाजी किशनगढ़ नहीं चला गया। मारवाड़ की सेनायें अखयराज की अध्यक्षता में गंगवाना तक चढ़ आईं। किशनगढ़ के राजा ने अम्बाजी को उकसाया कि वह मारवाड़ की सेनाओं पर आक्रमण करे। मारवाड़ की सेनाएं दो सेनाओं में विभक्त हो गईं। एक सेना अखयराज की अध्यक्षता में रही और दूसरी सेना रामदत्त ओझा तथा सवाईसिंह की अध्यक्षता में रही। इन दोनों सेनाओं के बीच में जालोर से आई सेना ने अपना कैम्प लगाया।

    मराठों ने भी अपनी सेना को तीन भागों में बांट लिया। उनकी एक सेना ने मारवाड़ के शिविर को लूटने के उद्देश्य से उस पर आक्रमण किया। दोनों पक्षों में भयानक मारकाट मच गई। मराठे हार कर भाग खड़े हुए। जब मराठों की पहली सेना मारवाड़ की सेनाओं के शिविर पर आक्रमण कर रही थी, तब अम्बाजी ने रामदत्त ओझा की सेना पर आक्रमण किया। अम्बाजी की सेना यहाँ भी हार गई। मराठों की तीसरी सेना ने जालोर से आई सेना पर आक्रमण किया। यहाँ भी राठौड़ों ने मराठों को परास्त करके दूर तक दौड़ा दिया। मराठों के 150 सैनिक मारे गये तथा 125 सैनिक घायल हो गये। अम्बाजी भी घायल होकर सरवाड़ की तरफ भाग खड़ा हुआ। काफी दूर तक पीछा करने के बाद मारवाड़ की सेना एक नदी के तट पर जाकर रुकी। अम्बाजी मालवा की तरफ चला गया। मारवाड़ की सेना, श्रीनगर एवं रामसर पर अधिकार करने के बाद अजमेर आई। मिर्जा अनवर बेग अब तक गढ़ बीठली की रक्षा कर रहा था किंतु राठौड़ सेनाओं के आते ही दुर्ग खाली करके बाहर आ गया। उसने राठौड़ों को 20 हजार रुपये तथा 45 घोड़े दिये ताकि उसे अजमेर से बाहर जाने की अनुमति मिल सके।

    अजमेर पर अधिकार करने के बाद राठौड़ों ने दिल्ली के बादशाह से सम्पर्क करके उसे संदेश दिया कि यदि वह सहायता करे तो मराठों को नर्बदा नदी के दक्षिण में धकेल दिया जाये। बादशाह ने जवाब दिया कि वह स्वयं लाचार है तथा सिंधिया उसे प्रतिदिन पांच हजार रुपये बादशाहत की रखरखाव के लिये दे रहा है। यदि जयपुर या जोधपुर उसे प्रतिदिन पांच हजार रुपये दे तो वह राजपूतों के मार्गदर्शन में काम करने को तैयार है। इस वार्तालाप के लिये बादशाह स्वयं दिल्ली से चलकर अलवर आया। राजपूतों ने बादशाह की बात मानने से मना कर दिया तथा दौलतराम हल्दिया ने बादशाह को दिल्ली लौट जाने के लिये कह दिया। इसी बीच मारवाड़ की सेना में हैजा फैल गया तथा हजारों राठौड़ सैनिक मारे गये। इस पर राठौड़ सरदार अपने डेरे उठाकर पुष्कर चले आये तथा वहाँ से अपने-अपने ठिकानों को चले गये। राठौड़ों का सेनापति भीमराज सिंघी जोधपुर लौट आया।

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