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  • अजमेर का इतिहास - 32

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 32

    विच्छिन्नता का युग (2)


    सलाबतखां को अजमेर की सूबेदारी

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    महाराजा अभयसिंह के मरने के बाद अजमेर सूबा सलाबत खां को दिया गया। सलाबत खां नाम मात्र का ही सूबेदार था क्योंकि कोई भी ठिकाना उसे राजस्व नहीं देता था। धन के अभाव में मुगल गवर्नरों की स्थिति हास्यास्पद हो गई थी। 19 अक्टूबर 1749 को जोधपुर महाराजा रामसिंह तथा अजमेर के सूबेदार सलाबतखां के बीच चुड़सियावास में युद्ध हुआ। महाराजा रामसिंह को जयपुर नरेश ईश्वरीसिंह की सहायता प्राप्त थी। इस युद्ध में पीसांगन का राजा शंभूसिंह मारा गया। महाराजा रामसिंह ने सलाबत खां को परास्त कर दिया। इसके बाद सलाबतखां ने महाराजा रामसिंह को एक लाख रुपये तथा रामसिंह के दीवान को पचास हजार रुपये दिये। इसके बाद दोनों पक्षों में शांति हो गई और सब अपने-अपने राज्य को चले गये।

    साहबा पटेल का अजमेर पर आक्रमण

    ई.1751 में नागौर के राजाधिराज बख्तसिंह ने अपने भतीजे जोधपुर नरेश रामसिंह को जोधपुर से बाहर निकाल दिया। बख्तसिंह ने रूपनगढ़ के राजा बहादुरसिंह को रामसर तथा श्रीनगर की जागीरें प्रदान कीं। बख्तसिंह ने राजगढ़ के 44 गांवों को अपने अधिकार में लेकर उन्हें रास के ठाकुर को दे दिया। उसी वर्ष ई.1751 में रामसिंह के निमंत्रण पर मल्हार राव होल्कर के सेनापति साहबा पटेल ने अजमेर पर आक्रमण किया। स्वयं रामसिंह भी साहबा पटेल की सहायता करने के लिये अजमेर आया। मेड़तिया राठौड़ों ने भी साहबा पेटल का साथ दिया। इन तीनों की सम्मिलित सेनाओं ने अजमेर पर अधिकार कर लिया तथा अजमेर के सूबेदार अमरसिंह गौड़ को जीवित ही धरती में गाड़ दिया।

    महाराजा बख्तसिंह की हत्या

    ई.1752 में जोधपुर नरेश बखतसिंह ने अजमेर पर अधिकार कर लिया। जयपुर वालों को यह कतई पंसद नहीं था कि अजमेर, राठौड़ों के अधिकार में जाये। इसलिये एक बार फिर राठौड़ नरेश की हत्या का षड़यन्त्र रचा गया। 21 दिसम्बर 1752 को राजाधिराज बख्तसिंह को सोनाली में जहर देकर मार दिया गया। इस हत्या में जयपुर नरेश की राठौड़ रानी का हाथ था जो किशनगढ़ की राजकुमारी थी तथा बख्तसिंह की भतीजी थी। बख्तसिंह की मृत्यु के बाद स्वर्गीय महाराजा अजीतसिंह के तीसरे पुत्र किशोरसिंह ने भिनाय पर अधिकार कर लिया। राजाधिराज बखतसिंह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र विजयसिंह जोधपुर की गद्दी पर बैठा। विजयसिंह ने लम्बे संघर्ष के बाद अपने राज्य को फिर से नियंत्रण में किया। ई.1756 तक अजमेर महाराजा विजयसिंह के अधीन रहा।

    कच्छवाहों, राठौड़ों तथा मराठों की अजमेर पर दावेदारी

    जब विजयसिंह ने जोधपुर पर अधिकार कर लिया तो रामसिंह ने मराठा सरदार जयअप्पा सिन्धिया को विजयसिंह के विरुद्ध अभियान के लिये आमंत्रित किया। जयअप्पा सिंधिया और रामसिंह की सम्मिलित सेनाओं ने ई.1756 में अजमेर पर आक्रमण करके उसे अपने अधिकार में ले लिया। रामसिंह की तरफ से पण्डित रामकरण पंचोली को तथा सिन्धिया की तरफ से गोविन्द राव को अजमेर का प्रशासक नियुक्त किया गया। खरवा, मसूदा तथा भिनाय रामसिंह के हिस्से में आये और शेष अजमेर प्रांत जयप्पा सिंधिया के भाई जनकोजी के अधिकार में आया।

    महाराजा विजयसिंह को भी अजमेर प्राणों से प्यारा था इसलिये वह हर समय अजमेर पर अधिकार करने की योजनाएं बनाता रहता था। अब अजमेर के कई दावेदार उठ खड़े हुए थे। एक तरफ तो जयपुर वालों का अजमेर पर दावा चला आ रहा था। दूसरी ओर जोधपुर भी अजमेर को पुनः प्राप्त करना चाहता था। तीसरी तरफ आधे अजमेर पर रामसिंह अधिकार जमाये बैठा था। चौथी तरफ मराठे अकेले ही अजमेर को हड़पने की ताक में थे।

    अंत में ई.1758 में मराठा सूबेदार गोविंदराज ने महाराजा रामसिंह के प्रतिनिधि रामकरन को अजमेर से बाहर निकाल कर पूरे अजमेर पर अधिकार कर लिया। इस पर महाराजा विजयसिंह ने रामसिंह को दिये गये प्रांतों पर अपना अधिकार जताते हुए अजमेर के आधे हिस्से की मांग की। गोविंदराज ने महाराजा विजयसिंह के इस दावे को स्वीकार कर लिया तथा मसूदा, खरवा एवं भिनाय विजयसिंह को सौंप दिये। विजयसिंह ने टंटोती में अपना थाना स्थापित किया। ये प्रांत ई.1791 तक महाराजा विजयसिंह के अधिकार में रहे।

    ई.1759 में अजमेर के मराठा सूबेदार ने ठाकुरों के साथ काफी कठोर व्यवहार किया। इससे नाराज होकर खवास के ठाकुर ने अन्य ठाकुरों के साथ मिलकर, मराठा सूबेदार को एक दुर्ग में बंदी बना लिया। जब मराठों की सेना आई तो उन्होंने मराठा सूबेदार को ठाकुरों की कैद से मुक्त करवाया।

    महाराजा विजयसिंह का अजमेर पर अधिकार

    ई.1761 में अहमदशाह अब्दाली ने पानीपत के मैदान में मराठा गवर्नर सदाशिव राव भाऊ को परास्त कर दिया। जोधपुर नरेश महाराजा विजयसिंह ने अपने लिये सुअवसर जानकर अपने सेनापति बालू जोशी को अजमेर पर आक्रमण करने भेजा। मराठा सेनापति गोविंदराव ने स्वयं को बीठली दुर्ग में बंद कर लिया तथा अजमेर की मजबूत किलेबंदी कर ली। बालू जोशी अजमेर को घेरकर बैठ गया। दो महीने की घेराबंदी के बाद दक्खिन से मराठा सेनाएं आईं। बालू घेरा उठाकर जोधपुर आ गया। उसी वर्ष महाराजा विजयसिंह ने बालू जोशी को अजमेर के ठाकुरों से पेशकशी वसूल करने भेजा। बालू ने पीसांगन, मसूदा तथा खरवा से 20-20 हजार रुपये, गोविंदगढ़ से 7 हजार रुपये, देवलिया तथा तण्टोटी से 17 हजार रुपये तथा भिनाय से 22 हजार रुपये की पेशकशी वसूल की। उसने बरली, जूनिया, ककड़ी, सावर तथा पारा से भी पेशकशी वसूल की। राजगढ़ को लूटने के बाद मारवाड़ की सेनाएं अजमेर की तरफ बढ़ीं।

    यहाँ पर रास, निमाज, निबोली तथा लाम्बिया के ठाकुर भी बालू जोशी से आ मिले। मेड़ता को सात लाख रुपये भिजवाये गये ताकि वहाँ से भी सेना तैयार करके अजमेर लायी जा सके। मराठे तीन दिनों तक अजमेर की रक्षा के लिये लड़ते रहे। उसके बाद पहाड़ी के ऊपर गढ़ बीठली में चले गये। अजमेर नगर पर महाराजा विजयसिंह का अधिकार हो गया। उसकी सेनाओं ने वीसल झील पर डेरा किया। अजमेर के फिर से हाथ आने पर महाराजा विजयसिंह को अपार संतोष हुआ।

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