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  • अजमेर का इतिहास - 31

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 31

    विच्छिन्नता का युग (1)


    महाराजा अभयसिंह को अजमेर की सूबेदारी

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    अजीतसिंह की हत्या के बाद अभयसिंह तथा बख्तसिंह ने मारवाड़ रियासत आपस में बांट ली। मुहम्मदशाह ने अभयसिंह को जोधपुर का राजा स्वीकार कर लिया तथा उसे अजमेर का सूबा भी प्रदान किया। बादशाह से विदा लेने के पश्चात् महाराजा अभयसिंह सीधा अजमेर आया। अजमेर पर अधिकार स्थापित करने के पश्चात् अभयसिंह ने जयपुर नरेश सवाई जयसिंह से भेंट की। राठौड़ों की ख्यात में यह भेंट जयपुर में बताई गई है जबकि टॉड एवं सूरज प्रकाश ने यह भेंट अजमेर में बताई है तथा महाराजा जयसिंह के अजमेर आने का कारण, पुष्कर में पितरों का श्राद्ध तर्पण करने हेतु बताया गया है।

    ई.1728 में शेख रहमतउल्लाह को तथा ई.1729 में वली मुहम्मद खां को अजमेर का सूबेदार बनाया गया। अब तक देश की राजनीतिक स्थिति में काफी परिवर्तन आ गया था। मुगल साम्राज्य पतन की ओर काफी आगे बढ़ चुका था तथा जोधपुर एवं जयपुर के हिन्दू शासक, अजमेर के सूबेदार की तुलना में बहुत शक्तिशाली हो चुके थे। मुगल शासक अब दिल्ली की राजनीति में ही उलझकर रह गये। इस कारण उन्हें सूबों में कायम मुगल सरकारों से कोई लेना देना नहीं रह गया। अजमेर पूरी तरह अपने भाग्य के भरोसे छोड़ दिया गया था।

    ई.1729 में अहमदाबाद के सूबेदार सरबलंदखां ने बादशाह के विरुद्ध विद्रोह किया। उसे दबाने के लिये बादशाह ने जोधपुर नरेश राठौड़ अभयसिंह को 18 लाख रुपये दिये तथा नवाब अजीमुल्ला खां को उसके साथ भेजा। अभयसिंह ने दिल्ली से चलकर अजमेर को अपने अधीन करके अपने अधिकारियों को अजमेर में नियुक्त किया। अभयसिंह ने अपने भाई राजाधिराज बख्तसिंह को सरबलंदखां के विरुद्ध अहमदाबाद भेजा। अजमेर से भी एक सेना अमरसिंह के अधीन अहमदाबाद भेजी गई। अभयसिंह ने अहमदाबाद पर आक्रमण किया। 10 अक्टूबर 1730 को हुए युद्ध में सरबलंद खां परास्त हो गया। इसी वर्ष उदयपुर के महाराणा ने बदनौर के ठाकुर जयसिंह तथा मसूदा के ठाकुर सुल्तानसिंह को अथूण पर आक्रमण करने के लिये भेजा। इस आक्रमण में मसूदा ठाकुर सुल्तानसिंह मारा गया।

    मराठों की आहट

    ई.1733 के आते-आते मुगलों की पकड़ पूरी तरह ढ़ीली पड़ गई और मराठों का उत्कर्ष चरम पर पहुँच गया। मराठों ने मारवाड़ की प्रत्येक रियासत को लूटा। जयपुर के राजा सवाईं जयसिंह ने उनसे पीछा छुड़ाने के लिये तीन लाख रुपये दिये। ई.1734 में मल्हार राव होल्कर ने अजमेर और उसके आस-पास के क्षेत्र को जी भरकर लूटा। मई 1735 में महाराजा अभयसिंह पुष्कर आया तथा एक माह पुष्कर में प्रवास करने के बाद वह अजमेर आ गया। उसने आनासागर के महलों में अपना डेरा जमाया। जब अभयसिंह को अजमेर में रहते हुए एक वर्ष हो गया तब महाराजा जयसिंह उससे मिलने के लिये अजमेर आया तथा अभयसिंह को अपने साथ जयपुर ले गया। ई.1736 में महाराजा अभयसिंह पुनः अजमेर आया। ई.1737 में मराठों ने दिल्ली को लूटा, उनका नेता बाजीराव दिल्ली से लौटते हुए अजमेर होकर गुजरा।

    जयसिंह को अजमेर की सूबेदारी

    ई.1737 में अजमेर परगना जयसिंह की सूबेदारी में चला गया। ई.1739 में नादिरशाह भारत आया। उसने मारवाड़ में घुसने के लिये बहाना बनाया कि वह मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की यात्रा करना चाहता है। जयपुर नरेश जयसिंह ने यह खबर सुनते ही अपने परिवार को उदयपुर भेज दिया किन्तु नादिरशाह ने अजमेर जाने का निश्चय त्याग दिया। ई.1740 में महाराजा अभयसिंह तथा नागौर के राजाधिराज बख्तसिंह ने जयपुर पर आक्रमण करने तथा उससे अजमेर छीनने का निर्णय लिया। बख्तसिंह अपनी सेना लेकर अजमेर आया तथा उसने अजमेर नगर पर अधिकार कर लिया। जिस समय जयसिंह को यह समाचार मिला, वह आगरा में था। वह उसी समय 50 हजार सैनिकों को लेकर अजमेर के लिये रवाना हो गया तथा तेजी से चलता हुआ अजमेर से 14 मील दूर ऊँटड़ा गांव पहुँच गया। इस समय बख्तसिंह के पास केवल 5 हजार घुड़सवार थे इसलिये उसने महाराजा अभयसिंह से सैनिक सहायता मंगवाई। जब महाराजा की ओर से कोई सेना नहीं भेजी गई, तब बखतसिंह ने अपने पांच हजार घुड़सवारों को साथ लेकर स्वयं ही युद्ध लड़ने का निर्णय लिया और वह अजमेर से 9 मील उत्तर पूर्व में स्थित गंगवाना गांव पहुँच गया।

    28 मई 1741 को गंगवाना में दोनों पक्षों के बीच भयानक युद्ध हुआ। जदुनाथ सरकार के अनुसार उस समय जयसिंह के पास मुगल बादशाह द्वारा उपलब्ध करवाई गई वह सेना भी थी जो उसे मराठों को अजमेर से दूर रखने के लिये दी गई थी। उसकी सेना में 10 हजार सैनिक थे। जबकि बख्तसिंह के पास केवल पाँच हजार घुड़सवार थे। जयसिंह की सेना अपने समक्ष तोपें खड़ी करके सन्नद्ध हो गई। मारवाड़ की सेना उन तोपों के बीच से होकर कच्छवाहों तक ऐसे पहुँच गई जैसे शेर भेड़ों के झुण्ड के बीच जा पहुँचते हैं। जयपुर के कई हजार सैनिक मार डाले गये एवं कई हजार घायल हो गये। उनमें से अधिकतर ने युद्ध लड़ा ही नहीं। कच्छवाहों की सेना भाग खड़ी हुई। केवल चार घण्टे की लड़ाई में कई वर्ग किलोमीटर लम्बा चौड़ा मैदान पूरी तरह साफ हो गया। जयसिंह मैदान से दो किलोमीटर दूर जाकर रुका। उसकी जान बहुत कठिनाई से बची थी। उसे युद्ध के मैदान से शर्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिला। बहुत देर तक वह अकेला ही खड़ा रहा। वह काफी विकल था। उसके निकट केवल कुछ सौ सैनिक ही बचे थे। शेष या तो मारे गये थे या फिर भय के कारण निकट की पहाड़ियों में भाग खड़े हुए थे। अपने इन्हीं सैनिकों के साथ वह अपनी राजधानी जयुपर के लिये रवाना हो गया।

    इधर बखतसिंह के एक हजार बहादुर सैनिकों में से अब कुछ ही जीवित बचे थे। बखतसिंह स्वयं भी बुरी तरह घायल हो गया था। वह पुष्कर में ठहरे हुए अपने बड़े भाई महाराजा अभयसिंह के पास चला गया। यहाँ से दोनों भाई महाराजा जयसिंह के पीछे चले जो अब तक अजमेर से आठ मील दूर लाडपुरा में था। जयसिंह ने अपने मंत्री रघुनाथ भण्डारी को महाराजा अभयसिंह के पास भेजकर उससे संधि कर ली तथा अजमेर, केकड़ी, परबतसर एवं रामसर राठौड़ों को देने स्वीकार कर लिये।

    महाराजा जयसिंह को अजमेर बहुत प्रिय था। इसी अजमेर के लिये उसने अपने परम हितैषी महाराजा अजीतसिंह की हत्या करवाई थी। इसलिये उसने अजमेर राठौड़ों को देना स्वीकार तो कर लिया किंतु दिया नहीं। इस प्रकार ई.1743 तक अजमेर परगना जयपुर नरेश जयसिंह के अधीन रहा। अजमेर सूबे के कई परगने मारवाड़ के राठौड़ों तथा मराठों के अधीन चले गये। 21 सितम्बर 1743 को सवाई जयसिंह की मृत्यु हो गयी तथा ईश्वरीसिंह जयपुर की राजगद्दी पर बैठा। मुगल बादशाह की ओर से ई.1743 में मीर मुहम्मद इस्लाम को अजमेर का सूबेदार बनाया गया।

    राठौड़ों का अजमेर पर अधिकार

    जयसिंह के मरने पर 3 अक्टूबर 1743 को महाराजा अभयसिंह ने मेड़ता से भण्डारी सुरतराम, ठाकुर सूरजमल, जोधा शिवराजसिंह तथा रूपनगढ़ के राजा बहादुरसिंह को अजमेर पर अधिकार करने भेजा। इन सरदारों ने कच्छवाहा फौजदार खंगारोत बिनयसिंह को मार डाला। अजमेर का हाकिम भाग खड़ा हुआ। उसी समय राजगढ़ से राजा सूरजमल गौड़ को भी बाहर निकाल दिया गया। भिणाय, रामसर और पुष्कर पर भी राठौड़ों का अधिकार हो गया।

    जब जयपुर नरेश ईश्वरीसिंह को इस बात की सूचना मिली तो उसने राठौड़ों का सामना करने का निश्चय किया तथा जयपुर से प्रस्थान करके ढाणी नामक ग्राम में डेरा किया। उधर महाराजा अभयसिंह ने भी मेड़ता से अजमेर के लिये प्रस्थान किया। अभयसिंह के डांगावास गांव पहुँचने पर नागौर का राजाधिराज बख्तसिंह भी नागौर से चलकर उसके साथ शामिल हो गया। वहाँ से चलकर दोनों ने अजमेर में डेरा किया। वहाँ से छातड़ी पहुँचने पर कोटा का भट गोविन्द राम 5,000 सेना के साथ उनसे आ मिला। इस प्रकार महाराजा अभयसिंह के पास सब मिलाकर 30,000 सेना हो गई।

    राजाधिराज बख्तसिंह की इच्छा तो युद्ध करने की थी परन्तु पुरोहित जगन्नाथ ने राजा अयामल के माध्यम से बात ठहराकर दोनों पक्षों में मेल करा दिया। इससे महाराजा ईश्वरीसिंह एवं महाराजा अभयसिंह के बीच बिना युद्ध के ही संधि हो गई। इस पर राजाधिराज बख्तसिंह, महाराजा अभयसिंह से नाराज हो गया और नागौर लौट गया। इसके बाद महाराजा ईश्वरीसिंह एवं महाराजा अभयसिंह में परस्पर भेंट हुई और आनासागर के महलों में गोठ हुई। तत्पश्चात् ईश्वरीसिंह जयपुर चला गया। महाराजा अभयसिंह का डेरा कुछ दिन तक छातड़ी में ही रहा।

    ई.1745 में महाराजा अभयसिंह अजमेर आया तथा नगर से बाहर ख्वाजा दानिश बाग में ठहरा। ई.1747 में मल्हार राव होलकर ने जयपुर नरेश के साथ संधि की तथा उसके बाद वह, महाराजा अभयसिंह से मिलने के लिये अजमेर आया। अजमेर से होलकर बूंदी चला गया।

    बख्तसिंह को अजमेर की सूबेदारी

    अप्रैल 1748 में मुगल बादशाह मुहम्मदशाह की मृत्यु के बाद अहमदशाह बादशाह बना। उसने बख्तसिंह को गुजरात व अजमेर का सूबेदार बना दिया। महाराजा अभयसिंह की इच्छा थी कि उसे स्वयं को अजमेर का सूबेदार नियुक्त किया जाये। महाराजा अभयसिंह ने वजीर कमरूद्दीन को सूचित किया कि वह अहमदाबाद या अजमेर जिस ओर भी मराठों का आतंक बढ़ने लगा है, जाने को तैयार है। साथ ही उसने यह भी लिखा कि अजमेर की सुरक्षा हेतु उसे एक बड़ी सेना की आवश्यकता है। अतः उसे 25 हजार रुपये भेजे जायें। उसके बदले में वह अहमदाबाद में मुगल सुरक्षा हेतु दस हजार राठौड़ अश्वारोही भेजने को तेयार है। इस पर अभयसिंह को अजमेर की सूबेदारी दे दी गई। 19 जून 1749 को अजमेर में महाराजा अभयसिंह की मृत्यु हो गई। उसका अन्तिम संस्कार पुष्कर में किया गया। उसके बाद रामसिंह जोधपुर की गद्दी पर बैठा।

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