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  • अजमेर का इतिहास - 30

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 30

    महाराजा अजीतसिंह (3)


    अजीतसिंह का अजमेर पर अधिकार

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    जब महाराजा अजीतसिंह को महाराजा जयसिंह के छल के बारे में ज्ञात हुआ तो अजीतसिंह ने तीस हजार घुड़सवारों के साथ अजमेर घेर लिया तथा अपनी तलवार निकालकर शपथ खाई कि वह अजमेर को अपने अधीन करेगा। उसने अजमेर के मुस्लिम गवर्नर को निकालकर तारागढ़ पर अधिकार कर लिया। उसके ऐसा करते ही अजमेर की मस्जिदों में बांग शांत हो गईं। मंदिरों में घण्टे बजने लगे। जहाँ कुरान पढ़ी जाती थी, वहाँ पुराण सुनाई देने लगे तथा मस्जिदों का स्थान मंदिरों ने ले लिया। काजी ब्राह्मणों के लिये रास्ता छोड़ने लगे। जहाँ गायें काटी गई थीं, वहाँ यज्ञों के लिये कुण्ड खोदे जाने लगे। अजीतसिंह ने सांभर झील तथा डीडवाना पर भी अधिकार कर लिया। उसने अनेक दुर्गों पर राठौड़ों के झण्डे चढ़ा दिये तथा बादशाह की परवाह छोड़कर स्वाधीनता पूर्वक आनासागर के शाही महलों में रहने लगा।

    अजीतसिंह अब बादशाह द्वारा दिये गये सिंहासन पर न बैठक कर अजमेर में अपने सिंहासन पर बैठा। उसने अपने सिर पर छत्र धारण कर लिया जो उसकी सर्वोच्चता का प्रतीक था। उसने अपने नाम के सिक्के ढलवाये। उसने लम्बाई नापने के लिये अपना गज तथा भार नापने के लिये अपना सेर चलाया। उसने न्याय करने के लिये अपना न्यायालय स्थापित किया। अपने सरदारों के लिये नये रैंक बनाये। उसने सम्प्रभु शासक के प्रत्येक चिह्न को स्थापित किया। एक कवि ने अजीतसिंह के अजमेर में होने के महत्तव को रेखांकित करते हुए लिखा है- अजमेर में अजमल वैसा ही था जैसे दिल्ली में अस्पति।

    महाराजा अजीतसिंह की इस सफलता के समाचार न केवल भारत वर्ष के कौने-कौने में फैल गये, बल्कि इस देश के बाहर मक्का और ईरान में भी उसकी खबरें पहुँच गईं।

    ये समाचार सुनकर बादशाह ने अजमेर को फिर से प्राप्त करने की तैयारी की। उसने सआदत खां को अजमेर की सूबेदारी प्रदान की तथा अजमेर पर चढ़ाई करने की आज्ञा दी परंतु इस कार्य में कोई भी अमीर, सआदत खां का साथ देने को तैयार नहीं हुआ। इस कारण अजीतसिंह पर हमला करने की, सआदत खां की हिम्मत नहीं हुई। इसके बाद शम्सामुद्दौला, कमरूद्दीन खां बहादुर और हैदरकुली खां बहादुर को इस कार्य के लिये तैयार किया गया किंतु किसी ने भी दिल्ली से आगे बढ़ने का साहस नहीं किया। अक्टूबर 1721 में हैदरकुली खां को गुजरात की तथा मुजफ्फर अली खां को अजमेर की सूबेदारी दी गई। मुजफ्फर अली खां बीस हजार आदमी लेकर अजमेर पर अधिकार करने पहुँचा किन्तु अजीतसिंह ने अजमेर खाली नहीं किया तथा महाराजकुमार अभयसिंह को मुजफ्फर अली खां का सामना करने के लिए भेजा। मुजफ्फर अली खां मनोहरपुर में बैठा रहा जहाँ धनाभाव के कारण उसके सिपाही उसे छोड़कर जाने लगे। इस पर मुजफ्फर अली खां को आमेर बुला लिया गया।

    चूड़ामन जाट द्वारा अजीतसिंह को सहायता

    जब मुजफ्फर अली खां बिना युद्ध किए ही लौट गया और उसने अजमेर की सूबेदारी का फरमान तथा खिल्लअत बादशाह को पुनः लौटा दी तो उसके स्थान पर सैयद नुसरतयार खां बरहा को अजमेर का नया सूबेदार बनाया गया तथा उसे अजीतसिंह पर चढ़ाई करने की आज्ञा दी गई। इसी बीच भरतपुर राज्य के संस्थापक चूड़ामन जाट ने अपने पुत्र मोहकम सिंह को सेना देकर महाराजा अजीतसिंह की सहायता के लिये अजमेर भेज दिया।

    अजीतसिंह द्वारा अजमेर लौटाने में आनाकानी

    अजीतसिंह को जब यह सूचना मिली कि नुसरतयार खां अजमेर पर अधिकार करने आ रहा है तो उसने महाराजकुमार अभयसिंह को नारनौल, दिल्ली तथा आगरा के आस-पास के प्रदेशों को लूटने की आज्ञा दी। नारनौल में अभयसिंह का, मुगल फौजदार बयाजीद खॉं मेवाती के हाकिम से सामना हुआ। अभयसिंह ने उसे परास्त करके नारनौल को लूटा तथा अलवर, तिजारा और शाहजहांपुर होते हुए दिल्ली से 16 किलोमीटर दूर सराय अली वर्दी खां तक जा पहुँचा। इसके बाद अजीतसिंह ने मुहम्मदशाह को चिट्ठी भिजवाई कि मैं तो बादशाह का वफादार हूँ, मुजफ्फर अली खां अजमेर आया ही नहीं।

    अतः मैं अजमेर किसे सौंपता? अब आपने नुसरतयार को अजमेर का गर्वनर बनाया है सो ठीक नहीं किया। इस पर बादशाह ने अजीतसिंह को ही अजमेर का सूबेदार बना दिया तथा सांभर के फौजदार नाहर खां को अजमेर सूबे का दीवान नियुक्त किया। अजीतसिंह को नाहर खां की नियुक्ति पसंद नहीं आई। अतः 6 जनवरी 1723 को अजीतसिंह ने मुगल शिविर पर आक्रमण करके नाहर खां, रूहुल्ला खां तथा उनके 25 आदमियों को मार डाला।

    मुहम्मदशाह का अधिकार

    अजीतसिंह की इस कार्यवाही के बाद, मुहम्मदशाह ने मुगल साम्राज्य के समस्त प्रबल सेनापतियों और सरदारों को अजमेर पहुँचने के आदेश दिये। उसने हैदर कुली खां को अजमेर का सूबेदार बनाया तथा शर्फुद्दौला इरदतमन्द खां को विशाल सेना देकर अजीतसिंह के विरुद्ध भेज दिया। सवाई जयसिंह, मुहम्मद खां बंगश, राजा गिरिधर बहादुर तथा अन्य कई अमीर, उमराव, सरदार, 50 हजार घोड़े लेकर अजीतसिंह के विरुद्ध इकट्ठे हुए। अजीतसिंह ने निमाज ठाकुर अमरसिंह और खीमसिंह भण्डारी के पुत्र विजयसिंह को अजमेर का दायित्व दे दिया तथा अपने परिवार को लेकर मारवाड़ चला गया।

    अमरसिंह तथा विजयसिंह ने एक महीने तक मुगलों को अजमेर में घुसने नहीं दिया। एक दिन हैदर कुली खां, सरबलंद खां तथा महाराजा जयसिंह हाथी पर सवार होकर ख्वाजा की दरगाह पर जा रहे थे कि तोप का एक गोला उनके हाथी पर आकर गिरा। इस गोले से हाथी पर सवार महावत की मौत हो गई। इससे शाही पक्ष में भय व्याप्त हो गया। उन्होंने महाराजा जयसिंह के माध्यम से महाराजा अजीतसिंह के साथ संधि वार्ता चलाई। दोनों पक्षों में संधि की शर्तें निर्धारित होने के बाद महाराजा अजीतसिंह ने अजमेर खाली करने तथा कुंवर अभयसिंह को शाही दरबार में भेजने का निर्णय लिया। इस संधि के बाद अजीतसिंह की सेना अपना झण्डा फहराती हुई, नगाड़े बजाती हुई, सम्मान पूर्वक दुर्ग से बाहर निकलकर मारवाड़ को चली गई। इस प्रकार ई.1724 में अजमेर पर फिर से मुगलों का अधिकार हो गया तथा जफरकुलीखां को अजमेर का सूबेदार बनाया गया।

    महाराजा जयसिंह की गद्दारी

    इस युद्ध में जयपुर नरेश सवाई जयसिंह मुगलों की तरफ से, अजीतसिंह के विरुद्ध लड़ने के लिये आया। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि जयसिंह को यह पसंद नहीं था कि अजीतसिंह अजमेर पर अधिकार करे। मन ही मन तो वह ई.1709 में ही अजीतसिंह का शत्रु हो गया था जब उसने अजमेर घेरे में अजीतसिंह का साथ नहीं दिया था किंतु ई.1724 में जयसिंह खुलकर सामने आ गया। जब अजीतसिंह अजमेर खाली करके चला गया तब भी सवाई जयसिंह को संतोष नहीं हुआ। वह अजीतसिंह को सदैव के लिये अपने मार्ग से हटा देना चाहता था ताकि अजमेर से राठौड़ों की दावेदारी समाप्त हो जाये। अजमेर प्राप्त करने की चाह में महाराजा जयसिंह यह भी भूल गया कि यह वही अजीतसिंह था जिसने बहादुरशाह की दाढ़ से आम्बेर निकालकर फिर से जयसिंह को गद्दी पर बैठाया था।

    महाराजा अजीतसिंह की हत्या

    महाराजा सवाई जयसिंह ने महाराजा अजीतसिंह के पुत्र कुंवर अभयसिंह को इस बात के लिये तैयार किया कि वह अपने पिता महाराजा अजीतसिंह की हत्या कर दे तथा जोधपुर राज्य पर अधिकार कर ले। राज्य के लालच में अभयसिंह अपने देवतुल्य पिता की हत्या करने के लिये तैयार हो गया। जिस अजीतसिंह की रक्षा के लिये महाराजा जसवंतसिंह की विधवा रानियां औरंगजेब के सैनिकों के हाथों तिनकों की तरह कट मरीं, जिस अजीतसिंह के लिये वीर दुर्गादास तथा मुकुंददास खीची ने अपना पूरा जीवन घोड़े की पीठ पर बिताया, जिस अजीतसिंह की रक्षा के लिये राठौड़ों ने बीस वर्ष तक युद्ध से मुंह नहीं मोड़ा, जिस अजीतसिंह के लिये मेवाड़ियों ने औरंगजेब को उत्तर भारत से निकालकर दक्षिण भारत में धकेल दिया, उसी अजीतसिंह को उसके पुत्रों ने मारने का निश्चय कर लिया।

    अदूरदर्शी राजकुमार अभयसिंह तथा बख्तसिंह, न तो मुगलों का षड़यन्त्र समझ पाये, न सवाई जयसिंह की दुष्टता को समझ पाये, न अपने पिता द्वारा चलाये जा रहे अभियान का मूल्य समझ पाये। राज्य के लालच में अंधे होकर उन्होंने 23 जून 1724 की रात्रि में महाराजा अजीतसिंह की हत्या कर दी। उस समय अजीतसिंह अपने महल में गहरी नींद में सो रहा था। जिस अजमेर पर विजय अर्जित करके अजीतसिंह ने राठौड़ों का डंका मक्का और मदीना तक बजवा दिया था, जिस अजमेर के लिये अजीतसिंह को विवश होकर अपनी पुत्री इंद्रकुंवरी का विवाह फर्रूखसीयर से किरना पड़ा था, उसी अजमेर ने स्वयं महाराजा अजीतसिंह के भी प्राण ले लिये थे।

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