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  • अजमेर का इतिहास - 3

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 3

    प्रागैतिहासिक काल से गुप्तकाल तक


    प्रागैतिहासिक काल

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अजमेर के निकट खेड़ा तथा कडेरी से मानव सभ्यता के ऊषा काल के मानव अवशेष प्राप्त हुए हैं। सिन्धु घाटी सम्भ्यता में बाट के रूप में सीसे तथा सफेद-काले अभ्रक के टुकड़े प्रयुक्त होते थे। वे टुकड़े इन्हीं पहाड़ों से ले जाये जाते थे। सिंधु सभ्यता में प्राप्त छोटे-छोटे आकार की तश्तरियां, साहुल-गोलक तथा स्वर्ण रजत निर्मित वस्तुएं जो सभ्यता के आरंभिक काल में पाई गई थीं, संभव है कि वे भी अजमेर से ले जाई गई हों। मेगालिथिक एवं नॉन मेगालिथिक पॉलिशयुक्त लाल एवं काले उपकरण भी इस क्षेत्र में प्राप्त हुए हैं। चित्रयुक्त सलेटी उपकरणों की भी उपस्थिति इस जिले में पाई गई है। भूरे रंग के चित्रित खण्डित बर्तन, गैर प्रस्तरित काले व लाल रंग के बर्तन तथा उत्तरी क्षेत्र की काली मिट्टी से निर्मित बर्तन भी अजमेर के निकट चोसला गांव से प्राप्त किये गये हैं।

    पौराणिक काल

    देवी पुराण में पुष्कर को नौ पवित्र अरण्यों में से एक बताया गया है। पद्म पुराण कहता है कि जब ब्रह्मा यज्ञ करने के लिये पृथ्वी पर एक उचित स्थान खोज रहे थे, तब उनके हाथ से एक कमल पुष्प गिर गया और धरती पर तीन स्थानों पर टकराया। ये तीनों स्थान ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य पुष्कर एवं कनिष्ठ पुष्कर के नाम से जाने जाते हैं। वाल्मिकी रामायण के अनुसार ऋषि विश्वामित्र ने पुष्कर में तपस्या की। एक दिन स्वर्ग लोक की अप्सरा मेनका, पुष्कर के पवित्र जल में स्नान करने के लिये आई। जब विश्वामित्र की दृष्टि मेनका पर पड़ी तो वे उसके रूपजाल में बंध गये। यह एक बहुश्रुत आख्यान है। महाभारत में आये एक उल्लेख के अनुसार महर्षि वेदव्यास महाराजा युधिष्ठिर को निर्देशित करते हैं कि सिन्ध के जंगलों को पार करने तथा मार्ग में स्थित कई छोटी नदियों को पार करने के बाद आपको पुष्कर सरोवर में स्नान करना चाहिये।

    कुछ इतिहासकारों के अनुसार अजमेर के तारागढ़ दुर्ग की स्थापना बाली ने अपनी पत्नी तारा के नाम पर की थी किंतु इस कथन का कोई एतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलता। फिर भी यह कथन, इस बात की ओर अवश्य संकेत करता है कि तारागढ़ की स्थापना काफी पुरानी है।

    चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व

    पुष्कर से पंचमार्क के सिक्के मिले हैं जो चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व में पुष्कर की समृद्धि की कहानी कहते हैं। अजमेर से 58 किलोमीटर दूर बार्ली गांव के भीलोत माता मंदिर से अशोक (132 ई.पू. से 72 ई.पू.) से भी पहले की ब्राह्मी लिपि का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है। यह शिलालेख राजपूताना संग्रहालय अजमेर में सुरक्षित है। यह शिलालेख वीर संवत् 84 (वि.सं. 386 अर्थात् ई.पू. 443) का है। इसकी तुलना सुहागपुरा तथा पिपरावा के शिलालेखों से की जा सकती है। ये शिलालेख खण्डित हैं। इनकी प्रथम पंक्ति जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी को इंगित करती है। दूसरी पंक्ति में वीर संवत 84 अंकित है, तीसरी पंक्ति में सालि मालिन का नाम दिया गया है।

    यह संभवतः दानदाता महिला थी। चौथी पंक्ति में माझमिका अथवा माध्यमिका शिलालेख की स्थापना करने के कारण के बारे में सूचना है। अनुमान है कि उस समय बार्ली, जैन संस्कृति का केन्द्र था। इस क्षेत्र में मिले सिक्कों से भी बार्ली की ब्राह्मीलिपि की तिथियों की पुष्टि होती है। इनसे यह भी अनुमान होता है कि उन दिनों बार्ली एक समृद्ध नगर रहा होगा। बार्ली का शिलालेख एक जैन राजा के बारे में सूचना देता है। स्थानीय आख्यानों के अनुसार यह राजा पद्मसेन था जिसने तारागढ़ पहाड़ी की तलहटी में पद्मावती नामक नगरी बसाई जिसे इंदरकोट भी कहते हैं। आज जहाँ सूरजकुण्ड, बनोली तथा किशनपुरा गांव स्थित हैं, कभी वहाँ पद्मावती नगरी स्थित थी। इस नगर को जल की आपूर्ति पाराची, नन्दा तथा सरस्वती नदियों से की जाती थी। उन दिनों इस क्षेत्र को कोंकण तीर्थ कहा जाता था। अब यह अजमेर नगर का ही अंग है। नदी के प्रबल वेग में बह जाने से पूर्व पद्मावती नगर, वर्षों तक फलता फूलता रहा।

    दूसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व

    मध्य प्रदेश के सांची स्तूप के चार शिलालेखों से, दूसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व में पुष्कर की महत्ता के बारे में ज्ञात होता है। इन शिलालेखों से ज्ञात होता है कि पुष्कर निवासी भिक्षु अर्हदीन, नगरक्षित, हिमगिरी तथा ईसिदत्ता (ईसिदत्ता भिक्षुणी थी) ने सांची में उदारता पूर्वक दान दिया। (इनके नाम इस प्रकार भी पढ़े जाते हैं- आय (आर्य), बुधरक्षित, संघरक्षिता, पुष्कर के लेवा पत्नी इषिदत्ता (ऋषिदत्ता)। इन शिलालेखों से यह भी ज्ञात होता है कि ईसा से दो सौ साल पहले, पुष्कर पवित्र तीर्थ स्थल तथा सुप्रसिद्ध नगर था।

    प्रथम शताब्दी ईस्वी

    गुलाम कादिर ने अपनी हस्तलिखित पुस्तक में एक संस्कृत लेख की चर्चा की है जिसमें लिखा है कि 'वि.सं. 106 (ई.49) में आषाढ़ शुक्ल पक्ष के 12वें दिन विक्रम व्यास की पुत्री, गोविन्द ब्राह्मण की पत्नी ने अपने पति के साथ आत्मदाह कर लिया।' यह पुस्तक ई.1830 में लिखी गई थी। अब यह मूल लेख कहीं भी देखने में नहीं आता है। कुषाण काल का एक खण्डित स्तम्भ नन्द में मिला था जो पुष्कर से कुछ मील की दूरी पर है। इस पर उत्कीर्ण संकेतों से स्पष्ट है कि ईसा की प्रथम शताब्दी के आरम्भ में पुष्कर और इसके निकटवर्ती क्षेत्र कला और संस्कृति के उन्नत केन्द्र थे। उसी अवधि में उत्तमभद्रों का होना सिद्ध होता है जिन्होंने सीथियनों के समक्ष समर्पण कर दिया था।

    दूसरी शताब्दी ईस्वी

    कर्नल टॉड ने अपनी पुस्तक एनल्स एण्ड एण्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान में अजमेर का स्थापना काल 145 ईस्वी बताया है। हण्टर ने इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इण्डिया तथा वाटसन ने गजेटियर ऑफ अजमेर में इसी तिथि को स्वीकार किया है किंतु इस तथ्य के समर्थन में अब तक कोई पक्का प्रमाण नहीं मिला है। अजमेर की स्थापना चौहानों ने की थी तथा चौहान इस समय तक अस्तित्व में नहीं आये थे। फिर भी यह निश्चित है कि इस समय अजमेर-पुष्कर क्षेत्र में उत्तमभद्र निवास करते थे। उनके पड़ौस में प्रथम शताब्दी ईस्वी के अंत तक मालवों ने वर्तमान जयपुर तथा टोंक के आसपास अपना स्वतंत्र गणराज्य स्थापित कर लिया था। इन मालवों का झगड़ा अजमेर-पुष्कर क्षेत्र के उत्तमभद्रों से हुआ। उत्तमभद्र शकों के मित्र थे। ऋषभदत्त (ऊषवदत्त) के लेख के अनुसार अजमेर का क्षेत्र शकों की क्षहरात शाखा के नहपान के अधीन था। (ऋषभदत्त नहपाण का दामाद था।)

    नासिक की एक गुफा के शिलालेख से ज्ञात होता है कि शकों का मुखिया ऋषभदत्त (ई.119-ई.123), भट्टारक (यह भट्टारक या तो नहपाण होना चाहिये या फिर नहपाण का भी स्वामी अर्थात् कोई कुषाण शासक होना चाहिये।) के आदेश से उत्तमभद्र जनजाति के मुखिया को मुक्त कराने के लिये गया था, जिसे मालवों द्वारा बंदी बना लिया गया। इस युद्ध में मालवों की करारी पराजय हुई जिसके पश्चात् शक वंश के राजा दीनिक के पुत्र उषवदत्त ने पुष्कर सरोवर में स्नान करने के बाद एक गांव तथा गायों का दान किया। पुष्कर से बैक्ट्रियन, यूनानी तथा शक क्षत्रपों के सिक्के बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं। इससे अनुमान होता है कि उस काल में पुष्कर समृद्ध नगर था। कर्नल टॉड ने पालनपुर के अंग्रेज अधिकारी मेजर माइल्स को ई.1818 में एक बैक्ट्रियन तगमे की प्रतिलिपि प्रदान की थी, टॉड ने लिखा है कि मुझे यह बैक्ट्रियन मुद्रा अवन्ती के खण्डहरों में अथवा अजमेर की पवित्र झील के किनारे मिली थी। जब बौद्ध धर्म अपने यौवन पर था, तब बौद्धों ने बनारस, गया और मथुरा की भांति पुष्कर में भी अपनी गतिविधियों को केन्द्रित किया किंतु इस धर्म के हा्रस के साथ ही पुष्कर से उनकी विदाई हो गई।

    गुप्त काल

    पुष्कर से गुप्त शासकों के सोने-चांदी के सिक्के तथा ताम्बे के गधैया सिक्के बड़ी संख्या में मिले हैं। इनसे अनुमान लगाया जा सकता है कि गुप्त काल में भी पुष्कर की समृद्धि और महत्ता बनी रही। चौहान शासकों के काल में भी अजमेर में गुप्तकालीन सोने और चांदी के सिक्के प्रचलन में थे।

    इस प्रकार हम देखते हैं कि सभ्यता के उषा काल से ही इस क्षेत्र में मनुष्य की हलचल आरंभ हो गई थी। ईसा से चार सौ साल पहले से लेकर गुप्तकाल तक बार्ली तथा पुष्कर इस क्षेत्र के प्रमुख नगर थे। गुप्तकाल अथवा उससे भी पूर्व किसी समय में तारागढ़ दुर्ग की भी स्थापना हो चुकी थी। संभव है कि गुप्तकाल में अथवा उससे भी पहले अजमेर नगर भी किसी न किसी रूप में अस्तित्व में आ चुका हो किंतु इस सम्बन्ध में अधिक साक्ष्य नहीं मिलते।

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