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  • अजमेर का इतिहास - 29

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 29

    महाराजा अजीतसिंह (2)


    शुजातखां का छल

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    शुजात खां ने जोधपुर नरेश अजीतसिंह के साथ छल करने के उद्देश्य से अजीतसिंह को संदेश भेजा कि मुझे मुगलिया सेवा से हटा दिया गया है। यदि अजीतसिंह चाहे तो अजमेर पर अधिकार कर ले। इस पर अजीतसिंह 25 हजार सैनिक लेकर जोधपुर से रवाना हुआ। उसने अजमेर के निकट के गांव लूट लिये। इसके बाद अजीतसिंह बिट्ठलदास भण्डारी के साथ अजमेर पहुंचा। इस समय तक फिरोज खां मेवाती का लड़का जो कि माण्डल का थानेदार था, अजमेर की रक्षा के लिये आया। नाहर खां तथा हुसैन खां ने भी अजमेर आकर अजमेर की किलेबंदी कर ली। इस पर अजीतसिंह अजमेर से 25 मील दूर पीसांगन के निकट दांतड़ा गांव में ठहर गया तथा उसने जोधपुर से तोपखाना मंगवाया।

    19 फरवरी 1709 को वह अजमेर पहुँचा तथा लड़ाई आरंभ हो गई। अजीतसिंह ने अजमेर नगर के उत्तरी हिस्से में आगरा गेट के बाहर गंज को लूट लिया। हुसैन खां मारा गया। अजीतसिंह ने नगर पर अधिकार करके तारागढ़ को घेर लिया। अब शुजात खां ने रूपनगढ़ के राजा राजसिंह (ई.1706 से1748) से सहायता मांगी। राजसिंह की मध्यस्थता के बाद दोनों पक्षों में समझौता हुआ। शुजातखां ने अजीतसिंह को 45 हजार रुपये तथा हाथी-घोड़े देकर अपना पीछा छुड़ाया। इसके बाद अजीतसिंह अपना विवाह करने के लिये प्रतापगढ़ देवलिया चला गया।

    हिन्दू नरेशों में मनमुटाव

    अब तक जयपुर नरेश सवाई जयसिंह तथा राठौड़ नरेश अजीतसिंह के सम्बन्ध काफी सौहार्द पूर्ण रहे थे किंतु अजमेर घेरे में जयसिंह ने अजीतसिंह का साथ नहीं दिया। अजीतसिंह लगातार अजमेर पर अपनी पकड़ मजबूत बनाता जा रहा था और सवाई जयसिंह को यह बात अच्छी नहीं लग रही थी क्योंकि जयसिंह स्वयं भी अजमेर पर आंख गढ़ाये हुए था। अजमेर के गवर्नर शुजात खां को, अजमेर पर घेरा डालने के मुद्दे पर जयसिंह और अजीतसिंह के बीच चल रहे मतभेद की जानकारी थी। 23 फरवरी 1709 को शुजातखां ने जयसिंह को पत्र लिखकर, अजीतसिंह से दूर रहने के लिये जयसिंह की प्रशंसा की क्योंकि अजीतसिंह ने अदूरदर्शिता पूर्ण ढंग से अजमेर पर घेरा डाला था।

    इसी बीच अजीतसिंह के मुसाहिब भण्डारी खीमसी ने अजमेर के निकट देवगांव पर आक्रमण करके उसके ठाकुर नाहरसिंह से 15 हजार रुपये का नजराना वसूल किया। नाहरसिंह के बेटे ने, अजीतसिंह की सेवा करना स्वीकार किया। प्रतापगढ़ से लौटकर अजीतसिंह अजमेर के निकट किशनगढ़ में आया तथा वहाँ पर अपना झण्डा गाढ़ दिया। इसके बाद उसने 13 अगस्त 1709 को रूपनगढ़ पर आक्रमण किया। रूपनगढ़ के राजा राजसिंह ने पहले तो सामना किया किंतु बाद में दो तोपें देकर अजीतसिंह से पीछा छुड़ाया। इसके बाद अजीतसिंह ने अजमेर के पास पीसांगन तथा जूनिया के ठिकानों पर आक्रमण करके उनके ठाकुरों को दण्डित किया क्योंकि उन्होंने अजीतसिंह के विरुद्ध राजसिंह का साथ दिया था।

    अजमेर घेरे में जयपुर नरेश जयसिंह द्वारा राठौड़ नरेश अजीतसिंह का साथ न देने के कारण दोनों के सम्बन्ध में आई यह खटास अब तक चल रही थी। जनवरी 1710 में जब जयसिंह ने अजमेर पर घेरा डाला और इस काम में अजीतसिंह का सहयोग मांगा तो अजीतसिंह, जयसिंह का साथ देने में काफी हिचकिचाया।

    अजीतसिंह अजमेर में

    जब अजमेर और आमेर के समाचार बहादुरशाह ने सुने तो वह दक्खिन से लौट कर अजमेर की तरफ आया तथा अजमेर से 60 मील दूर डण्डवा में डेरा डाला। उसने वहीं से अपने दूत अजीतसिंह के पास भेजे। अजीतसिंह ने बादशाह के दूत को खिलअत देकर उसका सम्मान किया। जब दूत ने यह बात बादशाह को बताई तो उसने अपने प्रधानमंत्री के पुत्र महाबतखां को अजीतसिंह को अजमेर लाने के लिये भेजा। 20 जून 1710 को बहादुरशाह का प्रधानमंत्री स्वयं अजीतसिंह को लेने के लिये जोधपुर पहुँचा तथा उसे अजमेर चलने का आग्रह करते हुए उसकी सुरक्षा के प्रति भरोसा दिलाया।

    इस पर अजीतसिंह ने जयपुर महाराजा जयसिंह को भी अजमेर पहुँचने के लिये कहा तथा स्वयं भी भारी सेना लेकर अजमेर पहुँच गया। अजीतसिंह तथा जयसिंह के राजपूत सैनिक अजमेर के चप्पे-चप्पे पर फैल गये। अजमेर में जहाँ देखें, राजपूत ही दिखाई देने लगे। मैदानों के साथ-साथ पहाड़ों पर भी राजपूत सैनिक जा चढ़े। इतनी तैयारी केवल इसलिये की गई थी कि यदि बहादुर शाह मुगलिया परम्परा के अनुसार कोई दगा करने की कुचेष्टा करे तो उसका प्रतिकार किया जा सके तथा दोनों राजाओं को अजमेर से सुरक्षित निकाला जा सके। इसके बाद अजीतसिंह तथा जयसिंह देवराई गांव में बादशाह के सम्मुख उपस्थित हुए। बादशाह ने दोनों हिन्दू राजाओं को खिलअत, तलवार, जमधर, हाथी, घोड़ा आदि उपहार में देकर उनका सम्मान किया तथा उन्हें अपने राज्यों में जाने की अनुमति दे दी। इसके बाद दोनों राजा देवराई से चलकर पुष्कर आये तथा सरोवर में स्नान करके अपने अपने राज्यों को चले गये।

    अजीतसिंह का अजमेर पर अधिकार

    बहादुर शाह ने ई.1710 में पहले शाह उल्लाह खां को और फिर रामसिंह को अजमेर की सूबेदारी सौंपी। ई.1711 में पहले नजाबत खां को और फिर बाज़ खां को अजमेर का गवर्नर बनाया गया। ई.1712 में बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र जहांदार शाह अपने तीन भाइयों को मारकर बादशाह बना किन्तु उसी वर्ष जहांदार शाह के भतीजे फर्रूखसीयर ने जहांदार शाह की हत्या कर दी और सैयद बन्धुओं की सहायता से दिल्ली के तख्त पर बैठा। उसने सैयद मुजफ्फर खां को अजमेर का सूबेदार बनाया। जहांदार शाह के मरते ही अजीतसिंह ने अजमेर पर अधिकार कर लिया।

    फर्रूखसियर का अजमेर पर अधिकार

    अजीतसिंह द्वारा अजमेर पर अधिकार कर लिये जाने के बाद फर्रूखसीयर ने बख्शी-उल-मालिक हुसैन अली खां को सेना लेकर अजमेर भेजा। बख्शी-उल-मलिक हुसैन अली खां ने राठौड़ों को बुरी तरह परास्त किया। अजीतसिंह ने विवश होकर अजमेर दुर्ग मुगलों को सौंप दिया। अपने पुत्र को बादशाह की सेवा में दिल्ली भेज दिया तथा अपनी पुत्री इंद्रकुंवरी का विवाह फर्रूखसीयर से कर दिया। ई.1713 में बदनौर (मेवाड़) के ठाकुर जसवंतसिंह ने अथूण (मेरवाड़ा) पर आक्रमण किया। 10 दिसम्बर 1715 को फरूर्खसियर ने अजीतसिंह को गुजरात की सूबेदारी प्रदान की। फरूर्खसियर ने ई.1716 में खानजहाँ को, ई.1717-18 में पहले अजीजुद्दौला खान आलम को तथा बाद में समंदर खां को तथा ई.1718-19 में सवाई जयसिंह को अजमेर की सूबेदारी सौंपी। फर्रूखसियर के शासनकाल में अजमेर की टकसाल से सोने के सिक्के ढाले गये।

    फर्रूखसियर का वध

    17 फरवरी 1719 को महाराजा अजीतसिंह ने सैय्यद बंधुओं की सहायता से दिल्ली के लाल किले पर अधिकार कर लिया। महाराजा ने लाल किले के दीवाने आम में अपना आवास बना लिया। महाराजा ने दीवाने आम में घण्टों और शंख-ध्वनियों के बीच हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा की तथा तीन दिन तक लाल किले को अपने अधिकार में रखा। महाराजा के भय से बादशाह फर्रूखसीयर भाग कर जनाने में छिप गया और तीन दिन तक वहाँ से नहीं निकला। इस पर रफीउद्दरजात को दिल्ली का बादशाह घोषित कर दिया गया तथा फर्रूखसीयर को जनाने से खींचकर उसका वध कर दिया गया।

    ज्ञातव्य है कि फर्रूखसीयर ने अजीतसिंह को विवश करके उसकी पुत्री से बलपूर्वक विवाह किया था। फर्रूखसीयर का वध करने के बाद अजीतसिंह अपनी पुत्री को जोधपुर ले आया और उसकी शुद्धि करके उसे पुनः हिन्दू धर्म में दीक्षित करके उसका पुनर्विवाह किया। महाराजा अजीतसिंह के आदेश पर रफीउद्दरजात ने हिन्दुओं पर से जजिया उठा लिया तथा हिन्दू तीर्थों को सब प्रकार की बाधाओं से मुक्त कर दिया।

    महाराजा अजीतसिंह को अजमेर की सूबेदारी

    फर्रूखसीयर के बाद रफीउद्दजात को बादशाह बनाया गया। चार माह बाद रफीउद्दजात की भी हत्या हो गई। उसके बाद तीन माह के लिये रफीउद्दौला बादशाह बना। अंत में उसी वर्ष मुहम्मद शाह मुगल सम्राट बना। 22 अक्टूबर 1719 को मुहम्मद शाह ने अजमेर सूबे का प्रबंध नुसरतयार खां से लेकर अजीतसिंह के अधीन कर दिया। अजीतसिंह ने गुजरात तथा अजमेर में गौवध निषिद्ध कर दिया।

    महाराजा जयसिंह का छल

    जून 1720 में सयैद हुसैन अली को दिल्ली में मार डाला गया तथा अब्दुल्ला खां को बंदी बना लिया गया। मुहम्मद शाह ने अजीतसिंह को अजमेर की सूबेदारी से मुक्त कर दिया। जब यह बात जयपुर नरेश जयसिंह को ज्ञात हुई तो वह महाराजा अजीतसिंह को बताये बिना चुपचाप दिल्ली चला गया।

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