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  • अजमेर का इतिहास - 28

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 28

    महाराजा अजीतसिंह (1)


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    औरंगजेब ने राठौड़ राजकुमार अजीतसिंह को ढूंढने के काफी प्रयास किये किंतु उसे सफलता नहीं मिली। न ही उसने राठौड़ों को उनका राज्य लौटाया। 8 सितम्बर 1681 को औरंगजेब के दक्खिन में चले जाने से उत्तर भारत में राठौड़ों के लिये मैदान साफ हो गया। वे खुलकर अजमेर सूबे में लूटपाट करने लगे। 23 मार्च 1687 को राठौड़ सरदारों ने बालक महाराजा अजीतसिंह को प्रकट किया। उन्होंने अजीतसिंह को अपना राजा घोषित किया। इसके बाद अजीतसिंह ने औरंगजेब से मारवाड़ राज्य से चौथ अर्थात् राजस्व के चौथे हिस्से की मांग की। अजमेर के गवर्नर इनायत खां ने ई.1689 में अजीतसिंह को चौथ देना स्वीकार कर लिया तथा उसने अजीतसिंह को सिवाना का परगना सौंप दिया। जब औरंगजेब को दक्खिन में यह समाचार मिला तो उसने इनायत खां द्वारा अजीतसिंह को चौथ देने की स्वीकृति को निरस्त कर दिया तथा इनायत खां को निर्देश दिये कि वह अजीतसिंह को पकड़ ले। इन आदेशों के अजमेर पहुँचने के कुछ दिन बाद ही इनायत खां मर गया तथा गुजरात के सूबेदार शफी खां को अजमेर का सूबेदार बनाया गया। वह भी राठौड़ों का कुछ नहीं बिगाड़ सका।

    शफी खां का षड़यन्त्र

    ई.1689 में राठौड़ों ने अजमेर के गवर्नर शफी खां को तंग करना आरंभ किया। इस पर बादशाह ने शफीखां की भी खूब लानत-मलानत की। राठौड़ों से निबटने के लिये शफी खां ने एक षड़यन्त्र रचा। उसने अजीतसिंह को धोखे से पकड़ने का निश्चय किया तथा उसे संदेश भेजा कि वह अजमेर आकर शाही फरमान ले जाये। नवम्बर 1690 में अजीतसिंह अपने 20 हजार घुड़सवारों के साथ सिवाना से अजमेर आया। शफी खां अजीतसिंह को बंदी बनाने की हिम्मत तो नहीं कर सका किंतु उसके आदमियों ने सिवाना पर अधिकार कर लिया। जब राठौड़ों को इस कपट की जानकारी हुई तो वे अजमेर को आग की लपटों के हवाले करने पर उतारू हो गये। शफी खां ने अजीतसिंह को हीरे-जवाहर, घोड़े तथा रुपया देकर अजमेर को आग की लपटों में जाने से बचाया।

    इस घटना की सूचना पाकर शुजातखां मारवाड़ आया। उसने व्यापारियों के लगान का चौथा हिस्सा राठौड़ों को देना तय किया। जून 1692 में अजीतसिंह परबतसर के निकट भड़मिया गांव में था। यह ज्ञात होते ही शफी खां ने अजीतसिंह पर हमला बोल दिया। यह लड़ाई जनवरी 1693 तक चलती रही किंतु अजीतसिंह को परास्त नहीं किया जा सका। इस पर औरंगजेब ने शफीखां को निर्देश भिजवाये कि वह अजीतसिंह को हजारी मनसब देकर उसके साथ शांति स्थापित कर ले। इस पर शफीखां ने अजीतसिंह को अजमेर बुलवाया। अजीतसिंह स्वयं तो ब्यावर के निकट शामगढ़ पहुँचकर ठहर गया और मुकुंददास खींची को अजमेर भेजा। संभवतः इस वार्ता का भी कोई परिणाम नहीं निकला और अजीतसिंह को फिर से पहाड़ों में भाग जाना पड़ा।

    औरंगजेब ने ई.1688-89 में पहले सिपादआबाद शेर को और फिर खुदादआबाद शेर को, ई.1690-91 में मुहम्मद खां को अजमेर का सूबेदार बनाया। ई.1692-93 में अलायार खां को, ई.1693-94 में पहले शफी खां को और फिर मुहम्मद शरीफ को, ई.1694-95 में मुहम्मद खां को, ई.1697-98 में पहले नरसिंहदास को और फिर सालेश मुहम्मद को, ई.1698-99 में पहले अमुद अली को और बाद में केसरीसिंह को अजमेर का सूबेदार बनाया।

    महाराजा अजीतसिंह को अजमेर के खजाने से धन

    ई.1700 में महाराजा अजीतसिंह ने औरंगजेब को लिखा कि यदि उसे (अजीतसिंह को) सेना रखने के लिये जागीर या धन दे दिया जाये तो वह 4 हजार सवारों के साथ शाही दरबार में उपस्थित हो जायेगा। इस पर बादशाह ने अजमेर के सूबेदार को आदेश दिया कि महाराजा अजीतसिंह को शाही खजाने से धन दे दिया जाये तथा उससे वायदा किया जाये कि जब अजीतसिंह दरबार में आयेगा, उसे जागीर भी दे दी जायेगी। अजीतसिंह ने अजमेर के खजाने से राशि तो मंगवा ली किंतु स्वयं कभी भी औरंगजेब के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ।

    औरंगजेब ने ई.1700-1701 में अमीर अली खां को, ई.1701-02 में रामचंद को, ई.1702-03 में केसरीसिंह को, ई.1703-04 में मुहम्मद सैयद को तथा ई.1704-05 में कुंवर आत्माराम को अजमेर का सूबेदार बनाया। ई.1704 में सयैद अब्दुल्लाह खान ने अब्दुल्लाहपुरा बसाया। इसमें उसकी बेगम की मजार, एक उद्यान तथा एक मस्जिद बनाई गई। इस निर्माण के चारों ओर ऊंची दीवारों को निर्माण किया गया। ई.1710 में इसी परिसर में सैयद अब्दुल्लाह खान के पुत्र हुसैन अली खान ने अपने पिता की मजार बनवाई। बाद में इस परिसर को राजकीय कारागृह में बदल दिया गया। उसके बाद इसमें सराय खुल गई।

    ई.1705 में जबरदस्तखां अजमेर और जोधपुर का हाकिम नियुक्त हुआ। ई.1707-08 में शाह नवाब घायसाली खां को अजमेर का सूबेदार बनाया गया।

    औरंगजेब की मृत्यु

    औरंगजेब अपनी चालीस वर्ष की आयु में अपने पिता को कैद में डालकर, भाइयों को मौत के घाट उतारकर और अपने पुत्रों तथा पुत्री को जेल में सड़ा-सड़ा कर मार डालने के बाद बादशाह बना था। उसने 49 वर्ष शासन किया। उसके मन, वचन और कर्म से क्रूरता टपकती थी। उसकी नसों में तैमूर लंग तथा चंगेज खां जैसे आतताइयों का रक्त बहता था और वह उन्हीं के समान रक्त पिपासु तथा हिंसक था। वह मानवता का शत्रु था। उसके शासन काल में पूरे भारत में अशान्ति की ज्वाला दहकती रही जिससे हिन्दू राजाओं का मन मुगल साम्राज्य से फिर गया और वे मुगलों के कट्टर शत्रु हो गये। औरंगजेब के शासन काल में अजमेर में स्थापत्य की दृष्टि से कोई विकास नहीं हुआ। फादर कटरॉ के अनुसार औरंगजेब के समय में अजमेर का वार्षिक राजस्व 2,19,00,002 रुपये हो गया। मिरात-इ-आलम के अनुसार इस समय अजमेर सूबे में 235 महाल थे तथा इसका राजस्व 63,68,94,882 दम्म अथवा 1,59,22,372 रुपये हो गया था।

    दक्खिन में लड़ते-लड़ते औरंगजेब की आयु 89 वर्ष हो गई। वह बूढ़ा, कमजोर, अशक्त, झक्की और सनकी हो गया था। उसका पूरा शरीर कांपता था। कमर झुक जाने के कारण वह हर समय लाठी लेकर चलता था। उसकी आंखों से हैवानियत टपकती थी। 21 फरवरी 1707 को अहमदनगर में उसकी मृत्यु हो गई। औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही भारत का इतिहास आधुनिक काल में प्रवेश कर जाता है। औरंगजेब की मृत्यु का समाचार सुनते ही 9 मार्च 1707 को महाराजा अजीतसिंह राठौड़ ने जोधपुर नगर पर अधिकार कर लिया।

    अजमेर सूबा बिखराव की ओर

    औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों मुअज्जम, आजम तथा कामबख्श में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ। आजम को मारकर मुअज्जम विजयी हुआ और 63 वर्ष की आयु में बहादुरशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा। कामबख्श ने अजमेर में आकर स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया। 24 मार्च 1708 को बहादुरशाह अजमेर आया और उसने शुजात खां को अजमेर का सूबेदार नियुक्त किया। बहादुरशाह ने अजीतसिंह को मिलने के लिये अजमेर बुलवाया। अजीतसिंह कालू गांव में नये बादशाह से मिला। इसके बाद 20 मार्च 1708 को बादशाह अजीतसिंह को लेकर अजमेर आ गया। अजीतसिंह ने नरेली गांव में अपना शिविर स्थापित किया। दोनों पक्षों के बीच शांति की संधि हुई। अजीतसिंह को मारवाड़ का राजा मान लिया गया तथा उसे चार हजारी मनसब दिया गया।

    इसी बीच आम्बेर नरेश जयसिंह भी अजमेर आ गया। जनवरी 1708 में बहादुरशाह ने उसका राज्य तथा मिर्जा राजा की उपाधि छीनकर उसके छोटे भाई विजयसिंह को दे दिये थे फिर भी जयसिंह, बहादुरशाह से राज्य पाने की आशा में बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। इसके बाद बहादुरशाह, अजीतसिंह तथा जयसिंह तीनों ही 2 अप्रेल 1708 को अजमेर से उज्जैन के लिये रवाना हो गये। 14 अप्रेल 1708 को ये लोग मंदसौर पहुँचे जहाँ जयसिंह और अजीतसिंह, बहादुरशाह से अलग होकर उदयपुर महाराणा के पास चले गये ताकि उनसे जयसिंह को फिर से जयपुर दिलवाने के लिये सहायता प्राप्त की जा सके। वहाँ से दोनों राजा जोधपुर आ गये।

    6 अगस्त 1708 को अजीतसिंह, जोधपुर से 20 हजार राठौड़ों को लेकर जयसिंह की सहायता के लिये उसके साथ आम्बेर के लिये रवाना हुआ। मार्ग में ये लोग पुष्कर में ठहरे। जब अजमेर के सूबेदार शुजातखां को यह ज्ञात हुआ तो उसने इन दोनों के साथ छल करने के विचार से इन्हें विश्वास दिलाया कि वह बादशाह से कहकर उन दोनों को उनके राज्य फिर से दिलवा देगा तथा अपने आदमी, छल से सेना लेने के लिये बादशाह के पास भेजे। इन दोनों राजाओं ने दो माह तक पुष्कर में ही बादशाह के आदेश की प्रतीक्षा की किंतु जब वहाँ से आदेश नहीं आया तो ये दोनों राजा, जयपुर के लिये चल दिये। तब तक बहुत विलम्ब हो चुका था।

    इन दोनों राजाओं को नष्ट करने के लिये दिल्ली, आगरा, मथुरा तथा करनाल से शाही सेनाएं आ गईं। आम्बेर से भी तोपखाना शाही सेना की सहायता के लिये आ गया। सांभर के पास दोनों पक्षों की सेनाओं का सामना हुआ। इस युद्ध में मुगल सेना की करारी हार हुई। मुगलों के दो हजार सिपाही और चार हाथी मार डाले गये। इसके बाद अजीतसिंह, जयसिंह को लेकर आम्बेर पहुँचा, जहाँ उसने जयसिंह को आम्बेर की गद्दी पर बैठा दिया।

    इस प्रकार जब बहादुरशाह दक्षिण की तरफ चला गया तो मेवाड़, मारवाड़ तथा जयपुर के हिन्दू राजाओं ने संघ बना लिया और अपने-अपने क्षेत्र मुगल साम्राज्य से विमुक्त कर लिये। इससे अजमेर सूबा बिखर गया और मुगलों का नियन्त्रण नाम मात्र का रह गया।

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