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  • अजमेर का इतिहास - 27

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 27

    औरंगजेब द्वारा अजमेर की उपेक्षा


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    अकबर से लेकर शाहजहाँ तक के शासन काल में अजमेर को आगरा, दिल्ली तथा लाहौर के समान ही प्रतिष्ठा प्राप्त थी किन्तु औरंगजेब के काल में अजमेर को कोई महत्त्व नहीं मिला। उसके शासन काल में अजमेर की टकसाल से केवल रुपया ढाला गया तथा अन्य मुद्राएं ढालनी बंद कर दी गईं। औरंगजेब ने लगभग हर वर्ष अजमेर का सूबेदार बदला। कई बार तो एक साल में दो बार सूबेदार बदला गया। उसने ई.1657-58 में हाफिज नाजिर शाह को, ई.1658-59 में कुंवर रामसिंह को, ई.1659-60 में तरबियात खां को, ई.1660-62 में मरहमत खां को, ई.1662-63 में पहले मुरावत खां और फिर उसमान को अजमेर की सूबेदारी दी। ई.1664-65 में हाफिज नाजिर, ई.1665-66 में पहले राशिद अहमद और फिर महाराजा उदयभान अजमेर के सूबेदार रहे। उनके बाद महाराजा राजसिंह तथा राजसिंह के बाद मीर सयैद उमैद भी अजमेर के सूबेदार हुए।

    ई.1667 में सूरजमल द्वारा बांदनवाड़ा जागीर की स्थापना की गयी। इसी वर्ष ख्वाजा कुलीखान को अजमेर का सूबेदार नियुक्त किया गया। ई.1667-68 में आबिदखां, ई.1668-69 में मीर सयैद उमैद, ई.1669-70 में पहले नवाब सुरतखां तथा उसके बाद जफीर खां, ई.1670-71 में पहले नवाब इज़ात खां तथा उसके बाद महाराजा राजसिंह को अजमेर का सूबेदार नियुक्त किया गया। ई.1670 में किशनसिंह द्वारा मेहरून तथा जूनिया की जागीरें स्थापित की गयीं। ई.1671-72 में रूपसिंह को, ई.1675 में पहले दाराब खां को, उसके बाद अमानत खां को और फिर सैयद अहमद को अजमेर का सूबेदार बनाया गया। ई.1676 में पहले खान खट्टब को तथा बाद में सैयद हामिद खां के पुत्र मुर्तिजा खां को अजमेर का सूबेदार नियक्त किया गया। ई.1677 में इफ्तिखार खां सुल्तान हुसैन को तथा ई.1678 में औरंगजेब ने पादशाह कुली खान को तहव्वर खान का खिताब देकर अजमेर का फौजदार नियुक्त किया।

    महाराजा जसवंतसिंह की मृत्यु

    22 जनवरी 1678 को जमरूद के मोर्चे पर मारवाड़ के शासक जसवंतसिंह का निधन हो गया। उस समय उसकी दो रानियां गर्भवती थीं। महाराजा के अंतिम संस्कार के बाद मारवाड़ के सरदार गर्भवती रानियों को लेकर मारवाड़ के लिये रवाना हुए। मार्ग में दोनों रानियों ने एक-एक शिशु को जन्म दिया। एक शिशु का नाम दलथंभन तथा दूसरे का नाम अजीतसिंह रखा गया। औरंगजेब ने रानियों एवं शिशुओं को दिल्ली बुलवा लिया। दलथंभन की मार्ग में ही मृत्यु हो गई। रानियां अजीतसिंह को लेकर दिल्ली पहुँचीं। औरंगजेब ने विधवा रानियों एवं शिशु अजीतसिंह को बंदी बना लिया किंतु राठौड़ सरदार शिशु अजीतसिंह को दिल्ली से निकाल लाये और उसे सिरोही राज्य की पहाड़ियों में छिपा दिया।

    औरंगजेब अजमेर में

    औरंगजेब ई.1658 में आगरा के तख्त पर बैठा था किंतु पूरे 10 वर्ष तक वह अजमेर से दूर रहा। जब अजीतसिंह उसके हाथों से निकल गया तो औरंगजेब ने मारवाड़ राज्य खालसा कर लिया। उसने अपने अधिकारियों को मारवाड़ राज्य पर अधिकार करने के आदेश दिये। मारवाड़ की गतिविधियों पर दृष्टि रखने के लिये औरंगजेब स्वयं भी 1 जनवरी 1679 को दिल्ली से चलकर 2 फरवरी 1679 को अजमेर आ गया। वह आनासागर के निकट एक महल में ठहरा। औरंगजेब ने अपने समस्त सेनापतियों को विभिन्न स्थानों और मोर्चों से अजमेर बुलवाया ताकि मारवाड़ पर अधिकार जमाया जा सके। उस समय तैबरखां अजमेर का सूबेदार था। औरंगजेब ने हसन अलीखां तथा बहादुरखां के अधीन 10 हजार सैनिक जोधपुर पर अधिकार करने के लिए भेजे। जोधपुर की तरफ से राठौड़ रूपसिंह, राम कुमावत भाटी तथा नरसिंहदास राठौड़ ने मोर्चा संभाला। गुढ़ा के पास भारी लड़ाई हुई। जब मारवाड़ पर शाही अधिकार हो गया तो 7 मार्च 1679 को औरंगजेब अजमेर से दिल्ली लौट गया।

    औरंगजेब ने बहादुरखां को अजमेर का सूबेदार बनाया तथा रहीमखां को जोधपुर में नियुक्त किया। जब औरंगजेब अजमेर से किशनगढ़ पहुंचा तो बहादुर खां ने उसे प्रार्थना भिजवाई कि वह शिशु अजीतसिंह को राठौड़ों का राजा स्वीकार कर ले किंतु औरंगजेब ने इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया तथा बहादुर खां को निर्देश दिये कि वह अजमेर में ही रहे। कुछ समय बाद जोधपुर से राठौड़ों का एक प्रतिनिधि मण्डल बादशाह से मिलने अजमेर आया। तब तक बादशाह दिल्ली के लिये जा चुका था। इस पर बहादुरखां ने अपने पुत्र को इस प्रतिनिधि मण्डल के साथ दिल्ली भेज दिया। यह प्रतिनिधि मण्डल अप्रेल 1679 में दिल्ली पहुँचा किंतु बादशाह ने जोधपुर के सरदारों का अनुरोध ठुकराकर नागौर के राव इंदरसिंह को जोधपुर का राज्य दे दिया।

    राठौड़ों का अजमेर पर आक्रमण

    इसी वर्ष राठौड़ों ने जोधपुर दुर्ग पर आक्रमण करके रहीम खां से दुर्ग छीन लिया। रहीम खां भागकर अजमेर आया। इस पर राठौड़ों ने अजमेर पर आक्रमण कर दिया। मुगलों के समय में राठौड़ों का अजमेर पर यह पहला आक्रमण था। जब राठौड़ों ने अजमेर पर आक्रमण किया तब तहव्वरखां पुष्कर में था। पुष्कर में ही 19 अगस्त 1679 को दोनों पक्षों में युद्ध आरंभ हुआ जो 21 अगस्त 1679 तक चला। तहव्वरखां परास्त होकर भाग खड़ा हुआ। उसकी सेना नष्ट हो गई। राठौड़ों का नेतृत्व राजसिंह कर रहा था। वह भी भटककर आई हुई गोली से मारा गया।

    शहजादे अकबर का विद्रोह

    राठौड़ राजकुमार अजीतसिंह को जोधपुर का राजा बनाये जाने के मुद्दे को लेकर मेवाड़ और मारवाड़ के राजपूतों ने एकजुट होकर, औरंगजेब से तीस साल लम्बी लड़ाई लड़ी। यह लड़ाई ई.1679 में आरम्भ हुई। राजपूतों की सम्मिलित शक्ति का मुकाबला करने के लिये नवम्बर 1679 में औरंगजेब फिर अजमेर आया और उसे अपनी सैनिक छावनी बना लिया। उसने अपने पुत्र अकबर को राजपूतों से लड़ने के लिये भेजा किन्तु राजपूतों ने अकबर से मेल करके उसे औरंगजेब की गलत नीतियों के बारे में समझाया। अकबर को मुगल साम्राज्य के पूर्ववर्ती बादशाहों- अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ की नीतियों के मुकाबले अपने पिता औरंगजेब की नीतियां गलत जान पड़ीं। वह अपने पिता का विरोधी हो गया तथा 70 हजार सैनिक लेकर अजमेर की ओर मुड़ा जहाँ उसका पिता औरंगजेब ठहरा हुआ था। यह खबर सुनकर औरंगजेब की स्थिति दयनीय हो गई। उस समय उसके पास खानसामों, बावर्चियों, भिश्तियों और अन्य असैनिक कर्मचारियों को मिलाकर दस हजार आदमी थे क्योंकि सेना तो वह अकबर के साथ भेज चुका था फिर भी औरंगजेब ने हिम्मत नहीं हारी।

    ई.1680 के आरंभिक महीनों में औरंगजेब ने इनायत खां को अजमेर का फौजदार नियुक्त किया। बहरमंद खां को सैन्य अभियान का कमाण्डर बनाया तथा उसे निर्देश दिये कि शाही सैनिकों के चारों ओर किलेबंदी की जाये तथा अजमेर की तरफ आने वाले मार्गों की रक्षा की जाये। असदखां बटलाया को पुष्कर मार्ग तथा झील पर नियुक्त किया गया। अबू नासरखां को असद खां का नायब नियुक्त करके अजमेर के पश्चिम की ओर दृष्टि रखने का काम दिया गया। अकबरी महल के निकट अजमेर की गलियों में तोपें लगा दी गईं। अहमदाबाद के नाजिम हाफिज मोहम्मद अमीन तथा अन्य अधिकारियों को निर्देश दिये गये कि वे हर समय शस्त्र लेकर तैयार रहें तथा अपने दायित्वों का निर्वहन करते रहें। उम्दतुलमुल को किलेबंदी की निगरानी रखने का काम दिया गया। शहजादे के वकीलों शुजात खां तथा बादशाह खां को गढ़ बीठली में बंदी बना लिया गया। हिम्मतखां को गढ़ बीठली का कमाण्डर नियुक्त किया गया।

    अनुभवहीन अकबर, औरंगजेब की दयनीय स्थिति का आकलन नहीं कर सका और कदम-कदम सूंघता हुआ बहुत धीमी गति से अजमेर की ओर बढ़ा। 15 दिन में उसने 120 मील दूरी तय की। ये 15 दिन औरंगजेब जैसे अनुभवी सेनापति के लिए पर्याप्त थे। उसने आस-पास के सरदारों को बुलाकर काफी सेना एकत्रित कर ली। 17 जनवरी 1681 को शहजादा अकबर अपने राठौड़ साथियों के अजमेर से 22 मील दक्षिण में बुधवाड़ा पहुँच गया। औरंगजेब भी अजमेर से निकलकर दोराई पहुँच गया परंतु यहाँ से आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं हुई। यहाँ से अकबर तथा औरंगजेब की सेनाओं के बीच की दूरी 3 मील रह गई थी। जैसे-जैसे दोनों सेनाओं के बीच की दूरी घटती जाती थी, वैसे-वैसे बादशाही अमीर अकबर की सेना से निकलकर औरंगजेब के लश्कर में मिलते जाते थे। शहजादा मुअज्जम भी यहीं आकर औरंगजेब से मिल गया।

    औरंगजेब का सेनापति तहव्वर खां अब भी अकबर के साथ था। जबकि उसका श्वसुर इनायत खां औरंगजेब के साथ था। औरंगजेब ने इनायत खां को आदेश दिये कि वह तहव्वखां को बुला ले और यदि वह नहीं आये तो तहव्वर खां के परिवार को नष्ट कर दे। इस पर इनायतखां ने तहव्वर खां को बादशाह के आदेशों की सूचना भिजवाई। यह सूचना मिलने पर तहव्वर खां, एक पहर रात गये अकबर का शिविर छोड़कर औरंगजेब के लश्कर में चला गया। रात्रि में ही वह औरंगजेब से मिलने उसकी डेवढ़ी पर गया। तहव्वर खां से कहा गया कि वह शस्त्र बाहर रखकर बादशाह से मिलने भीतर जाये किंतु तहव्वर खां ने शस्त्र बाहर रखने से मना कर दिया। इसलिये बादशाह के सिपाहियों ने उसे उसी स्थान पर मार दिया।

    जिस रात तहव्वर खां, अकबर को छोड़कर औरंगजेब के पास गया, उसी रात औरंगजेब ने एक षड़यन्त्र रचा। यह वही षड़यन्त्र था जो किसी समय शेरशाह सूरी ने राव मालदेव के विरुद्ध रचा था। औरंगजेब ने राजपूतों को धोखा देने के लिये अकबर के नाम एक झूठा पत्र लिखकर दुर्गादास के हाथ में पहुँचवा दिया। यह पत्र इस प्रकार से था- मैं तेरे द्वारा राठौड़ों को धोखा देकर फँसा लाने से बहुत प्रसन्न हूँ। कल प्रातःकाल युद्ध में, मैं आगे से उन पर आक्रमण करूंगा और तू पीछे से हमला कर देना। इससे वे आसानी से नष्ट हो जायेंगे।

    जब यह पत्र दुर्गादास को मिला तो वह इसके सम्बन्ध में अपना संदेह मिटाने के लिये अकबर के शिविर में पहुँचा परंतु उस समय अर्द्धरात्रि से भी अधिक समय बीत चुका था तथा अकबर गहरी नींद में सोया हुआ था। दुर्गादास ने अकबर के अंगरक्षकों से अकबर को जगाने के लिये कहा किंतु ऐसा करने की आज्ञा न होने के कारण अंगरक्षकों ने इस बात को मानने से मना कर दिया। इससे दुर्गादास क्रुद्ध होकर लौट गया। इसके बाद राठौड़ों ने तहव्वरखां की तलाश की परंतु उसके भी शाही सेना में चले जाने का समाचार मिला तब राठौड़ों का संदेह दृढ़ हो गया और वे प्रातःकाल होने के तीन घण्टे पूर्व ही अकबर के शिविर को लूटकर मारवाड़ की तरफ लौट गये। यह देखकर अन्य शाही सेना नायक भी बादशाह से जा मिले।

    राजरूपक में लिखा है कि जब तहव्वरखां बादशाह के पास जाने लगा, तब उसने राठौड़ों से भी कहलवाया कि मैंने आपके और शहजादे के बीच पड़कर संधि करवाई थी किंतु मुझे शहजादे के बादशाह से मिल जाने का संदेह है। अतः अब मैं इसकी जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं रख सकता। आप लोगों को भी सावधान होकर लौट जाना चाहिये।

    प्रातःकाल होने पर इस घटना की सूचना अकबर को मिली तो वह बहुत घबराया। अब उसके पास केवल 350 सवार ही रह गये थे। इसलिये वह बादशाह के कोप से बचने के लिये अपनी एक बेगम, 25 दासियां तथा जवाहरातों से भरा हुआ बक्सा लेकर 10 कोस के अंतर पर ठहरे हुए राठौड़ों की तरफ रवाना हुआ। जब मेरों को यह ज्ञात हुआ कि अकबर बहुत थोड़े आदमियों के साथ राठौड़ों की तरफ जा रहा है तो वे तीर कमान लेकर उसका मार्ग रोककर खड़े हो गये। इस पर अकबर के साथ के स्त्री पुरुषों ने मेरों पर तीर बरसाये किंतु मेर उन पर भारी पड़े। यह देखकर अकबर ने मेरों को जवाहरातों से भरा बक्सा देकर उनसे सुरक्षित मार्ग खरीद लिया। रबड़िया गांव के पास अकबर ने दुर्गादास से भेंट की। तब जाकर दुर्गादास को सारी सच्चाई का पता लगा। उसने अपने आदमी मेरों के पीछे भेजे। दुर्गादास के आदमी जवाहरातों से भरा हुआ बक्सा मेरों से वापस छीनने में सफल रहे।

    यह घटना 16 जनवरी 1681 की है। अब औरंगजेब से लड़ना संभव नहीं रहा था। इसलिये दुर्गादास अकबर को अपने साथ लेकर जालोर की तरफ रवाना हो गया। औरंगजेब ने शहजादा आलम को अकबर को वापस लाने के लिये उसके पीछे भेजा किंतु अकबर को अपने बाप पर कतई विश्वास नहीं था इसलिये वह जालोर से शंभाजी के पास होता हुआ अरब चला गया। वह अपने एक पुत्र तथा एक पुत्री को दुर्गादास के पास छोड़ गया। दुर्गादास ने अजमेर से एक मुस्लिम शिक्षिका बुलाकर शहजादे तथा शहजादी को कुरान की शिक्षा दिलवाने का प्रबंध किया।

    औरंगजेब का दक्षिण के लिये प्रस्थान

    अकबर के चले जाने से बादशाही शिविर में बड़ा आनंद मनाया गया। इसके बाद औरंगजेब अपने सेनापतियों- शाहबुद्दीनखां, शाह आलम, कुलीखां, इंद्रसिंह आदि को बागियों का पीछा करने की आज्ञा देकर स्वयं अजमेर लौट आया। इस समय तक राठौड़ों तथा मेवाड़ियों के नित्य नये आक्रमणों से उकताये हुए औरंगजेब को मराठों के द्वारा तगड़ी चेतावनी मिलने लगी थी। इसलिये वह 8 सितम्बर 1681 को शहजादे शाह आलम के पुत्र अजीमुद्दीन तथा वजीर जुमलात उल मुल्क असदखां को राजपूतों से अजमेर की रक्षा करने के लिये अजमेर में छोड़कर, शंभाजी पर आक्रमण करने दक्खिन के लिये चल दिया। जहाँ से वह कभी वापस लौटकर नहीं आया। औरंगजेब ने ई.1681 में असदखां, ई.1682 में महाराजा माधोसिंह तथा ई.1685-86 में राजा पृथ्वीसिंह को अजमेर का सूबदेदार बनाया। ई.1685 में नाहरसिंह ने देवगांव बघेड़ा में ठिकाणे की स्थापना की।

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