Blogs Home / Blogs / अजमेर नगर का इतिहास - पुस्तक / अजमेर का इतिहास - 26
  • अजमेर का इतिहास - 26

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 26

    दारा शिकोह एवं औरंगजेब युद्ध (2)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    औरंगजेब की सेनाएं, दारा के मोर्चे की तरफ पहाड़ी पर बनी इंदरकोट की जिस प्राचीन, विशाल एवं सृदुढ़ दीवार को गिराने के लिये तोप के गोले दाग रही थी, वह अब भी उसी तरह मजबूती से खड़ी हुई थी। इस पर औरंगजेब ने अपनी सेनाओं को आगे बढ़कर हमला करने को कहा किंतु औरंगजेब के सेनापतियों ने ऐसा करने के प्रति यह कहकर अनिच्छा व्यक्त की कि जब तक तोपें अपना काम पूरा नहीं कर लेतीं, तब तक हमें आगे नहीं बढ़ना चाहिये। दारा की सेना इस दीवार की आड़ में से औरंगजेब की सेना पर आग बरसाती रही। दारा के सिपाही ऊँचाई पर थे तथा मोर्चों एवं दीवार की आड़ में थे इसलिये उन्हें कम हानि पहुँच रही थी जबकि औरंगजेब की सेना निचाई पर होने तथा खुले मैदान में होने से अधिक हानि उठा रही थी। इस प्रकार दूसरा दिन बीत जाने पर भी युद्ध में कोई प्रगति नहीं हो सकी। औरंगजेब की सेना को यह विश्वास हो गया कि दारा के शिविर में घुस पाना असंभव है। औरंगजेब के सिपाही डगमगाने लगे थे।

    औरंगजेब के सेनापति भी अब दूसरी तरह सोचने लगे थे। उनमें से बहुत से तो औरंगजेब के साथ केवल इसलिये हुए थे क्योंकि उन्हें विश्वास था कि युद्ध में जीत औरंगजेब की ही होगी। उन्हें लगता था कि दारा दुर्भाग्यशाली है और वह कभी जीत नहीं सकता किंतु भीतर से वे दारा के सद्गुणों के प्रशसंक थे। अब जब दारा औरंगजेब पर भारी पड़ रहा था, उन्हें भीतर ही भीतर पछतावा होने लगा था। तीसरे दिन की प्रातः औरंगजेब ने एक गंभीर प्रयास करने का निश्चय किया। उसने अपने सेनापतियों को एकत्रित किया, उन्हें जोशीला भाषण देकर उनमें नई ऊर्जा का संचार किया तथा उन्हें बिना कोई क्षण गंवाये सम्मिलित होकर लड़ने के लिये प्रेरित किया।

    उसी समय जम्मू के राजा रामरूप ने औरंगजेब को सूचित किया कि उसके पहाड़ी लड़ाकों ने, तारागढ़ की पहाड़ी में एक गुप्त मार्ग ढूंढ निकाला है। इस मार्ग पर वे दक्षिण-पश्चिम दिशा से घुसकर कोकला पहाड़ी पर ठीक दारा के पीछे पहुँच सकते हैं तथा इस प्रकार वे दारा के दाहिने पार्श्व को तोड़ सकते हैं। औरंगजेब ने बिना कोई समय गंवाये, शाही सेना के खास बंदूकची तथा सिपाही उस मार्ग से कोकला पहाड़ी के पीछे भेज दिये तथा जम्मू का राजा रामरूप, दारा का ध्यान बंटाने के लिये कोकला पहाड़ी के सामने जा धमका। रामरूप का यह कदम औरंगजेब के लिये तो विजयकारी सिद्ध हुआ किंतु वह स्वयं, अपने पूरे सैनिक दल के साथ रणक्षेत्र में ही काट दिया गया। जब तक दारा के सिपाहियों ने रामरूप का खात्मा किया, तब तक औरंगजेब के खास बंदूकची तथा हजारों सिपाही कोकला पहाड़ी पर से नीचे उतरने लगे।

    अब दृश्य उलट चुका था। औरंगजेब के बंदूकची तथा पैदल सिपाही ऊँचाई पर थे जबकि दारा के सिपाही नीचे की ढलान पर थे। औरंगजेब के बंदूकचियों ने दारा के सिपाहियों को तड़ातड़ गोलियों की बरसात करके मार डाला। दारा के खेमे में अफरा तफरी मच गई। ठीक उसी समय दिलेर खां तथा शेख मीर ने सामने से दारा के खेमे पर धावा बोला। दिलेर खां चश्मे की दक्षिणी दिशा से तथा शेख मीर उत्तरी दिशा से आगे बढ़े ताकि वे दारा की तोपों की मार से बच सकें। ठीक उसी समय बाईं ओर से महाराजा जयसिंह तथा अमीर उल उमरा तथा दाईं ओर से असद खां एवं होशाबाद सामान्य धावे के लिये आगे बढ़े।

    दिलेर खां तथा शेख मीर आगे बढ़ते हुए दारा की मोर्चाबंदी के सबसे कमजोर बिंदु पर पहुँच गये जहाँ औरंगजेब का श्वसुर शाहनवाज खां मोर्चा संभाले हुए था। इस बिंदु से झरने का एक रास्ता उन्हें दीवार के ऊपरी हिस्से तक ले गया। शाही सिपाही इंदरकोट की सुदृढ़ दीवार पर चढ़ गये। दारा के सिपाहियों को शाही सिपाहियों तक पहुँचने से रोकने के लिये शाहनवाज खां के सिपाही तोपों से गोले बरसाने लगे। दारा के आदमियों ने भी अपनी तोपों के मुंह उनकी तरफ मोड़ दिये। इस अस्तव्यस्त गोलाबारी के बीच शाहनवाज खां तोप के गोले से मारा गया। उसे ख्वाजा की दरगाह में दफनाया गया। उसका पुत्र सयैद खां भी घायल हो गया।

    शेख मीर औरंगजेब की ओर से लड़ रहा था। वह हाथी पर सवार होकर अपनी सेना का नेतृत्व कर रहा था। पहाड़ी के ऊपर से आई तोपों की वर्षा से वह भी मारा गया। हाथी के हौदे में सवार महावत ने शेख मीर के मृत शरीर को हौदे में इस तरह बिठा दिया मानो वह जीवित हो। शेख मीर के मारे जाने की बात युद्ध की समाप्ति के बाद ही प्रकट हो सकी। दारा अपने पुत्र सिपहर शिकोह के साथ एक ऊँचे स्थान पर खड़े होकर युद्ध देख रहा था। उसने देखा कि उसके दाहिने पार्श्व पर दिलेर खां ने सफलता प्राप्त कर ली है और राजा जयसिंह भी उसकी सहायता के लिये आगे बढ़ रहा है। दारा ने तेजी से निर्णय लिया कि युद्ध का परिणाम उसके विरुद्ध जा रहा है। स्थिति वास्तव में नाजुक तो थी किंतु चिंताजनक नहीं थी। उसकी सेना का मध्य भाग तथा उत्तरी भाग अब भी पूरी तरह सुरक्षित था। उसके पास सात हजार सिपाही अब भी सुरक्षित खड़े थे। एक तीव्र प्रत्याक्रमण दिलेर खां को उसके स्थान से पीछे धकेल सकता था। यहाँ तक कि राजा जयसिंह की आगे बढ़ने की गति इतनी धीमी थी कि वह शीघ्रता से दिलेरखां को सहायता नहीं पहुँचा सकता था।

    अभी दारा विचार कर ही रहा था कि कोकला पहाड़ी पर कोलाहल हुआ तथा वहाँ से घोषणा की गई कि शत्रु ने पहाड़ी के सबसे सुरक्षित स्थान को छीन लिया है। इस नये संकट ने दारा को तत्काल निर्णय लेने पर विवश कर दिया। औरंगजेब की तरह उसमें सर्वोच्च प्रयास करने का हौंसला नहीं था जो हारी हुई बाजी को पलट सके। तीन दिन की लगातार लड़ाई के दबाव ने उसे हतोत्साहित कर दिया था। वह अपनी सेना को उसके भाग्य पर छोड़कर युद्ध के मैदान से निकल गया। सत्य तो यह है कि जिस दिन से जसवंतसिंह ने दारा की सहायता करने से मना कर दिया था, उस दिन से दारा ने मन ही मन अपनी पराजय स्वीकार कर ली थी।

    दारा इतना भयभीत हुआ कि वह युद्ध के मैदान से भागकर अजमेर नगर में नहीं गया जहाँ उसका हरम तथा उसका खजाना किसी भी बुरी परिस्थिति में पलायन के लिये हाथियों पर लदा हुआ तैयार खड़ा था। दारा पश्चिम दिशा में मेड़ता की पहाड़ियों की तरफ भाग गया। उसका हरम उसके पीछे गया। इसी बीच रात हो गई। औरंगजेब के सेनापतियों को अपनी जीत पर विश्वास नहीं हुआ। दिलेर खान यद्यपि शत्रु सेना की घेराबंदी को तोड़ चुका था तथापि उसकी स्थिति नाजुक थी। शेख मीर के सिपाहियों को भी शेख मीर की मृत्यु के बारे में ज्ञात हो चुका था। वे सारा अनुशासन भंग करके लूटपाट में लग गये। जयसिंह की आगे बढ़ने की गति अब भी धीमी थी। उसके दाहिनी तरफ असद खान एवं होशदाद खां अब भी कुछ नहीं कर पाये थे। उसकी टुकड़ियां दर्शक बनकर व्यर्थ खड़ी थीं किंतु दारा के भाग जाने से अब उनके पास कुछ काम नहीं बचा था। जैसे ही औरंगजेब को ज्ञात हुआ कि दारा भाग गया तो युद्ध रुक गया। राजा जयसिंह ने आगे बढ़कर तंग घाटी का रास्ता रोक लिया ताकि दारा के सिपाही जान बचाकर न भाग सकें। देखते ही देखते दारा के सिपाहियों का कत्लेआम मच गया। यह कत्लेआम देर रात तक चलता रहा। इस प्रकार 11 मार्च की शाम को आरंभ हुआ युद्ध 13 मार्च की रात में थम गया।

    दारा की सेना किसी भी तरह से औरंगजेब की सेना से कम नहीं थी किन्तु दारा का मनोबल बढ़ाने वाला कोई मित्र उसके साथ न था जबकि औरंगजेब को नित नई सहायता प्राप्त हो रही थी। दुर्भाग्य से हिन्दू राजाओं ने गलत निर्णय लिये। उन्होंने अच्छे दारा को छोड़कर बुरे औरंगजेब का साथ दिया। जम्मू नरेश रूपराय स्वयं भी नष्ट हो गया और उसने दारा को भी नष्ट कर दिया। यदि जयपुर नरेश जयसिंह औरंगजेब का साथ न देता तो दारा परास्त न हुआ होता। यदि जोधपुर नरेश जसवंतसिंह दारा के पक्ष में लड़ने के लिये आ गया होता, तो भी दारा परास्त न होता। मध्यकाल के हिन्दू नरेश लगभग हर मोर्चे पर इतने ही अदूरदर्शी सिद्ध हुए जितने वे अजमेर युद्ध के दौरान थे। इस युद्ध में अजमेर की वीसल झील नष्ट हो गई तथा तारागढ़ एवं अजमेर नगर के परकोटों को गंभीर क्षति हुई।

    जब दारा मेड़ता होता हुआ अहमदाबाद की ओर भाग रहा था तब फ्रैंच यात्री मॉन्शियर बर्नियर दारा से मिलने के लिये आगरा जा रहा था। उन दिनों दारा की एक बेगम के पैर में विसर्प लगने से वह बीमार थी तथा दारा उसकी सेवा कर रहा था। जब दारा को ज्ञात हुआ कि बर्नियर नामक एक चिकित्सक पास में ही है तो दारा ने बर्नियर को बुलवाया। बर्नियर दारा के तम्बू में गया और वहाँ उसने उसकी बेगम की चिकित्सा की। बर्नियर तीन दिन तक दारा के साथ यात्रा करता रहा ताकि उसकी बेगम की देखभाल की जा सके।

    कुछ समय बाद दारा औरंगजेब द्वारा पकड़ा जाकर अपमानजनक मृत्यु को प्राप्त हुआ। औरंगजेब की अपेक्षा दारा एक नेक दिल इन्सान था और ईश्वर पर उसे बड़ा भरोसा था किन्तु विधि का विधान कुछ ऐसा ही बन गया कि नेक दिल दारा के स्थान पर धूर्त औरंगजेब जीत गया। औरंगजेब मुगलिया सल्तनत का आखिरी प्रभावशाली शासक था। उसके अत्याचारों ने मुगल सल्तनत का सूरज इतिहास के नेपथ्य की ओर धकेल दिया।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×