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  • अजमेर का इतिहास - 25

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 25

    दारा शिकोह एवं औरंगजेब युद्ध (1)


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    शाहजहाँ ने ई.1657 में तरबियात खां बरलस को 4 हजारी मनसब, 4 हजार घुड़सवार एवं 3 हजार घोड़े देकर अजमेर का गर्वनर नियुक्त किया। उसी वर्ष शाहजहाँ बीमार पड़ा और उसके पुत्रों में उत्तराधिकार की लड़ाई छिड़ी। धरमत और सामूगढ़ की पराजय के बाद शाहजहाँ के प्रिय शहजादे दारा शिकोह ने मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह से सम्पर्क किया। जसवंतसिंह ने उसे सलाह दी कि वह सेना लेकर अजमेर पहुँचे ताकि चारों तरफ से उसे राजपूत राज्यों से सहायता मिल सके। महाराजा जसवंतसिंह की सलाह पर दारा अजमेर आ गया। जसवंतसिंह स्वयं भी जोधपुर से रवाना होकर रूडियावास पहुँच गया। अजमेर का नाजिम तरबियात खां, दारा का मुकाबला करने में असमर्थ था। इसलिये उसने दारा के अजमेर पहुँचने से पहले ही अजमेर खाली कर दिया और औरंगजेब के पास आगरा चला गया। जब औरंगजेब को ज्ञात हुआ कि महाराजा जसवंतसिंह ने दारा को सहयोग करने का आश्वासन दिया है तो उसने जयपुर नरेश जयसिंह से कहा कि वह जसवंतसिंह को दारा से अलग करे।

    जब दारा को यह ज्ञात हुआ तो उसने फिर जसंवतसिंह से सहायता का अनुरोध दोहराया। उस समय फ्रैंच लेखक बर्नियर भारत में ही था। उसने लिखा है कि महाराजा जयसिंह ने महाराजा जसवंतसिंह को पत्र लिखकर सूचित किया कि यदि जसवंतसिंह दारा का साथ छोड़ दे तो बादशाह, महाराजा जसवंतसिंह के अब तक के अपराध क्षमा कर देगा तथा आपने खजुआ (इलाहाबाद के पास) से जो धन प्राप्त किया है, उसकी भी मांग नहीं करेगा तथा आपको गुजरात का सूबेदार नियुक्त कर देगा जहाँ आप पूरे स्वाभिमान के साथ शासन करेंगे तथा शांति एवं सुरक्षा के साथ रह सकेंगे।

    इस पर जसवंतसिंह ने अपने विश्वस्त अनुचर आसा माधावत को महाराजा जयसिंह के पास भेजा। जयसिंह, आसा को बादशाह के पास लेकर गया। बादशाह ने अपने पंजे का निशान लगाकर एक फरमान जसवंतसिंह के नाम जारी किया जिसके अनुसार जसवंतसिंह को उसका राज्य लौटा दिया गया तथा उसका पुराना मनसब बहाल कर दिया गया। जब यह फरमान जसवंतसिंह के पास पहुँचा तो वह रूडियावास से पुनः जोधपुर लौट आया।

    इस पर दारा ने एक संदेशवाहक जसवंतसिंह के पास भेजा। उस समय जसवंतसिंह जोधपुर से 40 मील दूर रह गया था। जसवंतसिंह ने संदेशवाहक से मना कर दिया। जब संदेशवाहक ने अजमेर लौटकर इसकी सूचना दी तो दारा ने शहजादे सिपहर शिकोह को एक सौ आदमियों के साथ महाराजा की सेवा में भेजकर सहायता का अनुरोध दोहराया किंतु वह भी बेकार गया। शहजादा खाली हाथ अजमेर लौट आया।

    निराश होकर दारा ने अपनी सेना के भरोसे ही युद्ध लड़ने का निर्णय लिया। उधर जयपुर तथा जम्मू की सेनायें औरंगजेब की सहायता के लिये पहुँच चुकी थीं। दारा ने तारागढ़ दुर्ग की तलहटी में अपनी सेना की व्यूह रचना की। उसने अजमेर की तरफ आने वाले रास्तों को पत्थरों और मिट्टी की दीवारों से बंद कर दिया तथा स्थान-स्थान पर मोर्चे खड़े कर लिये। हर मोर्चे पर उसने एक प्रमुख व्यक्ति को तैनात किया। दारा के दाहिनी ओर पहला मोर्चा सयैद इब्राहीम, अस्कर खान, जान बेग तथा उसके पुत्र के अधीन था।

    यह मोर्चा तारागढ़ के ठीक निकट था। इस मोर्चे से अगला मोर्चा फिरोज मेवाती के अधीन था जो दारा के सर्वाधिक योग्यतम एवं विश्वस्त सेनापतियों में से था। इसके आगे के मार्ग पर बड़े अवरोध खड़े किये गये तथा इसी के निकट दारा ने अपना निवास नियत किया। दारा के बाईं ओर एक और बड़ा मोर्चा स्थापित किया गया जिसमें दारा के शहजादे का भृत्य शाह नवाज खान जो कि उसका सम्बन्धी भी था, मुहम्मद शरीफ जिसे किलीज खान का खिताब प्राप्त था और जिसे मुख्य खजांची तथा बरकंदाज नियुक्त किया गया था एवं अन्य प्रमुख लोग रखे गये। इस मोर्चे के पीछे शहजादे सिपहर शिकोह को रखा गया जिसके पास में पहाड़ी थी।

    अजमेर से चार मील दक्षिण में तारागढ़ की पहाड़ियाँ एक तंग घाटी में बदल जाती हैं, इसे नूर चश्मा कहते हैं। यहाँ से एक मार्ग इंदरकोट की घाटी होता हुआ अजमेर नगर की ओर जाता था। तारागढ़ के पश्चिम में देवराई गांव था। दारा की सेना ने इस चश्मे के मुख के दोनों ओर फैलकर तंग घाटी का रास्ता रोक लिया। उसका बायां पार्श्व गढ़ बीठली की पहाड़ी पर टिका था। उसका दाहिना पार्श्व कोकला नामक दुर्गम पहाड़ी पर टिका हुआ था। उसके सामने पत्थरों की एक विशाल एवं मजबूत दीवार थी जो संभवतः प्राचीन इंदरकोट दुर्ग का बचा हुआ अवशेष थी। इस दीवार के क्षतिग्रस्त हिस्से को मजबूत चट्टानों से भर दिया गया। (यह दीवार बीसवीं सदी के तीसरे दशक तक मौजूद थी तथा युद्ध के दिनों की याद दिलाती थी।) इस प्रकार की मोर्चाबंदी से दारा तक पहुँचने के लिये केवल चश्मे की तंग घाटी वाला मार्ग ही शेष रह गया। आसपास की गढ़ियों पर तोपें चढ़ा दी गईं तथा उनके चारों ओर खाइयां खुदवा दी गईं। समस्त गढ़ियों को अजमेर से आवागमन करने के लिये जोड़ दिया गया ताकि अजमेर में स्थित रसद सामग्री तक उसकी सेनाओं का संचार बना रहे। दारा ने अजमेर नगर के कमजोर स्थानों को भी सुरक्षित बनाया तथा अपने सैनिकों को चेताया कि औरंगजेब इंदरकोट की तरफ से नगर के पिछवाड़े से अजमेर में घुसने का प्रयास करेगा।

    प्राकृतिक दृष्टि से यह एक मजूबत मोर्चा था किंतु व्यवहारिक दृष्टि से, चश्मे के मुंह के दोनों तरफ फैले हुए होने से, दोनों तरफ के योद्धाओं का एक दूसरे तक पहुँचना अत्यंत कठिन था। ऐसी स्थिति में चश्मे के एक तरफ की सेना के कमजोर पड़ जाने पर दूसरी ओर से सहायता नहीं पहुँचाई जा सकती थी।

    इधर दारा मोर्चा जमाने में व्यस्त था और उधर औरंगजेब, अजमेर की ओर तेजी से बढ़ा चला आ रहा था। औरंगजेब अब तक की विजयों से इतना उत्साहित था तथा सेना, सामग्री और उत्साह की दृष्टि से इतना समृद्ध था कि उसे अपनी स्थिति की कमजोरी और शक्ति पर ध्यान दने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। वह विजय के प्रति इतना आश्वस्त था कि उसकी सेना ने रामसर से दौराई तक की 22 मील की दूरी दो दिन में पूरी कर ली। दौराई में उसने अपना डेरा लगाया जहाँ से अब वह दारा से केवल दो मील दूर रह गया। राजा जयसिंह ने औरंगजेब के दाहिनी ओर मोर्चा जमाया। पुर्दिल खां को 150 आदमियों की एक टुकड़ी के साथ, रात्रि में ही शत्रु से सम्पर्क करने के लिये भेजा गया। उसने एक मील आगे चलकर रात्रि में एक नीची पहाड़ी पर अपना मोर्चा जमाया। यहाँ से दारा भी एक मील रह गया।

    जब प्रातः होने पर दारा के आदमियों ने पुर्दिल खां को पहाड़ी पर मोर्चा जमाये हुए देखा तो उन्होंने पुर्दिल खां पर आक्रमण किया। इस पर औरंगजेब ने शफ्शकिन खां को पुर्दिल खां की सहायता के लिये भेजा। शफ्शकिन खां ने पुर्दिल खां के पास पहुँचकर दारा के आदमियों पर फायरिंग आरंभ कर दी। दारा के आदमी मुड़कर पीछे चले गये। इस पर शफ्शकिन खां ने तेजी से पहाड़ियों पर अपने आदमी फैला कर जमा दिये। इसके बाद उन्होंने दारा के मोर्चों की तरफ लम्बी दूरी की फायरिंग आरंभ कर दी। शफ्शकिन खां ने अपने मोर्चे की रक्षा के लिये शेख मीर तथा दिलेरखां के नेतृत्व में रक्षा टुकड़ियां तैनात कीं जो इन्हें आकस्मिक हमलों से बचा सके।

    अब औरंगजेब की सेना ने सामान्य आक्रमणों के लिये स्वयं को व्यवस्थित कर लिया। अमीर उल उमरा तथा राजा जयसिंह को औरंगजेब के वाम पार्श्व पर नियुक्त किया गया, उनका मुख कोकला पहाड़ी की तरफ था। दाहिनी ओर नियुक्त असद खां तथा होशदाद खां को घाटी के बाईं ओर आक्रमण करने के निर्देश दिये गये जो बीठली गढ़ की तरफ की एक खड़ी चट्टान से लगी हुई थी। इसके बाद शफ्शकिन खां अपनी तोपों को तीन सौ गज और आगे ले गया।

    11 मार्च 1659 की शाम के समय दोनों तरफ से भारी बमबारी आरंभ हुई जो पूरी रात चलती रही। अगले दिन का काफी हिस्सा भी इसी बमबारी में गुजर गया। वातावरण में धुंए का गुब्बार आंधी की तरह छा गया। इसके बीच में से तोपों से निकले गोलों की चिंगारियां बिजली की तरह चमकती थीं। पूरी धरती पर गंधक, आग और लपटें फैल गईं। इस धुंए की ओट में छिपकर दोनों ओर के सिपाही, शत्रु तोपों तक पहंुचे और उन्होंने द्वंद्व युद्ध करके तोपचियों को काबू कर लिया। इस कारण तोपें कुछ देर के लिये बंद हो गईं किंतु शीघ्र ही इन सिपाहियों को पीछे से आये प्रतिद्वंद्वियों की बंदूकों की गोलियों, तलवारों तथा बर्छियों ने वापस धकेल दिया। औरंगजेब की सेना की तरफ से फायरिंग जारी रही।

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