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  • अजमेर का इतिहास - 24

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 24

    शाहजहाँ


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ई.1627 में राजौरी में जहाँगीर की मृत्यु हो गई। उस समय खुर्रम दक्षिण में था। जहाँगीर की मृत्यु का समाचार मिलते ही वह अहमदाबाद तथा गोगून्दा होता हुआ अजमेर आया तथा आनासागर झील के किनारे ठहरा। अजमेर में ही उसे समाचार मिला कि उसका भाई शहरयार गिरफ्तार कर लिया गया है जिसे नूरजहाँ बेगम आगरा के तख्त पर बैठाना चाहती थी। इस समाचार से खुर्रम का बादशाह बनना निश्चित हो गया। अतः खुर्रम ख्वाजा मोइनुद्दीन की दरगाह पर उपस्थित हुआ। वहाँ उसने संगमरमर की विशाल मस्जिद बनाने का आदेश दिया। उसने महाबत खां को अजमेर का साहिब-ए-सूबा (सूबेदार) नियुक्त किया व स्वयं आगरा जाकर शाहजहाँ के नाम से तख्त पर बैठ गया।

    ई.1628 में शाहजहाँ ने महाबतखां को तथा ई.1629 में हासुबखां को अजमेर का फौजदार (सूबेदार) नियुक्त किया। ई.1629-30 में मुताकब खां अजमेर का फौजदार नियुक्त हुआ। ई.1630 में इखलास खां हुसैनबेग को अजमेर का फौजदार नियुक्त किया गया। ई.1631 में मिर्जा मुजफ्फर किरमानी को अजमेर का फौजदार नियुक्त किया गया।

    बिट्ठलदास गौड़ को अजमेर की फौजदारी

    ई.1632 में श्रीनगर (अजमेर के निकट) के राजा बिट्ठलदास गौड़ को अजमेर का फौजदार नियुक्त किया तथा उसे अजमेर से लेकर रणथंभौर के मध्य स्थित समस्त दुर्ग प्रदान किये। बिट्ठलदास ई.1637 तक अजमेर का फौजदार रहा। उसके पुत्र को अजमेर का नायब फौजदार बनाया गया। शाहजहाँ के काल में अजमेर सूबे में पर्याप्त शांति रही। शाहजहाँ ने उपद्रव करने वालों के विरुद्ध सख्ती से काम लिया। शाहजहाँ ने आमेर नरेश मिर्जा राजा जयसिंह को चाटसू तथा अजमेर के परगने प्रदान किये। 4 नवम्बर 1632 को शाहजहाँ ने मिर्जा राजा जयसिंह को निर्देश दिये कि माघ पुत्र कंकार कच्छवाहा के भतीजे रतनसिंह ने अनुरोध किया है कि वह परगना रोशनपुर व नारायणा सूबा अजमेर में जागीरदार है जिसमें केसरीसिंह एवं कल्याणदास राजपूत जमींदार, आतंकित करके उक्त परगनों में अकारण हस्तक्षेप करते हैं और वादी के कुछ व्यक्तियों को बिना त्रुटि के मार दिया है। अतः राजा जयसिंह उपद्रवियों को उद्दण्डता करने से रोकें और वतन से बाहर निकाल दें। ई.1636 में शाहजहाँ ने अकबर की दरगाह में जामा मस्जिद का निर्माण किया। ख्वाजा की दरगाह का वर्तमान गुम्बद, सफेद संगमरमर से, शाहजहाँ ने ही बनवाया।

    आनासागर पर निर्माण कार्य

    ई.1636-37 में राजा भीमसिंह सियोदिया अजमेर का फौजदार हुआ तथा अगले ही वर्ष ई.1637-38 में सयैद बाघा को अजमेर की फौजदारी मिली। शाहजहाँ ने कई बार अजमेर की यात्रा की। उसके आदेश पर आनासागर झील के किनारे 1240 फुट लम्बी दीवार बनवाई गई तथा संगमरमर के पांच मण्डप तथा तुर्की शैली के स्नानागार बनाये गये जो ई.1637 में बनकर तैयार हुए। इनमें से तीसरे नम्बर का मण्डप दिल्ली किले के दीवाने खास की अनुकृति है। मुआसिरउलउमरा के अनुसार जहाँगीर ने अजमेर तथा अहमदाबाद में भवन निर्माण पर 10 लाख रुपये व्यय किये जबकि ताजमहल के निर्माण पर 50 लाख रुपये व्यय हुए थे। शाहजहाँ अजमेर में आनासागर के किनारों पर बने महलों में रहा करता था। शाहजहाँ के शासन काल में अजमेर में कुछ सिक्के ढाले गये।

    शाहजहाँ की अंतिम अजमेर यात्रा

    ई.1638-47 की अवधि में शाह अली अजमेर का फौजदार रहा। ई.1640 में मीरक मुइनुद्दीन अहमद को अजमेर का बक्शी नियुक्त किया गया। उसे अजमेर सूबे का समाचार लेखक भी बनाया गया। ई.1648 में नूरजहाँ के भाई के पुत्र मिर्जा अबू सईद को अजमेर का फौजदार बनाया गया किन्तु बीमार होने के कारण वह कुछ ही दिन अजमेर में रुक कर आगरा चल गया। फिर भी वह ई.1651 तक इस पद पर बना रहा। ई.1653 में पृथ्वीसिंह राठौड़ को तथा ई.1654 में बहादुर को अजमेर का फौजदार बनाया गया। ई.1654 में शाहजहाँ ने असद उल्लाह खां के नेतृत्व में एक सेना भेजकर चित्तौड़ दुर्ग में हुए नव निर्माण को नष्ट करने के आदेश दिये। अभियान की सफलता सुनिश्चित करने के लिये शाहजहाँ स्वयं भी अजमेर आ गया। यह उसकी आखिरी अजमेर यात्रा थी। शाहजहाँ के समय में अजमेर सूबे का राजस्व डेढ़ करोड़ रुपये हो गया। ई.1655-1656 में पहले राजा रूपसिंह को और बाद में रामसिंह को फौजदार बनाया गया। ई.1657-58 में मिर्जाजार अस्तराबदी को अजमेर का फौजदार नियुक्त किया गया।

    शाहजहाँ कालीन अजमेर

    शाहजहाँ ने अजमेर नगर के चारों ओर के परकोटे का जीर्णोद्धार करवाया तथा इसका विस्तार भी करवाया। उसने परकोटे में स्थित चांदपोल दरवाजा, देहली दरवाजा, कड़क्का चौक के पूर्वी सीमा वाला दरवाजा, मदार दरवाजा और डिग्गी से पचास कदम उत्तर की तरफ का दरवाजा बनवाया। (यह दरवाजा ई.1885 में तोड़ गया।) अब यह नया परकोटा ही नगर की सीमा बन गया। इस परकोटे के बनने से अजमेर नगर की सूरत बदल गई किंतु इस नगर में न तो सड़कें थीं न कोई नगर पालिका थी।

    मल-मूत्र से भरे हुए पीपे और कनस्तर गली कूंचों में दिखाई देते थे। न पत्थरों का फर्श था, न कोई पुलिस वाला गलियों में फिरता हुआ दिखाई देता था। न इक्के चलते थे न किराये की सेज गाड़ियां थीं। शहर में सड़कों की जगह मनों रेता पड़ा हुआ था जिसमें पेशाब और पानी शोषित हो जाता था। रात को खबरदार-खबरदार की आवाज शहर की सफीलों (परकोटे) से सुनाई देती थी। दरगाह के नौबतखाने के अलावा शाही सूबेदार के दरवाजे पर नौबतें कड़कती थीं। शहर परकोटे के अंदर खंदकें थीं। इन खंदकों में शहर के लोग पाखाना फिरते थे। (ये खाइयां ई.1894 में पाट दी गईं।) उस समय नया बाजार, पुरानी मण्डी और डिग्गी के निकट ऊसरी दरवाजे का भीतरी भाग पूरी तरह वीरान था।

    मदार के पेड़ बहुत अधिक थे, जिन्हें गधे चरा करते थे। शहर के बाहर किसी फकीर की कुटी के अतिरिक्त और कोई मकान न था। अब्दुल्लाहपुरा की सराय सूनी पड़ी रहती थी। (उन्नीसवीं शताब्दी में इस सराय के निकट मदार दरवाजे के अंदर महाजनों की बस्ती हो गई थी।)शहर की सराय मुसाफिरों के लिये थी। अजमेर नगर की यह स्थिति ब्रिटिश शासन आरंभ होने तक रही।

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