Blogs Home / Blogs / अजमेर नगर का इतिहास - पुस्तक / अजमेर का इतिहास - 23
  • अजमेर का इतिहास - 23

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 23

    नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर


    सत्रहवीं शताब्दी में अजमेर

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अकबर ने ई.1602 में अमानत खां को अजमेर का बख्शी तथा इतिहास लेखक नियुक्त किया। ई.1603-1604 में शहबाज खां को अजमेर का सूबेदार बनाया। ई.1603 में शहजादे सलीम को माफी मिल गई और उसे दुबारा अजमेर का सूबेदार बनाया गया। जब उसे अजमेर रवाना किया गया तो उसने आगरा से बाहर आकर, शहंशाह अकबर को बड़ी-भारी मांगें भिजवाईं तथा अजमेर जाने से मना कर दिया। अकबर ने उसे अयोग्य समझकर अजमेर न जाकर इलाहाबाद जाने की छूट दे दी ताकि वह अपने दुव्यर्सनों में व्यस्त रह सके।

    जहाँगीर का अजमेर में प्रवास

    ई.1605 में अकबर की मृत्यु हो गई तथा उसका बड़ा पुत्र सलीम, अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर के नाम से आगरा की गद्दी पर बैठा। उसने अपने हाथों से ही अपने सिर पर ताज रखा तथा बादशाह गाजी की उपाधि धारण की। ई.1605 में जहाँगीर ने गोकलदास को अजमेर सूबे की सावर जागीर प्रदान की। जहाँगीर ने ई.1608-1609 में मिर्जा मसूद को, ई.1609-1610 में सयैद अली को अजमेर का फौजदार (सूबेदार) नियुक्त किया। ई.1610 में मुगल सेनापति महावत खां ने मेवाड़ के विरुद्ध अभियान किया किन्तु महाराणा अमरसिंह ने उसे परास्त कर दिया। जहाँगीर ने ई.1611-1612 में सफदर खान को अजमेर का सूबेदार नियुक्त किया। ई.1611 में जहाँगीर ने मारवाड़ रियासत के राठौड़ राजकुमार किशनसिंह को अजमेर के निकट सेठोलाव जागीर प्रदान की जहाँ किशनसिंह ने किशनगढ़ रियासत की स्थापना की।

    ई.1613 में जहाँगीर ने मेवाड़ महाराणा अमरसिंह के विरुद्ध युद्ध अभियान चलाया। उसने भी अकबर की तरह मेवाड़ के विरुद्ध अभियान चलाने के लिये, अजमेर को अपना मुख्यालय बनाया। 18 नवम्बर 1613 को जहाँगीर आगरा से अजमेर आया तथा ख्वाजा की दरगाह पर उपस्थित हुआ।

    जब मारवाड़ नरेश महाराजा सूरसिंह को ज्ञात हुआ कि जहाँगीर अजमेर में है तो वह अपने कुंवर गजसिंह को लेकर अजमेर आया और जहाँगीर की सेवा में उपस्थित हुआ।

    किशनगढ़ का राजा किशनसिंह जो कि महाराजा सूरसिंह का छोटा भाई था, भी अजमेर आकर जहाँगीर की सेवा में उपस्थित हुआ। उसी वर्ष जहाँगीर ने शहजादे शाहजहाँ को मेवाड़ पर चढ़ाई करने के लिये भेजा। इस सन् का एक शिलालेख हाथीभाटा में मिला है जिसमें कहा गया है कि भयानक दुर्भिक्ष के कारण इस वर्ष एक रुपये का एक सेर गेहूं बिका।

    जहाँगीर पूरे तीन साल अजमेर में रहा। यहाँ रहकर उसने मेवाड़ के विरुद्ध पूरी शक्ति झौंक दी। परिणाम स्वरूप मेवाड़ का महाराणा अमरसिंह मुगलों से सन्धि करने को विवश हो गया। यह सन्धि सिसोदिया कुल की मर्यादाओं के अनुरूप हुई। अजमेर में ही जहाँगीर की पौत्री-जहॉंआरा तथा दो पौत्रों- दारा एवम शुजा का जन्म हुआ। जहाँगीर ने अजमेर में महल, मकबरे एवं बाग बनवाये। जहाँगीर के शासन-काल में आठवें वर्ष में उसी की आज्ञा से पुष्कर के निकट हिन्दू मन्दिरों को विनष्ट किया गया।

    जहाँगीर के काल में अजमेर टकसाल

    जहाँगीर के शासन काल में अजमेर की टकसाल में सोने, चांदी एवं ताम्बे के सिक्के ढाले गये। हिजरी 1023 में (ई.1618) में उसने ऐसी दो मुहरें अजमेर टकसाल से ढलवाईं जिनपर जहाँगीर का आवक्ष चित्र बना हुआ है। इन चित्रों में वह पालथी मारे बैठा है तथा उसके दाहिने हाथ में एक चषक है। इन मुद्राओं पर फारसी में शबीह हजरत शाह जहाँगीर तथा पृष्ठ भाग पर सूर्य का चिह्न बना हुआ है। इसके चारों ओर फारसी में अल्लाहु अकबर ज़रब अजमेर लिखा हुआ है। अब यह सिक्का लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में सुरक्षित है।

    जहाँगीर ने अजमेर की टकसालों से राशिबोधक सिक्के जारी करवाये। इन सिक्कों को जिस माह में जारी किया जाता था, उस माह में सूर्य जिस राशि में होता था, उस राशि की सूचना अंकित की जाती थी। हिज्री 1034 में उसने अजमेर से एक कर्क राशि की मुहर जारी की जिस पर साम्राज्ञी नूरजहाँ बेगम का नाम अंकित है। जहाँगीर के शासन काल में अजमेर टकसाल से सोने की ऐसी मुहरें जारी की गईं जिन पर कई सूचनाएं अंकित हैं। ये सिक्के बहुत कम संख्या में ढाले गये थे इस कारण ये अत्यंत दुर्लभ माने जाते हैं। जहाँगीर के शासन काल में भी इन सिक्कों का सैट एकत्रित कर पाना अत्यंत कठिन था। जहाँगीर के राशिबोधक सिक्कों का पूरा सैट ब्रिटिश म्यूजियम लंदन में सुरक्षित है। पूरा सैट अन्यत्र कहीं उपलब्ध नहीं है।

    अजमेर में ब्रिटिश अधिकारियों का आगमन

    ई.1614 में अंग्रेज यात्री जॉन मिडन हॉल अजमेर आया। जून 1614 में अजमेर में ही उसकी मृत्यु हुई। वह अजमेर में मरने वाला पहला यूरोपियन था। उसकी मृत्यु के दिन थॉमस कैरिज भी अजमेर पहुँचा। थॉमस कैरिज आगे चलकर सूरत की व्यापारिक कोठी का प्रेसीडेंट बना। ई.1614 में ही अंग्रेजों ने सूरत कारखाने के अधीन अजमेर में एक कारखाना स्थापित किया। मिडनहॉल रोमन कैथोलिक था, उसे आगरा में दफनाया गया। ई.1614 में जहाँगीर ने जोधपुर के राजा सूरसिंह को अजमेर से मेवाड़ पर चढ़ाई करने के लिए भेजा। सूरसिंह ने मेवाड़ को जाने वाले समस्त पहाड़ी रास्ते बंद कर दिये।

    जून 1615 में अंग्रेज यात्री टॉम कोर्याट अजमेर आया। उसने एक पर्चा प्रकाशित किया जिसका शीर्षक था- 'टॉम कोरयार्ट, ट्रैवलर फॉर द इंगलिश विट्स; ग्रीटिंग, फ्रॉम दी कोर्ट ऑफ दी ग्रेट मुगल एट अजमेर।' जुलाई 1615 में एक अन्य अंग्रेज यात्री मि. विलिंगडन अजमेर आया।

    दारा शिकोह का जन्म

    शहजादा खुर्रम को अजमेर में ही शाहजहाँ की उपाधि दी गई। इस अवसर पर खुर्रम ने अपनी सेना की परेड का प्रदर्शन आम जनता के सामने करवाया। पर्सियन राजदूत मुहम्मद रिजि अजमेर में ही जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ। अजमेर में ही जहाँगीर ने अपनी चहेती बेगम नूरमहल को नूरजहाँ की उपाधि दी। खुर्रम (शाहजहाँ) के बड़े पुत्र दारा शिकोह का जन्म भी दिसम्बर 1615 में अजमेर में हुआ।

    जहाँगीर द्वारा अजमेर में निर्माण कार्य

    18 नवम्बर 1613 से 10 नवम्बर 1613 तक की अवधि के अपने तीन साल के अजमेर प्रवास में जहाँगीर नौ बार मोइनुद्दीन की दरगाह पर गया, पन्द्रह बार पुष्कर झील देखने गया तथा अड़तीस बार चश्मा-ए-नूर देखने गया। आनासागर झील पर उसने दौलत बाग बनवाया। दौलत बाग से कैसर बाग जाने वाले मार्ग पर उसने कुछ महल बनवाये जिनके कुछ खण्डहर आज भी देखे जा सकते हैं। तारागढ़ की पश्चिमी घाटी में उसने सुन्दर और विशाल महल का निर्माण करवाया जो ई.1615 में बनकर तैयार हुआ। अपने अजमेर प्रवास का अधिकतर समय जहाँगीर ने अकबर के महल में व्यतीत किया जहाँ वह नियमित रूप से झरोखे में न्याय करने के लिये बैठता तथा उसके नीचे के मैदान में जहाँ अपराधियों को सजा दी जाती थी, वह हाथियों की लड़ाई देखा करता था।

    महाराजा किशनसिंह की हत्या

    ई.1615 में महाराजा किशनसिंह के भाई जोधपुर नरेश सूरसिंह के आदमियों ने महाराजा किशनसिंह की हत्या कर दी। किशनसिंह की मृत्यु के सम्बन्ध में अलग-अलग विवरण मिलता है। कर्नल टॉड ने लिखा है कि खुर्रम के कहने पर किशनसिंह ने जोधपुर नरेश गजसिंह के भाटी सरदार गोविन्ददास को मार डाला। इससे गजसिंह अत्यंत दुखी हुआ। (टॉड ने यहाँ भारी चूक की है। इस समय तक गजसिंह गद्दी पर नहीं बैठा था।) बलदेव प्रसाद मिश्र ने इस पर टिप्पणी की है कि किशनसिंह ने खुर्रम के कहने पर गोविंददास को नहीं मारा था। गोविंददास ने सरवनसिंह के भतीजे गोपालदास को अजमेर में महाराजा शूरसिंह के डेरे पर जाकर रात्रि के समय जेठ सुदी 8 संवत 1771 अर्थात् 1615 ई. को मारा था जिसके बदले में तड़के ही कुंवर गजसिंह ने अपने पिता के आदेश से पीछा करके अपने काका किशनसिंह को किशनगढ़ जाते हुए मार्ग में मार डाला। (पं. बलदेव प्रसाद ने भी यहाँ चूक की है। कुं. गजसिंह, गोपालदास की हत्या का बदला लेने नहीं गया होगा अपितु किशनसिंह द्वारा गोविंददास की हत्या किये जाने पर गजसिंह ने किशनसिंह का पीछा किया होगा।)

    इस हत्या के सम्बन्ध में जहाँगीर ने लिखा है कि 26 मई 1615 को एक अजीब बात हुई। मैं उस रात दैवयोग से पुष्कर में ही था। राजा सूरसिंह का भाई किशनसिंह, सूरसिंह के वकील गोविंददास पर जिसने कुछ समय पूर्व किशनसिंह के भतीजे गोपालदास को मारा था, अप्रसन्न था। किशनसिंह को आशा थी कि इस अपराध के लिये सूरसिंह गोविंददास को मरवा देगा परंतु सूरसिंह ने गोविंददास की योग्यता का विचार करके ऐसा न किया। किशनसिंह ने ऐसी दशा में स्वयं अपने भतीजे की हत्या का बदला लेने का निश्चय किया। जब किशनसिंह के भतीजे की मृत्यु को काफी दिन बीत गये तो उसने अपने अनुचरों को बुलाकर कहा कि आज रात को मैं गोविंददास को मार डालूंगा।

    सवेरा होने से कुछ समय पहले किशनसिंह अपने साथियों सहित राजा सूरसिंह के डेरे पर पहुँचा, जहाँ से उसने कुछ आदमियों को पहले गोविंददास के डेरे पर भेजा, जो निकट ही था। उन्होंने भीतर प्रवेश कर गोविंददास को उसके कई अनुचरों सहित मारा डाला। जब ये समाचार किशनसिंह को मिले तब वह भी उतावला होकर अश्वारूढ़ हो, साथियों के मना करने पर भी गोविंददास के डेरे में घुस गया। इस कोलाहल में सूरसिंह की नींद खुल गई और वह नंगी तलवार लेकर बाहर निकल आया। उसके अनुचर भी जागकर चारों तरफ से दौड़े। किशनसिंह और उसके साथियों के अंदर पहुँचते ही वे उन पर टूट पड़े।

    फलस्वरूप किशनसिंह और उसका भतीजा करण वहीं मारे गये। सूरसिंह के 30 आदमी और किशनसिंह की तरफ के 36 आदमी मारे गये। दिन निकलने पर इस बात का पता चला और राजा सूरसिंह ने अपने भाई, भतीजे एवं कई प्रिय अनुचरों को मरा हुआ पाया। इस घटना के बाद जहाँगीर ने सूरसिंह को खुर्रम की सहायता के लिये मेवाड़ भेज दिया। मेवाड़ में कार्य पूर्ण हो जाने के बाद सूरसिंह पुनः अजमेर आया। उसने जहाँगीर को दो हाथी, 100 मोहरें तथा तेतालीस हजार रुपये भेंट किये।

    टॉमस रो अजमेर में

    10 जनवरी 1616 को ब्रिटिश सम्राट चार्ल्स प्रथम का राजदूत सर टॉमस रो जहाँगीर की सेवा में अजमेर में उपस्थित हुआ। (हर बिलास शारदा ने यह तिथि 23 दिसम्बर 1615 बताई है।) टॉमस रो ने अपनी डायरी में लिखा है कि बादशाह पुराने शहर में रहता था। केवल उसी का मकान पक्का था, अजमेर में कच्चे घरों की संख्या बहुत ज्यादा थी जो बरसात में गिर जाया करते थे। उसने ख्वाजा की दरगाह, अढाई दिन का झौंपड़ा, दरगाह बाजार तथा शहर परकोटे का उल्लेख तक नहीं किया है। जब टॉमस रो अजमेर पहुँचा तो सूरत में ब्रिटिश कम्पनी के ऐजेन्ट मि. एडवर्ड ने टॉमस रो का अजमेर में स्वागत किया।

    टॉमस रो लिखता है- उस समय कुछ क्रिश्चियन परिवार अजमेर में रहते थे जो सूरत कम्पनी के हितों की रक्षा के लिये मुगल दरबार से निरन्तर सम्पर्क बनाये रहते थे। अंग्रेज कम्पनी के ये अधिकारी फ्रेंच, पोर्चुगीज, डच तथा अन्य विदेशी व्यापारियों से स्पर्धा में आगे रहने के लिये मुगलों की हाजरी बजाया करते थे। टॉमस रो ने कुछ स्थानीय क्रिश्चियन परिवारों का भी उल्लेख किया है जो संभवतः पहले हिन्दू या मुसलमान थे और अंग्रेजों के रहन-सहन से प्रभावित होकर क्रिश्चियन बन गये थे।

    जिस समय टॉमस रो भारत आया, उस समय अजमेर में मास्टर एडवर्ड्स के अधीन एक कारखाना चलता था जो सूरत के कारखाने के अधीन था। टॉमस रो एक साल तक अजमेर में रहा। वह जहाँगीर से, भारत में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त करना चाहता था। जहाँगीर के साथ उसका पहला साक्षात्कार 19 जनवरी 1616 को हुआ। जहाँगीर ने उसे कोई महत्त्व नहीं दिया। यहाँ तक कि जहाँगीर ने अपनी पुस्तक में टॉमस रो का उल्लेख तक नहीं किया है। जहाँगीर की आज्ञा से भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को व्यापार करने की अनुमति मिली। 19 अगस्त 1616 को सर टॉमस रो का सचिव सम्मानित जॉन हॉल, अजमेर में मृत्यु को प्राप्त हो गया। यह अजमेर में मरने वाला दूसरा यूरोपियन था। टॉमस रो के अजमेर प्रवास की पूर्ण जानकारी दी एम्बेसी ऑफ सर टॉमस रो नामक पुस्तक में दी गई है।

    कुंवर कर्णसिंह अजमेर में

    16 फरवरी 1616 को उदयपुर का राजकुमार कर्णसिंह जहाँगीर के अजमेर दरबार में उपस्थित हुआ। जहाँगीर ने उसे 2 लाख रुपये, पांच हाथी और 110 घोड़े देकर 5 जून को पुनः विदा कर दिया। इसी वर्ष जहाँगीर ने अजमेर में वीसल झील की मरम्मत करवाई। इसी वर्ष जहाँगीर ने पुष्कर में दो घाटों का निर्माण करवाया। इस आशय के शिलालेख आज भी इन घाटों पर लगे हुए हैं।

    ब्राह्मणों को पुष्कर का पट्टा

    24 जून 1616 को अजमेर में शाहजहाँ के पुत्र शुजा का जन्म हुआ। ई.1616 में जहाँगीर ने अजमेर दरबार में राठौड़ राजकुमार कुंवर गजसिंह को जालोर का परगना दिया जो अब तक बिहारी मुसलमानों के अधीन था। गजसिंह ने बिहारी पठानों को परास्त कर जालोर पर अधिकार कर लिया। पठान भागकर पालनपुर चले गये जिन्होंने पालनपुर में मुस्लिम रियासत स्थापित की जो भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति तक चलती रही। इसी वर्ष जहाँगीर ने ब्राह्मणों को पुष्कर की जागीर का पट्टा प्रदान किया।

    मेरों ने जहाँगीर का डेरा लूटा

    10 नवम्बर 1616 को जहाँगीर अजमेर से माण्डू के लिये रवाना हुआ। जहाँगीर के शासन काल में अजमेर के दक्षिण तथा दक्षिण पूर्व में 650 वर्ग मील क्षेत्र की लम्बी पट्टी के रूप में स्थित मेरवाड़ा मुगलों के अधीन नहीं था। इस अनुपजाऊ पहाड़ी क्षेत्र में मेर जाति निवास करती थी जो मुख्यतः डाके डाल कर जीवन यापन करती थी। ई.1616 में जब जहाँगीर अजमेर से दक्षिण की ओर रवाना हुआ तो उसको अपना शिविर मेर क्षेत्र में लगाना पड़ा। मेरों ने इस शिविर पर डाका डाला और उसे लूट लिया। मेरों को मेवाड़, मारवाड़, जयपुर तथा अजमेर के शासक भी नियन्त्रित नहीं कर पाये। कई बार मेरों के गांव जलाये गये और उनके सरदारों को पकड़कर कत्ल किया गया। 19 दिसम्बर 1616 को पर्सिया का राजदूत मुहम्मद राजबेग अजमेर में जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ। इसी वर्ष 1 दिसम्बर को सर टॉमस रो इंग्लैण्ड वापिस लौट गया। उसने रामसर में विश्राम किया।

    जहाँगीर ने अजमेर नगर की बसावट में कोई परिवर्तन नहीं किया। उसने आनासागर के बांध को मजबूत बंधवाकर उस पर संगमरमर के भवन बनवाए और इसके पूर्व में एक उद्यान लगवाया जिसे अकबर द्वारा निर्मित दौलतखाना के नाम पर दौलत बाग कहा गया। आजादी के बाद से इसे सुभाष बाग कहते हैं। ई.1618 में जहाँगीर ने करीमदाद खां को अजमेर का फौजदार बनाया। ई.1623 में जहाँगीर ने मुहम्मद मुराद को अजमेर का फौजदार बनाया। ई.1624-25 में उसने अजमेर की फौजदारी सार्दुलसिंह को सौंपी। ई.1626 में मिर्जा अब्दुर्रहीम खानखाना को तथा ई.1627 में मिर्जा मुन्नू को अजमेर का फौजदार नियुक्त किया।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×