Blogs Home / Blogs / अजमेर नगर का इतिहास - पुस्तक / अजमेर का इतिहास - 22
  • अजमेर का इतिहास - 22

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 22

    मुहम्मद जलादुद्दीन अकबर (3)


    मुल्लाओं की नाराजगी से पैदल यात्राएं बंद

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    इस यात्रा के बाद अकबर कभी अजमेर नहीं आया। इसका कोई स्पष्ट कारण तो नहीं है किंतु माना जाता है कि उसके द्वारा हर साल ख्वाजा की दरगाह पर की जा रही यात्राओं के कारण मुल्ला लोग नाराज हो गये थे क्योंकि अकबर पैगम्बर के स्थान पर ख्वाजा को मानने लगा था। इसलिये मुल्लों ने अकबर के विरुद्ध फतवे जारी कर दिये। हजारों प्रभावशाली लोग अकबर के दुश्मन हो गये तथा मुल्लों ने अकबर के भाई हकीम मिर्जा को आगरा का बादशाह बनने के लिये आमंत्रित किया। यह भी कहा जाता है कि इस उम्र तक आते-आते मजहब के सम्बन्ध में अकबर का दृष्टिकोण बदलने लगा था।

    इन सब कारणों से अकबर ने अजमेर आना बंद कर दिया। एक कारण यह भी बताया जाता है कि अब तक अजमेर के चारों ओर की समस्त रियासतें अकबर के अधीन आ चुकी थीं, इसलिये अब उसे अजमेर जाने की आवश्यकता नहीं रह गई थी। यद्यपि अकबर ई.1605 तक जीवित रहा किंतु ई.1579 के बाद कभी अजमेर नहीं आया। अकबर की अजमेर यात्राओं ने अजमेर को प्रांतीय राजधानी का स्तर प्रदान किया जो दीर्घकाल तक अक्षुण्ण बना रहा।

    गुलबदन बेगम अजमेर में

    अकबर ने ई.1580 में अब्दुर्रहीम खानखाना को अजमेर का नाजिम बनाया ई.1580 में अकबर ने शहजादे दानियाल को अजमेर भेजा। दानियाल रहीमखां का जंवाई था। दानियाल ने ख्वाजा की दरगाह के पास रहने वाले फकीरों में 25 हजार रुपये वितरित किये। ई.1582 में हुमायूं की बहन गुलबदन बेगम तथा अकबर की पत्नी सलीमा बेगम हिजाज (मक्का तथा मदीना के क्षेत्र को हिजाज कहा जाता है।) की यात्रा से लौटते हुए अजमेर पहुँची। अकबर ने शहजादे सलीम को निर्देश दिये कि वह इन दोनों बेगमों को सुरक्षा के साथ आगरा ले आये। सलीम अजमेर आया तथा इन दोनों शाही महिलाओं को अपने साथ आगरा ले गया।

    मुगलिया प्रांतों का पुनर्गठन

    अकबर ने ई.1581 में राजा मानसिंह को तथा ई.1586 में जगन्नाथ को अजमेर का नाजिम बनाया। उसके साथ राय दुर्गा को अजमेर का दीवान तथा सुल्तान कुली को अजमेर सूबे का बख्शी नियुक्त किया गया। जगन्नाथ के बाद राय दुर्गा को अजमेर का नाजिम बनाया गया। यह 1589 तक अजमेर का नाजिम रहा। ई.1589 में गोपाल जाधव को अजमेर का नाजिम बनाया गया। यह उसी वर्ष अजमेर में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। ई.1591-92 में माधोसिंह को अजमेर का नाजिम बनाया गया। ई.1592 में अकबर ने अपने पूरे साम्राज्य को चार क्षेत्रों में बांटा। अजमेर, गुजरात तथा मालवा को मिलाकर एक क्षेत्र बनाया गया।

    महाराजा सूरसिंह को अजमेर के परगने

    ई.1594 में शेरुया खां को अजमेर का पेशबां नियुक्त किया गया। ई.1595 में राठौड़ राजकुमार सूरसिंह को जोधपुर का राजा बनने पर अकबर की ओर से अजमेर सूबे के कई परगने दिये गये जिनका विवरण इस प्रकार है- पीसांगन परगना (मूल्य 20 हजार रुपये), समेल परगना (मूल्य 4 हजार रुपये), नारू (मूल्य 800 रुपये), भदसूरिया (मूल्य 800 रुपये), मेरवाड़ा (मूल्य 87 हजार 631 रुपये; 12 गांव), तेरवाड़ा (मूल्य 54 हजार 524 रुपये; 14 गांव), झारवासा एंव अधवासा (मूल्य 1 लाख रुपये)। ई.1597 में सुल्तान सालिम को अजमेर का नाजिम नियुक्त किया गया।

    शहजादे सलीम को अजमेर की सूबेदारी

    ई.1598 में शहजादे सलीम (जहाँगीर) का नायब शहबाजखां मेवाड़ पर चढ़ाई करने के लिये अजमेर आया। अगले ही वर्ष अजमेर में उसकी मृत्यु हो गयी। इस पर ई.1599 में अकबर ने शहजादे सलीम को अजमेर का सूबेदार बनाया ताकि वह अजमेर में रहकर मेवाड़ के राणा अमरसिंह के विरुद्ध लड़ाई जारी रख सके। उसके साथ राजा मानसिंह को भी भेजा गया। अजमेर पहुँचकर सलीम तो कुसंगति में पड़कर दुव्यर्सनों में व्यस्त हो गया और मानसिंह ने अमरसिंह के विरुद्ध कड़ी मोर्चा बन्दी की। उन्हीं दिनों बंगाल में विद्रोह हुआ। अकबर अपनी सेना के साथ खानदेश में था। इसलिये अकबर ने बंगाल के विद्रोह को दबाने के लिये राजा मानसिंह तथा शहजादा सलीम को बंगाल जाने के आदेश भिजवाये।

    मानसिंह तो अपनी सेनाएं लेकर उसी समय बंगाल के लिये रवाना हो गया किंतु सलीम ने बंगाल जाने से मना कर दिया। सलीम के लिये यह बादशाह बनने का अच्छा अवसर था। अकबर मुगलों की विशाल सेना के साथ दक्षिण में था। अकबर का प्रमुख सेनापति राजा मानसिंह अपनी सेना के साथ बंगाल को कूच कर गया था, तथा सलीम अपनी सेनाओं के साथ राजपूताने में मौजूद था। अतः सलीम ने आगरा पर कब्जा करने और बादशाह बनने की योजना बनाई।

    संयोग से उन्हीं दिनों सलीम के सहायक शहबाज खां कम्बू की मृत्यु हो गई तथा उसके एक करोड़ रुपये सलीम के हाथ लग गये। उन दिनों आगरा में 20 करोड़ रुपये का खजाना मौजूद था। अब सलीम ने आगरा के खजाने को लूटने की योजना बनाई तथा अपनी सेनाओं को मेवाड़ से अजमेर बुला लिया। जब सेनाएं अजमेर पहुँच गईं तो सलीम पूरी तैयारी के साथ आगरा के लिये रवाना हो गया। उसने आगरा के किलेदार कुलीच खां से आगरा लेने के प्रयास किये किंतु कुलीच खां ने सलीम को आगरा देने से मना कर दिया। इस पर सलीम इलाहाबाद चला गया। अंत में सलीमा बेगम की मध्यस्थता से पिता-पुत्र में समझौता हुआ तथा उसके बाद ई.1599-1600 में अकबर ने मीर कालान को अजमेर का सूबेदार बनाया।

    अकबर के समय का अजमेर

    अकबर के समय अजमेर की विचित्र सी शक्ल थी। इधर दिल्ली दरवाजा तक और उधर लाखन कोठरी तक, पश्चिम में अंदर कोट तक, ऊसरी दरवाजा की तरफ डिग्गी तक और आगरा दरवाजा की तरफ नया बाजार की पश्चिमी सीमा चौक कड़कशाह की पूर्वी सीमा तक और मदार दरवाजे से 70 कदम पश्चिम की तरफ तक अजमेर शहर आबाद था। कड़क नामक फकीर के नाम पर इसे चौक कड़कशाह कहते थे। दरगाह के मशरिकों में खादिमों की आबादी थी। बाजार और दरगाह कुछ रौनक पर था। बाकी सन्नाटे का आलम था। तारागढ़ के नीचे का पुराना शहर उजड़कर यहाँ आ बसा था।

    अकबर के आदेश से ख्वाजा की दरगाह के सामने एक बाजार की नींव डाली गई तथा इसके चारों ओर लोगों को आबाद होने का आदेश दिया गया। इसे दरगाह बाजार कहते थे। ख्वाजा साहब की दरगाह के चारों तरफ जहाँ झाड़ियां और थोहर के बेशुमार पेड़ और वीराना था, अकबर के आदेश से कुछ ही दिनों में वहाँ बहुत से सुंदर भवन बन गये। अकबर ने अजमेर नगर के पूर्वी भाग में दौलतखाना बनवाया जिसमें अकबर की बेगमें और अकबर रह सके। जब अंग्रेजों का शासन हुआ तो यह भवन मैगजीन कहलाने लगा।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×